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बुलडोजर पर जनाब बोरिस जॉनसन
बुलडोजर दुनिया के इस सबसे बड़े जनतंत्र में सरकार की मनमानी, दादागिरी एवं संविधान द्वारा प्रदत्त तमाम अधिकारों को निष्प्रभावी करके जनता के व्यापक हिस्से पर कहर बरपाने का प्रतीक बन गया है, उस वक्त़ बोरिस जॉन्सन की यह सवारी एक तरह से सत्तासीन समूह की कार्रवाइयों को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता प्रदान करने के तौर पर ही देखी जा सकती है।
सुभाष गाताडे
25 Apr 2022
Boris Johnson

बुलडोजर एक विचार है
जो एक मशीन के रूप में सामने आता है
और आँखों से ओझल रहता है

बुलडोजर एक विचार है
हर विचार सुंदर नहीं होता
लेकिन वह चूंकि मशीन बन आया है तो
इस विचार को भी कुचलता हुआ आया है
कि हर विचार को सुंदर होना चाहिए .....

-
बुलडोजर एक विचार है - विष्णु नागर

कुछ तस्वीरें ताउम्र सियासतदानों का पीछा करती हैं और मुमकिन हो एकांत में बैठे उन्हें इन तस्वीरों को देख कर शर्मिंदगी भी होती हो। जैसे वह एक तस्वीर थी जिसमें भारत के प्रधानमंत्री जनाब नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति ओबामा की अगुवाई में एक ऐसी पोशाक पहने दिखे थे, जिस सूट पर उनका अपना नाम अंकित था।

जनाब बोरिस जॉनसन, जो इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त़ कम से कम, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं, की एक ऐसी ही तस्वीर इन दिनों वायरल हो गयी है, जिसमें वह बुलडोजर पर सवार दिख रहे है, जिसके चलते हंगामा मच गया है।

यह तस्वीर भारत की उनकी हालिया यात्रा की है, जहां गुजरात के पंचमहल स्थित जेसीबी प्लांट का उदघाटन करने के लिए पहुंचे थे। वजह साफ थी कि वह सरकारी खर्चे से, अर्थात जनता की गाढ़ी कमाई से मिले टैक्स के बलबूते चार हजार किलोमीटर दूर की यात्रा करके दूसरे मुल्क में पहुंचे थे, ताकि वहां के हुक्मरानों से बातचीत की जाए, कुछ आपसी मेल मिलाप, व्यापार बढ़ाया जाए और उसी यात्रा से समय चुरा कर आप ऐसे शख्स की फैक्टरी में पहुंचे थे, जो आप की पार्टी को चंदा देता हो, तो फिर सवाल उठना लाजिमी था।

याद रहे जेसीबी के चेयरमैन लॉर्ड बैमफोर्ड वर्ष 2001 से उनकी कन्जर्वेटिव पार्टी को चंदा देते रहे हैं, इतना ही नहीं वर्ष 2019 में कन्जर्वेटिव पार्टी के नेतृत्व के लिए चले संघर्ष में भी उन्होंने बोरिस जॉनसन का साथ दिया था। बात यहां तक नहीं रूकी उन्होंने उस खरबपति द्वारा बनाए जा रहे बुलडोजर पर सवार होकर एक तरह से उसके उत्पाद का विज्ञापन किया ताकि चंदेदार का उत्पाद और बिके तो फिर सवाल उठना लाजिमी है।

गौरतलब है कि भारत यात्रा के पहले दिन बुलडोजर पर उनकी सवारी का प्रसंग राजधानी दिल्ली के जहांगीरपुरी के इलाके में हनुमान जयंती के दिन हुए दंगों के बाद, जिसे उकसावा देने में दक्षिणपंथी जमातों की सक्रिय भूमिका दिखी है, अवैध निर्माण तोड़ने के नाम पर अधिकतर धार्मिक अल्पसंख्यकों के मकानों एव दुकानों  पर चले बुलडोजर के अगले दिन ही सामने आया था।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के बाद भी आधे घंटे तक जेसीबी मशीनों द्वारा  इन मकानों एवं दुकानों को गिराया गया था। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की जेसीबी पर की गयी सवारी को लेकर दुनिया के अग्रणी मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की तरफ से जारी बयान में बाकायदा कहा गया कि आखिर एक देश का प्रधानमंत्री इस समूची पृष्ठभूमि में ऐसी ‘अज्ञानता’ का परिचय कैसे सकता है ?

