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आर्थिक संकट: क्यों नव-उदारवादी चिंतक केवल नोटबंदी को ज़िम्मेदार मानते हैं?
वर्तमान आर्थिक मंदी की जड़ें नव-उदारवादी रास्ते के भीतर धंसी हैं, जिसके कारण अति-उत्पादन का संकट पैदा हुआ है। फ़र्क़ इतना है कि नोटबंदी और ‘जल्दबाज़ी’ में लागू की गई जीएसटी ने इसे अधिक बढ़ा दिया है।
प्रभात पटनायक
14 Sep 2019
Translated by महेश कुमार
economy crises

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीतिक परिदृश्य उभरते हुए एक बार फिर से रूढ़िवादी नव-उदारवादी विचार को समझा रहे है, कोई भी वर्तमान आर्थिक मंदी के संबंध में तीन अलग-अलग दृष्टिकोणों को स्पष्ट रूप से समझ सकता है।

पहली रूढ़िवादी नव-उदारवादी स्थिति वह है जिसे सिंह ने हाल ही में स्पष्ट किया है। वे बताते हैं कि यह संकट नव-उदारवादी नीतियों की वजह से नहीं है, जिसे उन्होंने ख़ुद देश में 1991 में लागू किया था, बल्कि पूरी तरह से बाहरी कारक हैं, जैसे कि नोटबंदी/विमुद्रीकरण और माल और सेवा कर को ‘जल्दबाज़ी’ में लागू करना, और इसलिए नरेंद्र मोदी प्रशासन पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। सिंह ने इस संकट को "मानव निर्मित" कहा, अर्थात, मानव त्रुटि का परिणाम, उनके मुताबिक़ यह संकट गलत निर्णय और समझ की कमी से उत्पन्न हुआ है, इसलिए व्यवस्था को इस तरह के बाहरी झटकों ने प्रभावित किया है, न कि नवउदारवाद के भीतर मौजूद किसी भी तरह की अन्य प्रवृत्ति से ऐसा हुआ है।

यह निष्कर्ष जो संकट पर क़ाबू पाने के इस दृष्टिकोण को आगे लेकर जाता है, वह नवउदारवाद रास्ते को ही आगे बढ़ाएगा, लेकिन आर्थिक मामलों पर "सोचने वाले लोगों" की सलाह से व्यवस्था को इस तरह के झटके से बचाया नहीं जा सकता है।

यह रास्ता या विचार विशेष रूप से संकट के रूप में समग्र मांग में आई कमी की पहचान नहीं करता है, और इसलिए सिस्टम में मांग को इंजेक्ट करने के लिए कोई विशिष्ट आवश्यकता भी नहीं दिखती है, और न ही बुनियादी आय योजना जैसा कोई रास्ता जिसे कांग्रेस पार्टी ने ख़ुद 2019 के लोकसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर पेश किया था। जिसे न्याय योजना कहा गया था, और प्रत्येक उस परिवार को जो आर्थिक स्थिति में सबसे निचले पायदान पर है को प्रति माह 6,000 रुपये देने की कल्पना की गई थी, जो लगभग पांच करोड़ घरों को दिए जाने की योजना थी। बेशक, इस योजना को किस तरह से वित्तपोषित किया जाएगा, कैसे लाभार्थियों की पहचान की जानी थी, ग़रीबों के बीच अंतर कैसे सुनिश्चित किया जाना था, कुछ भी तो स्पष्ट नहीं था। यह योजना सोची समझी योजना की जगह इच्छा पूर्ण ज़्यादा दिखी थी।

कांग्रेस के घोषणापत्र के प्रति वफ़ादारी तो तब होती जब इस योजना को शुरू करने के प्रयास को आर्थिक संकट से जोड़ा गया होता, जिसका देश वर्तमान में सामना कर रहा है। लेकिन मनमोहन सिंह ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। इस अर्थ में, उनका विश्लेषण और परिप्रेक्ष्य, जो वास्तव में सभी नव-उदारवादी अधिवक्ताओं का भी है, राहुल गांधी ख़ुद भी इस वर्ष मार्च में जो कहा उसके मुताबिक़ वे भी उससे प्रस्थान करते नज़र आए (यह उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह ने उस समय कांग्रेस की न्याय योजना के बारे में कुछ नहीं कहा था, और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने केवल यह कहा था कि यह एक व्यावहारिक योजना है। नवउदारवाद के पैरोकार, यह अनुमान लगाना ग़लत नहीं होगा कि उस योजना के प्रति उत्साही नहीं थे।

