NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
कोविड-19 के आने से बाक़ी सभी बीमारियां ख़त्म तो नहीं हो गईं न?
“लॉकडाउन के दो महीने और मेरा दवाख़ाना” यह कहानी है एक डॉक्टर की, जिन्होंने इस संकट के समय में भी अपना क्लीनिक लगातार खोले रखा और मरीज़ों का इलाज किया। हमारे आग्रह पर उन्होंने अपने अनुभव लिखे। हालांकि उनका मानना है कि उन्होंने कोई बहादुरी का काम नहीं किया है जो उन्हें वॉरियर इत्यादि कहा जाए या ताली बजाई जाए। उनके मुताबिक जैसे दूध-ब्रैड और राशन की दुकान वाले बहादुरी दिखा रहे थे। दवा की दुकानें खुल रही थीं। बैंक वाले काम कर रहे थे। पत्रकार काम कर रहे थे, वैसे ही बस वे भी अपना काम कर रहे थे।
डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
29 May 2020
कोरोना वायरस
प्रतीकात्मक तस्वीर। साभार : healthline

लॉकडाउन के दो महीने पूरे हो चुके हैं। चौथा चरण भी ख़त्म होने जा रहा है। लॉकडाउन की शुरुआत, हम दिल्ली वाले कह सकते हैं, 22 मार्च से यानी कि जनता कर्फ़्यू के दिन से ही हो गई थी। 22 मार्च को जनता कर्फ़्यू के साथ ही अगले 31 मार्च तक के लिए राज्य स्तर पर पाबंदियां लग गईं थीं। लेकिन इसके बाद 24 मार्च की रात आठ बजे घोषणा कर दी गई कि रात के बारह बजे से ही पूरे देश में 21 दिन का सम्पूर्ण लॉकडाउन (तालाबंदी) लागू है। अचानक किये गए इस लॉकडाउन से सभी लोग अचंभित रह गये। कोरोना के संकट के बारे में पता था और उससे निपटने के लिए एक औजार के रूप में लॉकडाउन की बातें की जा रही थीं। कुछ देशों में लागू भी हुआ था पर हमारे देश में जिस तरह से अचानक ही लागू हुआ, न तो शायद किसी को उम्मीद थी और न शायद ही इतना अचानक कहीं और लागू हुआ होगा।

लॉकडाउन की घोषणा भी प्रधानमंत्री जी द्वारा आदतन रात को आठ बजे ही की गई। लॉकडाउन लगना तो था ही पर इतना जल्दी और इतना अचानक, इसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। 24 मार्च को रात आठ बजे, जब मोदी जी ने पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा की, उस समय मैं अपने दवाखाने में मरीज़ देख रहा था। किसी मरीज़ ने ही बताया कि रात बारह बजे से पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई है। जब नोटबंदी की घोषणा की गई थी तब भी मैं इसी तरह अपने दवाखाने में ही मरीज़ देख रहा था और तब भी किसी मरीज़ ने ही मुझे नोटबंदी की सूचना दी थी। उस समय जब तक मुझे उस सूचना पर विश्वास होता, कई लोग मुझे हजार और पुराना पांच सौ का नोट थमा चुके थे।

खैर देश में लॉकडाउन यानी तालाबंदी की घोषणा कर दी गई थी। अपना दवाख़ाना बंद करते समय मैंने अपने यहां काम करने वाले कर्मचारियों से कहा कि कल सुबह आना है और तब निश्चय करेंगे कि आगे क्या करना है। घर पहुंच मैंने भोजन आदि से निवृत्त हो इस बारे में पत्नी और साथ रह रहे बेटे से विमर्श किया। उनका कहना था कि क्लीनिक क्यों नहीं खोला जाना चाहिए। क्लीनिक को जरूर खोले रखना चाहिए। अगर मैं और अन्य डाक्टर क्लीनिक बंद करेंगे तो बीमार लोग कहाँ जायेंगे। यद्यपि मैं उम्र के पैंसठवें वर्ष में चल रहा हूँ और मधुमेह का मरीज़ भी हूँ, अतः 'हाई रिस्क ग्रुप' में आता हूँ, फिर भी रोगियों का हित ध्यान रखते हुए हमने क्लीनिक खोलने का निर्णय लिया।

