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चिप युद्ध : क्या अमेरिका वास्तव में चीन को पछाड़ सकता है
शोध के लिए कम पैसा होने का मतलब अंतत: इस क्षेत्र में अमरीका की बढ़त का ही खत्म होना होगा क्योंकि दूसरे देशों के विपरीत, अमरीका बढ़ते पैमाने पर चिपों या मशीनों के उत्पादन से पीछे हटता गया है।
प्रबीर पुरकायस्थ
30 Aug 2021
Translated by राजेंद्र शर्मा
चिप युद्ध : क्या अमेरिका वास्तव में चीन को पछाड़ सकता है

अब जबकि अमरीका ने चीन के खिलाफ प्रौद्योगिकी संबंधी पाबंदियां लगा दी हैं, विश्व इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। इन पाबंदियों के बाद, हुआवे मोबाइल फोन आपूर्तिकर्ता के रूप में अपने पहले स्थान (2020 की दूसरी तिमाही) से फिसल कर, इस समय सातवें स्थान पर आ गयी है। इस गिरावट पर टिप्पणी करते हुए हुआवे के चेयरमैन ने कहा कि फिलहाल हुआवे की लड़ाई अपना अस्तित्व बचाने की है। लेकिन, इस लिहाज से देखा जाए तो हुआवे सिर्फ बची हुई ही नहीं है, ठीक-ठाक तंदुरुस्त भी है। वह अब भी दूरसंचार उपकरणों के बाजार में दुनिया के स्तर पर सबसे आगे है और इस बाजार में उसका हिस्सा 31 फीसद है, जो कि उसके निकटतम प्रतिद्वंद्वियों, नोकिया और एरिक्सन से दोगुना है। हुआवे ने 2021 के पहले छ: महीने में ही करीब 50 अरब डालर का मुनाफा दर्ज कराया है। बहरहाल, सवाल यह है कि अगर चीन, चिपों के निर्माण और डिजाइन टैक्रोलाजियों के मामले में, दूसरों के मुकाबले की स्थिति में नहीं आता है, तो क्या हुआवे इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग में अपनी हैसियत बनाए रख पाएगा?

ऐसा भी नहीं है कि इससेे सिर्फ चीनी कंपनियों को ही मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा हो। अमरीका और चीन के बीच चिप युद्ध  के तेज होने का असर, इलैक्ट्रोनिक चिप की विश्व सप्लाई चेन पर पड़ा है और चिपों की तंगी पैदा हो गयी है। याद रहे कि सेमीकंडक्टर चिपों का उपयोग करीब-करीब सभी आधुनिक उत्पादों में होता है, जिसमें सामान्य घरेलू उपकरणों—माइक्रोवेव ओवन व टोस्टरों—से लेकर, इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग के सबसे उन्नत उत्पादों तक आते हैं। मिसाल के तौर पर आज कार उद्योग की सबसे बड़ी सीमा चिपों की यह तंगी ही है जिसकी वजह से कारों के उत्पादन पर काफी मार पड़ी है। अगर चिपों का यह युद्ध जारी रहता है तो चिपों की तंगी के इस संकट का असर अन्य उद्योगों पर भी दिखाई देने लगेगा।

तो क्या सेमीकंडक्टर उद्योग का यह संकट, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के छिन्न-भिन्न होने के पूर्व-संकेत हैं? क्या यह दो युद्धरत गुटों की ओर ले जाएगा, जिसमें एक ध्रुव पर अमरीका होगा और दूसरे पर चीन? क्या आपूर्ति शृंखलाओं की इस भंगुरता के साथ, हम वैश्वीकरण के प्रतिमान के अंत की ओर बढ़ रहे हैं?

