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भारत
राजनीति
बिहार के 'बालिका सुधार गृह' की सच्चाई
बालिका सुधार गृह में कम उम्र की लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार की अमानवीय हरकत सालों साल चलती रही. आखिर हमारे समाज में इतनी अमानवीय हरकत होती रहे और किसी को पता नहीं चले,यह कैसे हो सकता है ?इसका अर्थ यह है कि हमारे समाज की सारी जिम्मेदार संस्थाएं भीतर ही भीतर खोखली होती जा रही हैं .
मुकुंद झा
27 Jul 2018
बिहार बालिका के साथ बलत्कार
mage Courtesy: DailyO

बिहार के मुजफ्फरपुर में अभी कुछ दिनों पहले ही एक ऐसी घटना समाने आई थी जिसने सबको हिला कर रख दिया था | एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ किस तरह से सालों से करीब 29 बालिकाओ के साथ मुजफ्फरपुर के बालिका सुधारगृह सेवा ‘संकल्प समिति’ में  बलात्कार जैसी भयावह घटना हुई थी | इसके मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर है जो की इस संस्था के सर्वेसर्वा है | बृजेश पर कई गंभीर आरोप है |ये मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है और इसमें मानवाधिकार आयोग ने भी सरकार से नोटिस देकर जबाब माँगा है|

इसे भी पढ़े : बिहार: बालिका सुधारगृह में मासूम बच्चियों से सालों से हो रहा था बलात्कार!

ज़मीनी सच्चाई को खोजने वाले संतोष से बातचीत के अंश हम दे रहे हैं

इस मामले को शुरुआत से से कवर करने वाले पत्रकार संतोष सिंह का मानना है की इस मामले में पीड़ित को न्याय मिलेगा अभी भी कहना बहुत मुश्किल है | वो ऐसा क्यों कह रहे  उन्होंने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए पुरे विस्तार से बताया है  |

लोकतंत्र में जब सारा तंत्र एक साथ खड़े हो जाये तो इंसाफ का किस तरीके से गला घोटा जा सकता है इस पर आपको अगर अध्ययन करना हो तो मुजफ्फरपुर जाइए और देखिए किस तरीके से बालिका सुधार गृह में 29 लड़कियों से रेप कि घटना घटी और उस रेपिस्ट पर कोई कारवाई ना हो,इसके लिए सरकार ,न्यायपालिका,ब्यूरोक्रेसी ,मीडिया और एनजीओं किस तरीके से रेपिस्टों के साथ खड़ा दिख रहा है

 

 प्रशासन और बृजेश के सम्बन्ध  कैसे थे ?

संतोष सिंह बताते है किस तरह से प्रशासन की मदद से इस बालिका गृह में सालों से बड़े ही सुनियोजित ढंग से बालिकाओ का शोषण हो रहा था | जिस बालिका गृह में 42 में से 29 लड़कियों के साथ रेप कि घटना घटी है उस बालिका गृह में बालिका सुरक्षित है  इसके लिए एडीजी स्तर के न्याययिक अधिकारी को माह में एक बार कम से कम विज़िट करना होता है. बालिका गृह के विजिटर रजिस्ट्र में दर्ज है कि न्याययिक अधिकारी भी आते थे, समाज कल्याण विभाग के अधिकारी को सप्ताह में एक दिन आना अनिवार्य हैं ।

इसके अलावा, समाज कल्याण विभाग औऱ एनजीओ का एक पूरा गठजोड़ बना हुआ है, जिनको इन बालिकाओं का ख्याल रखने कि जिम्मेवारी होती है   | इसके निरक्षण के लिए  समाज कल्याण विभाग पांच अधिकारी के साथ साथ वकालत और समाजिक कार्य से जुड़े एक दर्जन से अधिक व्यक्ति इसके देखभाल के लिए गठित बोर्ड का सदस्य होता है जो नियमित इन लड़कियों से मिलता है,और देखते है की सब कुछ ठीक है या नही परन्तु इसके सदस्य  निरक्षण करते नही या फिर कागजों पर ही निरिक्षण करते थे |
न्यायपालिका की भूमिका 

न्यायापालिका और पुलिस अबतक बृजेश ठाकुर को रिमांड में भी नही ले सकी हैं | संतोष सिंह कहते है की बालिका गृह का संचालक ब्रजेश ठाकुर गिरफ्तार होकर जेल पहुंचता है तीसरे दिन बिमार होने कि बात पर कोर्ट के आदेश पर अस्पताल पहुंच गया एक सप्ताह बाद हंगामा शुरु हुआ कि अस्पताल से ही फोन कर रहा है तो जबरन एक दिन पुलिस उसे फिर जेल भेज दिया ।
ऐसा पहला केस देखने को मिला है जिसमें पुलिस ब्रजेश ठाकुर से पुछताछ के लिए रिमांड का आवेदन देती है लेकिन कोर्ट रिमांट कि अनुमित नहीं दिया, पुलिस ने जब दोबारा आवेदन दिया तो कोर्ट ने कहा कि जेल में ही पुछताछ करिए बाद में पुलिस ने कहां कि जेल में ब्रजेश ठाकुर पुछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं, दो माह होने को है अभी तक पुलिस को रिमांड पर नहीं मिला है ।
इतना ही नहीं हाईकोर्ट के अधीन राज्य विधिक आयोग होता है जिसके हेड हाईकोर्ट के रिटायर जज होते हैं उनकी तो इस तरह के गृह में बेहतर व्यवस्था है कि नहीं ये भी देखने कि जिम्मेवारी विशेष तौर पर रहती है ।।
जिस दिन ये मामला सामने आया उसी दिन राज्य विधिक आयोग कि टीम बालिका गृह पहुंचा लेकिन रिपोर्ट क्या दिया कहना मुश्किल है ।ये कोर्ट का हाल है