अगले दिन सुबह क्लीनिक पर पहुंचने पर पाया कि सभी कर्मचारी भी सहमत हैं कि क्लीनिक खोलना ही चाहिए। आखिर ऐसा तो नहीं हुआ है कि कोविड-19 के आने से बाकी सभी बीमारियां समाप्त हो गई हैं। अन्य सभी बीमारियों के मरीजों को भी इलाज चाहिए। अतः अपने कर्मचारियों के सहयोग से मैं इस निर्णय पर पहुंचने में सफल हुआ कि हमें अपना क्लीनिक खुला रखना चाहिए। हमने मिलकर उन सब सावधानियों पर ध्यान दिया जो हमें आने वाले मरीजों की और अपनी सुरक्षा के लिए बरतनी होंगी। तो परिवार की इच्छा और सहयोगियों के सहयोग से मेरा दवाख़ाना लॉकडाउन लगने के बाद भी निरंतर खुल रहा है।

शुरू में मन में एक डर भी था। सड़कें बिल्कुल सुनसान थीं। शुरुआती दिनों में तो इतनी सुनसान कि उन पर चलते हुए भी डर लगता था, विशेष रूप से रात को क्लीनिक से लौटते समय। डर अंदर भी था और बाहर भी। अंदर यह डर था कि यदि कोरोना हो गया तो! सारी बहादुरी धरी रह जायेगी। लोग-बाग हर तरह की बातें बनायेंगे। कुछ कहेंगे कि हो गया न कोरोना, बहुत बहादुर बनता था, जैसे इसे तो कोरोना हो ही नहीं सकता है। कुछ लोग क्लीनिक खोलने में सेवा भाव नहीं, कमाई का एंगल ढूंढेंगे। पर यह पता था कि लोगों को जीने के लिए सिर्फ़ राशन की ही नहीं, बीमार होने पर इलाज की भी जरूरत है। यदि कोरोना नहीं रुक रहा था तो बाकी बीमारियां भी ठहर नहीं गईं थीं।

इस दौरान, जब अधिकतर प्राइवेट क्लीनिक बंद थे, दिल्ली सरकार के अधिकतर मोहल्ला क्लीनिक भी बंद हो चुके थे तथा बड़े सरकारी अस्पताल कोरोना अस्पताल में तब्दील हो चुके थे, मेरे पास कुछ ऐसे भी मरीज़ आये जो विभिन्न सरकारी अस्पतालों में भटक रहे थे और उनका इलाज नहीं हो पा रहा था।

ऐसा ही एक मरीज़ जिसे तपेदिक और मधुमेह की बीमारी थी और जो दिल्ली के एक बड़े टीबी अस्पताल में भर्ती था, उसके खून की जांच में गुर्दे की खराबी भी पाई गई। टीबी अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई कि वह किसी बड़े अस्पताल में गुर्दा विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाये। वह लगभग सभी बड़े अस्पतालों से निराश होकर मेरे पास आया। उसे किसी भी अस्पताल में गुर्दा विशेषज्ञ ने नहीं देखा। मैंने अपने सामर्थ्य अनुसार उसे दवाइयां लिखीं। वह बेहतर है और अब जब अस्पताल ओपीडी शुरू करने जा रहे हैं, वह गुर्दा विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखा सकेगा।

ऐसे ही एक बच्ची, यही कोई बीस साल की, उसे बुखार हो गया। उसके मां-बाप किसी कार्यवश कोलकाता गये हुए थे कि लॉकडाउन लग गया और उसके माता पिता वहीं फंस गये। वह बच्ची अपने एक छोटे भाई के साथ यहां रह रही थी। उसको टायफायड बुखार हो गया। वह इलाज के लिए मेरे पास आयी। मैं तो अपनी व्यवसायिक गतिविधि निभा रहा था पर उस बच्ची का ही जीवट था कि वह अपने छोटे भाई को भी सम्हाले रही और अपना इलाज और परहेज भी करती रही।

और भी बहुत से मरीज़ आये। हर तरह की बीमारियों के। ऐसी बीमारियों के भी जो मेरी विशेषज्ञता से बाहर थे पर वे मेरे पास इसलिए आये क्योंकि और कोई डाक्टर उपलब्ध नहीं थे। काफी दूर से भी मरीज़ आये क्योंकि उनके घर के पास कोई भी क्लीनिक खुला नहीं था। मुझे संतोष है कि मैं इस कठिन समय में अपने पेशे के साथ न्याय कर सका।