चिप निर्माण और इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग, सबसे पूंजी सघन तथा शोध व विकास (आर एंड डी) सघन उद्योग हैं। किसी भी अन्य उद्योग का ऐसा चरित्र नहीं है। मिसाल के तौर पर बिजली और इस्पात के संयंत्र, पूंजी सघन होते हैं, जबकि दवा उद्योग शोध व विकास सघन होता है। लेकिन, पूंजी और शोध व विकास, दोनों की ऐसी सघनता और किसी उद्योग मेें नहीं होती है। एएसएमएल नाम की एक अनजानी सी डच कंपनी है, जो चिपों के निर्माण के लिए लिथोग्राफिक मशीनें बनाती है। इस कंपनी का मार्केट कैपीटलाइजेशन, फोक्सवैगन से ज्यादा है, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता है। इसकी वजह यह है कि इस कंपनी की मशीनों पर भारी शोध व विकास लागत आती है। वास्तव में एएसएमएल ऐसी इकलौती उपकरण निर्माता कंपनी है, जो सबसे उन्नत किस्म की चिपों को बनाने के लिए जरूरी मशीन मुहैया करा सकती है। आज नयी पीढ़ी की चिपें बनाने के लिए एक नयी निर्माण सुविधा खड़ी करने पर 20 अरब डालर खर्च होते हैं यानी एक विमान वाहक पोत या नाभिकीय संयंत्र खड़ा करने से भी ज्यादा। ताइवान में टीएसएमसी और सेमसंग ही इलैक्ट्रोनिक्स उद्योग में उपयोग में आने वाली सबसे उन्नत चिपें बनाने में समर्थ हैं।

अमरीका और चीन के बीच आर्टिफीशिअल इंटैलीजेंस, कंप्यूटर, मोबाइल नैटवर्क तथा फोन जैसे क्षेत्रों में होड़ है। लेकिन, इन सभी उद्योगों को खड़ा किया जाता है सेमीकंडक्टर चिपों के आधार पर। किसी चिप में जितनी सर्किटरी भरी जा सकती है, उतनी ही ज्यादा उसकी कंप्यूटिंग की शक्ति होगी। इसका ज्यादातर बाजार अब भी पुरानी चिप निर्माण सुविधाओं पर ही चल रहा है, जिनमें 180 से 28 एनएम तक की ही प्रौद्योगिकियों का उपयोग होता है। सबसे उन्नत चिपों का हिस्सा 2 फीसद ही होता है, जिनमें 10 एनएम से कम के स्तर की प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जाता है। ये चिपें सिर्फ टीएसएमसी तथा सेमसंग बना सकती हैं। वैसे तो चीन की चिप निर्माता एसएमआइसी भी जो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी चिप निर्माता है, 14 एनएम के स्तर तक पहुंच चुकी है। हाल ही में उसने 28 एनएम से 14 एनएम तक का सफर तया किया है। चीनी सरकार की मदद से, यह ऐसी उत्पादन लाइनों में निवेश कर रही है, जो 14 एनएम के स्तर से भी आगे जा सकती हैं। दूसरी ओर इंटैल, जो एक जमाने में चिप निर्माण के क्षेत्र में दुनिया भर में सबसे आगे थी, 14 एनएम के स्तर पर ही अटकी हुई है, हालांकि उसके भी मंसूबे अगली पीढ़ी के चिपों के उत्पादन की क्षमताओं का निर्माण करने के हैं।

अमरीका ने इलैक्ट्रोनिक्स/ सेमीकंडक्टर उद्योग को चीन के साथ अपनी भूरणनीतिक होड़ का मैदान बनाने के लिए चुना है। उसको लगता है कि इस मैदान में उसे प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काफी बढ़त हासिल है और बाजार का बड़ा हिस्सा उसके पास है। चीन इस मैदान में देर से उतरा है और हालांकि उसके पास बाजार का तुलनीय हिस्सा है, फिर भी वह अब भी कुछ ऐसी केंद्रीय महत्व की प्रौद्योगिकियों पर निर्भर है, जिनका नियंत्रण अमरीका और उसके यूरोपीय सहयोगियों तथा जापान व दक्षिण कोरिया के हाथों में है। इसीलिए, अमरीका ने अपनी पाबंदियों के निशाने के तौर पर चीन की दो प्रमुख कंपनियों, हुआवे और सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग इंटरनेशनल कार्पोरेशन (एसएमआइसी) को चुना है।

