NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
बावजूद औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि के दावे के बेरोजगारी 7 प्रतिशत की दर से बड़ी
रिपोर्ट के मुताबिक़ औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में वृद्धि हुई है और बढ़ती जा रही है, लेकिन बड़े पैमाने पर बढ़ती बेरोजगारी इस बात को ठुकरा रही हैं।

सुबोध वर्मा
14 Mar 2018
Translated by महेश कुमार
employment

केंद्रीय सरकार द्वारा 13 मार्च को जारी औद्योगिक उत्पादन (आईआईपी) आंकड़ों के नवीनतम सूचकांक में कॉर्पोरेट और मुख्यधारा के मीडिया सर्किलों में बहुत उत्साह अपने को ही शाबाशी देने का वातावरण है। जनवरी 2018 में आईआईपी में जनवरी 2017 के मुकाबले 7.5 बढ़ोतरी दर्ज की गयी। सूचकांक एक मासिक उपाय है कि कितना औद्योगिक उत्पादन हो रहा है और समय के साथ यह कैसे बदल रहा है। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि औद्योगिक उत्पादन अंततः उठ रहा है।

हालांकि, यही आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्तीय वर्ष 2017-18 में, अप्रैल 2017 से जनवरी 2018 तक आईआईपी में वृद्धि पिछले वित्तीय वर्ष की इसी अवधि के मुकाबले 4.1 प्रतिशत रही, जो कि अप्रैल 2016 से जनवरी 2017 तक का साइकिल है।

दूसरे शब्दों में, यह सब आप पर निर्भर करता है कि इसमें क्या ढूंढना चाहते हैं - डेटा समान है अपरिहार्य तथ्य यह है कि औद्योगिक विकास - किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी होती है- जो रोज़गार के मामले में कमजोर बनी हुई है, कुछ बिंदु ऊपर या नीचे, लेकिन कुछ भी ऐसा जिसे सकारात्मक रूप से लिखा जा सके।

क्यों जनवरी 2018 से जनवरी 2017 की साल-दर-वर्ष की तुलना इसमें क्यों एक बड़ी छलांग दिखती है? याद रखे, यह नोटबंदी है! जिसके जरिए  नवंबर और दिसंबर 2016 महीने में मोदी सरकार ने भारत में सबसे बड़ी आर्थिक आपदाओं में से एक को आर्थिक वृद्धि, औद्योगिक और कृषि उत्पादन और रोजगार में गड़बड़ी पैदा कर दी थी। जनवरी 2017 के महीने में भी  अर्थव्यवस्था अभी भी इस हमले से जूझ रही थी। इसलिए, पिछले साल जनवरी के साथ इस वर्ष के जनवरी के आंकड़ों की तुलना केवल पिछले साल के निम्न स्तर को दर्शाती है और एक बड़ी वृद्धि को दिखाती है। बेहतर उपाय होगा कि जनवरी से अप्रैल की तुलना पिछले वर्ष की तुलना में जाए तो पायेंगे कि यह ऊपर दिखाए गए आंकड़ों के अनुसार अभी भी कमजोर वृद्धि है।

बेरोजगारी पर सीएमआईई के नवीनतम आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि 11 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में, बेरोजगारी की दर 7 प्रतिशत थी जबकि श्रम भागीदारी दर 42.6 प्रतिशत  थी। सीएमआईई द्वारा जारी फरवरी 2018 के लिए व्यापक आंकड़े कहते हैं कि 2.6 करोड़ लोग बेरोजगार थे, 1.1 करोड़ "मामूली बेरोजगार" थे और 40.7 करोड़ व्यक्ति कार्यरत थे। सीएमआईई ने "मामूली बेरोजगार" को परिभाषित किया है कि वे बेरोजगार हैं, काम करने को तैयार हैं, लेकिन सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में नहीं हैं।

सीएमआईई के आंकड़ों के मुताबिक, देश में नियोजित व्यक्तियों की संख्या अभी भी स्तर के नीचे है। अक्टूबर 2016 में, 41.4 करोड़ लोग श्रम शक्ति में थे वे अभी भी काम फिर से शुरू करने के लिए वापस नहीं आए हैं।

अगर आप सोच रहे हैं कि बेरोजगारों की बड़ी समस्या के विवरण के लिए – जब मोदी ने हर वर्ष दो करोड़ नौकरियों का निर्माण करके इसको हल करने का वादा किया था – अगर इन बेरहम आंकड़ों के संदर्भ में देखे तो मोदी का नारा एक खिलवाड़ नज़र आता है, और कोई भी अच्छी खबर तलाश नहीं होती है।