’दिल्ली की म्युनिसिपल कारपोरेशन द्वारा उत्तरी पश्चिमी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में मुसलमानों की दुकानों को ध्वस्त करने के लिए हुआ जेसीबी बुलडोजरों के इस्तेमाल की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की चुप्पी शर्मनाक है।’ 

अपने टिवटर पर एमनेस्टी ने इस पूरे प्रसंग पर जॉन्सन के मौन की भी आलोचना की और जोड़ा कि जिस तरह भारत सरकार मानवाधिकारों पर रोज हमले कर रहे हैं, तब ब्रिटेन का चाहिए कि वह मौन दर्शक न बने।’

एक ऐसे वक्त़ में जबकि बुलडोजर दुनिया के इस सबसे बड़े जनतंत्र में सरकार की मनमानी, दादागिरी एवं संविधान द्वारा प्रदत्त तमाम अधिकारों को निष्प्रभावी करके जनता के व्यापक हिस्से पर कहर बरपाने का प्रतीक बन गया है, उस वक्त़ बोरिस जॉन्सन की यह सवारी एक तरह से सत्तासीन समूह की कार्रवाइयों को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता प्रदान करने के तौर पर ही देखी जा सकती है।

हम बोरिस जॉन्सन के इस सूचक मौन एवं बुलडोजर सवारी की तुलना ब्लैक लाइव्स मैटर के जबरदस्त आंदोलन के दिनो में  जिसने वर्ष 2020 में अमेरिका ही नहीं बल्कि यूरोप के तमाम हिस्सों को प्रभावित किया तथा जिसकी अनुगूंज दुनिया के अन्य हिस्सों में भी दिखाई दी थी।  किसी नेता द्वारा श्वेत वर्चस्ववादियों के हक़ में की गयी किसी कार्रवाई से, भले ही वह प्रतीकात्मक हो, कर सकते हैं।

मालूम हो कि विगत कुछ समय से भाजपाशासित राज्यों में बिना कोई जांच किए, यहां तक कि किसी भी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लिए बिना, महज संदेह के आधार पर जगह जगह लोगों के मकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। कहा जाता है कि उन मकानों से जुलूसों पर पथराव हुआ। इसलिए उन्हें ध्वस्त किया गया।

इस तरह का पैटर्न बन गया है कि हिंदू पर्व त्योहार पर उग्र हिंदू समूह जुलूस निकालते है, जुलूस जब अल्पसंख्यक समुदाय के इलाके से गुजरती है तो भद्दे भद्दे नारे लगते हैं, गंदे गीत बजाए जाते हैं और मुसलमानों के अस्मिता पर चोट पहुंचाकर उसे उकसाने की कोशिश की जाती है।

साथ चल रही पुलिस ऐसी भड़कावे वाली कार्रवाइयों का विरोध नहीं करती। अगर कहीं आत्मरक्षा के लिए कोई कदम उठाए तो न केवल इन संगठित गिरोह उन लोगों पर हमला करते हैं, उनके प्रार्थनास्थलो को नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हे अपमानित करते हैं और फिर यह सब गुजर जाने के बाद पुलिस यह कहते हुए कि फलां फलां मकानों से पथराव हुआ, उन मकानों, दुकानों को बुलडोजर लगा कर नष्ट कर देती हैं। 


भारत के संविधान के तहत प्रदत्त तमाम अधिकारों को, तय की गयी प्रणालियों को धता बताते हुए जहां किसी को दोषी साबित करने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। फिर कार्रवाई होती है, उन सभी प्रक्रियाओं को बेकार किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश के खरगौन का मामला सभी के सामने है, जहां रामनवमी की रैली मेें हुई हिंसा के बाद शाम के वक्त़ जेसीबी मशीनों  से लैस पुलिस अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में पहुंची। उसने लगभग 40-50 मकानों, दुकानों को ध्वस्त कर दिया। इन मकानों में वसीम शेख नामक एक शख्स की झोपड़ी भी शामिल थी, जिसके दोनों हाथ कई साल पहले कट गए हैं।  पुलिस ने उसे भी ‘पथराव करने में शामिल बताया था। इन ध्वस्त किए मकान में उस महिला का मकान भी है, जो प्रधानमंत्राी आवास योजना के तहत बना था और उन दो युवाओ के भी मकान थे, जो विगत एक माह से अधिक समय से जेल में बंद हैं। यहां पर भी पुलिस का तर्क था कि वह पथराव में शामिल थे।

सांप्रदायिक तनाव के बाद जब ‘दंगाइयों’ के मकानों को पुलिस की तरफ से गिराया जाता है तो तर्क यह भी दिया जाता है कि सरकार की तरफ से अवैध निर्माण को गिराया जा रहा है। अगर 2019 -2020 के सीएए विरोधी आंदोलन के बाद सूबा उत्तर प्रदेश में आंदोलन में हुई हिंसा के लिए चंद लोगों का जिम्मेदार ठहराते हुए नुकसान भरपाई के लिए उन्हें नोटिस भेजे गए थे, ऐसे लोगों की तस्वीरें जो सरकार के हिसाब से अभियुक्त थे बाकायदा चौराहों चौराहों पर लगायी गयी थी, कई जगहों पर लोगों से वसूली भी हुई थी।