सरकार का संकट पर नज़रिया दूसरी स्थिति को दर्शाता है, उनके मुताबिक़ न तो नवउदारवाद, न ही विमुद्रीकरण और न ही “जल्दबाज़ी में लागू की गई जीएसटी (माल और सेवा कर) मंदी के लिए ज़िम्मेदार है; वास्तव में, उन्हें कोई मंदी नज़र ही नहीं आ रही है। सच यह है, कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पूंजीपतियों को कई तरह की रियायतों की घोषणा की है, और उन्हे बजटीय प्रस्तावों में शामिल किया गया है; और भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने अपने स्वयं के भंडार से खर्च करने के लिए सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपये देने के अलावा ब्याज़ दर में भी कमी की है। लेकिन ये उपाय अर्थव्यवस्था में गिरावट को देख कर किए जा रहे हैं, ऐसा सरकार क़तई मानने को तैयार नहीं हैं।

इसके अलावा, ये उपाय मंदी को गिरफ़्त में नही ले पाएंगे। जबकि ब्याज़ दर में कमी, या आम तौर पर ऋण भुगतान में अधिक आसानी, निजी निवेश पर बहुत कम प्रभाव डालेगा, जबकि मंदी में मोटे तौर पर ब्याज़ को लेकर ज़्यादा उत्साह दिखाई नहीं देता है, आरबीआई द्वारा सौंपे गए 1.76 लाख करोड़ रुपये भी बस बजट अनुमानों में प्रस्तावित राजस्व संग्रहों में कमी को पूरा करेंगे; चूंकि बजट स्वयं कोई विस्तारवादी नहीं था, इसलिए राजस्व की कमी की भरपाई इस संकट को दूर करने में शायद ही मदद करेगी। सरकार ने, संक्षेप में कहा जाए तो, अर्थव्यवस्था में मंदी का मुक़ाबला करने के लिए बहुत कम काम किया है और इसके होने को भी अभी तक स्वीकार नहीं किया है। इसलिए, यह दूसरी स्थिति है, जिसमें संकट होने से ही इनकार किया जा रहा है, या फिर भ्रम की स्थिति पैदा की जा रही है।

इन दो नजरियों के मुक़ाबले तीसरा नज़रिया वामपंथियों का है, जो न केवल संकट और उसकी गंभीरता को पहचानता है, बल्कि नव-उदारवादी रास्ते के भीतर इसकी जड़ों को भी रेखांकित करता है। एक नव-उदारवादी व्यवस्था आवश्यक रूप से किसान कृषि व्यवस्था पर अंकुश लगाता है, जो दोनों ही किसान की आय को कम करती है, और यह स्थिति काफ़ी लोगों को ग़ैर-मौजूद नौकरियों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करने के लिए मजबूर करता है, जिससे श्रम की आरक्षित सेना में बढती है, और कृषि उत्पादन की वृद्धि को भी नीचे ले आती है, जिसमें खाद्य उत्पादन में कमी भी शामिल है। श्रम की यह आरक्षित सेना काम करने वाले सभी लोगों की आय पर एक संयमित प्रभाव डालती है, यहां तक कि श्रम उत्पादकता बढ़ती रहती है, अतिरिक्त उत्पादन बढ़ता है और आय और पुंजि की असमानताओं को बढ़ा देता है।

इन दोनों ही कारणों से, अर्थात् कृषि विकास दर में गिरावट, और आय असमानता में हुई वृद्धि से, सभी तरह की वस्तुओं के लिए बाज़ार विवश बना हुआ है। यह कुछ समय के लिए ऑफ़सेट हो सकता है जैसे पहले के मुक़ाबले मांग में वृद्धि या परिसंपत्ति-मूल्य के बुलबुले से उत्पन्न होने वाले धन जैसे कुछ विशिष्ट कारक हो सकते हैं, लेकिन अंततः यह एक अति-उत्पादन संकट के रूप में अपने को व्यक्त करता है।

भारत में ऐसा ही कुछ हो रहा है; और चूंकि इसी तरह की प्रवृत्तियां दुनिया भर में काम कर रही हैं, इसलिए अति-उत्पादन के संकट का विश्वव्यापी प्रभाव पड रहा है, जो इसके परिणामों से बचने के लिए भारत की ओर से कोई भी ऐसा प्रयास किया जाता है, जैसे कि निर्यात को बढ़ाकर, एक निरर्थक क़दम है। इसलिए, हम जो देख रहे हैं, वह एक मृत-अंत है यानी उसके आगे कुछ नहीं है, और इस अंत को नवउदारवाद दुनिया में लाया है।

