NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अंतरराष्ट्रीय
अर्थव्यवस्था
चीन के शेयर बाजार का पतन
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
01 Sep 2015

इन्द्रानी और शीना के मीडिया की सुर्खियाँ बनने से पहले अगर मीडिया को पढ़े तो ऐसा माना जा रहा था कि चीन की अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है और इसका सीधा फायदा भारत की स्टोक बाज़ार को होगा. वैश्विक मीडिया अपनी प्रतिक्रया में थोडा संतुलन बनाए हुए था – चूँकि उनका स्टॉक बाज़ार चीन के बाज़ार से सीधा जुडा हुआ है – इसलिए उनका कोई भी बयान उनके लिए घातक हो सकता है. तो असलियत में चीन में हो क्या रहा है?

चीन के बाज़ार में गिरावट को एक समूह इसे बाज़ार द्वारा अपने आपको “सुधारने” की संज्ञा दे रहा है. स्टॉक बाज़ार कुछ ज्यादा ही गर्म हो गया था, पिछले 12 महीनों में दोहरे स्तर पर आ गया था, यह गुर्तुवाकर्षण का उत्कृष्ट नियम है, जो चीज़ ऊपर जाती है वह नीचे आएगी जरूर. यहाँ तक की इस गिरावट के बाद, जिसकी वजह से संघाई के बाज़ार में उसके सूचकांक में 25 प्रतिशत की गिरावट ला दी, यह अभी भी पिछले वर्ष के स्तर से 30 प्रतिशत से अधिक पर है. और वर्तमान में दिख रहा है कि एक छोटे स्तर पर इजाफा हो रहा है। अन्य स्टॉक बाज़ार जो चीन के बाज़ार के साथ धराशायी हो गए थे उनमें भी अहिस्ता-आहिस्ता सुधार देखने को मिल रहा है, हालांकि इसमें कोई एक जैसा सुधार नहीं है: कुछ बाज़ार तेज़ी के साथ आगे बढ़ गए और कुछ आहिस्ता-आहिस्ता संभल रहे हैं.

जो इस समझ को लेकर अपने विचार रखते हैं, कि “चीन की अर्थव्यवस्था जोकि निर्यात और औद्योगिक उत्पादन पर निर्भर थी और अब वह अपने आपको अपने देश के एक अरब चालीस करोड़ लोगों के उपभोक्ता बाज़ार के लिए बदल रही है”. इसके लिए चीन युआन की विनिमय दर को कम कर रहा है और और उसे परिवर्तनीय बना रहा है और वह इसे दूसरी मुद्राओं की तरह उपभोक्ता के पक्ष में परिवर्तनीय बना रह है न कि निर्यातोन्मुख जैसा कि पहले था.

अन्य मुद्दा है कि चीन के बाज़ार का गिरना इस बात का संकेत है कि चीन की अर्थव्यवस्था ढांचागत संकट में फंस गयी है. यह चीन की अर्थव्यवस्था के एक गहरे संकट में फसने का संकेत है. यह संकट अमरिका के उसी संकट जैसा है जिसके उसका गुबार फूटा था, चीन के भीतर उसका रियल स्टेट बड़ी मात्र में उछाल दिखाकर बड़े स्तर पर सीमेंट, लोहा और अन्य वस्तुओं की मांग बढ़ा कर अर्थव्यवस्था के मुख्य संकट को झुठला रहा है. चूँकि रियल स्टेट को को अर्थव्यवस्था की सच्चाईओं से परे रखकर ह्वा में बनाया गया था, और इसका अंदाजा नहीं था कि जो आप बना रहे हैं उसे खरीदेगा कौन? इससे पूरा बाज़ार गिरेगा और न अदा करने वाला क़र्ज़ बढ़ जाएगा. इस परिपेक्ष्य में युआन की विनिमयदर में कटौती चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने का एक प्रयास है, ताकि वह अपने निर्यात को प्रतियोगी बना सके और इस संकट से निजात पा ले.

कौनसा विचार सही है? या फिर दोनों में कोई सचाई है? यह सब विश्लेषण पश्चिमी मीडिया और विश्लेषकों ने चीन के आंकड़ों के बारे है किसी गहरे अविश्वास में किया है. हालांकि कुछ लोग यह मानने को तैयार हैं कि यह संकट अर्थव्यवस्था को बड़े उद्योगों की निर्भरता से हटा कर छोटा व्यापार जोकि आज की तारीख में महत्वपूर्ण हो गया है में संक्रमण के चलते पैदा हुआ है और इसलिए डाटा का संग्रहण थोडा मुशिकिल है, लेकिन कुछ दुसरे लोगों का मानना है कि चीन कुछ और ही कहानी बना रहा है. लेकिन चीन भारत की तरह नहीं जहाँ मोदी ने विकास की ऊँची दर दिखाने के लिए और किसानों की आत्महत्या को कम आंकने के लिए जोड़ के तरीके को ही बदल कर रख दिया है. डाटा की अनिश्चितता के चलते चीन पर विमर्श और भी मुश्किल हो गया है.

जो लोग यह समझते हैं कि चीन का संकट भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वरदान साबित होगा, वे लोग यह भूल जाते हैं कि हमारे यहाँ भी रियल स्टेट में उछाल आया था और अब वह बड़ी गिरावट की तरफ है, जिस उछाल के चक्कर में’ लोगों ने बड़े क़र्ज़ उठाये और अब उसे चुकाने में असमर्थ हैं. इसकी वजह से देहस की अर्थव्यवस्था में ‘बुरा क़र्ज़’ बढ़ गया और बैंक में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (यानी क़र्ज़ न अदा करने वाले खाते) की संख्या बढ़ गयी. इसलिए अगर चीन की अर्थव्यवस्था संकट में तो हमारी अर्थव्यवस्था भी कुछ बेहतर स्थिति में नहीं है.

