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भारत
राजनीति
चुनाव 2019 : दूसरे चरण में 95 सीटों पर मतदान, बिहार से बीजेपी बाहर
बिहार में भाजपा दूसरे चरण में चुनाव नहीं लड़ रही है। एनडीए के सीट बंटवारे में भाजपा ने ये पांचों सीटें जदयू को दे दी हैं। लेकिन उसका कैडर वोट आसानी से शिफ्ट होता नहीं दिख रहा है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
17 Apr 2019
mhagathbandhn
image courtesy- khas khabar

लोकसभा चुनाव को दूसरे चरण में गुरुवार, 18 अप्रैल को 95 सीटों के लिए वोट डाले जाएंगे।

इस चरण में  उत्तर प्रदेश की 8, बिहार की 5 , छत्तीसगढ़ की 3, तमिलनाडु की 38, पश्चिम बंगाल की 3, कर्नाटक की 14, असम की5, जम्मू कश्मीर की 2 , महाराष्ट्र की 10, मणिपुर की एक,  ओडिशा की 5 और पडुच्चेरी की एक सीट के लिए मतदान होगा। तमिलनाडु की एक सीट वैल्लोर का चुनाव रद्द कर दिया गया है जबकि त्रिपुरा की त्रिपुरा पूर्व की सीट पर मतदान टाल दिया गया है। अब वहां 23 अप्रैल को चुनाव होगा।

जीत और हार का पता तो 23 मई को चलेगा। लेकिन हार-जीत का अंदाज़ा पांच सालों के दौरान हुई उथल-पुथल से लगाया जा सकता है। सामाजिक पृष्ठभूमि और पिछले सालों में इन जगहों के चुनाव परिणाम से लगाया जा सकता है।

आइए फिलहाल बिहार के गणित, भूगोल और रसायन पर चर्चा करते हैं और जानते हैं कि यहां 18 अप्रैल को जिन 5 सीटों पर मतदान हो रहा है वहां क्या स्थिति है।

1. किशनगंज लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र

कुल मतदाता: 14,38,990

महिला मतदाता : 6,76,113

पुरुष मतदाता : 7,62,877    

इस  लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत  बहादुरगंज, ठाकुरगंज, किशनगंज, कोचाधामन, अमौर, बैसी विधानसभा क्षेत्र आते हैं। भाजपा के शाहनवाज हुसैन ने साल 1999 में राजद के तस्लीमुद्दीन को हराकर सीट जीती। बाद में शाहनवाज हुसैन ने फिर से  2004 में सीट जीत ली। अभी 2014 से कांग्रेस नेता मोहम्मद असरुल हक सांसद हैं। लोकसभा चुनाव 2019 के दंगल में किशनगंज सीट से कुल14 प्रत्याशी मैदान में है। इस बार यहां अब तक जो चुनावी फिजा बन रही है उसके अनुसार त्रिकोणीय मुकाबले के आसार हैं। जदयू से सैयद महमूद अशरफ, कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. मो. जावेद व एमआईएम प्रत्याशी अख्तरुल ईमान के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होगा।

किशनगंज  लोकसभा क्षेत्र में  किशनगंज जिले के साथ पूर्णिया जिले का भी कुछ हिस्सा शामिल है। किशनगंज जिले की कुल आबादी16,90,400 हैं, जिसमें  मुस्लिम आबादी 11.49 लाख है। यानी यह मुस्लिम बहुल इलाका है।

2. कटिहार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र    

कुल मतदाता: 14,46,478

महिला मतदाता : 6,77,434

पुरुष मतदाता: 7,69,044

इस संसदीय क्षेत्र में  विधानसभा क्षेत्र कटिहार, कदवा, बलरामपुर, प्राणपुर, मनिहारी (ST), बरारी शामिल  हैं। यह संसदीय  निर्वाचन क्षेत्र भाजपा का गढ़ रहा है। निखिल कुमार चौधरी 1999 और 2004 के बीच यहां के  सांसद थे। लेकिन वह साल 2014  में  नेशनल कांग्रेस पार्टी  के तारिक अनवर से हार गए। कांग्रेस छोड़ने के बाद तारिक शरद पवार की पार्टी एनसीपी में शामिल हो गए। एनसीपी के टिकट पर भी एक बार सांसद रहे। पिछले साल रफ़ाल डील मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन में शरद पवार के बयान से नाराज होकर उन्होंने एनसीपी छोड़ दी और वापस कांग्रेस में लौट आए।

