NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
ब्रह्मा समिति की रिपोर्ट अवैध अप्रवासी के भूमि अधिग्रहण के ख़तरे पर ज़ोर देती है
यह रिपोर्ट असम में भूमि अधिग्रहण पैटर्न से संबंधित तथ्यों से भरा हुआ है।
विवान एबन
17 May 2018
brama

कमेटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ लैंड राइट्स ऑफ इंडिजेनस पीपल ने 18 जनवरी को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंप दी। हालांकि ऐसा लगता है कि समिति के सदस्यों के बीच मतभेदों के कारण दो रिपोर्ट सौंपी गईं। ये रिपोर्ट पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हरि शंकर ब्रह्मा द्वारा असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल को सौंपी गई। हालांकि पूर्व शिक्षा सचिव रोहिणी बरुआ द्वारा सौंपी गई दूसरी रिपोर्ट की अनदेखी की गई। बरुआ ने अपनी रिपोर्ट पोस्ट द्वारा जमा की। इन दोनों रिपोर्ट की सामग्रियों में ज्यादा भिन्नता नहीं हैं, हालांकि बरुआ द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट अवैध आप्रवासियों द्वारा भूमि अधिग्रहण के ख़तरे को लेकर ज़्यादा तथ्यात्मक है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा लगता है कि इन विचारों में अंतर इस बात से प्रेरित होते हैं कि आप्रवासी मुद्दे पर कितना ज़ोर दिया जाना चाहिए।

दोनों रिपोर्टों में जो सहमति थी वह ये कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित कुछ क़ानून पुराने थे, जबकि अन्य उचित रूप से लागू नहीं किए जा रहे थे। इन सिफारिशों में उजागर किए गए मुद्दे निम्न थे:

1. आप्रवासी

2. अतिक्रमणकारियों की बेदखली

3. कृषि आय

4. भूमि सुधार

आप्रवासी के मुद्दे पर दोनों रिपोर्टों पर सहमति है कि असम में भूमि सुधारों तथा भूमि के किसी सार्थक पुनर्वितरण को केवल नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजेन्स (एनआरसी) के अद्यतन होने के बाद ही लागू किया जा सकता है, बांग्लादेश के साथ प्रत्यावर्तन संधि में भारत के प्रवेश करने - असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं, और विदेशियों का पता लगाने और वापस भेजने के साथ किया जा सकता है। यहां समस्या यह है कि भारत को यह कैच -22 की स्थिति में रखता है। एक तरफ अगर भारत बांग्लादेश के साथ प्रत्यावर्तन संधि के लिए आक्रामक रूप अपनाता तो ये देश अन्य अनुकूल व्यापार भागीदारों में बदल सकता है। हालांकि, अगर भारत इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं करता तो ये नई दिल्ली की ओर असमिया नाराज़गी को जागृत करने में मदद कर सकते हैं।

इन समितियों ने वन भूमि, चाय वाले क्षेत्र में भूमि, चार भूमि, मंदिर भूमि, सत्रा भूमि, और वक्फ भूमि से अतिक्रमण हटाने की सिफारिश की है। उन्होंने इंगित किया था कि अतिक्रमण करने वालों की दो श्रेणियों हैं: अवैध आप्रवासी अतिक्रमणकर्ता और बाढ़ और अपरदन से आंतरिक रूप से विस्थापित। निर्दिष्ट वन भूमि के साथ-साथ चार भूमि से अतिक्रमणकर्ता से को हटाने का कारण पारिस्थितिक कारकों पर है। चार जलोढ़ गाद के जमा होने से बने नदी के द्वीप हैं। चार तीन प्रकार के होते हैं: स्थायी द्वीप, अर्द्ध-स्थायी द्वीप, और अस्थायी द्वीप। इस समिति ने अस्थायी चार से सभी लोगों को बेदखल करने की सिफारिश की। अर्द्ध-स्थायी चार अगर चार साल के बाद नहीं समाप्त होते हैं तो उसे वितरित किया जा सकता है। वितरण के लिए स्थायी चार को भूमि का हिस्सा बनने की सिफारिश की गई थी।

