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भारत
राजनीति
अंतरधार्मिक विवाह को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद हालात बदलेंगे?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि स्पेशल मैरिज ऐक्ट  के तहत शादी करने वाले जोड़ों को अब किसी सार्वजनिक नोटिस की 'बाधा' से नहीं गुज़रना होगा। नोटिस को अनिवार्य बनाना 'स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन' होगा।
सोनिया यादव
14 Jan 2021
अंतरधार्मिक विवाह
प्रतीकात्मक तस्वीर I

उत्तर प्रदेश में एक ओर बीजेपी की योगी आदित्यनाथ सरकार अवैध धर्मांतरण कानून के जरिए अंतरधार्मिक विवाह की स्थिति को और जटिल बना रही है तो वहीं दूसरी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताज़ा फैसला अलग धर्म में शादी करने वालों के लिए राहत लेकर आया है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्पेशल मैरिज ऐक्ट को लेकर कहा है कि अब इस ऐक्ट के तहत शादी करने वाले जोड़े को 30 दिन पहले नोटिस देने की ज़रूरत नहीं होगी।

आपको बता दें कि अभी तक स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत शादी करने वाले जोड़े को मैरिज ऑफ़िसर के पास महीने भर पहले शादी के लिए अर्ज़ी देनी होती थी। इसके बाद इस अर्ज़ी को नोटिस की शक्ल में सरकारी दफ़्तर के नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक तौर पर चस्पा कर 30 दिनों के भीतर आपत्तियां आमंत्रित की जाती थीं। लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले के ये नोटिस सार्वजनिक करना बाध्यकारी नहीं रह गया है।

क्या है पूरा मामला?

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक इलाबाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार, 12 जनवरी को एक हैबियस कार्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर एक अहम फैसला सुनाया। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि एक बालिग लड़की को दूसरे धर्म से संबंध रखने वाले अपने प्रेमी से शादी करने की उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ हिरासत में लिया गया।

याचिका में कहा गया कि वे दोनों बालिग़ हैं, दोनों ने अपनी मर्ज़ी से शादी की है और दोनों एक दूसरे के साथ रहना चाहते हैं। ऐसे में लड़की के पिता का उसे अपनी निगरानी में रखना ग़ैर-क़ानूनी है।

लड़की ने कोर्ट को बताया कि उसने हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार हिंदू धर्म अपना लिया है लेकिन उसके पिता उसे उसके पति के साथ नहीं रहने दे रहे हैं। हालांकि अदालत के सामने लड़की के पिता ने इस शादी को मंज़ूर कर लिया।

नोटिस की अनिवार्यता 'स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन' है

जोड़े ने कोर्ट को ये भी बताया कि वे स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत शादी करना चाहते थे। लेकिन इस क़ानून में 30 दिनों की एडवांस नोटिस देने की शर्त है जिससे पूरी दुनिया को उनके संबंध के बारे में पता लग जाता। ऐसे नोटिस से उनकी प्राइवेसी का हनन होता और इससे उनकी शादी पर ग़ैर-ज़रूरी सामाजिक दबाव पड़ता। ये उनके 'निजता के अधिकार का उल्लंघन है और उनकी अपनी पसंद की शादी में हस्तक्षेप है'।

लाइव लॉ की खबर के अनुसार उनकी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने इस मुद्दे पर विचार करने के लिए आगे कहा कि 'क्या सामाजिक परिस्थितियां और कानून, जो कि 1872 के अधिनियम और उसके बाद से 1954 के अधिनियम के पारित होने के बाद काफी आगे बढ़ गए हैं, किसी भी तरह से अध‌नियम की धारा 5,6,7 की व्याख्या को प्रभावित करेंगे और क्या परिवर्तन के साथ उक्त धाराएं प्रकृति में अनिवार्य नहीं होंगी?'

कोर्ट ने क्या कहा?

ज‌स्टिस विवेक चौधरी ने 30 दिन पहले नोटिस देकर आपत्तियां आमंत्रित करने के मामले में कहा कि इस प्रकार से नोटिस को अनिवार्य बनाना 'स्वतंत्रता और निजता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन' बताया। देश में ज़्यादातर शादियां लोगों के अपने धार्मिक रीति-रिवाजों के तहत होती हैं और इसमें किसी नोटिस को प्रकाशित करने या इस पर लोगों की आपत्तियां मँगाने का कोई प्रावधान नहीं होता है।

कोर्ट ने कहा कि अगर कोई झूठ बोलकर या जानकारी छुपाकर शादी करता है तो ऐसी शादी किसी भी क़ानून में प्रतिबंधित है। ऐसी स्थिति पैदा होने पर अदालत कभी भी सुनवाई कर सकती है और इस तरह की शादी को ख़ारिज कर सकती है।

