NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
बम्पर फसल के बावजूद 20 करोड़ भारतीय भूखे हैं
जब कि लापरवाह मोदी सरकार 2030 से पहले भूख को खत्म न कर पाने की इच्छा जता कर रही है।

सुबोध वर्मा
18 Oct 2018
Translated by महेश कुमार
global health index

नई दिल्ली में इस खबर का जशन अभी खत्म भी नही हुआ था कि 2017-18 के कृषि वर्ष में खाद्यान्न (284.83 मिलियन टन) और फलों और सब्जियों का (307 मिलियन टन) का उत्पादन रिकार्ड के रुप में पैदा हुआ है, लेकिन इसी के साथ एक बुरी ख़बर भी आयी जिसे सरकार ने अनदेखा कर दिया । खबर के मुताबिक ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) में भारत का रैंक 103 पर है, इस रैंकिंग के मुताबिक 132 देशों में भारत को 119वां स्थान मिला है।2015-17 के दौरान हमारी सरकार द्वारा एकत्रित आंकड़ों के आधार पर जीएचआई की गणना के मुताबिक, भारत में 14.8 प्रतिशत आबादी कुपोषण का शिकार थी। यह लगभग 19 करोड़ 80 लाख (198 मिलियन) लोगों हैं, जो अपने आप में एक चौंकाने वाली संख्या है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) की गणना चार संकेतकों को ध्यान में रखकर की जाती है - 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे जो लंबाई और वज़न की कमी से ग्रस्त होते हैं, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर का आकलन और कुपोषण जाँचना इसके कुछ आधार होते हैं। इससे आबादी में सूक्ष्म पोषक तत्वों सहित सभी आवश्यक पोषक तत्वों की कमी की जांच के ज़रीए देश में भूख के स्तर की एक उचित तस्वीर उभरती है।

लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है: कि खाद्य उत्पादन में लगातार वृद्धि के बावजूद, भारत में भूखमरी अनिश्चित स्तर पर बनी हुयी है। यह इशारा करता है कि लोगों के बीच खाद्यान्न वितरित किए जाने के तरीके में एक गंभीर परेशानी है। ऐसे भी लोग हैं जिन्हे जरूरत से ज्यादा भोजन मिल रहा हैं लेकिन ऐसे लोग भी  हैं जिनकी संख्या लाखों में हैं और जिन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है।

भारत के संबन्ध में एक ओर अन्य मुद्दा है उसकी क्षेत्रीय और समुदाय आधारित असमानता है। मिसाल के तौर पर, दूरदराज के क्षेत्रों में विशेष रूप से भारी बारिश वाले क्षेत्रों में अधिक कुपोषण वाले लोगों को पाया जाता है मुकाबले उन क्षेत्रों के जहां अधिक उत्पादन, बेहतर सिंचाई, बेहतर पहुंच वाले इलाके मौजूद हैं। झारखंड या ओडिशा के अंदरूनी इलाकों में रहने वाले लोगों के मुकाबले पंजाब और हरियाणा के लोगों को अधिक खाना मिलता है।

उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति (जैसे कृषि मजदूर) और उनका सामाजिक स्तर (जिसमें दलित और आदिवासी शामिल है) की वजह से कमजोर लोगों का एक बड़ा वर्ग समाज में मौजूद हैं। यहां तक कि लिंग-आधारित असमानताएं के चलते अपने समकक्षों की तुलना में लड़किया और महिलाऐं अधिक भूख से पीड़ित रहती हैं। भारत में  घातक भुखमरी के संकट की इन विशेषताओं को अतीत में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन सर्वेक्षण और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट में अच्छी तरह से दर्ज किया गया है।

मोदी सरकार की लापरवाही भरी प्रतिक्रिया 
16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के समारोह में बोलते हुए कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने उद्यमियों और कृषि वैज्ञानिकों की एक सभा को आश्वस्त करते हुए बहादुरी से कहा कि भारत "2030 तक शून्य भूख स्तर हासिल करने का एक बड़ा लक्ष्य रख्ता है। हमारी सरकार लगातार चरणबद्ध तरीके से इस दिशा में काम कर रही है। " इस काम को आगे बढ़ाने के उदाहरण के रूप में, उन्होंने कहा कि सरकार ने "200 में से 150  स्टार्ट-अप और प्रसंस्करण इकाइयों को स्थापित करने के लिए सहायक उद्यमियों को सहायता देने का निर्णय लिया है।"
क्या कृषि मंत्री के पास यही सब कुछ पेश करने के लिए है? यानि अगले 12 साल के लिए भूख रहेगी, और लाखों बच्चे पैदा होंगे जो भोजन की कमी से बाधित अपने शारीरिक और मानसिक विकास का नतीज़ा भुगतेंगे? यानि अगले 12 वर्षों में बच्चे अपने पांचवां जन्मदिन मनाने से से पहले मौत का शिकार हो जाएंगे?कुछ लोग सोच सकते हैं कि इस स्थिति को बदलने के लिए मौजूदा सरकार वास्तव में क्या कर सकती है। कुछ जवाब काफी स्पष्ट हैं और इनकी जानकारी मंत्रियों और प्रधान मंत्री को होनी चाहिए।