इन रिपोर्टों ने चाय क्षेत्र में अतिक्रमण करने वालों को बेदखल करने की सिफारिश की। दिलचस्प बात यह है कि चाय के क्षेत्र में उनके द्वारा कब्ज़ा किए गए भूमि पर केवल उपयोगिता अधिकार है। ये भूमि वास्तव में सरकारी है। हालांकि, इस क्षेत्र में पूरी तरह से खेती नहीं की जाती है, और वास्तव में बहुत सारी भूमि पर वन लगाई जाती है। इस समिति ने शेष भूमि को वापस सरकार को स्थानांतरित करने के लिए कानून में संशोधन करने की सिफारिश की है अगर इसे चाय के क्षेत्र में लेने के चार साल बाद खेती नहीं की जाती है। धार्मिक ट्रस्ट द्वारा लिए गए भूमि के संबंध में समिति ने सत्र और मंदिरों द्वारा लिए गए भूमि से अतिक्रमण हटाने की सिफारिश की। दूसरी तरफ वक्फ संपत्ति के संबंध में समिति ने वक्फ संपत्ति से निपटारे के लिए स्थानीय मुस्लिमों का एक बोर्ड गठन करने की सिफारिश की। इस बोर्ड को वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की निगरानी करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनका इस्तेमाल उनके उद्देश्य के लिए किया जाता है।

कृषि आय के मुद्दे पर इन रिपोर्टों ने पाया कि हालांकि असम के लगभग 80 प्रतिशत लोग किसान थें, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा नगण्य था। इस शिर्ष में कोल्ड स्टोरेज की सुविधाओं में सुधार करने, बीज और उपकरणों तक पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित करने, कृषिगत कार्यों से संबंधित बड़े शैक्षिक कार्यक्रमों और कार्य नैतिकता को सुनिश्चित करने के लिए सिफारिश की गई थी। साथ ही साथ सामूहिक खेती और बहु-फसल को प्रोत्साहित करने को लेकर भी सिफारिश की गई।

भूमि सुधारों के लिए यह सिफारिश की गई थी कि सरकार द्वारा वितरित कृषि भूमि का आधार वर्तमान में कानून द्वारा प्रति व्यक्ति अनिवार्य 8 बिघा (लगभग 3 एकड़) के बजाय 5 बिघा(लगभग 2 एकड़) होना चाहिए। जबकि मौजूदा कानून भूमिहीन को भूमि वितरित करने को लेकर भी है, इस समिति ने सीमांत भूस्वामी को शामिल किया है जिससे कि वे 5 बिघा तक भूमि प्राप्त कर सकें। विरोध यह है कि सभी भूमि को फिर से वितरित किया जाना चाहिए और केवल स्थानीय लोगों को आवंटित किया जाना चाहिए। हालांकि यह विरोध असम भूमि तथा राजस्व विनियमन, 1886 (एएलआरआर) के अध्याय दस में शामिल व्यक्तियों की श्रेणियों पर लागू नहीं होते है। यह प्रावधान कुछ निश्चित वर्ग के लोगों को भूमि प्राप्त करने तथा भूमि रखने की अनुमति देता है। ये भूमि समतल जनजातीय, पहाड़ी जनजातीय, चाय बागान जनजातीय, संताल, नेपाली कृषक-चरवाहा और अनुसूचित जातियों को प्राप्त करने और रखने की अनुमति देता है। हालांकि, इस समिति ने अनुसूचित जाति से पहले 'स्थानीय' डालने के इस प्रावधान में संशोधन की भी सिफारिश की। संक्षेप में, भूमि सुधार से संबंधित ये सिफारिश पूरी तरह से यह सुनिश्चित करने से संबद्ध है कि कृषि भूमि को जनजातीय से गैर-जनजातीय में स्थानांतरित नहीं किया जाए। एएलआरआर के अध्याय दस के तहत संरक्षित वर्ग से किसी गैर-संरक्षित वर्ग को, तथा स्थानीय व्यक्ति से एक गैर-स्थानीय व्यक्ति को।

रिपोर्ट्स को सबसे दिलचस्प बनाता है वह यह कि इसने कानूनी रूप से 'स्थानीय' को परिभाषित करने का प्रयास किया। हैं। शब्दकोश में 'स्थानीय' की परिभाषा के माध्यम से, यूएनओ की परिभाषा के साथ-साथ विभिन्न हितधारकों के विचारों को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने निम्नलिखित विशेषताओं की सिफारिश की:

 

brahma13.png

असम में कृषि भूमि से संबंधित भारत के अन्य राज्यों के नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने के अलावा इस परिभाषा को जो दिलचस्प बनाता है वह ये कि अगर इस परिभाषा को अपनाया जाता है तो यह बराक घाटी में असम के बंगाली भाषी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। दूसरी ओर चूंकि बराक घाटी ऐतिहासिक रूप से सिलहट का एक हिस्सा है,इसलिए सिल्हेटी भाषा में पुनरुत्थान दिखाई दे सकता है। असम में बिष्णूपुरिया मणिपुरियों को भी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है, जब तक कि यह स्वीकार नहीं किया जाता कि वे जिस क्षेत्र में रहते हैं वह कभी मणिपुर के पुराने साम्राज्य का हिस्सा था।

