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आर्थिक मंदी : छोटे-मोटे उपाय की नहीं, बल्कि बड़े संरचनागत सुधार की ज़रूरत 
भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल : "मरीज का शरीर तप रहा है। तीमारदार दूसरी तरफ मुंह करके बैठा है। थर्मामीटर को तोड़ दिया गया है और अब डॉक्टर को भी भगाया जा रहा है... ।"
अजय कुमार
26 Aug 2019
economic crises

23 अगस्त की शाम वित्त मंत्री ने जर्जर चल रही अर्थव्यवस्था को उभारने के लिए उपायों को ब्योरा रखा। ब्योरा केवल फॉर्मल इकॉनमी में शामिल उद्योगपतियों की हलचल को शांत करने के लिए था, इनफॉर्मल इकॉनमी में सुधार करने के लिए कोई  कदम नहीं दिखा। जबकि सबसे अधिक छंटनी की खबरें इनफॉर्मल सेक्टर में काम करने वाले लोगों की हो रही हैं। इनकी नौकरियां छीनी जा रही है।

अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान वित्त मंत्री 6 कैटगरी के 32 स्लाइड लेकर आईं थीं।  उन्होंने यह नहीं बताया कि पिछले 20 सालों में भारत की विकास दर सबसे कम रही है। बल्कि दुनिया की आर्थिक रफ्तार के सहारे अपनी बात कहने की कोशिश की। उन्होंने बताया कि ग्लोबल जीडीपी की रफ्तार धीमी है और इसके अभी घटने की आशंका जताई जा रही है। ग्लोबल डिमांड कम है। भारत की स्थिति विकसित और विकासशील देशों में अच्छी है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार रिज़ोल्यूशन चाहती है न कि प्रोसिक्यूशन चाहती है। मोदी सरकार वेल्थ क्रिएटर का सम्मान करती है। ऐसे वाक्यों से यह इशारा भी मिल रहा था कि उद्योगपतियों को राहत दिए जाने की कोशिश है, जो खुलकर भारत की जर्जर होती अर्थव्यवस्था के खिलाफ बोलने लगे हैं। उनके गिरते मुनाफे को बचाने की कोशिश है।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस की सबसे बढ़ी घोषणा घरेलू और विदेशी पोर्टफोलियों इन्वेस्टमेंट पर लगाया गया, सरचार्ज वापस लेने से जुड़ी है। बजट के दौरान ही इसकी घोषणा की गयी थी। इस सरचार्ज से उद्योग जगत नाखुश था। वह इसे हटाने की मांग कर रहा था। 18 जुलाई को वित्त मंत्री ने कहा कि विदेशी निवेश पर सरचार्ज नहीं हटेगा लेकिन 23 अगस्त को इसे हटाया दिया गया। यानी यह कोई इकॉनमी बूस्टर नहीं है बल्कि सरकार की भूल सुधार है, जो उसने उद्योगपतियों के दबाव में किया है। सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ की पूंजी तुरंत देगी सरकार। इसकी घोषणा इस साल के बजट में की गयी थी। यानी सरकार इस साल में आज नहीं तो कल इस पूंजी को सरकारी बैंको को देती ही।

वित्त मंत्री ने कहा कि कारोबारियों के लिए GST रिफंड आसान होगा। माइक्रो स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज के GST रिफंड 30 दिन में कर दिए जाएंगे। आगे के सभी GST रिफंड केस 60 दिन में निपटाए जाएंगे। लोन क्लोजर के 15 के दिन के अंदर ग्राहक को दस्तावेज दे दिए जाएंगे। लोन आवेदन की ऑनलाइन ट्रैकिंग की सुविधा मिलेगी। CSR उल्लंघन को क्रिमिनल नहीं सिविल अपराध माना जाएगा। यानी सोशल रेस्पॉन्सिबिल्टी का भुगतान न किया जाना अब अपराध नहीं होगा।

इससे जुड़े जेल जाने के प्रावधान अब कम्पनी एक्ट में बदले जाएंगे। कंपनी एक्ट में चल रहे 14000 केस वापस लिए गए। यानी सुधार के नाम पर एक ही झटके में एक ही साथ तकरीबन 14 हजार केस वापस ले लिए गए। हाउसिंग बैंक के लिए 30,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। घर बिक भी नहीं रहे हैं। मामलों को निपटाने के लिए जो रेरा बना है वो पूरी तरह फ्लाप है, इसके जवाब में वित्त मंत्री ने कहा कि उनका ध्यान इस समस्या पर है। असलियत यह है कि घरों को खरीदने के लिए लोगों के पास पैसा नहीं है।  जिन्हने घर खरीदा है, उन्हें घर मिल नहीं रहा है। इसमें जो भी कुछ भी हो रहा है वह सुप्रीम कोर्ट से हो रहा है। 

इसे भी पढ़े:आर्थिक मंदी: घर में आग लगी है और आप फ़र्नीचर सजा रहे हैं!

