NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
आयकर आँकड़ों से कॉर्पोरेट को दी गयी रियायतों का खुलासा
कॉर्पोरेट निकायों पर कर क्यों नहीं बढ़ाए जाएँ ताकि सरकार सभी नागरिकों को विभिन्न आवश्यक सेवाएँ मुहैया करवा सके?
सुबोध वर्मा
25 Oct 2018
Translated by महेश कुमार
corporate concessions

मोदी सरकार फिर एक बार भरमाने वाले आँकड़ों के आधार पर अपनी पीठ को थपथपा रही है। इस बार यह आयकर से जुड़े आँकड़े है, जिन्हें हाल ही में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड द्वारा जारी किया गया है। सरकार ने दावा किया है कि कर अनुपालन और कर वसूलियों में लगातार वृद्धि हुई है।

वास्तव में सरकार इन तथ्यों में जो छिपा रही है वह यह है कि जीडीपी के हिस्से के तौर पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर वसूलियाँ पिछले कई वर्षों में लगभग स्थिर हैं (नीचे ग्राफ देखें)।

Corporate concessions 1.jpg

एकत्रित कर के इतने सारे करोड़ रुपये की पूर्ण संख्या - सरकार जिनको प्रचारित कर रही है – वे अप्रासंगिक हैं क्योंकि मुद्रास्फीति ने न केवल ऐसे आँकड़े को निगल लिया है बल्कि देश के सकल उत्पादन (सकल घरेलू उत्पाद) का मूल्य भी इसी अवधि में लगातार बढ़ा है। तो, कर वसूलियों को देखने का एक बेहतर तरीका जीडीपी के हिस्से के तौर पर देखना होगा। इस तरह से देखने से हम पाते हैं कि 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद का 5.81 प्रतिशत प्रत्यक्ष कर है जो 2017-18 में 5.98 प्रतिशत तक बढ़ गया था (जिसके लिए केवल अस्थायी अवांछित आँकड़े उपलब्ध हैं, जो ऊपर दिए गए ग्राफ में *इंगित है)। सात वर्षों में मात्र  0.18 प्रतिशत अंक की वृद्धि का ज़िक्र करना फ़िज़ूल सा लगता है। जीडीपी के हिस्से के तौर पर अप्रत्यक्ष कर इसी अवधि में 4.48 प्रतिशत से बढ़कर 5.46 प्रतिशत हो गया, जो कि केवल 0.98 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी है।

यदि आप इन दो प्रकार के करों को जोड़ते हैं, और जीडीपी के हिस्से के तौर पर इसकी गणना करते हैं तो यह 2010-11 में 11.3 प्रतिशत की तुलना में 2017-18 में केवल 11.44 प्रतिशत तक बैठता है। यह न केवल बहुत कम बढ़ोतरी है बल्कि 11.44 प्रतिशत का कर-जीडीपी अनुपात इस आकार की अर्थव्यवस्थाओं के लिए दुनिया में सबसे कम है।

एक ओर भी चौंकाने वाली वास्तविकता है जिसका खुलासा नये आँकड़े करते है – जिस पर मोदी सरकार चुप्पी साधे हुए है। वह कि: जीडीपी के हिस्से के तौर पर कॉर्पोरेट कर में इस अवधि के दौरान गिरावट आई है। 2010 -11 में यह जीडीपी का 3.89 प्रतिशत था जो 2010-11 में घटकर सकल घरेलू उत्पाद का 3.41 प्रतिशत ही रह गया यानि कॉर्पोरेट ने पहले के मुकाबले कम कर चुकाया है।

Corporate concessions 2.jpg

यह मोदी सरकार द्वारा लागू भारी व्यापार अनुकूल नीतियों का परिणाम है, जो पिछली सरकार की रियायतों का कुल योग है। कॉरपोरेट निकायों को दी गयी विशाल बोनंजा की गंगा रियायतों और कटौती और विभिन्न करों और ड्यूटी में छूट से बहती है जिसे कि जेटली के तहत वित्त मंत्रालय हर साल कोर्पोरेट के लिए उंडेल रहा है।

इस बीच, व्यक्तिगत आयकर (व्यक्तियों के साथ-साथ छोटी कंपनियों सहित अन्य गैर-कॉर्पोरेट संस्थाओं के लिए लागू) 2010-11 में सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.9 प्रतिशत से बढ़कर 2017-18 में 2.5 प्रतिशत हो गया है।

दूसरे शब्दों में, व्यक्तियों और गैर-कॉर्पोरेट संस्थाओं की अंतिम बूंद तक को निचोड़ा जा रहा है जबकि कॉर्पोरेट संस्थाओं को सभी तरह के करों में सुविधा दी जा रही हैं।

सरकार के द्वारा किए जाने वाला विलाप कि उनके पास विभिन्न आवश्यक कार्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए कोई संसाधन नहीं है - जैसे बुजुर्गों को पेंशन देना या स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए अधिक धन खर्च करना - इस 'व्यापार अनुकूल' दृष्टिकोण पर विचार करने से उन्हे इसका जवाब खुद ही मिल जाएगा। कॉर्पोरेट निकायों पर कर क्यों नहीं बढ़ाए जाएँ ताकि सरकार सभी नागरिकों को विभिन्न आवश्यक सेवाएँ मुहैया करवा सके?

मोदी सरकार से आने वाले चुनावों में शायद यह सवाल पूछा जाएगा और उसे उत्तर देना होगा जब वे जनादेश मांगने के लिए मतदाताओं के पास जाएंगे।

income tax
corporate concessions
Modi Govt
Income tax data

Related Stories

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

मोदी सरकार 'पंचतीर्थ' के बहाने अंबेडकर की विचारधारा पर हमला कर रही है

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा

ज्ञानवापी, ताज, क़ुतुब पर बहस? महंगाई-बेरोज़गारी से क्यों भटकाया जा रहा ?

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!


बाकी खबरें

  • hunger crisis
    डॉ. राजू पाण्डेय
    चिंता: ग्लोबल हंगर इंडेक्स को लेकर भी असहिष्णु सरकार
    29 Oct 2021
    पिछले कुछ समय से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है।
  • climate
    टिकेंदर सिंह पंवार
    जलवायु परिवर्तन का संकट बहुत वास्तविक है
    29 Oct 2021
    भविष्य में आने वाली अधिक आपदाओं का मुक़ाबला करने के लिए आपदा जोखिम को कमतर करने वाले सिद्धांतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है।
  • Supreme Court on Pegasus
    अजय कुमार
    पेगासस जासूसी कांड पर सुप्रीम कोर्ट की खरी-खरी: 46 पन्नों के आदेश का निचोड़
    29 Oct 2021
    केवल राष्ट्रीय सुरक्षा का जिक्र कर सरकार को निजता के अधिकार के उल्लंघन से जुड़े सवालों के जवाब देने से छूट नहीं मिल सकती है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटे में 14,348 नए मामले, 805 मरीज़ों की मौत
    29 Oct 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या बढ़कर 0.47 फ़ीसदी यानी 1 लाख 61 हज़ार 334 हो गयी है।
  • exxon
    इलियट नेगिन
    प्रतिबंधित होने के बावजूद एक्सॉनमोबिल का जलवायु विज्ञान को ख़ारिज करने वालों को फंड देना जारी
    29 Oct 2021
    अमेरिकी तेल और गैस की प्रमुख कंपनी एक्सॉनमोबिल ने जलवायु विज्ञान को लेकर संदेह पैदा करने के लिए 39 मिलियन डॉलर से ज़्यादा ख़र्च किए हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License