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बग़ैर काउंसिलिंग, बिना डॉक्टरी परामर्श के होम आइसोलेशन में हैं बिहार के 90 फ़ीसदी कोरोना मरीज़!
पिछले दिनों राज्य में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने की वजह से स्वास्थ्य विभाग ने माइल्ड सिम्प्टम वाले मरीजों को घर में ही रह कर इलाज कराने के लिये कहा है, मगर एक तरफ़ सबके पास होम क्वारंटीन की सुविधा नहीं है, दूसरी तरफ़ समाज का रवैया भी ठीक नहीं है। इसके अलावा सरकार की तरफ से उन्हें जो नियमित सुझाव और सहयोग की जरूरत है, वह नहीं मिल पाता।
पुष्यमित्र
25 Jul 2020
covid-19

केस 1

बिहार के शिवहर जिला मुख्यालय में एक बैंक के चार कर्मी कोरोना पॉजिटिव पाये गये। उनमें मामूली लक्षण (Mild symptoms) थे, इसलिए उन्हें होम आइसोलेशन में जाने के लिए कहा गया। उनमें से दो युवतियां थीं, जो बैंक द्वारा लीज पर लिये गये एक मकान में रहती थीं।

रिजल्ट आने के तत्काल बाद उन दोनों ने एहतियात बरतते हुए अपने मकान मालिक को इसकी सूचना दे दी। मगर यह खबर मिलते ही कि वे दोनों कोरोना पॉजिटिव हैं और उनके मकान में होम आइसोलेशन में रहना चाहती हैं, मकान मालिक दोनों से तत्काल मकान को खाली करने कहने लगे। उन्होंने इसके लिए स्थानीय प्रशासन से भी दबाव डलवाया। उस वक्त रात काफी हो चली थी, दोनों युवतियों के पास कोई विकल्प नहीं था। फिर कुछ परिचित लोगों ने स्थानीय प्रशासन को सूचना दी और इस बिना पर उन्हें रात भर रहने की अनुमति मिली। सवेरे उनमें से एक युवती के भाई अपनी कार लेकर आये और दोनों को लेकर पटना गये। वहां दोनों एक खाली अपार्टमेंट में आइसोलेशन में हैं। उन्हें पटना लाने वाले उनके भाई में भी कोरोना के लक्षण उभर आये हैं, उन्होंने टेस्ट के लिए सैंपल दिया है।

केस 2

पटना सिटी की एक महिला कोरोना पॉजिटव होने के बाद अपने घर में क्वारंटीन थीं। पिछले बुधवार को सुबह चार बजे महिला की मृत्यु हो गयी। मृत्यु के बाद परिजनों ने स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को कई बार सूचित किया। मगर शाम तक उनके शव को हटाने के लिए कोई नहीं आया। इस दौरान उनके पड़ोसी उनके घर आकर लगातार नाराजगी जाहिर करते रहे और उनसे जल्द से जल्द शव को हटाने का दबाव बनाते रहे। कई बार झगड़े की नौबत उत्पन्न हो गयी।

केस 3

वे पटना के व्यवसायी हैं। पति-पत्नी दोनों कोरोना से संक्रमित हैं। एक टू बीएचके अपार्टमेंट में किराये पर रहते हैं, वहीं होम आइसोलेशन में हैं। उन्होंने इस भय से अपने मकान मालिक और पड़ोस के लोगों को सूचना नहीं दी है कि कहीं वे परेशान न करें। एकल परिवार है, इसलिए बाजार का काम भी खुद ही करते हैं। अपने स्तर से हर तरह का एहतियात बरत रहे हैं। घर में भी और बाहर भी। मगर चूंकि वे लोगों को यह जानकारी नहीं दे रहे कि कोरोना संक्रमित हैं तो बाजार में कोई उनसे परहेज भी नहीं कर रहा।

ये तीन उदाहरण बताते हैं कि बिहार जैसे राज्य में कोरोना संक्रमित लोगों के लिए होम क्वारंटीन रहना कितना जटिल काम है। पिछले दिनों राज्य में कोरोना के मामले तेजी से बढ़ने की वजह से स्वास्थ्य विभाग ने माइल्ड सिम्प्टम वाले मरीजों को घर में ही रह कर इलाज कराने के लिये कहा है, मगर एक तरफ कोरोना को लेकर सामाजिक स्तर पर अनावश्यक खौफ का माहौल उन्हें सहज नहीं रहने दे रहा तो दूसरी तरह सरकार की तरफ से उन्हें जो नियमित सुझाव और सहयोग की जरूरत है, वह नहीं मिल पाता।

शुक्रवार 24 जुलाई तक के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में इस वक़्त 10457 एक्टिव कोरोना मरीज हैं। राज्य में कुल कितने मरीज होम आइसोलेशन में हैं, इस बात की स्पष्ट जानकारी विभाग की तरफ से नहीं मिल रही, मगर एक प्रमुख स्थानीय अख़बार में छपी ख़बर के मुताबिक पूरे राज्य में 8953 मरीजों को होम आइसोलेशन में रखा गया है। इसी खबर के मुताबिक सिर्फ पटना में इस वक़्त 1500 के करीब मरीज होम क्वारंटीन हैं। इस खबर को अगर सच माना जाये तो राज्य के कुल एक्टिव कोरोना मरीजों में से लगभग 90 फीसदी इस वक्त होम आइसोलेशन में हैं।