मोदी सरकार द्वारा उठाए गए क़दमों, जैसे कि विमुद्रीकरण और जीएसटी ने भारत में इस संकट को अधिक बढ़ा दिया है; लेकिन यह कहना कि भारत में संकट के पीछे अकेले ये क़दम हैं, तो यह तथ्यों को झूठलाना होगा। यह उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह और नव-उदारवादी की वकालत करने वाले लोग यह नहीं समझाते हैं कि विमुद्रीकरण से विकास दर में कमी क्यों आनी चाहिए, जबकि बहुत पहले ही विकलांग पड़ी मुद्रा के बदले नई मुद्रा का थोक में विनिमय किया जा चुका है।

यह सच है, कि विमुद्रीकरण का छोटे उत्पादन क्षेत्र पर स्थायी प्रभाव पड़ा है; लेकिन, संकट को तिव्र करने में एक छोटे सा कारण होने के नाते, यह अर्थव्यवस्था की नीचे की ओर कैसे ले जा सकता है, जब ऑटोमोबाइल से लेकर बिस्कुट क्षेत्र तक मांग में अकानक कमी का सामना कर रहे हैं। इसी तरह, यह भी नहीं समझा पाएंगे कि अति-उत्पादन का संकट केवल भारत तक ही सीमित क्यों नहीं है, बल्कि वह एक विश्वव्यापी संकट का प्रतिनिधित्व करता है।

इस संकट का समाधान, जो समान रूप से काफी स्पष्ट है, अर्थात कामकाजी लोगों के हाथ में क्रय शक्ति को बढ़ाना और उनके लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवा, मुफ्त शिक्षा, रोज़गार की गारंटी, सस्ते भोजन और ग़ैर-अंशदायी वृद्धावस्था पेंशन के लिए इंतज़ाम करना होगा। 

लोगों के हाथों में अतिरिक्त क्रय शक्ति देने से औद्योगिक क्षेत्र में उनकी क्षमता का बेहतर उपयोग होगा और इससे बड़ा निवेश होगा, यह सुनिश्चित करने के लिए कि बढ़ी हुई क्रय शक्ति खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में मुद्रास्फ़ीति का कारण न बने, इसलिए खाद्य उत्पादन में वृद्धि करनी होगी। इसके लिए किसानी कृषि के लिए राज्य के व्यापक समर्थन की ज़रूरत है, जिसमें उनके लिए दूरगामी क़ीमतों को सुनिश्चित करना, भूमि के हितों को साधने के लिए भूमि सुधार करना ताकि जो लोग भूमि पर ब्याज़ के ज़रिये पूंजी के आदिम संचय को अंजाम दे रहे हैं, और वह भी उप्लब्ध सब्सिडी के ज़रिये ऐसा कर रहे हैं। वास्तव में, कई अध्ययन किए गए हैं जो इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि इस वैकल्पिक एजेंडे के लिए वित्तीय संसाधनों की कितनी आवश्यकता है।

इन सबसे ऊपर, वामपंथी एजेंडे के लिए काम करने वाले लोगों को वर्गीय ताक़तों के संतुलन में बदलाव लाने के लिए जुटना ज़रूरी है, जो कि नव-उदारवादी शासन की विशेषता है। यह एक समाजवादी एजेंडा नहीं है, लेकिन एक ऐसा एजेंडा है जो पूंजीपतियों पर अधिक करों को लागू करने के लिए मजबूर करेगा, विशेष रूप से वेल्थ टैक्स के रूप में; अन्यथा, अगर आम लोगों पर टैक्स लगाया जाता है वह भी बड़े सरकारी ख़र्चों को पूरा करने के लिए, तो शायद ही कभी कुल मांग का शुद्ध विस्तार हो पाएगा, और शायद ही संकट का कोई समाधान होगा।

इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि मनमोहन सिंह जैसे नवउदारवाद के पैरोकार, इस पर कोई ठोस सुझाव नहीं दे पाते हैं कि संकट को कैसे दूर किया जा सकता है (नवउदारवाद के सामान्य अनुसरण के अलावा)। वे सरकार को सलाह देते हैं कि "लोगों के बारे में सोचें", यह सुझाव देते हुए कि सरकार के पास ख़ुद ही इस तरह की सोच की कमी है, एक बिंदु इससे असहमत हो सकता है; लेकिन क्या वास्तव में ये  नव-उदारवादी शिविर के "सोचने वाले लोग" सरकार को सलाह देंगे, वहाँ काफ़ी चुप्पी है। यह शायद ही कोई आश्चर्य की बात है: नवउदारवाद के अंत का अर्थ है कि इसकी "सोच वाले लोगों" के पास भी इस संकट से निकलने का कोई रास्ता नहीं हैं।

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