इसे भी पढ़े : बिहार: एक और नाबालिग का बलात्कार और निर्मम हत्या

मिडिया भी चुप क्यों है ?

आगे श्री सिंह  मीडिया कि चुप्पी पर भी बात भी करते है ,इतनी बड़ी घटना किसी अखबार और मीडिया ने इस खबर को प्रमुखता नहीं दिया जिले में छपता रहा लेकिन कभी राज्यस्तर  पर मुख्य पृष्ट पर खबर नही लगी ।।
वजह एक तो ब्रजेश ठाकुर खुद पत्रकार था औऱ उसका सारा रिश्तेदार किसी ना किसी चैनल से जुड़ा हुआ है ।

सभ्य समाज और कार्यकर्ता में भी इतनी शांति क्यों है ?
 पत्रकार संतोष कहते है की सबसे ज़्यादा उन्हें सभ्य समाज या एऩजीओ का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा रेप कि इतनी बड़ी घटनाये घटी लेकिन कहीं ना तो कैंडिल मार्च निकला ,ना कही कोई प्रोटेस्ट हुआ, लगा ही नहीं कि कोई घटना भी घटी है, सोशल मीडिया का भी हाल कुछ ऐसा ही रहा कहीं कोई खबर नहीं कही कोई पोस्ट नहीं ना कोई ट्वीट  सब कुछ समान्य ।
इसलिए ना कि जिस लड़की के साथ रेप हुआ है उसका धर्म पता नहीं है उसकी जाति पता नहीं और रेप करने वाला मुस्लिम नहीं है खामोशी कि वजह तो यही है ना।
इसके बाद संतोष ने  सरकार के रैवये की बात की और कहते है की TISS के जिस रिपोर्ट को लेकर सरकार अपना पीठ थपथपा रही है कि इस मामले को तो सरकार ने ही उजागर किया है बात सही है लेकिन सवाल ये है कि जब TISS ने समाज कल्याण विभाग के प्रधान सचिव कि माने तो 23 अप्रैल को ही विभाग को रिपोर्ट सौप दिया था , प्रधान सचिव ने कहा कि विभाग एक माह अध्ययन करने के बाद फैसला लिया कि अब एफआईआर दर्ज करायी जाये ।।
अब आप ही बताये रेप जैसे गम्भीर आरोप मामले में विभाग पुलिस के पास पहुंचने में एक माह का समय लगा दिया इसके मंशा पर शंक किया ही जा सकता कि नहीं।

पुलिस और जाँच को कैसे हुई है ?

संतोष जी ने पुलिस की करवाई  और जाँच पर भी प्रश्नचिंह लगते हैं हुए कहता हैं की ,रिपोर्ट आने के एक माह बाद एफआईआर दर्ज होने का उनके पास कोई ठोस आधार नहीं है और इतना ही नहीं समाज कल्याण विभाग जो एफआईएर दर्ज किया वो भी किसी को नामजद नहीं बनाया है और ना हो कोई आरोप चार पक्ति में एफआईआऱ है,और इसके लिए प्रधानसचिव से कोई सवाल भी नहीं हो रहा है इतना ही नहीं एफआईआर दर्ज होने से पहले ही बालिका गृह की लड़कियों को मधुबनी,मोकामा और पटना अलग अलग सिफ्ट कर दिया गया इस वजह से इस मामले में पुलिस को कारवाई करने में अभी भी परेशानी हो रही है समाज कल्याण विभाग इसके लिए तर्क ये दे रहा है कि लड़कियों को वहां से नहीं निकाला जाता है तो लड़किया डिपरेसन में जा सकती थी इसलिए सब को अलग अलग बालिका गृह में भेजा गया जबकि कहां ये जा रहा है कि इससे साक्ष्य संकलित करने में पुलिस को खासा परेशानियों का सामना करना पड़ा है ।
पुलिस कि बात करे इतने संवेदनशील मसले पर पुलिस मुख्यालय का रुख बेहद नकारत्मक है कोई भी सीनियर अधिकारी इस केस में सहयोग नहीं कर रहा है जो भी कुछ कारवाई हुई है उसका क्रेडिंट एसएसपी हरप्रीत कौर को दी जा सकती है ।