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इन मरीजों में ज्यादातर ऐसे हैं, जिनके पास नियमानुसार होम क्वारंटीन होने की समुचित सुविधा नहीं है। होम आइसोलेशन के मामले में आदर्श स्थिति तो यह मानी जाती है कि मरीज के पास अपना अलग कमरा और टायलेट होना चाहिए, उस घर के दूसरे सदस्यों से लगातार दूरी बनाकर रखनी चाहिए। मगर राज्य में ऐसे परिवारों की संख्या बहुत कम है, जिनके पास दो टायलेट हों और वे होम आइसोलेशन में रह रहे परिवार के सदस्य को अलग टायलेट दे सकें। केस तीन में जिस व्यवसायी पति-पत्नी के बारे में बताया गया है, उनके टू बीएचके अपार्टमेंट में भी एक ही टायलेट है, जिसे वे अपने कोरोना निगेटिव बच्चों के साथ साझा करते हैं। वे इसे लगातार सैनिटाइज करने की कोशिश करते हैं।

2011 के सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक राज्य की 65 फीसदी ग्रामीण आबादी भूमिहीन है। इनमें से ज्यादातर बहुत छोटे से जमीन के टुकड़े पर सपरिवार रहते हैं। ऐसे परिवारों में अगर कोई होम आइसोलेशन में रहना चाहे तो उन्हें अलग कमरा देना लगभग असंभव है। ऐसे लोग अपने परिवार को संक्रमित होने से बचा नहीं सकते। इसके बावजूद इन आंकड़ों से जाहिर है कि राज्य सरकार ने एक तरह से राज्य के लोगों को संस्थागत क्वारंटीन की सुविधा देने से हाथ खींच लिया है और उन्हें होम आइसोलेशन में रहने कह दिया है।

होम आइसोलेशन में रहने वाले मरीजों से बात करने पर यह समझ में आ रहा है कि स्वास्थ्य विभाग की तरफ से उन्हें इस बात की जानकारी न के बराबर दी जाती है कि होम आइसोलेशन में उन्हें किस तरह रहना है। न ही होम आइसोलेशन में उनकी नियमित निगरानी की जाती है और किसी परेशानी की स्थिति में उन्हें इलाज, समाधान या कोई अन्य सहयोग उपलब्ध कराया जाता है।

हालांकि स्वास्थ्य विभाग इस बात का दावा करता है कि होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों को रोज फोन किया जाता है और डाक्टर वीडियो कांफ्रेंसिंग से उनसे नियमित संपर्क में रहते हैं। तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की सुविधा है। मगर ऊपर जिन तीन मामलों का जिक्र किया गया है, उनमें से सिर्फ दो के पास एक-एक बार स्वास्थ्य विभाग से फोन आया और उन्होंने उनसे सिर्फ नाम-पता पूछकर फोन काट दिया।

शिवहर की दोनो बैंक कर्मी कहती हैं कि उन्हें होम आइसोलेट होना है इसकी जानकारी भी उन्हें उनके बैंक से मिली। होम आइसोलेशन में क्या करना है, क्या नहीं करना है। इसके बारे में अभी तक कुछ भी बताया नहीं गया है। हमारे मन में कई तरह के कंफ्यूजन होते हैं, मगर हमें समझ नहीं आता कि ये सवाल किससे पूछें।

तीसरे केस वाले व्यवसायी पति पत्नी अपने परिचित डाक्टरों से पूछ कर और इंटरनेट से सर्च करके जानकारी जुटाते हैं और उसी के हिसाब से परहेज बरतते हैं। अगर स्वास्थ्य विभाग सचमुच इन मरीजों की नियमित निगरानी कर रहा होता तो दूसरे केस वाली महिला की घर में मृत्यु नहीं होती। तबीयत बिगड़ने से पहले उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया होता। मगर उनके मामले में तो मौत के 12 घंटे बाद शव को हटाने के लिए अस्पताल के कर्मी पहुंचे।

ये तीनों मामले अमूमन संपन्न और मध्यम वर्ग के हैं। दुर्भाग्यवश तमाम कोशिशों के बावजूद ग़रीब तबके से जुड़ा होम क्वारंटीन का कोई ऐसा केस नहीं मिल सका। मगर इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि अगर संपन्न तबके के लोगों को इतनी परेशानी हो रही है तो राज्य की गरीब आबादी होम आइसोलेशन में किस स्थिति का सामना कर रही होगी। राज्य के गरीब मरीजों के लिए क्वारंटीन सेंटर खोलने के बदले सरकार ने पटना में एक होटल को एक्वायर कर पेड आइसोलेशन सेंटर खोला है, जिसका रोज का किराया 1800 रुपये है।  

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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