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बौनेपन से निपटना भारत के लिए होगी चुनौती!
फूड एंड न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के आंकड़ों के मुताबिक 2022 तक भारत में तीन में से एक बच्चा कद में बौना रह जाएंगे।
अजय कुमार
26 Jun 2019
malnutrition

भारत दुनिया में सबसे तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनापन रोकने के मामलें में तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में सबसे पीछे है।

फूड एंड न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के विश्लेषण से मिली जानकारी के तहत भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन की दर में एक फीसदी की दर से कमी आ रही है, जो कि दुनिया की तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यस्थाओं में सबसे सबसे कम है। 

अगर यह ऐसी ही चलता रहा तो साल 2022 तक भारत में तीन में से एक बच्चा कद में बौना रह जाएंगे। यानी पांच साल से कम उम्र के बच्चों में तकरीबन 32 फीसदी बच्चे बौने रह जाएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2022 तक इसे 25 फीसदी तक लाने के लिए भारत को अपने कोशिशों में दोगुनी दर से काम करने की जरूरत है।  

जरा इस बात पर सोचिए कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों को सही से पोषण नहीं मिला तो क्या हो सकता है? उनकी पूरी जिंदगी बीमारियों की चपेट में गुजरने के लिए अभिशप्त हो जाती है। 

कुपोषण के चलते हुई स्टंटिंग और वेस्टिंग जैसी बीमारियां पूरे शरीर को उम्र भर के लिए कमजोर कर देती है। स्टंटिंग का मतलब होता है उम्र के हिसाब से कद में कमी और वेस्टिंग का मतलब होता है कद के हिसाब से वजन में कमी। यह दोनों स्थितियां कुपोषण यानी पोषण की कमी की वजह से पैदा होती है। 

शरीर हद से अधिक कमजोर हो जाता है। शरीर की मांसपेशियां बहुत अधिक कमजोर हो जाती हैं। शरीर संक्रमण के जाल में फंस जाता है। एक के एक बाद बीमारी शरीर पर हावी होने लगती है। अगर यह स्थिति बनी रही और नौजवानी में पोषण स्तर बढ़ाने की कोशिश की गयी तो शरीर  डायबिटीज, हाइपर टेंशन और मांसपेशिओं से जुडी बीमारियों का घर बनने लगता है।  

विडंबना यह है कि पिछले दो दशकों में देश में अनाज के पैदावार में तकरीबन 33 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर होता जा रहा है। फिर भी देश की बड़ी आबादी को सही पोषण नहीं मिल पाता है। कारण जगजाहिर है। गरीबी और आर्थिक असमानता की खाई इतनी बड़ी है कि महंगाई से नहीं लड़ पाती है। 

अनाज होते हुए भी अनाज नहीं मिल पाता है। साथ में अनाज की बर्बादी और अनाज से जुड़े आयात-निर्यात के मसले का खराब प्रशासन, स्थिति को और अधिक गंभीर बना देता है। ऐसे स्थिति में गरीबी में जीने वाले लोगों की हालत जोड़ लीजिये।  तकरीबन 30 फीसदी सबसे अधिक गरीब लोग अपने पोषण से हर दिन केवल 1,811 किलोकैलोरी ऊर्जा ले पाते हैं, जो औसत ऊर्जा  2,155 किलोकैलोरी की प्रति दिन की खपत से बहुत कम है। 

फ़ूड एंड न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के ही आंकड़ों के मुताबिक, सबसे अधिक गरीब लोगों के बच्चों में तकरीबन 52 फीसदी बच्चे स्टंटिंग से जूझ रहे हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति की आबादी में तकरीबन 43 और 44 फीसदी बच्चें स्टंटिंग से परेशान है। अशिक्षित मांओं में से तकरीबन 51 फीसदी मांओं के बच्चे स्टंटिंग से जूझ रहे हैं।  

जन स्वास्थ्य अभियान के डॉक्टर गार्गिया कहते हैं कि अफ़्रीकी देशों में पहले लोग बहुत लम्बे और मजबूत हुआ करते थे, लेकिन गृह कलहों, नस्लीय लड़ाइयों की वजह से अफ्रीकी समाज बहुत अधिक बर्बाद हो गया। अब स्थिति यह है कि अफ्रीका कुपोषण से हर वक्त जूझता रहता है।  वहां पर बड़ी संख्या में बच्चे पैदा होते ही मर जाते हैं। जो जीवन को जीते रहते है, वह जीवन भर बीमारियों से जूझते रहते हैं। इस तरह से कुपोषण से जुड़ा मसला केवल सेहत से जुड़ा मसला नहीं है। यह स्थिति बताती है कि एक समाज के आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक स्थिति बहुत अधिक खराब है।  इसलिए कुपोषण का मसला सेहत से होता हुआ पूरे भारतीय समाज को चलाने वाली व्यवस्थाओं पर गहरा सवालिया निशान खड़ा करता है।
 

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