किस प्रकार से पुर बिहार में ये NGO सिस्टम कैसे  कम करता है और कैसे बृजेश इसका पहुँचा खिलाड़ी कैसे बना ?
संतोष बताते है, ब्रजेश ठाकुर सिस्टम का एक हिस्सा है जिसका काम है पूरे बिहार में सरकार से जुड़े एनजीओ से पैंसा उगाही कर विभाग के आलाधिकारी से लेकर मंत्री के तक पहुंचाना है इसके जिम्मे समाज कल्याण विभाग ,एड्स नियंत्रण सोसाइटी और राज्य हेल्थ सोसाइटी है ।।
ये एक चैन है जो सचिवालय से लेकर बीडीओ के दफ्तर तक ,,मंत्री से लेकर पंचायत तक और डीजीपी कार्यालय से लेकर थाना तक बना हुआ है ,जहां ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग अलग अलग नाम और पहचान से जाने जाते हैं जिनके सहारे मुखिया जी से लेकर मंत्री जी तक ,पंचायत सचिव से लेकर प्रधान सचिव तक और थाने से लेकर डीजीपी तक कमीशन पहुंचता है इसी को बोलचाल कि भाषा में सिस्टम कहते ये लोग इतने ताकतवर होते हैं कि इन्ही के उंगूलियों पर सरकार नाचती है जी है ।।
जब से एनजीओ का उदय हुआ सरकार इसको नियंत्रित करने के लिए कई तरह के उपाय किये लेकिन कही ना कही से आवाज उठ ही जाती थी इससे परेशान होकर सरकार ने एनजीओ को भी इस सिस्टम में शामिल करने के लिए समाज सुधार और प्रचार प्रसार जैसे कार्यों को एनजीओ के माध्यम से कराने का फैसला लिया और फिर शुरु हुआ एनजीओ और सिस्टम का गठजोड़ जिसके कड़ी बने ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग।।
110 प्रोजेक्ट समाज कल्याण विभाग के माध्यम से पूरे बिहार में चल रहा है जिसमें विशिष्ठ दस्तक संस्थान.छह वर्ष तक के बच्चों को सम्भालता है,.बाल गृह,ओपेन सेल्टर होम,रक्षा गृह,अल्पावास गृह,ऐसे कई प्रोजेक्ट है जो लवारिस बच्चे बच्चिया वृद्ध, बिमार लाचार लोगों के लिए चलाया जाता है ।।
30 लाख से 50 लाख रुपया इसका बजट है इतने संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए समाज कल्याण विभाग ने ब्रजेश ठाकुर को इतना मजबूत कर दिया कि बिना इसके सहमति के किसी भी संस्थान को प्रोजेक्ट नहीं मिलता है और फिर ब्रजेश ठाकुर उन तमाम एनजीओ से पैंसा उगाही कर विभाग के मंत्री से लेकर पदाधिकारी तक पहुंचाता था ब्रजेश ठाकुर और मंत्री के पति के नम्बर का कांल डिटेल्स सबूत के लिए काफी है ।।
लेकिन इस खेल में एक और बड़ी मछली है जिस पर अभी तक पुलिस ने हाथ नहीं डाला है जी है हम बात मधु कुमारी कि कर रहे है इस पूरे खेल में इसकी बड़ी भूमिका है ब्रजेश ठाकुर कि संस्था का ये मुख्य पदाधिकारी है और पटना औऱ दिल्ली से स्तर पर जो भी खेल होते थे इसकी मास्टर माइंड यही थी पता नहीं क्यों इस पर पुलिस अभी तक हाथ नहीं डाल रही है देखिए सीबीआई अब क्या करती है ।

देखिए आगे आगे होता है क्या लेकिन ये समझने कि जरुरत है कि जब सिस्टम ही अपराधियों के साथ खड़ी हो जाये तो ऐसे में आम आदमी को न्याय कैसे मिलेगा इस पर भी सोचने कि जरुरत है।।

जब हमने उनसे आगे पुझा की वो इस जाँच आगे कैसे देखा जा रहा हैं ?

इस पर संतोष ने कहा की राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुजफ्फरपुर रेप मामले में लिया संज्ञान डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी को भेजा नोटिस, लड़ाई एक कदम और आगे बढा।

आगाज से अंजाम तक जी है लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाकी है जब तक बालिका गृह के बेटियों को न्याय नहीं मिल जाती है तब तक ये संघर्ष जारी रहेगा । बिहार सरकार ने अभी से थोड़ी देर पहले मुजफ्फरपुर बालिका गृह रेप मामले में भारत सरकार से सीबीआई जांच कि सिफारिश किया है । लेकिन इससे इन बेटियों को न्याय मिल जायेगा कहना मुश्किल है इसलिए इसको छोड़ना नहीं है ताकि इस तरह के सोच रखने वाले को ये डर हो कि सारे सिस्टम साथ क्यों ना खड़े हो जाये जनता कि आवाज में अभी भी बड़ी ताकत है।
 

Bihar
मुजफ्फरपुर बालिका सुधारगृह
मानवाधिकार आयोग
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