NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भारतीय जेलों के लिए  बजट में क्या गड़बड़ी है?
जेलों में स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, सुधार सेवाओं और कल्याण को बहुत कम प्राथमिकता दी जाती है।
भरत डोगरा
19 Oct 2021
prisons

भारत में अक्सर जेलों और उनमें रहने वाले कैदियों की खराब हालत की चर्चा होती रहती है। यह समस्या बजट से कितनी जुड़ी है? 2019 के लिए आवंटित पैसे के खर्च से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करने पर इस समस्या के बारे में कुछ जानकारी पता चलती है। राष्ट्रीय अपराध शाखा द्वारा प्रकाशित "प्रिजन स्टेटिस्टिक्स इंडिया, 2019" के आंकड़े बताते हैं कि जेलों के लिए कुल 6818 करोड़ रुपए का आवंटन हुआ था। लेकिन वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान इसमें से सिर्फ़ 5958 करोड़ ही खर्च हो पाए  जेलों में इस खर्च का 34 फ़ीसदी कैदियों पर खर्च हुआ। यह मूल्य 2060 करोड़ रुपए था।

रिपोर्ट के मुताबिक़ हरियाणा और आंध्र प्रदेश में कैदियों पर खर्च होने वाला हिस्सा बहुत ज्यादा रहा है। हरियाणा में लगभग नामुमकिन स्तर पर यह आंकड़ा 100 फ़ीसदी और आंध्र प्रदेश में 88 फ़ीसदी रहा। लेकिन इसे छोड़िए। दूसरे राज्यों में कैदियों पर भी बहुत ज्यादा हिस्सा खर्च हुए है, मतलब हुआ कि औसत के कम होने की वजह दूसरे राज्यों में कैदियों पर बहुत कम खर्च होना है।

भारत में 1350 जेल हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 4.03 लाख है। साल भर जेलों में कैदियों की आवक होती है। हालांकि इनमें से कुछ को ज़मानत, परोले या दूसरी वजह से छोड़ा भी जाता है। तो इसका मतलब हुआ कि साल के अंत में कैदियों की जी संख्या गिनी जाती है, वास्तविकता संख्या इससे कहीं ज्यादा होती है। तो 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक साल भर में जेल के भीतर 18,86,092 लोगों को लाया गया, जिनमें से साल के अंत में सिर्फ 4.78 लाख लोग ही जेल के भीतर हैं।

यह अहम हो जाता है कि बजट का विश्लेषण करते वक़्त इन दो आंकड़ों में अंतर रखा जाए। अगर हम 4.78 लाख को ही कैदियों की संख्या मानेंगे, तो जेलों के लिए आवंटित बजट का ज्यादा अनुमान लगाएंगे। जबकि 14 लाख मानने पर लगेगा कि सरकार को अपना बजट बढ़ाने की जरूरत है, भले ही कुछ कैदी कम समय के लिए आते हों।

अगर हम 4.78 लाख कैदियों का आंकड़ा ही ले लें और उनके ऊपर कुल खर्च (2060 करोड़) में इसे विभाजित के दें, तो हमें 119 रुपए प्रति दिन मिलते हैं। अगर हम कुल खर्च को 365 से विभाजित कर दें, तो हमें प्रति दिन का एक कैदी का खर्च मिल जाएगा। अगर हम उन 14 लाख दूसरे लोगों को ध्यान में रखें जो  कम अवधि के लिए आए थे, तो यह बजट और भी कम हो जाता है। फिर कोई भी विश्लेषण भ्रष्टाचार को तस्वीर में नहीं लेता। जो हिंदुस्तान में बहुत ज्यादा है। तो जो कैदियों तक पहुंचता है वो 119 रुपए से भी कम है। यह तथ्य ध्यान में रखते हुए कि जेलों में 70 फ़ीसदी कैदी विचाराधीन हैं और उनके अपराध साबित नहीं हुए हैं, यह काफ़ी नाइंसाफी भरा लगता है।

