NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अब भी जल रहा है बवाना
एक एक करके बवाना की भयानक सच्चाई परत दर परत खुलती गयी और खुलती हुई हर एक गिरह जैसे अपना ही एक उदासीन दृष्य प्रस्तुत कर रही थीI
ऋतांश आज़ाद
15 Feb 2018
बवाना

दिल्ली का एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र बवाना पिछले महीने 20 जनवरी को एक फैक्ट्री में लागी आग और उसमें मरे 17 मज़दूरों की वजह से सुर्ख़ियों में आया था I इस पूरे इलाके में करीब 16000 फैक्ट्रियाँ हैं और करीब 3 लाख मज़दूर काम करते और रहते हैं I हाल ही में बवाना में जो आग लगी थी अब तक शांत नहीं हुई है I मैं ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि मज़दूरों से बात करते हुए लगता है कि उनकी ज़िन्दगी अपने आप में एक हादसा है जिससे प्रशासन और सरकार दोनों ने ही मुँह मोड़ लिया है I

 बवाना औद्योगिक क्षेत्र तक जाने के लिए दिल्ली के समयपुर बदली मेट्रो स्टेशन से 40 मिनट का समय लगता है I इस क्षेत्र के बीच में एक चौक है जिसे समोसा चौक कहा जाता है, यहाँ इलाके के मज़दूर दोपहर में भोजनावकाश के समय इक्कठा होते हैं I हम जब वहाँ कैमरा और माइक लेकर पहुँचे तो काफी समय तक वहाँ मज़दूर हमसे बात करने में हिचकिचाते रहे I कुछ देर बाद जब हमने वहाँ CITU के स्थानीय नेता हरपाल सिंह से कैमरा पर बात करनी शुरू की तो वहाँ मौजूद मज़दूरों को कुछ बल मिला I उनकी बात में हाँ में हाँ मिलाने के कुछ देर बाद मज़दूर भी अपनी बात रखने लगे I एक एक करके बवाना की भयानक सच्चाई परत दर परत खुलती गयी और खुलती हुई हर एक गिरह जैसे अपना ही एक उदासीन दृष्य प्रस्तुत कर रही थीI

मज़दूरों ने बताया कि उनमें से बहुत से लोग अब फैक्टरियों में काम इसीलिए नहीं कर रहे क्योंकि वहाँ सिर्फ 5 से 6 हज़ार रुपये मज़दूरी मिलती है जबकी उनसे 12 घंटे काम कराया जाता है I काम करते समय अगर किसी को चोट लग जाए या किसी का हाथ तक अगर कट जाए तो कोई मुआवज़ा या इलाज करना तो दूर उन्हें फैक्ट्री से बहार फेंक दिया जाता है I

अपने साथियों को ज़िन्दगी की व्यथा सुनाते देख कैमरा पर बोलने और भी मज़दूर भी वहाँ इक्कठा हो गए I वहाँ मौजूद एक मज़दूर ने कहा “ना हम अपने बच्चों को स्कूल भेज पाते हैं और न ही अपने लिए कुछ पैसे बचा पाते हैं” I वहाँ पर मौजूद कुछ फैक्ट्री में काम करने वाले मज़दूर भी जमा हो गये पर उन्होंने कैमरा पर बात करने से मना कर दिया I बाकि मज़दूरों ने बताया ऐसा इसीलिए था क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं फैक्ट्री मालिक ये देख लेंगे तो उन्हें निकाल दिया जायेगा I

यहाँ हमसे बात करने वाले अधिकांश मज़दूर वो थे जो दिहाड़ी पर बोझा उठाने का काम करते हैंI 18,000 रुपए प्रतिमाह न्यूनतम मज़दूरी तो दूर, यहाँ किसी को भी 7,000 रुपये महीने से ज़्यादा नहीं मिलता I

 हमारे ये पूछने पर कि “क्या फैक्ट्रीयों में आग बुझाने या आग लगने के बाद लोगों के निकलने का कोई इंतजाम है?” उनका कहना था बहुत-सी फैक्ट्री में आग बुझाने का कोई साधन नहीं है और “फायर एगज़िट” तो दूर की बात, वहाँ बहुत सी फैक्टरियों में बाहर से ताले लगे रहते हैं जिससे कोई मज़दूर बाहर न जा सके I मज़दूरों ने बताया कि कई फैक्टरियाँ तो छुट्टी के दिन भी गैरकानूनी तरीके से उनसे काम करवाती हैं I हम अगर 20 जनवरी की आग की घटना के बारे में सोचे तो याद आता है कि वहाँ भी मज़दूर इसीलिए मरे क्योंकि फैक्ट्री बाहर से बंद थी और शनिवार को भी वहाँ मज़दूर काम कर रहे थे I