IT ऑर्डर, नोटिस, समन सेंट्रल कंप्युटर सिस्टम से भेजे जाएंगे। यानी टैक्स अधिकारीयों के साथ होने वाली प्रत्यक्ष करवाई खत्म होगी। टैक्सपेयर ने IT नोटिस  दिया तो तीन महीने में मामले का निपटारा होगा। कुल मिलाकर इन सारे क़दमों में आर्थिक सुधार के कोई बड़े कदम नहीं दिखते है। प्रक्रियाओं को सरल किया गया है। उन करभारों में छूट दी गयी है जो उद्योगपतियों से जुड़ी है।

न्यूज़क्लिक से बातचीत में अर्थशास्त्री अरुण कुमार कहते हैं कि आरबीआई, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकारों के सदस्यों के बाद, अब कम से कम वित्त मंत्रालय के सदस्यों ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं है। लेकिन सवाल उठता है कि जब सरकार कह रही है कि आर्थिक वृद्धि दर 5 से 6 फीसदी के दर से हो रही है तो यह सोचने वाली बात है कि उपभोग क्षमता क्यों नहीं बढ़ रही है, निवेश क्यों नहीं बढ़ रहा है? यह रुक क्यों गया है।

इसलिए जरूरी है कि मांग में आ रही कमी को दूर किया जाए। यह तीन साल पहले नोटबंदी, जीएसटी, बैंकों के एनपीए बढ़ने के साथ शुरू हो गयी थी। इसकी वजह से मांग में कमी आना शुरू हो चुका था। पहले असंगठित क्षेत्रों में उसके बाद संगठित क्षेत्रों में दिक्कतें आना शुरू हो गयी। ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी अभी दो-तीन महीने से कमी नहीं आयी है। यह पिछले आठ- नौ महीने से चल रही है। ऐसा होने के बावजूद भी निर्मला सीतारमण के प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए इनफॉर्मल सेक्टर के लिए कुछ भी नहीं दिखा। थोड़े बहुत कदम दिखे भी तो वह केवल फॉर्मल सेक्टर के लिए दिखे।

राजनीतिक अर्थशास्त्री शकंर अय्यर इस विषय पर एक टेलीविज़न चर्चा में कहते हैं कि ये सुधार ऐसे हैं जैसे ट्रैफिक से बचने के लिए फ्लाईओवर बनाया जाता है और आगे चलकर फ्लाईओवर पर जाम लगने लगता है। असली कहानी यह है कि ILFS का पिछले साल दिवालिया निकल गया, जिसके पास लोगों का एक लाख करोड़ का बकाया था। हाउसिंग फाइनेंस के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनी DHFL का चार महीने पहले दिवालिया निकल गया, जिसके पास लोगों और कंपनियों का तकरीबन 90 हजार करोड़ बकाया है।

स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को पावर कंपनियों को तकरीबन 40 हजार करोड़ का भुगतान करना है। यही हाल रोड कंस्ट्रक्शन, फ़र्टिलाइज़र कम्पनी, फ़ूड कारपोरेशन का है। जहां नकदी की भारी समस्या है कि आगे बढ़ना तो दूर की बात है खुद को चलाये रखने की कोशिश कर सके। सरकार के ये बहुत सारे उपक्रम दिवालेपन की हद तक पहुँच चुके हैं। यानी अगर समाज से मांग नहीं पैदा हो रहा है तो सरकार की तरफ से खर्च भी नहीं किया जा रहा है कि मांग पैदा होने की स्थितियां जन्में।

इसे भी पढ़े:आर्थिक मंदी : नोट कीजिए, किस सेक्टर में कितना नुकसान

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार परन्जॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं कि इस समय अर्थव्यवस्था को ऑपरेशन की जरूरत थी लेकिन निर्मला सीतारमण ने बैंड-एड दे दिया है। यह बजट के बाद दूसरे बजट की तरह है। ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, धागा मिल, स्टील से लेकर बिस्किट कम्पनी तक की डिमांड कम हो गयी है। एक लाख 70 हजार मकान बने पड़े हैं लेकिन कोई खरीदने वाला नहीं है। अब आने वाला समय ही बताएगा कि आगे क्या होगा।

जानकरों की तरफ से हमेशा यह कहा जाता है कि भारत बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है, यहां की अर्थव्यवस्था में मांग में कमी आना बहुत मुश्किल है। ऐसे में अगर मांग में कमी आयी है तो इसका मतलब साफ़ है कि भारत की अर्थव्यवस्था को किसी छोटे- मोटे उपाय की नहीं बल्कि बहुत बड़े स्तर पर संरचनागत सुधार की जरूरत है।

ऐसे में किसी जानकार ने ठीक ही लिखा है कि मरीज का शरीर तप रहा है।  तीमारदार दूसरी तरफ मुंह करके बैठा है। थर्मामीटर को तोड़ दिया गया है और अब डॉक्टर को भी भगाया जा रहा है (प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों जैसे कि रघुराम राजन , अरविन्द सुब्रमण्यम)। इसका नतीजा क्या होगा, आप खुद ही सोच लीजिए।

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