इस सुधार की शुरुआत के लिए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सार्वभौमिक बनाया जाना चाहिए, अर्थात, इस प्रणाली को विस्तार कर इसमें सभी लोगों को शामिल किया जाना चाहिए, न कि आबादी का केवल दो-तिहाई हिस्सा, जो 2013 की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में दर्ज़ है। योजनाओं के 'लाभ' को लक्षित करना - विकृत नव-उदारवादी सिद्धांत का एक उत्पाद है- इसे त्यागना होगा। यदि देश के लोग भूखे हैं, और चारो तरफ भूखमरी हैं, तो इस स्थिति को बनाए रखने का सिद्धांत काफी त्रुटिपूर्ण है।खाद्य कार्यक्रमों को 'प्रौद्योगिकी', यानी इलेक्ट्रॉनिक नकद हस्तांतरण, आधार प्रमाणीकरण, डिजिटल प्रबंधन इत्यादि से जोड़ने को तुरंत बंद करना होगा क्योंकि कई वर्षों का अनुभव बताता है कि यह वंचित लोगों को  राशन व्यवस्था से बाहर करने का साधन बन गया है। इन बाधाओं के कारण दर्जनों भुखमरी से मर गए हैं।

लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन नीतियों की वजह से  बेतहाशा बेरोजगारी,  असमानता, कृषि संकट, मजदूरी में स्थिरता, औद्योगिक मंदी की वर्तमान स्थिति पैदा हो रही है उसे बदलने की जरूरत है। ऐसा करने से ही लोगों की पोषण संबंधी स्थिति में एक स्थायी सुधार लाया जा सकता है।क्या मोदी सरकार इस बारे में सोच रही है? और क्या वह मानती है कि देशभक्ति और राष्ट्रवाद में भुखमरी और भूखे देशवासियों के लिए चिंता शामिल है या नहीं है?
 

Global Hunger Index
malnutrition in India
Modi Govt
PDS system

Related Stories

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

सरकारी एजेंसियाँ सिर्फ विपक्ष पर हमलावर क्यों, मोदी जी?

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

भारत में संसदीय लोकतंत्र का लगातार पतन

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

मोदी सरकार 'पंचतीर्थ' के बहाने अंबेडकर की विचारधारा पर हमला कर रही है

लोगों की बदहाली को दबाने का हथियार मंदिर-मस्जिद मुद्दा

ज्ञानवापी, ताज, क़ुतुब पर बहस? महंगाई-बेरोज़गारी से क्यों भटकाया जा रहा ?

तिरछी नज़र: ...ओह माई गॉड!


बाकी खबरें

  • srilanka
    न्यूज़क्लिक टीम
    श्रीलंका: निर्णायक मोड़ पर पहुंचा बर्बादी और तानाशाही से निजात पाने का संघर्ष
    10 May 2022
    पड़ताल दुनिया भर की में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने श्रीलंका में तानाशाह राजपक्षे सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन पर बात की श्रीलंका के मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. शिवाप्रगासम और न्यूज़क्लिक के प्रधान…
  • सत्यम् तिवारी
    रुड़की : दंगा पीड़ित मुस्लिम परिवार ने घर के बाहर लिखा 'यह मकान बिकाऊ है', पुलिस-प्रशासन ने मिटाया
    10 May 2022
    गाँव के बाहरी हिस्से में रहने वाले इसी मुस्लिम परिवार के घर हनुमान जयंती पर भड़की हिंसा में आगज़नी हुई थी। परिवार का कहना है कि हिन्दू पक्ष के लोग घर से सामने से निकलते हुए 'जय श्री राम' के नारे लगाते…
  • असद रिज़वी
    लखनऊ विश्वविद्यालय में एबीवीपी का हंगामा: प्रोफ़ेसर और दलित चिंतक रविकांत चंदन का घेराव, धमकी
    10 May 2022
    एक निजी वेब पोर्टल पर काशी विश्वनाथ मंदिर को लेकर की गई एक टिप्पणी के विरोध में एबीवीपी ने मंगलवार को प्रोफ़ेसर रविकांत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। उन्हें विश्वविद्यालय परिसर में घेर लिया और…
  • अजय कुमार
    मज़बूत नेता के राज में डॉलर के मुक़ाबले रुपया अब तक के इतिहास में सबसे कमज़ोर
    10 May 2022
    साल 2013 में डॉलर के मुक़ाबले रूपये गिरकर 68 रूपये प्रति डॉलर हो गया था। भाजपा की तरफ से बयान आया कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया तभी मज़बूत होगा जब देश में मज़बूत नेता आएगा।
  • अनीस ज़रगर
    श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों में शराब की दुकान खुलने का व्यापक विरोध
    10 May 2022
    राजनीतिक पार्टियों ने इस क़दम को “पर्यटन की आड़ में" और "नुकसान पहुँचाने वाला" क़दम बताया है। इसे बंद करने की मांग की जा रही है क्योंकि दुकान ऐसे इलाक़े में जहाँ पर्यटन की कोई जगह नहीं है बल्कि एक स्कूल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License