यद्दपि न्युज्क्लिक चीन की अर्थव्यवस्था में जो भी हो रहा है उस पर विमर्श जारी रखेगी, हमने चीन की स्टॉक बाज़ार में गिरावट पर उत्पन्न हुए विभिन्न विचारों को रखा है कि वे चीन की अर्थव्यवथा के बारे में क्या सोचते हैं.

गुन्त्राम बी. वोल्फ्फ़, जोकि 2013 से ब्रुएगेल के निदेशक हैं, और थॉमस वाल्श, जो मैक्रोइकॉनॉमिक्स के क्षेत्र में ब्रुएगेल में अनुसंधान सहायक है के द्वारा ब्रुएगेल में प्रकाशित

क्या हमें चीन के स्टॉक बाज़ार और देश के बाज़ार में जारी उथल-पुथल से चिंतित होना चाहिए? इस सम्बन्ध में परिकल्पनायें मौजूद है:

पहला तो यह कि चीन का स्टॉक बाज़ार ऐसे मुकाम पर पहुँच गया था जिसे उस ऊँचाई पर थामना मुश्किल था और इसलिए वह धराशाही हो गया, यह मात्र बाज़ार को सुधारने भर का मामला है ताकि वह पाने बुनियादी सिधान्तों पर कायम रह सके, यह कोई चीन की अर्थव्यवस्था के लिए गहरी चेतावनी नहीं है.

यह विचार ई.सी.बी. के उपाध्यक्ष विटोर कांताचियो इन विचारों से मेल खाते हैं: “संकेत यह मिलते हैं .......कि चीन की अर्थव्यवस्था में इतनी गिरावट नहीं आई है की उसका स्टॉक बाज़ार से सफाया ही जाए..(...) चीन की समस्या जर्मनी की कंपनियों को प्रभावित नहीं कर रही हैं”.

पूरी दुनिया में स्टॉक बाज़ार में गिरावट आती है और इस विचार से इन गिरावटों के जरिए अल्प अवधि के लिए नुकशान होता है और इसका असली अर्थव्यवस्था की गतिविधियों पर कोई असर नहीं पड़ता है.

दूसरी परिकल्पना यह है कि स्टॉक बाज़ार का गिरना चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट का संकेत है. और इसका असर व्यापार संबंधों के जरिए चीन के साथ व्यापार करने वालों पर भी पड़ेगा. हमें इसकी खोज करनी होगी कि यूरोप के स्टॉक बाज़ार में गिरावट वित्तीय छूत समस्या या यह चीन के साथ जुड़े व्यापार से सम्बंधित हैं. हमने अगस्त की शुरुवात से अब तक इस गिरावट पर नज़र रखें हैं, और चीन का ओ.ई.सी.डी. देशों के साथ व्यापार तथा चीन के सकल घरेलू उत्पाद को निर्यात के हिस्से की तुलना के तौर पर.

पहली परिकल्पना के विपरीत यह वित्तीय बाज़ार में उथल-पुथल का मामला है, क्योंकि यूरोप के जो देश चीन के साथ व्यापार से सम्बंधित हैं और जिनके चीन के साथ मज़बूत व्यापारिक रिश्ते हैं उन्हें उनके स्टॉक बाज़ार में काफी नुकशान हुआ है. हम सी संकेत को चीन की अर्थव्यवस्था में भारी उथल-पुथल के रूप में लेते हैं, जिसकी वजह से यूरोप के चीन में निर्यात कम हो गया है हो इसका असर व्यापार चेनलों के जरिए यूरोप के स्टॉक बाज़ार पर पड़ा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चीन
डाव् जोंस
निर्यात
आयात
बाज़ार
भारत
जीडीपी
इराक. अमरीका
येन

Related Stories

पंजशीर घाटी पर तालिबान की जीत के मायने क्या हैं?

मालदीव को लोकतंत्र चाहिए, न कि भारतीय हस्तक्षेप

पाकिस्तान के पद्चिन्हों पर चल रहा है भारत: परवेज़ हूदभोय

अमरीका की नयी पर्यावरण योजना एक दृष्टि भ्रम के सिवा कुछ नहीं है

नवउदारवाद के “फायदे”: बढती आर्थिक असमानता

नोम चोमस्की : न्रेतत्वकारी/अग्रणी आतंकवादी देश

मोदी एवं विदेश नीति: कम काम, ज्यादा दिखावा

फ़ोर्तालेज़ा में ब्रिक्स शिखर वार्ता को जस्ट नेट कोएलिशन का पत्र


बाकी खबरें

  • putin
    अब्दुल रहमान
    मिन्स्क समझौते और रूस-यूक्रेन संकट में उनकी भूमिका 
    24 Feb 2022
    अति-राष्ट्रवादियों और रूसोफोब्स के दबाव में, यूक्रेन में एक के बाद एक आने वाली सरकारें डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाली बड़ी आबादी की शिकायतों को दूर करने में विफल रही हैं। इसके साथ ही, वह इस…
  • russia ukrain
    अजय कुमार
    यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!
    24 Feb 2022
    तमाम आशंकाओं के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए युद्ध की शुरुआत कर दी है। इस युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कौन से कारण इसके पीछे हैं? आइए इसे समझते हैं। 
  • up elections
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
    24 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
  • ayodhya
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
    24 Feb 2022
    अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही…
  • mali
    पवन कुलकर्णी
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है
    24 Feb 2022
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाने की मांग करने वाले बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों का उभार 2020 से जारी है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में, माली की संक्रमणकालीन सरकार ने फ़्रांस के खिलाफ़ लगातार विद्रोही…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License