NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
भगवन्, तुम तो बहाना हो गये!
नौजवान हाथों को काम देने की बजाय सरकार ने हथियार थमा दिया है जिसका नशा पूरे समाज को खोखला कर रहा है.
शाहनवाज़
26 Oct 2017
भगवा आतंक
courtesy - umeed.com

शराब की तासीर बस इतनी है कि ये चढ़ती है और कुछ घंटे में उतर जाती है. इसका नशा स्थायी नहीं होता. नशे में फिर जाना है तो सामान दोबारा जमा करना होगा, ख़ुराक़ फिर से चढ़ानी पड़ेगी.

एक नशा इसके बिल्कुल उलट काम करता है. यह ज़रा भी छू जाए तो आप इसकी गिरफ़्त में हैं. वक़्त के साथ जकड़न बढ़ती है. मदमस्त नशेलची आसपास के समाज में कौतुहल पैदा करता है. जैसे कुछ नया घट रहा है. निठल्ले तमाशबीन इस नशे का आसान और पहला शिकार बनते हैं.

इस नशे की बानगी इस बार मैंने अपने शहर में देखी जो कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक छोटा और शांत कस्बा है.

दशहरे और दीवाली की रंगत यहां बदली नज़र आई. त्योहार घरों में मने, बाज़ार फीका रहा, मेला मेले जैसा नहीं रहा, वो कुम्हार नहीं नज़र आया जो हर साल मिट्टी के खिलौने बनाकर और उन्हें रंगकर बड़ी उम्मीदों के साथ सड़क के किनारे रखकर बेचा करता था. गुब्बारे वालों की साइकिलें भी बस दो दिखीं.

मेरे शहर में हर साल दशहरे पर देर रात तक भक्ति गीत बजा करते थे. लाल चुनरी ओढ़कर लड़के तब तक नाचा करते, जब तक मूर्तियां विसर्जित नहीं हो जाती मगर इस बार ऐसा नहीं था. इस बार मूर्तियां नए लड़के विसर्जित करवा रहे थे. चुनरी की जगह उनके हाथ में झंडे थे और भक्ति गीतों की जगह नारों ने ले ली थी.

उनमें से कुछेक नारे- 'एक ही नारा एक ही नाम, जय श्री राम जय श्री राम', 'घर-घर भगवा छाएगा, राम राज्य फिर आएगा', 'भारत का अभिमान है हिंदू, इस धरती की शान है हिंदू', 'राज तिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं भगवाधारी'.

वे हरेक नारे पर हाथ उठाकर तलवार लहरा रहे थे. उनके हाथों में चापड़, गड़ासे, दरांती जैसी हथियार थे.

मेरे मुसलमान दोस्त ने कहा कि एक दिन वह इन्हीं नारा लगाने वालों के बीच से गुज़र रहा था और ख़ुद को दहशत से भरा हुआ महसूस किया. वो सफेद कुर्ते पायजामे में था जिसने उसका डर बढ़ा दिया था. उसने मुझसे कहा कि मेरी तरह और भी मुसलमान इनके आसपास से गुज़रते हुए दहशत में आए होंगे मगर अपने इस डर के बारे में किससे कहें?

मेरा हिंदू दोस्त जिसका पूरा बचपन दूर्गा पूजा में सड़कों पर बीता, उसने कहा कि इस बार वह एक भी दिन दशहरे और दीवाली पर घर से बाहर नहीं गया. अपनी बीवी और बच्चों के साथ घर पर रहना उसे ज़्यादा ठीक लगा. बाहर की फिज़ा अब ठीक नहीं है.

मगर 10 दिन के इस सफ़र में मुझे सबसे ज़्यादा बेचैन किया राजन पांडेय ने. रात 11 बजे जब शहर सोने की तैयारी कर रहा था, तब राजन एक बंद दुकान की सीढ़ियों पर बैठा था. वो हरेक शख़्स को देख रहा था जो जल्दी-जल्दी अपने घरों को लौट रहे थे. मुझे देखते ही उसने चिल्लाकर बुलाया. ऐसा लगा कि मुझे आवाज़ देने के लिए उसने अपने शरीर की पूरी ताक़त झोंक दी है.

उसे देखकर मैं परेशान हो गया. उसके बाल आधे से ज़्यादा झड़ चुके थे. जो बचे हैं, उनमें भी आधे पके हुए. आंखें धंसी हुई.

राजन और मेरे घर का रिश्ता कम से कम 50 साल पुराना है. 15 साल पहले मूर्ति विसर्जन के दौरान जब राजन नाचता था तो हर कोई उसे अपनी ओर नाचने के लिए खींचता. कह सकते हैं कि राजन एक स्टार था, भले ही एक मामूली कस्बे का.

