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भारत
राजनीति
छद्मपूर्ण योजना: "आदर्श गाँव" के पाँच साल
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बढ़ते संकट और किसानों की परेशानियाँ दूर करने तथा सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं की ओर ध्यान देने की बजाये यह योजना “विकास” के मापदंड स्थापित करने में ज़्यादा रूचि दिखा रही हैI
योगेश एस.
16 Aug 2018
Translated by महेश कुमार
aadarsh gram yojna failure

संसद आदर्श ग्राम योजना (एसएजीवाई) उन पहली योजनाओं में से एक है, जिनकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को अपने पहले स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान की थी। इस योजना को 'डिजिटल इंडिया', 'मेक इन इंडिया' के साथ घोषित किया गया था, 'प्रधानमंत्री जन-धन योजना' उनकी तरह ही कागज़ों पर लिखे जादुई शब्द बनकर रह गयी है। इस योजना की शुरुआत 11 अक्टूबर, 2014 को हुईI  यह "ग्रामीण भारत की आत्मा को जीवित रखने" के उद्देश्य को पूरा करने का दावा करती है।

प्रधानमंत्री ने इस योजना को पेश करते कहा था, "...आज मैं आपके पास एक नए विचार के साथ आया हूँ। हम अपने देश में प्रधानमंत्री के नाम पर इतनी सारी योजनाएँ चला रहे हैं, विभिन्न नेताओं के नाम पर कई योजनाएँ हैं। लेकिन, आज मैं, एक संसद सदस्य होने के नाते, 'सांसद आधार ग्राम योजना' की घोषणा करने जा रहा हूँ।“ प्रधानमंत्री के "नया विचार" यह था कि एसएजीवाय के पहले चरण में संसद के सदस्य एक-एक गाँव गोद लें; दूसरे चरण में दो तथा तीसरे चरण में प्रत्येक सांसद तीन गाँवI इसके साथ ही एक गाँव को 2016 तक और 2019 तक पाँच को आदर्श गाँव बनाना था। इसका उद्देश्य लोगों को "गुणवत्तापूर्ण बुनियादी सुविधाएँ और अवसर" मुहैया करवाना था और ग्रामीण आबादी को "अपनी नियति को आकार देने" के लिए सक्षम करना था।

इस योजना ने अलग-अलग मंत्रालयों, विभागों और निजी क्षेत्र (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) के समर्थन के साथ राज्य सरकार की योजनाओं के साथ देश की योजनाओं की 21 शॉर्टलिस्ट वाली योजनाओं द्वारा सरकार नए कार्यान्वयन का वायदा किया था। सांसद योजना के कार्यान्वयन के लिए संसद लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम (एमपीएलडीएस) के तहत आवंटित धन का उपयोग सांसदों को करना था। इस योजना के कार्यान्वयन में आने से पहले, गाँव को अपनाने में संसद सदस्यों द्वारा दिखाए गए विचलन पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि यह योजना एक विफल योजना है।

चरण 1 में 703 सांसदों ने गाँव को अपनाया, जबकि 786 संसद सदस्यों में से केवल 466 ने द्वितीय चरण में गाँव की पहचान की और रिपोर्टों में कहा गया है कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों के 784 सांसदों में से 612 ने अभी तक तीसरे चरण के तहत एक भी गाँव की पहचान नहीं की है। 13 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के लोकसभा सदस्यों और 16 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के राज्यसभा सदस्यों ने तीसरे चरण में गाँव की पहचान नहीं की है। उत्तर प्रदेश (यूपी) में से 108 सांसदों (दोनों सदनों को मिलाकर) में से 56 प्रतिशत ने गाँव को नहीं अपनाया है। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र में 67 सांसदों में से 88 प्रतिशत ने गोद लेने के लिए गाँव की पहचान नहीं की है।

इस योजना के लिए केंद्र द्वारा आवंटित कोई भी फंड नहीं है और सांसदों द्वारा गोद लेने वाले गाँव में सभी 21 चल रही योजनाओं को लागू करने में एमपीएलडीएस धन का उपयोग करने की उम्मीद थी। उदाहरण के लिए, एमपीएलडीएस के आँकड़ों के अनुसार, भारत सरकार ने तमिलनाडु राज्य के लिए एमपीएलडीएस के रूप में जीओआई द्वारा 3,564.85 करोड़ रुपये जारी किए थे। राज्य के सांसदों को सभी 21 योजनाओं को लागू करने के लिए सीएसआर फंड के साथ इस पैसे का उपयोग करने की उम्मीद थी। यह एक असंभव कार्य है। यदि सांसदों ने गाँव की पहचान नहीं की है तो यह एक बुरी कहानी है और असफल कार्यान्वयन की कहानी और भी बद्दतर है।

कर्नाटक राज्य के मुख्य सचिव टी एम विजय भास्कर की अध्यक्षता वाली एक समीति ने राज्य में इस योजना के कार्यान्वयन की जाँच की। इस समीक्षा के निष्कर्ष बताते हैं कि इस योजना को राज्य में लागू करने में पूरी तरह नाकामयाब रहे है।