यह संसदीय क्षेत्र कटिहार जिले के अधिकांश हिस्सों को कवर करता है। इसकी आबादी 30,71,029 है, जिनमें 2011 के जनगणना के तहत 12,80,190 लोग साक्षर हैं। कटिहार पर मुस्लिमों के अलावा यादव और सवर्ण वोटरों का दबदबा है। इसके अलावा इस सीट पर आदिवासियों का वोट भी गेम चेंजर साबित हो सकता है। कटिहार के लोगों के लिए खेती के अलावा रोजगार का कोई दूसरा साधन नहीं है। रोजगार नहीं मिलने से हर साल हजारों की संख्या में लोग यहां से प्रवास करने को मजबूर हुए हैं। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की कमी के चलते यहां से छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर हैं। कई प्रखंडों में लोग पानी,बिजली और सड़क जैसे मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं। सरकारी अस्पताल में सभी तरह के इलाज की व्यवस्था नहीं होने के चलते यहां के लोगों को भागलपुर और पटना जाना पड़ता है।

3. भागलपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र

कुल मतदाता: 16,85,339

महिला मतदाता: 7,90,154

पुरुष मतदाता : 8,95,185

इस संसदीय क्षेत्र में बिहपुर, गोपालपुर, पीरपैंती (एससी), कहलगांव, भागलपुर, नाथनगर विधानसभा क्षेत्र शमिल हैं। 

सीपीएम के सुबोध रे ने साल  1999 में सीट जीती, लेकिन 2004 में भाजपा के सुशील कुमार मोदी से हार गए। साल 2014 में मोदी लहर के बाद भी भागलपुर में कमल नहीं खिला था। इस सीट पर इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच मुकबला है। जदयू ने यहां से अजय कुमार मंडल और राजद ने बुलो मंडल को मैदान में उतारा है। 2014 के चुनाव में अटल सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री रहे शाहनवाज हुसैन 9 हजार वोटों से चुनाव हार गए थे।

भागलपुर संसदीय क्षेत्र भागलपुर जिले के एक बड़े हिस्से को कवर करता है। 30,37,766 की आबादी वाला यह इलाका बिहार के प्रसिद्ध शहरी केंद्रों में से एक है। इसमें 5.37 लाख लोगों की मुस्लिम आबादी है। इस सीट पर मुस्लिम और यादव वोटर का दबदबा है। ओबीसी और सवर्ण वोटर का भी वर्चस्व है। सवर्ण भाजपा के परंपरागत वोटर रहे हैं। सांप्रदायिक रूप से यह सीट संवेदनशील है।1989 में हुए दंगे की ताप को लोग आज भी महसूस करते हैं। 24 अक्टूबर 1989 में मंदिर के लिए पत्थर इकट्ठा कर रहे एक जुलूस के दौरान बम फेंका गया था। इसके बाद भागलपुर शहर और आस-पास के इलाकों में दंगा भड़क गया था। दंगे की वजह से 50हजार से ज्यादा लोग बेघर हुए थे।

भागलपुर के शहरी इलाकों को छोड़ दिया जाए तो सभी जगह बिजली, पानी और सड़क की समस्या है। देवघर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने के बाद भागलपुर एयर कनेक्टिविटी से जोड़ने का प्लान ठंडे बस्ते में है। मोदी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए विक्रमशिला यूनिवर्सिटी बनाने का प्रपोजल दिया और इसके लिए 500 करोड़ रुपए का फंड जारी किया, लेकिन जमीन न मिलने की वजह से निर्माण शुरू नहीं हो सका। भागलपुर में जवाहर लाल नेहरु मेडिकल कॉलेज को छोड़ दूसरा कोई सरकारी अस्पताल नहीं है। लोगों को इलाज के लिए पटना या दूसरे शहर जाना पड़ता है। 2008-09 में यहां उद्योग लगाने के लिए 87 प्लांट को स्वीकृति दी गई। इसके लिए जमीन अधिग्रहण भी किया गया, लेकिन अब तक मात्र 25 प्लांट ही लग सके। युवाओं को रोजगार देने के लिए बियाडा (बिहार औद्योगिक केंद्र) को जमीन उपलब्ध कराई गई थी। महज 200-250 लोगों को ही रोजगार मिल सका। रोजगार की कमी के चलते हर साल यहां से सैकड़ों युवाओं को पलायन करना पड़ता है।