वही राजन अब ज़िंदगी हार रहा है. चेहरे पर झुर्रियां इतनी जैसे कोई 50 साल का बूढ़ा. बार-बार वो मुझे इतनी हसरत से देख रहा था कि मैं उसकी कोई मदद कर दूं, उसके दुख दूर कर दूं. 10 मिनट की मुलाक़ात में उसने मुझसे 10 बार कहा कि मुझे दिल्ली में कोई नौकरी दिलवा दो. अगर किसी दफ़्तर या फैक्ट्री के बाहर गार्ड की नौकरी मिल जाए तो मेरा काम हो जाएगा. वो सालों से बेरोज़गार है.

राजन हर दिन लड़ रहा है जीने के लिए. मगर शोर इतना ज़्यादा है कि कोई उसे सुनने वाला नहीं. जब तक उसके शरीर में ताक़त है, तब तक वो इसी तरह अपने जानने वालों को पकड़-पकड़कर काम मांगता रहेगा. मगर मुझे पक्का यक़ीन है कि उसे काम नहीं मिल पाएगा और वो वक़्त से पहले मर जाएगा.

राजन को काम नहीं मिल पाने के लिए किसी की जवाबदेही भी तय नहीं होगी. वो जब मरेगा तो पूरी व्यवस्था जुट जाएगी यह साबित करने में कि वह सामान्य मौत मरा है. कोई नहीं कह पाएगा सरकार से कि काम पैदा करने की बजाय सरकार और जनप्रतिनिधि समाज में सांप्रदायिकता का नशा घोलने में लगे थे और राजन इसी राजनीति के चलते मारा गया.

21वीं सदी के भारत में भिखारियों जैसी ज़िंदगी जीने के लिए अभिशप्त समाज की इस गुलामी के बारे में सरकार और चुने हुए नुमाइंदे अच्छे से जानते है. यही वजह है कि नौजवान हाथों को काम देने की बजाय सरकार ने हथियार थमा दिया है जिसका नशा पूरे समाज को खोखला कर रहा है.

साम्प्रदाइकता
उत्तर प्रदेश
भगवाकरण
रोज़गार

Related Stories

उप्र बंधक संकट: सभी बच्चों को सुरक्षित बचाया गया, आरोपी और उसकी पत्नी की मौत

नागरिकता कानून: यूपी के मऊ अब तक 19 लोग गिरफ्तार, आरएएफ और पीएसी तैनात

5 सितम्बर मज़दूर-किसान रैली: सबको काम दो!

यूपी-बिहार: 2019 की तैयारी, भाजपा और विपक्ष

सोनभद्र में चलता है जंगल का कानून

यूपीः मेरठ के मुस्लिमों ने योगी की पुलिस पर भेदभाव का लगाया आरोप, पलायन की धमकी दी

नौकरियों के सम्बन्ध में जेटली का भ्रम

चीनी क्षेत्र के लिए केंद्र सरकार का पैकेज, केवल निजी मिलों को एक मीठा तोहफ़ा

चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण’ जेल में बंद, भीम आर्मी द्वार लोगों को संगठित करने का प्रयास जारी

डॉक्टर कफील ने कहा ऑक्सीज़न की कमी ने बच्चों की मौतों में किया था इज़ाफा


बाकी खबरें

  • अनिल अंशुमन
    झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!
    29 Mar 2022
    जगह-जगह हड़ताल के समर्थन में प्रतिवाद सभाएं कर आम जनता से हड़ताल के मुद्दों के पक्ष में खड़े होने की अपील की गयी। हर दिन हो रही मूल्यवृद्धि, बेलगाम महंगाई और बेरोज़गारी के खिलाफ भी काफी आक्रोश प्रदर्शित…
  • मुकुंद झा
    दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन
    29 Mar 2022
    केंद्रीय ट्रेड यूनियन ने इस दो दिवसीय हड़ताल को सफल बताया है। आज हड़ताल के दूसरे दिन 29 मार्च को देश भर में जहां औद्दोगिक क्षेत्रों में मज़दूरों की हड़ताल हुई, वहीं दिल्ली के सरकारी कर्मचारी और रेहड़ी-…
  • इंदिरा जयसिंह
    मैरिटल रेप को आपराधिक बनाना : एक अपवाद कब अपवाद नहीं रह जाता?
    29 Mar 2022
    न्यायिक राज-काज के एक अधिनियम में, कर्नाटक उच्च न्यायालय की व्याख्या है कि सेक्स में क्रूरता की स्थिति में छूट नहीं लागू होती है।
  • समीना खान
    सवाल: आख़िर लड़कियां ख़ुद को क्यों मानती हैं कमतर
    29 Mar 2022
    शोध पत्रिका 'साइंस एडवांस' के नवीनतम अंक में फ्रांसीसी विशेषज्ञों ने 72 देशों में औसतन 15 वर्ष की 500,000 से ज़्यादा लड़कियों के विस्तृत सर्वे के बाद ये नतीजे निकाले हैं। इस अध्ययन में पाया गया है कि…
  • प्रभात पटनायक
    पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में फिर होती बढ़ोतरी से परेशान मेहनतकश वर्ग
    29 Mar 2022
    नवंबर से स्थिर रहे पेट्रोल-डीज़ल के दाम महज़ 5 दिनों में 4 बार बढ़ाये जा चुके हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License