हर साल, 2.4 करोड़ लोग श्रमिक बल में तकनीकी रूप से शामिल होते हैं- वे 14 वर्ष की आयु से अधिक होते हैं। लेकिन उनमें से सभी वास्तव में काम करना शुरू नहीं करते क्योंकि कुछ पढ़ रहे होते हैं, कुछ (मुख्यतः लड़कियों) घरेलू काम कर रहे होते हैं। इसी तरह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 43 प्रतिशत वास्तव में काम में भाग लेना चाहते हैं। यह अभी भी एक बड़ी संख्या है – जोकि लगभग 1 करोड़ है।

इस विशाल, और बढ़ती, नौकरी चाहने वालों की सेना के लिये, नौकरियों की वृद्धि समुद्र में कुछ बूँद के बराबर है फिर आप किसी भी तरह वृद्धि और बढ़ोतरी को गिन लें।

इसलिए, आईआईपी में वृद्धि, या ऐसे अन्य आंकड़े जो कि सरकार द्वारा पेश किये जा रहे हैं, समस्या को हल करने में मदद नहीं करते है लेकिन मोदी और उनकी सरकार इस बढ़ते संकट की अनदेखी कर रही है।

unemployment
नरेन्द्र मोदी
भारतीय अर्थव्यवस्था
बेरोज़गारी
औद्योगित उत्पादन

Related Stories

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा

मोदी@8: भाजपा की 'कल्याण' और 'सेवा' की बात

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

मोदी के आठ साल: सांप्रदायिक नफ़रत और हिंसा पर क्यों नहीं टूटती चुप्पी?

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

ज्ञानव्यापी- क़ुतुब में उलझा भारत कब राह पर आएगा ?

वाम दलों का महंगाई और बेरोज़गारी के ख़िलाफ़ कल से 31 मई तक देशव्यापी आंदोलन का आह्वान

सारे सुख़न हमारे : भूख, ग़रीबी, बेरोज़गारी की शायरी

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा


बाकी खबरें

  • sudan
    पीपल्स डिस्पैच
    सूडान: सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ 18वें देश्वयापी आंदोलन में 2 की मौत, 172 घायल
    17 Feb 2022
    इजिप्ट इस तख़्तापलट में सैन्य शासन का समर्थन कर रहा है। ऐसे में नागरिक प्रतिरोधक समितियों ने दोनों देशों की सीमाओं पर कम से कम 15 जगह बैरिकेडिंग की है, ताकि व्यापार रोका जा सके।
  • muslim
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    मोदी जी, क्या आपने मुस्लिम महिलाओं से इसी सुरक्षा का वादा किया था?
    17 Feb 2022
    तीन तलाक के बारे में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना, तब, जब मुस्लिम महिलाओं को उनकी पारंपरिक पोशाक के एक हिस्से को सार्वजनिक चकाचौंध में उतारने पर मजबूर किया जा रहा है, यह न केवल लिंग, बल्कि धार्मिक पहचान पर भी…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब चुनाव में दलित-फैक्टर, सबको याद आये रैदास
    16 Feb 2022
    पंजाब के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी सहित सभी पार्टियों के शीर्ष नेता बुधवार को संत रैदास के स्मृति स्थलों पर देखे गये. रैदास को चुनावी माहौल में याद करना जरूरी लगा क्योंकि पंजाब में 32 फीसदी…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: मोदी की ‘आएंगे तो योगी ही’ से अलग नितिन गडकरी की लाइन
    16 Feb 2022
    अभी तय नहीं कौन आएंगे और कौन जाएंगे लेकिन ‘आएंगे तो योगी ही’ के नारों से लबरेज़ योगी और यूपी बीजेपी के समर्थकों को कहीं निराश न होना पड़ा जाए, क्योंकि नितिन गडकरी के बयान ने कई कयासों को जन्म दे दिया…
  • press freedom
    कृष्ण सिंह
    ‘दिशा-निर्देश 2022’: पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का नया हथियार!
    16 Feb 2022
    दरअसल जो शर्तें पीआईबी मान्यता के लिए जोड़ी गई हैं वे भारतीय मीडिया पर दूरगामी असर डालने वाली हैं। यह सिर्फ किसी पत्रकार की मान्यता स्थगित और रद्द होने तक ही सीमित नहीं रहने वाला, यह मीडिया में हर उस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License