NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चुनाव 2019; सीकर: राजनेता और किसान नेता के बीच मुक़ाबला
“जब हम किसानों की परेशानियों की बात करते हैं, तो हमें संसद में उन किसानों को पहुँचाने की ज़रूरत है जो किसानों का नेतृत्व करते हैं, और उन परेशानियों को ख़ुद झेलते हैं।"
दित्सा भट्टाचार्य, सत्यम् तिवारी
04 May 2019
चुनाव 2019; सीकर: राजनेता और किसान नेता के बीच मुक़ाबला

"इस सरकार के पास पूँजीपतियों के लिए पैसा है। अंबानी-अडानी के लिए पैसा है। लेकिन किसानों के लिए इनके पास कोई पैसा नहीं है। इसलिए अब किसानों को इनकी नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ज़रूरत है।" यह कहना है किसान नेता और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (सीपीएम) के सीकर, राजस्थान से प्रत्याशी अमराराम का।

अमराराम ने अपने नामांकन 15 अप्रैल के बाद अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत सीकर की मंडी से की थी। ये वही कृषि उपज मंडी है जहाँ किसान आंदोलन का इतिहास रहा है। इसी जगह पर अखिल भारतीय किसान सभा के नेता अमराराम के नेतृत्व में सितंबर 2017 में शेखावटी क्षेत्र के हजारों किसानों ने अपनी विभिन्न मांगें, जैसे फसल के गिरते दाम, क़र्ज़ा माफ़ी जैसी मांगों को लेकर 13 दिन का बड़ा आंदोलन किया था। किसानों ने बाज़ारों में, सरकारी दफ़्तरों में और सड़कों पर 13 दिन तक अपना विरोध जताया जिसके बाद उस समय की वसुंधरा राजे की सरकार को उनकी मांगों को मानने पर मजबूर होना पड़ा था। 

पिछले पाँच साल की बीजेपी सरकार की नीतियों ने देश भर में कई आंदोलनों को जन्म देने का काम किया है। और देश के हर क्षेत्र से किसान-मज़दूरों ने लगातार मोदी सरकार के विरोध में प्रदर्शन किया है और अपनी मांगों के लिए खुल कर आवाज़ उठाई है। बीजेपी सरकार ने जिस तरह से किसानों के मुद्दों को खुल कर नज़रअंदाज़ किया है और लगातार हो रही आत्महत्याओं पर उनकी चुप्पी की वजह से किसान लगातार एकजुट होते रहे हैं।

किसान आंदोलनों का एक बड़ा इतिहास राजस्थान में रहा है जहाँ सीकर, झुंझुनू और चुरू में पिछले बरसों में किसानों ने आंदोलन किए हैं। ऐसा ही एक आंदोलन इस साल की शुरुआत में फ़रवरी और मार्च में सीकर में हुआ था जहाँ प्याज़ उगाने वाले किसानों ने प्याज़ के गिरते दामों पर चुप्पी साधे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था। ये आंदोलन 9 दिन तक चला जिसके बाद सरकार ने किसानों को लिखित आश्वासन दिया। 

मोदी सरकार के 5 सालों में, देश भर में कृषि संकट लगातार बढ़ा है और विभिन्न क्षेत्रों के किसानों ने इसके विरोध में कई राज्यों में प्रदर्शन किया है। देश ने कई बड़े किसान आंदोलन देखे हैं चाहे वो नासिक का लॉन्ग मार्च हो, सीकर का आंदोलन हो, या तमिलनाडु के किसानों का जंतर-मंतर पर हुआ बड़े विरोध प्रदर्शन हो। इसके अलावा 2018 में नवंबर के अंत में दिल्ली में देशभर के किसानों का एक बड़ा जमावड़ा हुआ और रामलीला मैदान से संसद मार्ग तक अधिकार मार्च किया गया।

बीजेपी की सरकार ने अपनी नीतियों की वजह से लगातार किसानों की तरफ़ से कड़ा विरोध झेला है। इन विरोध प्रदर्शनों के बावजूद बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में किसानों की मुश्किलों को तरजीह देना ज़रूरी नहीं समझा है। 

किसानों की तमाम मुश्किलों में से एक है किसानों की आत्महत्या, जिनकी संख्या में लगातार वृद्धि हुई है। महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार में किसानों की आत्महत्या में दोगुनी वृद्धि हुई है। हालांकि 2016 के बाद से अब तक नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो ने किसानों की आत्महत्या की कोई रिपोर्ट जारी नहीं है। ग़ौरतलब है कि मोदी सरकार पर लगातार ऐसी रिपोर्ट ना जारी करने का इल्ज़ाम लगाया जा रहा है। 

पिछले 5 सालों में हुए किसान आंदोलनों को मद्दे-नज़र रखते हुए, हम बात कर रहे हैं कि इस समय संसद में किसान नेता की ज़रूरत क्यों है! हमने सीकर में किसान नेताओं और किसानों से बात की और ये जानने की कोशिश की कि किसानों के मुद्दों को संसद तक पहुँचाने में एक किसान नेता क्या किरदार अदा करेगा।

किसान नेता क्यों? 

