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चुनाव 2019 : आम इतरा रहा है और मुद्दा मुंह सुजाये खड़ा है!
जैसे-जैसे चुनाव प्रचार आगे बढ़ा मुद्दा लगातार डिप्रेशन का शिकार होता गया। और अराजनैतिक इंटरव्यू के दिन तो मुद्दे ने आत्महत्या तक करने की कोशिश की।
राज कुमार
05 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy : clipart.email

मुद्दे का आत्मालाप : एक व्यंग्य आलेख

समय चुनाव का है। प्रचार इतना चरम पर है कि शर्म के दायरे से निकलकर बेहूदगी की सीमाएं भी पार कर गया है। लेकिन, इंटरव्यू अराजनैतिक हो रहे हैं। एवैं कुछ भी ऐसा-वैसा मतलब टिक-टॉक जैसा नहीं। बल्कि, देश के प्रधानमंत्री का अराजनैतिक इंटरव्यू। वो भी चुनाव के समय। इस तरह के करिश्मे तभी संभव हो पाते हैं जब झूठ और कुटिलता का स्वर्ण युग चल रहा हो। तो अंततः भारतवर्ष कपट युग में प्रवेश करता है।

इस बार के इलेक्शन में आम इतरा रहा है और मुद्दा मुंह सुजाये खड़ा है। मुद्दे को जब बहस और चर्चाओं से निकाला गया तो वो दुखी हुआ लेकिन निराश नहीं हुआ। उसके बाद संसद से निकाला गया। मुद्दा मंद-मंद मुस्कुराकर देखता रहा क्योंकि उसे पता था कि एक वक्त ऐसा आएगा जब सबको मेरी शरण में आना ही पड़ेगा। और वो दिन भी आखिर आ ही गया। 11 मार्च सन् 2019, जब चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की घोषणा की। उस दिन मुद्दे की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। उसने कहा अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। अब क्या करोगे बच्चू। लेकिन मुद्दा भूल गया था कि उसका मुकाबला छल-कपट में माहिर शातिर खिलाड़ियों से हैं। तो जैसे-जैसे प्रचार आगे बढ़ा मुद्दा लगातार डिप्रेशन का शिकार होता गया। और अराजनैतिक इंटरव्यू के दिन तो मुद्दे ने आत्महत्या तक करने की कोशिश की।

मुद्दे के दिमाग में रह-रह कर ये ख्याल आता कि मैं, जिसके दम पर राष्ट्र और राजनीति का भूत वर्तमान और भविष्य टिका होता था। क्या आज मेरी औकात आम से भी गई-गुजरी हो गई। खैर खाने में यूं तो आम मुझे भी बहुत पसंद है। मैं आम का मुरीद रहा हूं। लेकिन...

पुरानी यादें ताजा करते हुए मुद्दे ने कहा, हालंकि बीजेपी के साथ हमेशा से मेरा 36 का आंकड़ा रहा है। मुझे याद है जब 21 अक्तुबर 1997 को बीजेपी के विधायक ने उत्तर प्रदेश की संसद में बेंच पर चढ़कर विपक्षियों पर माइक फेंक कर मारा था। उस वक्त भी मुझे लगा था कि अच्छा होता अगर उनकी तरफ कोई मुद्दा उछालते। लेकिन इस पहलवान ने वो माइक ही उखाड़ दिया जिससे मुझमें अनूगूंज पैदा होती थी।

बात सिर्फ यहीं तक होती तो भी देखा जाता। यहां तो मुद्दे की जबरदस्त फज़ीहत हो रही थी। बड़े से बड़े नेता, विद्वान जिस मुद्दे का संदर्भ दिया करते थे। पूरी बहस मोड़ दिया करते थे। दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया करते थे। आज उसे लोग जुमला कहकर पुकार रहे हैं। मुद्दे को चक्कर आने लगे, दिमाग में सन्नाटा छा गया। उसने किसी तरह खुद को संभाला। गहरी सांस लेते हुए खुद से कहा कि असल में मैं कभी बीजेपी का था ही नहीं। उसने पास ही प्लेट में रखा चौसा आम उठाया और किसी तरह दिमाग को शांत और आत्मा को तृप्त किया।

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