NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अनाकर्षक जिहादी
पी. साईनाथ
21 Sep 2014

यु.पी.ए.-2 को पूरे पांच साल लगे ताकि वह घोटालो और अन्य जन-विरोधी नीतियों के चलते लोगों को अपने से बुरी तरह से दूर कर दे। और भाजपा ने केवल पांच महीने में ही गलत ढंग से लोगो को अपने से दूर झटक दिया। इस हफ्ते जिन 32 सीटों पर उपचुनावों हुए उनमे से 24 पर भाजपा विराजमान थी। इनमें से भाजपा ने आधी सीटें खो दी जबकि अभी मीडिया में 100 मोदी सरकार का महोत्सव भी पूरा नहीं हुआ था। इन उपचुनाव के परिणाम के बारे में ज्यादा कयास लगाना ठीक नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक तौर पर इसका सही जायजा लेना जरूरी है।

एक महीने के भीतर महाराष्ट्र में होने जा रहे चुनावों में भाजपा शिवसेना को संभावना है कि वे काफी अच्छे ढंग से चुनाव जीत जायेगी। कांग्रेस-एन.सी.पी सरकार जो सत्ता में है इन चुनावों में धुल चाटेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उप-चुनावों से कोई सीख न ली जाए।

सबक:

सबक एक: भाजपा ने बहुत ही कम समय में देश भर में अल्पसंख्यकों को काफी डरा दिया है। 2014 के चुनावों में अल्पसंख्यक मत बहुत बुरे ढंग से विभाजित हो गए थे। इस बार राज्य दर राज्य अल्पसंख्यकों ने एक बड़ी पार्टी को वोट दिया। चाहे वह राजस्थान, उत्तर परदेश या असम हो।

लोकसभा चुनावों में नरेद्र मोदी ने सांप्रदायिक उन्माद बढाने की जिम्मेदारी को अमित शाह, गिरिराज सिंह, बाबा रामदेव आदि को सौंप दी थी या कहिये ‘आउट सोर्स’ कर दी थी, जबकि उसने खुद को विकास पुरुष के रूप में पेश किया। खैर, सांप्रदायिक मुर्गियों ने घर में बसेरा बना लिया।

यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल में, जहाँ भाजपा विधानसभा में अपने ‘प्रथम प्रवेश’ का महोत्सव मन रही है, बसिरहाट में जो इसने सीट जीती है उसकी संख्या काफी दिलचस्प है। बसीरहाट सीमा से लगा क़स्बा है जहाँ भाजपा मई महीन में हुए लोकसभा चुनाव में काफी गंभीर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही थी। इस सीट पर भाजपा की तृणमूल कांग्रेस से 30,000 मतों से भी ज्यादा की लीड थी। इस हफ्ते यह घाट कर मात्र 1700 मत रह गयी, एक बड़ी गिरावट। 

दो: आमतौर पर भ्रमित कांग्रेस से ज्यादा भाजपा लोगों को अपने से जल्दी दूर करती है। अप्रिय, आक्रामक, परिहासशील रुख अख्तियार करना और अपनी सफलताओं बढा-चढ़ा कर बताना सब उनके डीएनए में है। भाजपा ने उत्तराखंड में लोक सभा चुनावों भारी जीत दर्ज करने के थोड़े समय बाद ही बाद विधानसभा के उप-चुनावों में तीन सीटों मुह की खायी। इसे मध्य प्रदेश और कर्नाटक में मुख्य सीटों पर भी हार का सामना करना पड़ा – वह लोकसभा चुनावों इतनी बढ़िया जीत हासिल करने के बाद।

महत्त्वपूर्ण: ज्यादातर सीटों पर जहाँ भाजपा हारी है वे सीटें भाजपा के उन चुने हुए विधायकों की सीटें थी जिन्हें लोकसभा में उम्मीदवार बनाया गया था – और वे जीत गए। राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश की इन सीटों पर जाहिर है भाजपा मज़बूत स्थिति में थी। फिर भी इसे उत्तर परदेश में जिसे वह अपना मज़बूत गढ़ बताती है 11 में 8 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। चार महीनों में इनमे से कईं सीटें ये भारी बहुमत से हार गए। और इसके अलावा अन्य सीटों पर इनका जीत का फासला ओर भी कम हो गया। और कांग्रेस जोकि चुनाव शुरू होनेसे पहले धुल खाए पड़ी थी ने राजस्थान में चार में तीन सीटों पर जीत हासिल की और गुजरात की नौ सीटों में से तीन पर जीत हासिल की,सभी भाजपा की कीमत पर जीती गयी। 

तीन: भाजपा अब दिल्ली में चुनाव कराने की अनुमति नहीं देगी। फिर दिल्ली में चुनावों को टालना उनके लिए एक ओर बड़ी समस्या हो सकती है। मीडिया की मिलीभगत से आप पार्टी द्वारा किये स्टिंग ऑपरेशन जिसमें भाजपा नेता द्वारा विधायकों की खरीद फरोख्त करते दिखाया गया है को कोई ख़ास गंभीरता से नहीं लिया है। इस तरह की हरकत करना उनके लिए ओर मुसीबत बन जायेगी। और मीडिया किसी भी चाल पर अधिक से अधिक पैनी नज़र रखने पर मजबूर हो जाएगा।