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव, बादल सरोज ने कहा, “ पिछले 3-4 चुनावों को देखा जाए तो किसी भी पार्टी ने मज़दूर या किसान नेताओं को टिकट नहीं दिया है। एक समय था जब मज़दूर यूनियन के नेताओं को चुनावों में टिकट दिया  जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। वाम दलों के अलावा कोई भी पार्टी अब किसान नेताओं या मज़दूर नेताओं को चुनावों में टिकट नहीं देती है। जब हम कृषि संकट की बात करते हैं, तो हम ये देखते हैं कि जो वास्तविक में किसान हैं और किसानों की परेशानियों के बारे में जानते हैं, उन्हें इन बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों द्वारा शामिल नहीं किया जाता है। तो जब हम संसद में कृषि संकट के लिए एक महीने के सत्र की बात करते हैं, तो हमें ये देखना होगा कि क्या हमारे पास वो लोग संसद में मौजूद हैं जो किसानों की मुश्किलों को समझ सकते हैं? 

बादल सरोज ने आगे कहा, “जब हम किसानों की परेशानियों की बात करते हैं, तो हमें संसद में उन किसानों को पहुँचाने की ज़रूरत है जो किसानों का नेतृत्व करते हैं, और उन परेशानियों को ख़ुद झेलते हैं।" 

सीकर से सीपीआईएम के लोकसभा प्रत्याशी अमराराम के बारे में बादल सरोज ने कहा, “अमराराम ने किसानों के नेतृत्व में लगातार कृषि संकट पर सरकार को घेरा है, और हमेशा किसानों के अधिकारों के संघर्ष किया है। अमराराम को बख़ूबी पता है कि आज किसान की मुश्किलें क्या हैं, और इसी वजह से अमराराम को बाक़ी किसान नेताओं को संसद में जाना चाहिए ताकि वो किसानों के हित के मुद्दे संसद तक पहुँचा सकें।" 

58842388_2304530866270093_8574624313490014208_n_0.jpg

सीकर में अमराराम की आम सभा

राजस्थान के सीकर लोकसभा क्षेत्र में सीपीआईएम के अमराराम के अलावा कांग्रेस से सुभाष महारया प्रत्याशी हैं। सुभाष महारया पहले बीजेपी में थे और 2014 में जब बीजेपी ने सुमेधानंद सरस्वती को टिकट दिया था, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी और निर्दलीय चुनाव लड़े थे। 

बीजेपी से सीकर के प्रत्याशी सुमेधानंद सरस्वती हैं, जो मौजूदा सांसद भी हैं। 

देखने वाली बात ये है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों ने सीकर क्षेत्र में कई सालों से राज किया है लेकिन किसानों की दिक़्क़तें अभी भी ज्यों की त्यों हैं। इसलिए भी ये ज़रूरी हो जाता है कि सांसद में किसानों के हित की बात करने के लिए वो सांसद हो, जिसने इन परेशानियों को ख़ुद झेला है और क़रीब से देखा है। क्योंकि जिसने 'पूस की रात' देखी ही नहीं, जी ही नहीं, वो हलकू का दर्द क्या जानेगा! 

न्यूज़क्लिक से बात करते हुए जनवादी महिला समिति, जयपुर की पुष्पा ने कहा, “बाक़ी पार्टियों के प्रत्याशी चुनाव लड़ते हैं तो जीतने के लिए लड़ते हैं, राज करने के लिए लड़ते हैं। अगर नहीं जीत पाते तो क्षेत्र बादल लेते हैं, पार्टी बादल लेते हैं। लेकिन अमराराम ने हमेशा से सीकर में रह कर किसानों के हित के लिए आवाज़ उठाई है, काम किया है। उन्होंने हारने के बाद क्षेत्र को छोड़ा नहीं, और लगातार काम करते रहे हैं। अमराराम हमेशा किसानों के बीच रहते हैं और उनके लिए काम करते हैं, वो सिर्फ़ चुनाव के समय जनता के बीच नहीं जाते, वो जनता के बीच ही रहते हैं।" 

जब हम किसान नेता के जीतने की बात करते हैं तो एक बड़ा सवाल उठता है कि किसान नेता तो सिर्फ़ किसानों के लिए काम करेगा, और बाक़ी जनता उसे क्यों समर्थन देगी!