अब जबकि लॉकडाउन का चौथा चरण चल रहा है। लॉकडाउन में काफी ढील भी दे दी गईं हैं, अधिकतर डॉक्टरों ने अपना क्लीनिक खोल लिया है। पर मुझे एक बात अभी तक समझ नहीं आई है कि जब दूध ब्रैड की दुकानें खुली थीं, खाने पीने के सामान की दुकानें खुली हुई थीं, दवाई की दुकानें खुली थीं, बैंक काम कर रहे थे और उनमें कर्मचारी आ रहे थे, पत्रकार काम कर रहे थे और अख़बार भी छप और बंट रहे थे, तो डॉक्टर अपने क्लीनिक बंद कर क्यों बैठ गए थे। डॉक्टरों को तो अधिक समझदारी दिखानी चाहिए थी। वे तो सामाजिक दूरी, बार बार हाथ धोने और सैनेटाईजेशन जैसी व्यवाहरिक चीजों से अधिक परिचित हैं। उन्हें तो इनका पालन करते हुए अपनी सेवाएं प्रदान करना जारी रखना ही चाहिए था। मुझे इस कोरोना काल में अपनी बिरादरी के पीठ दिखाने पर बहुत ही अफ़सोस है।

Coronavirus
COVID-19
Lockdown
Corona and Other diseases
Private Clinic
Mohalla clinics
primary health care
health care facilities

Related Stories

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना ने फिर पकड़ी रफ़्तार, 24 घंटों में 4,518 दर्ज़ किए गए 

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 3,962 नए मामले, 26 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 84 दिन बाद 4 हज़ार से ज़्यादा नए मामले दर्ज 

कोरोना अपडेट: देश में कोरोना के मामलों में 35 फ़ीसदी की बढ़ोतरी, 24 घंटों में दर्ज हुए 3,712 मामले 

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में 2,745 नए मामले, 6 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में नए मामलों में करीब 16 फ़ीसदी की गिरावट

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 2,706 नए मामले, 25 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 2,685 नए मामले दर्ज

कोरोना अपडेट: देश में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 2,710 नए मामले, 14 लोगों की मौत

कोरोना अपडेट: केरल, महाराष्ट्र और दिल्ली में फिर से बढ़ रहा कोरोना का ख़तरा


बाकी खबरें

  • sedition
    भाषा
    सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश
    11 May 2022
    पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप से संबंधित सभी लंबित मामले, अपील और कार्यवाही को स्थगित रखा जाना चाहिए। अदालतों द्वारा आरोपियों को दी गई राहत जारी रहेगी। उसने आगे कहा कि प्रावधान की वैधता को चुनौती…
  • बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    एम.ओबैद
    बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    11 May 2022
    "ख़ासकर बिहार में बड़ी संख्या में वैसे बच्चे जाते हैं जिनके घरों में खाना उपलब्ध नहीं होता है। उनके लिए कम से कम एक वक्त के खाने का स्कूल ही आसरा है। लेकिन उन्हें ये भी न मिलना बिहार सरकार की विफलता…
  • मार्को फ़र्नांडीज़
    लैटिन अमेरिका को क्यों एक नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है?
    11 May 2022
    दुनिया यूक्रेन में युद्ध का अंत देखना चाहती है। हालाँकि, नाटो देश यूक्रेन को हथियारों की खेप बढ़ाकर युद्ध को लम्बा खींचना चाहते हैं और इस घोषणा के साथ कि वे "रूस को कमजोर" बनाना चाहते हैं। यूक्रेन
  • assad
    एम. के. भद्रकुमार
    असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की
    11 May 2022
    राष्ट्रपति बशर अल-असद का यह तेहरान दौरा इस बात का संकेत है कि ईरान, सीरिया की भविष्य की रणनीति का मुख्य आधार बना हुआ है।
  • रवि शंकर दुबे
    इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा यूपी में: कबीर और भारतेंदु से लेकर बिस्मिल्लाह तक के आंगन से इकट्ठा की मिट्टी
    11 May 2022
    इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग शहरों में गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License