राज्य में सांसदों द्वारा तीन चरणों में 56 गाँव को अपनाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि अब 2018 है और इनमें से किसी भी गाँव को "आदर्श  गाँव" नहीं कहा जा सकता है। इस योजना के पहले चरण में 39 सांसदों ने 39 गाँव अपनाये थे और दूसरे चरण में 16 सांसदों ने अपनाया था। हालांकि इन गांवों के लिए  कोई भी गाँव विकास योजना (वीडीपी) नहीं है जो योजना को लागू करने के शुरुआती कदमों में से एक है। चरण III में निर्मला सीतारमण ने एक गाँव अपनाया है और 50 वीडीपी लागू करने का फैसला किया है और रिपोर्ट में कहा गया है कि उनमें से कोई भी लागू नहीं हुआ है। राज्य के पूर्व सांसद कुख्यात विजय माल्या, जो मनी लॉंडरिंग के आरोपों के कारण लापता हैं, ने एक गाँव अपनाया था और 69 वीडीपी प्रस्तावित किए थे और जिनमें से 55 को पूरा कर लिया गया है। इस गाँव को छोड़कर, अन्य गोद लेने वाले गांवों में से कोई भी प्रगति नहीं देखी गई है।

एक बेकार योजना

महात्मा गांधी के "स्वराज टू सु-राज" (सुशासन के लिए आत्म शासन) और "आदर्श गाँव" की अवधारणा के विचार के आधार पर इस योजना ने कुल 6,40,930 गांवों मैं से पाँच आदर्श गाँव बनाने की ज़िम्मेदारी रखी (2001 की जनगणना के अनुसार , भारत में कुल 6,40, 930 निवासित गाँव थे और 2011 की जनगणना में कहा गया है कि यह 5,97,464 भारत में कुल  गाँव हैं)। पहले चरण में 5 लाख 5 लाख मैं से कुल 786 गाँव अपनाने थे, और चरण II में 1,572 गांवों को अपनाया जाना था। इस प्रकार यह योजना संख्या और लागू करने की गति के आधार पर, बेतुकी और केवल प्रतीकात्मक है।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा था, "यदि हम भारत के प्रत्येक जिले में एक आदर्श  गाँव प्रदान करते हैं तो आसपास के गांवों को स्वचालित रूप से उस आदर्श  का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाएगा।" आदर्श  ग्राम "बनाने का विचार और 5 लाख गांवों की को प्रेरित करने की उम्मीद और विकास के आदर्श  दोहराएं जाने का सपना कई आधारो पर दोषपूर्ण है। सबसे पहले, गांवों को "विकास" की ज़िम्मेदारी लेने की उम्मीद से सरकार अपने कर्तव्यों से दूर भागना चाहती है; दूसरा यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और इसकी समस्याओं के प्रति उसका  दृष्टिकोण दिखाता है, जो समुदायों को उनकी समस्याओं के लिए उन्हें ही दोषी ठहराता है; तीसरा, प्रधानमंत्री ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित करने के लिए आदर्श  ग्राम बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा था, "अगर हमें एक राष्ट्र बनाना है, तो हमें गाँव से शुरू करना चाहिए। आदर्श  ग्राम बनाएं। "हालांकि उनकी सरकार की नीतियों ने देश में ग्रामीण विकास की समर्थित संरचनाओं को तोड़ दिया। सरकार मनरेगा के कानूनी और वित्तीय ढांचे को कमजोर कर रही है और भूमि अधिग्रहण अधिनियम के प्रावधानों को कमजोर कर रही है और ग्रामीण विकास में बड़े बजट कटौती को एसएजीवाई को बढ़ावा देने में निवेश किया गया है जो एक प्रतीकात्मक योजना से परे कुछ भी नहीं है। इस प्रकार यह "आदर्श  गाँव" का नारा एक प्लेकार्ड बनके रह गया है, जब भी ग्रामीण इलाकों की उपेक्षा करने के लिए आलोचना की सरकार की जाती है तो वह यह प्लेकार्ड दिखाने लगती है।

उन लोगों के लिए योजना जिनके भाग्य के साथ हमेशा सत्ता के गलियारों में सरकारों द्वारा जब भी खेला जाता है, तो सरकार राष्ट्रीय गौरव, देशभक्ति, सामुदायिक भावना, आत्मविश्वास और विकासशील बुनियादी ढांचे के मूल्यों को पोषित करने के बारे में बात करता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बढ़ते संकट के बीच देश में किसानों की परेशानियों को दूर नहीं किया गया है, यह योजना प्रचलित सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने के "विकास" को मापने के लिए नैतिक पैमाने को स्थापित करने में अधिक रुचि रखती है।इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षकों और बुनियादी ढांचे के बिना स्कूल चलते है, कर्मचारियों और दवाओं के बिना अस्पताल, पानी और बिजली के बिना गाँव हैं, मनरेगा के लिए कोई धन नहीं है, अवैतनिक आईएई किस्त जमा नहीं कीजाती है, सरकार की इसके प्रतिकोई जवाबदेही नहीं है, कोई शिकायत निवारण केंद्र नहीं है, और जाति / लिंग का निरंतर संकट जारी है, आदर्श ग्राम के भव्य प्रदर्शन के लिए / सामाजिक-आर्थिक उत्पीड़न अलग से जारी हैं।

अंत में अपने पहले स्वतंत्रता दिवस में पीएम ने भाषण दिया कि एसएजीवाई का लक्ष्य क्या है और इसके कार्यान्वयन पर कहा कि, "क्या हम कम से कम ऐसा नहीं कर सकते? क्या हमें यह नहीं करना चाहिए? " यही योजना के कार्यान्वयन और विफलता की समीक्षा और रिपोर्टों का उत्तर है।

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कृषि संकट

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