लेकिन जब हम किसानों के हितों की बात करते हैं तो दरअसल हम सारे देश के हित की बात करते हैं क्योंकि आज भी हमारी अर्थव्यवस्था का 70 प्रतिशत हिस्सा कृषि पर निर्भर है। किसान ख़ुद जब अपने हित की बात करता है, तो वो सारे देश की बात कर रहा होता है क्योंकि उसी की उगाई फसल से देश भर को अनाज मिलता है। 

हमने तमाम किसान आंदोलनों में देखा है, कि लोगों ने खुले तौर पर ये समझा है कि किसानों का संकट सिर्फ़ किसानों का नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक का संकट है। और विभिन्न क्षेत्र के लोगों ने लगातार किसानों के आंदोलन में अपना समर्थन ज़ाहिर भी किया है। चाहे वो सीकर का आंदोलन हो, जहाँ वकीलों, डॉक्टरों, शिक्षकों ने किसानों का समर्थन किया था। या फिर वो नासिक से मुंबई तक हुआ लॉन्ग मार्च हो, जहाँ उस मुंबई के लोगों ने जिनके बारे में ये कहा जाता है कि बगल में किसी की मौत भी हो जाये तो कोई पुछेगा नहीं, उन लोगों ने किसानों के लॉन्ग मार्च को समर्थन दिया था और देर रात को रास्ते में उनके लिए खाना-पानी, जूते-चप्पल ले कर सड़कों पर आ गए थे। 

सीकर की बात करें तो किसान नेता अमराराम को विभिन्न क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है। 3 मई को हुई रैली में जिग्नेश मेवानी, स्वरा भास्कर जैसे लोग अमराराम के समर्थन में चुनाव प्रचार करते देखे गए। 

58978311_1185296208308724_3635075975043088384_n.jpg

वहीं, 3 मई को नरेंद्र मोदी ने सीकर में एक रैली को संबोधित किया जहाँ वो किसानों के मुद्दों की बात ना कर के, आतंकवाद, सेना और सर्जिकल स्ट्राइक की बातें करते हुए देखे गए। नरेंद्र मोदी ने जनता ने 10 बार "भारत माता की जय" का नारा लगवाया और किसानों को भूलकर सिर्फ़ कांग्रेस पर निशाना साधा। 

सीकर में पांचवें चरण में 6 मई को मतदान होना है।

elections 2019
Lok Sabha Elections 2019
Elections in Rajasthan
sikar
Amra Ram
farmers struggle
agrarian crisis
Agrarian Issues
farmers suicide
Farmers Struggle in Rajasthan
Kisan Long March
Kisan Long March in Delhi
CPIM
Narendra modi
BJP
Vasundhara Raje
Modi government
Farmer in Parliament

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • नए शौचालय बनाने से पहले पुराने शौचालयों की कार्यक्षमता और सफ़ाई कर्मियों की दशा दुरुस्त करने की ज़रूरत
    मोहित यादव, आशुतोष रंगा
    नए शौचालय बनाने से पहले पुराने शौचालयों की कार्यक्षमता और सफ़ाई कर्मियों की दशा दुरुस्त करने की ज़रूरत
    05 Jul 2021
    नए सूखे शौचालय भारत में ख़राब स्वच्छता व्यवस्था के बुनियादी ढांचों और साफ-सुथरे शौचालयों की बदतर हालत का भी एक नतीजा हैं। 
  • कोरोना
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 39,796 नए मामले, 723 मरीज़ों की मौत
    05 Jul 2021
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 39,796 नए मामले दर्ज किए गए हैं। देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.57 फ़ीसदी यानी 4 लाख 82 हज़ार 71 हो गयी है।
  • खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    सुबोध वर्मा
    खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
    05 Jul 2021
    प्रोटीन के बुनियादी स्रोत जैसे मांस, अंडे, दालें आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गए हैं और रसोई गैस की क़ीमत की तरह खाना पकाने के तेल की क़ीमतों में भी बड़ा उछाल आया है। 
  • लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    न्यूज़क्लिक टीम
    लेखक को भविष्य की उम्मीद दिखानी चाहिए
    04 Jul 2021
    न्यूज़क्लिक की ख़ास पेशकश में वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक अजय सिंह ने उपन्यासकार-गद्यकार गीता हरिहरन से उनके उपन्यास I have become the tide के बहाने मौजूदा दौर पर विस्तृत बातचीत की। अजय सिंह ने…
  • Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    न्यूज़क्लिक टीम
    Economic Liberalisation: 30 साल में क्या बदला, क्या नहीं?
    04 Jul 2021
    'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस एपिसोड में वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन 1991 Economic Liberalisation की बात कर रहे है. क्या है इसका इतिहास और इसे क्यों लागू किया गया था, आइये जानते हैं
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License