चंद रुपयों के लिए बहुत-से मज़दूर छुट्टी पर भी काम करते हैं I यहाँ मज़दूरों से पता चला कि जब सारा देश 26 जनवरी गणतंत्र दिवस मना रहा था तब मज़दूर इन फैक्टरियों अपनी कमर तोड़ रहे थे I

तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार को यह दिखाई नहीं पड़ता कि यहाँ के मज़दूर ठेकेदारों, मालिकों और पुलिस की मिलीभगत से बंदियों जैसी ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं , इस इलाके का जैसे सरकारों के लिए कोई अस्तित्व ही नहीं है I मज़दूरों ने बताया उनकी कागज़ पर ज़्यादा तनख्वाह दिखाई जाती है और उन्हें जो मिलता है उसने ज़्यादा हर एक मज़दूर से उनके ठेकेदार को मिलता है I

इन मज़दूरों को ठेकेदारों द्वारा इसीलिए रखा जाता है जिससे कल को कोई मज़दूर अगर शोषण की शिकायत करे तो मालिक ये कह सकें कि मज़दूरों को उन्होंने नहीं नियुक्त किया I

यहाँ श्रम कानून तो मज़ाक लगते हैं और कितनी ही फैक्टरियाँ ऐसी हैं जो कम लोग दिखाकर ज़्यादा लोगों से काम करातीं हैं I बहुत-सी फैक्टरियाँ गैरकानूनी भी हैं जो कि कुछ और दिखाकर कुछ और बनाती हैं I यानी  न्यूनतम वेतन से बहुत ही कम आमदनी, भयानक काम की जगहें , श्रम कानूनों का घोर उल्लंघन , छुट्टी , बोनस , तरक्की, स्वस्थ्य सेवाएं, काम के घंटों की सीमा कुछ भी नहीं I इस पूरे इलाके में एक आतंक का माहौल था और कोई भी फैक्टरियों के पास हमसे बात नहीं कर रहा था I

जब हम इस इलाके से दक्षिण की तरफ गए तो वहाँ कुछ खाली फ्लैट थे जहाँ कोई नहीं रहता , बताया गया कि ये असल में मज़दूरों को दिए जाने थे पर अब तक उनका कुछ नहीं हुआ है I इसके पीछे एक मजदूरों की बस्ती है जहाँ करीब 900 झुग्गियां हैं , यहाँ करीब 5000 लोग हैं ,जिनपर एक प्राथमिक विद्यालय, एक जर्जर स्थिति में पड़ा हुआ सामुदायिक केंद्र और एक शोचालय भवन था जो बहुत बुरी स्तिथी में है I

वहाँ लोगों ने मज़दूरों की उन्हीं सब समस्याओं को दोहराते हुए हमसे सवाल किया कि यहाँ घरों का किराया ही 2500 रुपये है और इसके आलावा बाकि घर के खर्चे मिलकर कुछ कैसे बचेगा जब उन्हें मिलते 6 हज़ार हैं ? महिलाओं ने बताया उन्हें मर्दों से कम पैसे मिलते हैं और लड़कियों को पढ़ाने में दिक्कत होती है क्यूंकि स्कूल जाने के रास्ते में उन्हें छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है I इसके साथ ही सथानीय लोग सरकार पर जमकर बरसे और कहा कि नोटबंदी ने उनकी पेट पर लात मारी है I एक व्यक्ति का तो यहाँ तक कहना था कि उनके भाई को तो नोट बंदी होने के दिन इतना बड़ा सदमा लगा कि उसके शरीर को लाखवा मार गया, वो आज भी काम करने के लायक नहीं है I