कम बजट, कैदियों के गैर भोजन खर्च में साफ झलकता है। हर दिन बड़ी मात्रा में जेल में खाना बनाया जाता है, तो 48 फ़ीसदी बजट इसी में खर्च हो जाता है। सिर्फ़ एक फीसदी कपड़ों पर, एक फीसदी शिक्षा पर, एक फ़ीसदी कौशल विकास पर और एक फ़ीसदी कल्याणकारी गतिविधियों पर खर्च होता है। प्रभावी तौर पर हर एक कैदी को कपड़ों के लिए प्रतिदिन एक रुपए, शिक्षा के लिए प्रतिदिन एक रुपए, और कल्याणकारी गतिविधियों के लिए मिलता है। फिर 4 फ़ीसदी स्वास्थ्य जरूरतों पर होता है, चार रुपए प्रतिदिन एक कैदी बैठता है। यह बहुत कम है, क्योंकि कैदी कई तरह की बीमारियों के शिकार होते हैं। कई गरीब और अल्प पोषित पृष्ठभूमि से आते हैं।

जेलों में अक्सर साफ सफाई की कमी होती है और ज्यादातर खाद्यान्न गुणवत्ता और पोषण अपर्याप्त होता है। स्वास्थ्य समस्या की खस्ता हालत इस तथ्य से भी पता चलती है कि हर साल जेल की तरफ से 4.7 लाख अस्पताल यात्राएं करवाई जाती है। तो स्वास्थ्य बजट भी बेहद कम है।

जेलों के लिए 3320 स्वास्थ्यकर्मियों का उपबंध किया गया है, लेकिन सिर्फ़ 1962 की ही तैनाती की गई है, जो सिर्फ़ 59 फ़ीसदी है ।इसका मतलब हुआ की हर जेल में सिर्फ 1.4 स्वास्थ्य कर्मी हैं। अगर हम कुछ बड़ी जेलों में ज्यादा अनुपात में स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती को भी तस्वीर में लें, तो पाएंगे कि कई जिलों में सिर्फ एक स्वास्थ्य कर्मी की तैनाती है। और बुरी बात यह है कि इनमें से सिर्फ़ 254 स्वास्थ्यकर्मी ही महिलाएं हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो 5 जेलों के लिए औसत तौर पर एक महिला स्वास्थ्यकर्मी से भी कम उपलब्ध है। इतने कम स्टाफ के साथ कैदियों की स्वास्थ्य समस्याओं का निदान नहीं किया जा सकता।

जेल अधिकारियों के लिए एक तरीका यह है कि वे कैदियों की स्वास्थ्य समस्याओं को ही नजर दें। तो जेल में कैदियों में बड़ी संख्या में स्वास्थ्य समस्याओं  से ग्रस्त संख्या है, लेकिन अनुमानित आंकड़ा सिर्फ़ 7300 लोगों का है। या एक जेल में सिर्फ़ पांच कैदी। इन 7300 लोगों में से मनोरोगियों की संख्या कुल 4,78,000 कैदियों में 2 फ़ीसदी से भी कम है। यहां हमने कुल कैदियों में कम समय के लिए आने वालों को शामिल नहीं किया है। इन अनुमानों के लिहाज से भारतीय जेलें मानसिक नजरिए से दुनिया की सबसे स्वस्थ्य जेल हैं।  अमेरिका और ओईसीडी देशों में गंभीर और सामान्य मानसिक बीमारियों से ग्रस्त कैदियों की संख्या 20 फ़ीसदी है।

मनोवैज्ञानिकों, कल्याण अधिकारियों और परिवीक्षा अधिकारियों को मिला लें, तो भारत के 1307 जेलों के लिए 1350 अधिकारियों की नियुक्ति का उपबंध है। अगर हम कुछ बड़ी जेलों में ज्यादा अधिकारियों की नियुक्ति को ध्यान में रखें तो प्रति जेल में इन अधिकारियों की तैनाती का आंकड़ा एक से भी कम  होगा। लेकिन इन पदों पर भी सिर्फ 761 नियुक्तियां ही की गई है। इस तरह दो जिलों पर लगभग एक सुधार अधिकारी की तैनाती है।