हालांकि, जब तक कि विधानसभा के समक्ष रिपोर्ट नहीं रखी जाती है तब तक संभवतः अलमारी में रखे इस पर धूल ही जमा होगा। अद्यतन होने की प्रक्रिया में एनआरसी के साथ, और असम अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के साथ, नागरिकता विधेयक का विरोध कर रहा है, ये तीनों मुद्दें अंतःस्थापित हो गए हैं। वे समुदाय जिनकी पहचान उनकी भूमि है उनकके लिए भूमिहीन होना सामाजिक मौत है।

brahma committee
Assam
NRC

Related Stories

असम में बाढ़ का कहर जारी, नियति बनती आपदा की क्या है वजह?

असम : विरोध के बीच हवाई अड्डे के निर्माण के लिए 3 मिलियन चाय के पौधे उखाड़ने का काम शुरू

CAA आंदोलनकारियों को फिर निशाना बनाती यूपी सरकार, प्रदर्शनकारी बोले- बिना दोषी साबित हुए अपराधियों सा सुलूक किया जा रहा

ज़मानत मिलने के बाद विधायक जिग्नेश मेवानी एक अन्य मामले में फिर गिरफ़्तार

शाहीन बाग़ की पुकार : तेरी नफ़रत, मेरा प्यार

असम की अदालत ने जिग्नेश मेवाणी को तीन दिन की पुलिस हिरासत में भेजा

सद्भाव बनाए रखना मुसलमानों की जिम्मेदारी: असम CM

देश बड़े छात्र-युवा उभार और राष्ट्रीय आंदोलन की ओर बढ़ रहा है

असम: बलात्कार आरोपी पद्म पुरस्कार विजेता की प्रतिष्ठा किसी के सम्मान से ऊपर नहीं

उल्फा के वार्ता समर्थक गुट ने शांति वार्ता को लेकर केन्द्र सरकार की ‘‘ईमानदारी’’ पर उठाया सवाल


बाकी खबरें

  • china
    रिचर्ड डी. वोल्फ़
    चीन ने अमेरिका से ही सीखा अमेरिकी पूंजीवाद को मात देना
    22 Nov 2021
    चीन में औसत वास्तविक मजदूरी भी हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ी है, जो देश की अपनी आर्थिक प्रणाली की एक और सफलता का संकेतक है। इसके विपरीत, अमेरिकी वास्तविक मजदूरी हाल ही में स्थिर हुई है। संयुक्त…
  • kisan andolan
    असद रिज़वी
    लखनऊ में किसान महापंचायत: किसानों को पीएम की बातों पर भरोसा नहीं, एमएसपी की गारंटी की मांग
    22 Nov 2021
    संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर हुई “किसान महापंचयत” में जमा किसानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन विवादास्पद कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा पर विश्वास की कमी दिखी। किसानों का कहना…
  • farmers movement
    सुबोध वर्मा
    यूपी: कृषि कानूनों को रद्दी की टोकरी में फेंक देने से यह मामला शांत नहीं होगा 
    22 Nov 2021
    ऐसी एक नहीं, बल्कि ढेर सारी वजहें हैं जिसके चलते लोग, खासकर किसान, योगी-मोदी की ‘डबल इंजन’ वाली सरकार से ख़फ़ा हैं।
  • Abhisar
    न्यूज़क्लिक टीम
    ज़ी न्यूज़ के संपादक को UAE ने अपने देश में आने से रोका
    22 Nov 2021
    बोल' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा, देश के मेनस्ट्रीम मीडिया और सरकार का अमूमन बचाव करने वाले जी न्यूज़ के संपादक 'सुधीर चौधरी' की चर्चा कर रहे हैंI ज़ी न्यूज़ के संपादक 'सुधीर चौधरी'…
  • modi
    अनिल जैन
    प्रधानमंत्री ने अपनी किस 'तपस्या’ में कमी रह जाने की बात कही?
    22 Nov 2021
    प्रधानमंत्री कहते हैं कि यह समय किसी को भी दोष देने का नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि यह समय नहीं है दोष देने का तो फिर सरकार के दोषों पर कब चर्चा होनी चाहिए और क्यों नहीं होनी चाहिए?
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License