एक महिला ने कहा “मोदी जी अच्छे होंगे पर अमीरों के लिए, गरीबों के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया है I” बस्ती में सफाई के लिए सिर्फ 2 कर्मचारी आते हैं , यहाँ कूड़े के ढेर पड़े रहते हैं , और बस्ती के पीछे गन्दा पानी है जहाँ बड़ी मात्रा में कूड़ा तैरता दिखाई देता है I यहाँ काफी लोग कल घर पर थे क्यूंकि उन्हें शिव रात्रि मनानी थी पर छुट्टी नहीं मिली , उन्होंने छुट्टी तो ली पर पता था कि एक दिन का वेतन कटेगा I

इस हालत को देखकर जब हम निराश हो रहे थे और वहाँ लोग हमसे ये पूछ रहे थे कि आप लोग हमारे लिए कुछ करते क्यों नहीं तो एक महिला ने कहा “ये लोग सिर्फ हमारी बात दिखा सकते हैं, करना तो हमें ही पड़ेगा, हमें मिलकर हड़ताल करनी होगी तभी कुछ बदलेगा I” ये सुनकर मैं और मेरी सह पत्रकार के चेहेरों पर उम्मीद की एक मुस्कान आ गयी I

दिल्ली
बवाना
मज़दूर
मज़दूर बस्ती
न्यूनतम वेतन
बवाना में आग
बीजेपी
बवाना औद्योगित क्षेत्र

Related Stories

झारखंड चुनाव: 20 सीटों पर मतदान, सिसई में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में एक ग्रामीण की मौत, दो घायल

झारखंड की 'वीआईपी' सीट जमशेदपुर पूर्वी : रघुवर को सरयू की चुनौती, गौरव तीसरा कोण

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

दिल्ली: दिव्यंगो को मिलने वाले बूथों का गोरखधंधा काफी लंम्बे समय से जारी

हमें ‘लिंचिस्तान’ बनने से सिर्फ जन-आन्दोलन ही बचा सकता है

जंतर मंतर - सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी द्वारा धरना-प्रदर्शन पर लगी रोक हटाई

दिल्ली के मज़दूरों की एक दिवसीय हड़ताल

क्या भाजपा हेडक्वार्टर की वजह से जलमग्न हो रहा है मिंटो रोड?

दिल्ली का दमकल

दिल्ली: 20 जुलाई को 20 लाख मज़दूर हड़ताल पर जायेंगे


बाकी खबरें

  • workers
    तारिक अनवर
    यूपी चुनाव: धीमी मौत मर रहा है भगवान कृष्ण को संवारने-सजाने वाला मथुरा-वृंदावन का उद्योग
    07 Feb 2022
    हिंदुत्व की उच्च डेसिबल की राजनीति हिंदू और मुस्लिम समुदायों से आने वाले कारीगरों, व्यापारियों और निर्माताओं की आजीविका को बचाने में विफल रही है।
  • yogi and amit shah
    अनिल जैन
    ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा को चुनावों में भगवान और मुसलमान का ही सहारा
    07 Feb 2022
    ख़बरों की इस भाग दौड़ में ख़बरों का मर्म छूट जाता है। इस हफ़्ते की कुछ ख़ास ख़बरें लेकर आए हैं अनिल जैन, जिसमें राम जी की जाति से लेकर केजरीवाल का मोदी मॉडल तक शामिल है। 
  • Lata Mangeshkar
    नम्रता जोशी
    लता मंगेशकर की उपलब्धियों का भला कभी कोई विदाई गीत बन सकता है?
    07 Feb 2022
    संगीत और फ़िल्म निर्माण में स्वर्ण युग के सबसे बड़े नुमाइंदों में से एक लता मंगेशकर का निधन असल में वक़्त के उस बेरहम और अटूट सिलसिले का एक दुखद संकेत है, जो अपने जीवन काल में ही किंवदंती बन चुके…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में एक महीने बाद कोरोना के एक लाख से कम नए मामले सामने आए  
    07 Feb 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 83,876 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 2.62 फ़ीसदी यानी 11 लाख 8 हज़ार 938 हो गयी है।
  • MGNREGA
    डॉ. राजू पाण्डेय
    बजट 2022: गांव और किसान के प्रति सरकार की खटकने वाली अनदेखी
    07 Feb 2022
    कोविड-19 के इस भयानक दौर में यह आशा की जा रही थी कि सरकार न केवल मनरेगा को ज्यादा मजबूती देगी, बल्कि शहरी इलाकों के लिए भी कोई ऐसी ही योजना लाई जाएगी। विगत वित्तीय वर्ष के संशोधित आकलन की तुलना में…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License