चार: गणित मायने रखता है। मई महीने में मैंने यह बात कही थी कि लोकसभा चुनावों में जो "बड़े पैमाने पर लहर" है वह अनिवार्य रूप से कांग्रेस-विरोधी और यु.पी.ए.-विरोधी लहर है। और इसके खिलाफ चाहे वह कोई भी ताकत हो उसे इसका फायदा मिलेगा। बड़ी सीट वाले राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार में फायदा ज्यादा होगा। ओडिशा में नवीन पटनायक की बी.जे.डी. को फायदा मिला। बंगाल में तृणमूल को। दक्षिण में आंध्र प्रदेश में तेलगु देशम और तमिल नाडू में अन्नाद्रमुक ने फायदा उठाया।

पांच: मैंने यह भी कहा था कि 2014 के लोक सभा चुना में मौजूदा चुनाव प्रणाली (FPTP) बेकाबू हो गयी। सामान्यतः एफपीटीपी व्यवस्था तब नुकसान करती है जब मुकाबलात्रिकोणीय हो। और जब ४ से ५ उम्मीदवार होते है तब यह बेहद नुकसान की स्थिति कड़ी कर सकती है जैसा कि अक्सर तमिलनाडू में देखने को मिला है।यहाँ एआईडीएमके को 44 फीसदी वोट और 95% सीटें मिली।।

राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को 31 प्रतिशत वोट और 282 लोक सभा सीटें मिली। वहीँ कांग्रेस को 19।3 फीसदी मतों के साथ मात्र 44सीटें मिली। २००९ के चुनावो में भाजपा को भी उतने प्रतिशत वोट मिले थे जितने २०१४ में कांग्रेस को पर उसे ११६ सीटें मिली थी।यह साफ़ है कि एफपीटीपी व्यवस्था ने २०१४ के चुनावों में बड़ी भूमिका अदा की।

इस बार उपचुनावों में मायावती की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में किनारे रहने का फैसला किया। उन्होंने एक भी उम्मीदवार नहीं खड़े किए। और नतीजन वही हुआ जिसकी उम्मीद थी। समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन भाजपा के मुकाबले कहीं बेहतर रहा।

एक महिना पहले ही बिहार में जद(यू) और राजद के साथ आने से भाजपा को ६ के मुकाबले ४ सीटों से ही संतोष करना पड़ा।उससे पहले उत्तराखंड में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनीदी थी। ।

छठा: जाति जिसे मीडिया और उसके बंधे बंधाये चिंतको ने मरा घोषित कर दिया था, आज भी महत्व रखता है। जो इसके जाने की बात कर रहे हैं, वो बस जानबूझ कर इसे अनदेखा कर रहे।(अगर इसे मारा घोषित कर डे तो फिर जाति व्यवस्था से लड़ना नहीं पड़ेगा।क्यों?)।

सातवाँ: मीडिया ने इसे आते हुए नहीं देखा। उन्होंने अपने आप को केवल ये नहीं कि मोदी का जादू कभी ख़तम नहीं होगा, बल्कि यह भी समझा लिया था कि अमित शाह भी वही करिश्मा कर दिखायेंगे। और उन्होंने कर भी दिखाया पर वैसा नहीं जैसा मीडिया ने सोचा था।

हाँ, सबक चुनावी से कहीं ज्यादा राजनीतिक हैं। भाजपा को महाराष्ट्र से दिलासा मिलेगा। बाकी तो इन उपचुनावों के परिणामो से मिल ही गया है। 

सौजन्य:  psainath.org

(अनुवाद- महेश कुमार)

 

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

भाजपा
उपचुनाव
साम्प्रदायिकता
कांग्रेस
जिहाद
लोक सभा
एनडीए
आरएसएस
यूपीए
सांप्रदायिक ताकतें

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

बढ़ते हुए वैश्विक संप्रदायवाद का मुकाबला ज़रुरी

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा भी बोगस निकला, आप फिर उल्लू बने

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप


बाकी खबरें

  • CARTOON
    आज का कार्टून
    प्रधानमंत्री जी... पक्का ये भाषण राजनीतिक नहीं था?
    27 Apr 2022
    मुख्यमंत्रियों संग संवाद करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य सरकारों से पेट्रोल-डीज़ल के दामों पर टैक्स कम करने की बात कही।
  • JAHANGEERPURI
    नाज़मा ख़ान
    जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी
    27 Apr 2022
    अकबरी को देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं था न ही ये विश्वास कि सब ठीक हो जाएगा और न ही ये कि मैं उनको मुआवज़ा दिलाने की हैसियत रखती हूं। मुझे उनकी डबडबाई आँखों से नज़र चुरा कर चले जाना था।
  • बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः महिलाओं की बेहतर सुरक्षा के लिए वाहनों में वीएलटीडी व इमरजेंसी बटन की व्यवस्था
    27 Apr 2022
    वाहनों में महिलाओं को बेहतर सुरक्षा देने के उद्देश्य से निर्भया सेफ्टी मॉडल तैयार किया गया है। इस ख़ास मॉडल से सार्वजनिक वाहनों से यात्रा करने वाली महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर होगी।
  • श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    प्रभात पटनायक
    श्रीलंका का आर्थिक संकट : असली दोषी कौन?
    27 Apr 2022
    श्रीलंका के संकट की सारी की सारी व्याख्याओं की समस्या यह है कि उनमें, श्रीलंका के संकट को भड़काने में नवउदारवाद की भूमिका को पूरी तरह से अनदेखा ही कर दिया जाता है।
  • israel
    एम के भद्रकुमार
    अमेरिका ने रूस के ख़िलाफ़ इज़राइल को किया तैनात
    27 Apr 2022
    रविवार को इज़राइली प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के साथ जो बाइडेन की फोन पर हुई बातचीत के गहरे मायने हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License