उस वक्त़ भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे कदम की आलोचना की थी, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर की पीठ ने योगी सरकार को बार बार फटकार लगायी थी।

गनीमत थी कि सरकार की इस एकतरफा कार्रवाई - जिसके तहत उसने कइयों से जुर्माना वसूल भी हो गया था - को  पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय और बाद में सुप्रीम कोर्ट से खारिज किया था, और सरकार को इस बात के लिए मजबूर किया गया था कि वह उन्हंे पैसे लौटा दे।

बुलडोजरों के इस्तेमाल से मकानों को ध्वस्त करना इस पूरी कवायद का अगला कदम है, जहां न नोटिस दिया जाता है, न कोई सुनवाई होती है, न पीड़ित पक्ष को बात कहने का मौका दिया जाता है, प्राकृतिक  न्याय के तमाम सिद्धांतों को भुला देते हुए पुलिस किसी व्यक्ति को ‘दोषी’ ठहरा देती है और फिर उसके ‘दोषी’ होने की सज़ा उसके मकान, दुकान को ध्वस्त करके उसके समूचे परिवार को देती है।

भारत के संविधान के तहत जीवन के अधिकार की जो गारंटी दी गयी है, वह सब शायद भुला दी गयी है।

वैसे ब्रिटेन के प्रधानमंत्राी बोरिस जॉन्सन - जो इन दिनों पार्टीगेट कांड के चलते मुश्किल में बताये जा रहे हैं - उनके प्रधानमंत्राी पद काल पर कोई भी नज़र दौड़ाए, वह अंदाज़ा लगा सकता है कि भारत आकर एक अधिक संयत, गरिमापूर्ण व्यवहार की उनसे अपेक्षा करना आकाशकुसुम पाने की अभिलाषा जैसा रहा है।

जिस पार्टीगेट कांड के चलते उनकी अपनी कुर्सी भी दांव पर लगी है, खुद कंजर्वेटिव पार्टी में उनके समर्थकों की संख्या तेजी से कम हो रही है, वह कांड आखिर क्या है ?

मालूम हो कि कोविड की पहली लहर के दिनों में जब ब्रिटेन में सैकड़ों लोग मर रहे थे, अस्पतालों में लोगों का पर्याप्त सुविधाए नहीं मिल रही थीं, एक दूसरे से न मिलने के लिए जनता पर जबरदस्त प्रतिबंध लगे थे, उन दिनों बोरिस जॉनसन के आफिस में उनके सहयोगियों के साथ उन्होंने पार्टी की थी। कुछ माह पहले इस पार्टी की ख़बर कहीं से लीक हो गयी और एक एक करके मामला खुलता गया। शुरूआत में बोरिस जॉनसन ने ऐसी किसी पार्टी के आयोजन से तथा इसमें उनकी अपनी सहभागिता से इन्कार किया, मगर जब अधिक प्रमाण सामने आए तो उन्हें बाकायदा कोविड नियमों का उल्लंघन करने के लिए जुर्माना देना पड़ा था।

अपने देश में मानवाधिकारों को लेकर उनका अपना रिकॉर्ड कत्तई प्रशंसनीय नहीं रहा है। ताजा मसला ब्रिटेन में शरण के लिए आ रहे प्रवासियों को एकतरफा टिकट देकर अफ्रीका के मुल्क रवांडा भेजने का है, जिसे लेकर ब्रिटेन सरकार की जबरदस्त आलोचना हो रही है, यहां तक कि उनके अपने करीबियों ने भी इस योजना से असहमति जतायी है।

बहरहाल, बोरिस जॉनसन को अपनी इस दो दिनी भारत यात्रा से कितना राजनीतिक फायदा हुआ हो या नही मगर इस बहाने उन्होंने भारत के अंदर मानवाधिकारों की बदतर होती स्थिति पर दुनिया की निगाहें फिर एक बार टिका दी हैे।

भारत किस तरह चुनावी एकतंत्र / इलेक्टोरल आटोक्रेसी में तब्दील हो रहा है, इसके तमाम आंकड़े आए दिन दुनिया के अग्रणी संस्थानो द्वारा दिए जा रहे हैं, वहां अब एक नया तथ्य यह भी जुड़ेगा कि इस लोकतंत्र का एक प्रतिस्थापन बुलडोजर बन गया है, जिसके माध्यम से भारत में सत्तासीन जमात एक नयी परिभाषा गढ़ रही है, जिसमें अब पीड़ितों की न्याय की रहीसही उम्मीदें भी अब जाती रहेंगी।

(यह लेखक के निजी  विचार है)

Boris Johnson
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