जस्टिस विवेक चौधरी की एकल पीठ ने इस मामले में फ़ैसला देते हुए कहा, "अगर स्पैशल मैरिज एक्ट से शादी करने की इच्छा रखने वाले अपने पार्टनर के बारे में और जानकारी लेना चाहते हैं तो वे सेक्शन 6 का इस्तेमाल करते हुए अपनी मर्ज़ी से नोटिस लगवाने का विकल्प चुन सकते हैं। ये उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा क्योंकि ये उन्होंने अपनी मर्ज़ी से चुना होगा।”

कोर्ट ने ये साफ किया कि सेक्शन 6 के तहत नोटिस लगवाना और सेक्शन 7 के तहत आपत्ति आमंत्रित करना शादी के इच्छुक लोगों की अपील पर ही संभव होगा, इसके अलावा नहीं।

बिना अनुरोध के न नोटिस प्रकाशित होगा, न ही आपत्ति पर संज्ञान लिया जाएगा

जस्टिस विवेक चौधरी ने कहा कि कोर्ट ये अनिवार्य करती है कि जो लोग इस ऐक्ट के सेक्शन 5 के तहत शादी करने का नोटिस देते हैं तो उस वक़्त साथ ही साथ उनके पास मैरिज ऑफ़िसर से लिखित में ये अपील करने का भी विकल्प होगा कि वे अपनी शादी का नोटिस प्रकाशित करवाना चाहते हैं या नहीं।

फैसले में कहा गया, "अगर वे प्रकाशित करवाने का कोई लिखित अनुरोध नहीं करते हैं तो मैरिज ऑफ़िसर उनकी शादी का नोटिस न तो प्रकाशित करेगा और न उस पर आने वाली आपत्ति का संज्ञान लेगा।"

हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा कि मैरिज ऑफ़िसर को स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के अधिनियम के तहत शादी करवाने से पहले दोनों पक्षों की पहचान, उम्र, रज़ामंदी और पात्रता सत्यापित करने का अधिकार है। अगर उसे कोई शक हो तो वह जानकारी और सबूत माँग सकता है।

जस्टिस चौधरी ने अपने फ़ैसले के आख़िर में लिखा है, "चूंकि ये मामला एक बड़ी जनसंख्या के मौलिक अधिकार की सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए कोर्ट के सीनियर रजिस्ट्रार इस आदेश की कॉपी राज्य के प्रमुख सचिव तक पहुँचा दें जो राज्य के मैरिज अफ़सरों और संबंधित अधिकारियों को जल्द से जल्द इसे पहुँचाएंगे।"

कई अदालतों ने पहले भी अपनी पसंद की शादी के पक्ष में फैसले दिए हैं

गौरतलब है कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के प्रावधानों के‌ खिलाफ एक रिट याचिका, सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। तो वहीं शादी को लेकर अलग-अलग राज्यों में बन रहे ग़ैरक़ानूनी धर्मांतरण कानूनों को 'लव जिहाद' से जोड़कर देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में बने अवैध धर्मांतरण कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं भी दायर की गई हैं। इसमें दावा किया गया है कि इस तरह के कानून संविधान के बुनियादी ढाँचे को तोड़ते-मरोड़ते हैं।

इन याचिकाओँ के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में ग़ैरक़ानूनी धर्मांतरण क़ानूनों की वैधता की जाँच करेगा।

इस संबंध में हाल ही में कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी कहा था कि यदि अलग-अलग धर्मों के लोगों के विवाह में कोई महिला अपना धर्म बदल कर दूसरा धर्म अपना लेती है और उस धर्म को मानने वाले से विवाह कर लेती है तो किसी अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

अंतर्जातिय विवाह को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए

केरल हाईकोर्ट ने अंतर धार्मिक शादियों के समर्थन में एक फैसले में कहा था कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के विवाह को 'लव-जिहाद' नहीं मानना चाहिए, बल्कि इस तरह के विवाहों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इसी तरह एक अन्य मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी कहा था कि किसी व्यक्ति का मनपसंद व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार उसका मौलिक अधिकार है, जिसकी गारंटी संविधान देता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा था कि धर्म की परवाह किए बग़ैर मनपसंद व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार किसी भी नागरिक के जीवन जीने और निजी स्वतंत्रता के अधिकार का ज़रूरी हिस्सा है। संविधान जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।

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Allahabad High Court
Hindutva
Justice Vivek Chaudhary
Illegal conversion law
Fundamental Rights

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