अगर हम कुल 60000 के जेल स्टाफ में स्वास्थ्यकर्मियों, सुधार अधिकारियों की हिस्सेदारी की बात करें तो यह सिर्फ 2700 मतलब 4 फ़ीसदी है। यह आंकड़ा बताता है कि जेलों में स्वास्थ्य, मानसिक तंदुरुस्ती, सुधार सेवाओं और कल्याण को बहुत कम प्राथमिकता दी जाती है।

बजट को निश्चित बढ़ाना होगा और बजट की प्राथमिकताओं को उन्नत करना होगा, ताकि जेल सुधार के लिए पर्याप्त जगह बनाई जा सके। जेल सुधारों पर होने वाले विमर्श में बजट पर ध्यान देने की जरूरत है। सही प्राथमिकताएं और आवंटन तय किए बिना, तमाम विमर्शों के बावजूद जेल सुधार बहुत मुश्किल होगा।

लेखक कैंपेन टू सेव अर्थ नाउ के मानद संयोजक है। उनकी हालिया किताब "मेन ओवर मशीन एंड प्रोटेक्टिंग अर्थ फ़ॉर चिल्ड्रेन" है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

All that is Wrong with Indian Budgets for Prisons

Indian Prisons
jail not bail
Mental health
prison headcount
health in prisons
jail conditions
budget for jails
NCRB

Related Stories

इतनी औरतों की जान लेने वाला दहेज, नर्सिंग की किताब में फायदेमंद कैसे हो सकता है?

आशा कार्यकर्ताओं की मानसिक सेहत का सीधा असर देश की सेहत पर!

योगी सरकार के दावे की पड़ताल: क्या सच में यूपी में नहीं हुआ है एक भी दंगा?

चुनाव चक्र: यूपी की योगी सरकार का फ़ैक्ट चेक, क्या हैं दावे, क्या है सच्चाई

यूपी: चुनावी समर में प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री का महिला सुरक्षा का दावा कितना सही?

विशेषज्ञों के मुताबिक़ कश्मीर में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति अपने कगार पर है

उत्तराखंड: मानसिक सेहत गंभीर मामला लेकिन इलाज के लिए जाएं कहां?

क्या हमारा देश बच्चों के के लिए सुरक्षित नहीं रह गया?

भारत में सबसे कम जेल में रहने की दर होने के बावजूद लक्षद्वीप को पांचवीं जेल की आवश्यकता क्यों है?

महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या


बाकी खबरें

  • putin
    एपी
    रूस-यूक्रेन युद्ध; अहम घटनाक्रम: रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश 
    28 Feb 2022
    एक तरफ पुतिन ने रूसी परमाणु बलों को ‘हाई अलर्ट’ पर रहने का आदेश दिया है, तो वहीं यूक्रेन में युद्ध से अभी तक 352 लोगों की मौत हो चुकी है।
  • mayawati
    सुबोध वर्मा
    यूपी चुनाव: दलितों पर बढ़ते अत्याचार और आर्थिक संकट ने सामान्य दलित समीकरणों को फिर से बदल दिया है
    28 Feb 2022
    एसपी-आरएलडी-एसबीएसपी गठबंधन के प्रति बढ़ते दलितों के समर्थन के कारण भाजपा और बसपा दोनों के लिए समुदाय का समर्थन कम हो सकता है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,013 नए मामले, 119 मरीज़ों की मौत
    28 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1 लाख 2 हज़ार 601 हो गयी है।
  • Itihas Ke Panne
    न्यूज़क्लिक टीम
    रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी: आज़ादी की आखिरी जंग
    28 Feb 2022
    19 फरवरी 1946 में हुई रॉयल इंडियन नेवल म्युटिनी को ज़्यादातर लोग भूल ही चुके हैं. 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस अंग में इसी खास म्युटिनी को ले कर नीलांजन चर्चा करते हैं प्रमोद कपूर से.
  • bhasha singh
    न्यूज़क्लिक टीम
    मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा
    27 Feb 2022
    मणिपुर की राजधानी इंफाल में ग्राउंड रिपोर्ट करने पहुंचीं वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह। ज़मीनी मुद्दों पर संघर्षशील एक्टीविस्ट और मतदाताओं से बात करके जाना चुनावी समर में परदे के पीछे चल रहे सियासी खेल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License