4. पूर्णिया लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र 

कुल मतदाता : 15,82,967

महिला मतदाता: 7,49,357

पुरुष मतदाता : 8,33,610

इसमें कस्बा, बनमनखी (एससी), रूपौली, धमदाहा, पूर्णिया, कोरबा (एससी) विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। राजेश रंजन उर्फ़ पप्पू यादव  ने1999 में एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में  यह सीट जीती थी। उसके बाद भाजपा के उदय सिंह ने अगले दो कार्यकाल के लिए सीट संभाली। 2014 में, जदयू के संतोष कुमार ने उदय सिंह को हरा दिया। इस संसदीय क्षेत्र में पूर्णिया जिले का बड़े हिस्सा  और कटिहार जिले का छोटा हिस्सा शामिल है। पूर्णिया लोकसभा सीट में 60 फीसदी हिन्दू व 40 फीसदी मुस्लिम वोट हैं। हिन्दुओं में पांच लाख एससी-एसटी, बीसी व ओबीसी मतदाता हैं। यादव वोटर डेढ़ लाख, ब्राह्मण वोटर सवा लाख व राजपूत मतदाताओं की संख्या सवा लाख से अधिक है। इसके अलावा एक लाख अन्य जातियों के वोटर हैं। यह सीट महागठबंधन की तरफ झुकी हुई दिखती है। 

5. बांका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र

कुल मतदाता: 15,49,456

महिला मतदाता: 7,24,446

पुरुष मतदाता : 8,25,010

इस संसदीय क्षेत्र में  सुल्तानगंज, अमरपुर, धौरैया (एससी), बांका, कटोरिया (एसटी), बेलहर विधानसभा क्षेत्र शमिल हैं। जदयू के दिग्विजय सिंह ने साल 1999 में सीट जीती, लेकिन 2004 में  राजद के गिरिधारी यादव से हार गए। साल  2009 में दिग्विजय  सिंह ने फिर से  निर्दलीय के चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।  साल 2014 में  राजद के जयप्रकाश नारायण यादव ने चुनाव जीता। इस बार टक्कर तीन प्रमुख प्रत्याशियों के बीच ही मानी जा रही है। इसमें जदयू से गिरिधारी यादव, राजद से जयप्रकाश नारायण यादव और भाजपा की बागी निर्दलीय पुतुल कुमारी शामिल हैं।

इस संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से कभी संघ परिवार का कोई सदस्य नहीं चुना गया। यह संसदीय क्षेत्र पूरे बांका और भागलपुर जिले के एक हिस्से में फैला है। बांका के भीतर कम से कम दो निर्वाचन क्षेत्र माओवाद प्रभावित हैं। यह सीमांचल का हिस्सा है, यहां सबसे अधिक यादव जाति का मत है। करीब तीन लाख यादव वोटर हैं  मुसलमानों का भी वर्चस्व है करीब 2 लाख वोटर मुसलमानों के हैं,इसलिए अल्पसंख्यक वोट बांका में बड़ी भूमिका निभाते हैं। 

दैनिक भास्कर के स्टेट एडिटर ओम गौड़ बिहार के दूसरे चरणों के चुनाव पर लिखते हैं कि पांचों सीटों का राजनीतिक इतिहास यह रहा है कि यहां भाजपा बहुत प्रभावशाली नहीं रही। शाहनवाज हुसैन एक बार किशनगंज और एक बार भागलपुर से सांसद रहे हैं। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद शाहनवाज भागलपुर से हार गए थे। शायद यही वजह रही कि एनडीए के सीट बंटवारे में भाजपा ने ये पांचों सीटें जदयू को दे दी। मतलब  भाजपा दूसरे चरण में  चुनाव नहीं लड़ रही है, लेकिन वह जदयू के पक्ष में माहौल बना रही है। पार्टी के कई वरिष्ठ-संघनिष्ठ कार्यकर्ताओं  ने इन क्षेत्रों में डेरा डाल रखा है। पांचों सीटों पर लगभग मुकाबला सीधा है। जदयू के सामने सबसे बड़ा संकट बंटवारे में भाजपा के हिस्से वाली बांका, भागलपुर, कटिहार और पूर्णिया सीट है,जहां भाजपा का कैडर वोट आसानी से शिफ्ट होता नहीं दिख रहा। पार्टी यहां वोटों को पोलराइज करने का खतरा भी इसलिए मोल नहीं ले सकती, क्योंकि उसे दूसरी सीटों पर इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। 

 

यूपी का गणित जानने के लिए पढ़िए : चुनाव 2019; यूपी : दूसरे चरण में भी गठबंधन की तरफ़ झुकाव

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