अमरीका, हुआवे तथा एसएमआइसी पर अपनी पाबंदियों से आगे बढ़ते हुए इसकी योजना पर चल रहा है कि वह जिन प्रौद्योगिकियों को ‘‘फाउंडेशनल टैक्रोलॉजी’’ कहता है, उनमें चीन के प्रवेश को ही अपने 2018 के निर्यात नियंत्रण कानून के अंतर्गत प्रतिबंधित कर दे। इसके लिए अमरीका जिस दलील का सहारा ले रहा है, बहुत सरल है। दलील यह है कि उन्नत चिपों के निर्माण के लिए बहुत ही जरूरी कुछ प्रौद्योगिकियों के मामले में हम चीन से आगे हैं। अब अगर हमें अपनी इस बढ़त को बनाए रखना है तो, हमारा इतना करना ही काफी होगा कि चीन को इन प्रौद्योगिकियों तक पहुंच ही हासिल नहीं होने दें। हम ऐसा करते हैं तो यह भविष्य में भी हमारी बढ़त बनी रहना सुनिश्चित करेगा और इस क्षेत्र में अमरीका का हावी रहना सुनिश्चित करेगा।

पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि चिपों को फाऊंडेशनल प्रौद्योगिकी माना जाना चाहिए और उनके मामले में अमरीका की पाबंदी वैध है। इसी तर्क से अमरीका ने हुआवे के दुनिया की सबसे बड़ी चिप निर्माता, ताइवान की टीएसएमसी से 7एनएम के स्तर की आधुनिकतम चिप खरीदने पर, रोक लगा दी थी।

इस पाबंदी के बाद एसएमआइसी ने 7एनएम के स्तर की चिपों के निर्माण के लिए अपनी ही उत्सादन लाइन कायम करने की कोशिश की। लेकिन, इसके लिए उसे डच कंपनी एएसएमएल से एक्स्ट्रीम अल्ट्रावोइलेट लिथोग्राफी (ईयूवी) मशीनों के आयात की जरूरत थी। ऐसी हरेक मशीन 12 से 15 करोड़ डालर की पडनी थी। लेकिन, हालांकि ये ईयूवी मशीनें नीदरलैंड्स से मंगायी जानी थीं, उनमें इस कंपनी की एक अमरीकी सब्सीडियरी द्वारा निर्मित सॉफ्टवेयर का उपयोग हो रहा था और इसलिए इन मशीनों के आयात पर अमरीकी पाबंदियां लागू होती थीं।

इन अमरीका पाबंदियों का मतलब यह था कि एएसएमएल, चीन को ईयूवी लिथोग्राफी मशीनें नहीं बेच सकती है, जबकि वह चीन को इससे कम क्षमता की चिपों के उत्पादन के लिए दूसरी लिथोग्राफिक मशीनें बेच सकती है। मकसद यह कि चीन को सबसे उन्नत, 10 एनएम से कम की प्रौद्योगिकी के दायरे से बाहर और तरह इस क्षेत्र के बाजार अगुओं से एक-दो पीढ़ी पीछे बनाए रखा जाए।

यह हमें इस सवाल पर ले आता है कि आखिर फाउंडेशनल प्रौद्योगिकी किसे कहेंगे? साफ है कि इलैक्ट्रोनिक्स की मुख्य चालक होने के बावजूद, चिप्स उस हद तक फाउंडेशन नहीं मानी जा सकती हैं, जिस हद तक उन मशीनों को माना जाएगा, जो इन चिपों को बनाती हैं। अगर किसी को प्रौद्योगिकी के शिखर पर पहुंचना है, तो उसे न सिर्फ चिप उत्पादन की प्रौद्योगिकी पर महारत हासिल करनी होगी बल्कि उन मशीनों को बनाने वाली प्रौद्योगिकी पर भी महारत हासिल करनी होगी, जिनसे उत्पादन लाइनें चलती हैं। इसीलिए, एएसएमएल की लिथोग्राफिक मशीनें चीन के लिए संकरी मोरी बन गयी हैं।

और मशीनों तथा चिपों के उत्पादन की अति-महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में प्रगति को संचालित क्या चीज करती है? जैसा कि मार्क्सवादी जानते ही हैं, ज्ञान ही है जो उत्पादक शक्तियों को और इस खास मामले में चिप डिजाइन को संचालित करता है। यह ज्ञान मूर्त रूप लेता है सॉफ्टवेयर डिजाइन के उपकरणों मेें और इससे जुड़ी लिथोग्राफी मशीनों में। जाहिर है कि यह क्षेत्र बहुत ही ज्ञान सघन है और इसके लिए बहुत उच्च विशेषज्ञता कौशल से संपन्न श्रम की जरूरत होती है।

अमरीका और उसके विश्वविद्यालय अब भी उस ज्ञान के विकास के मुख्य स्रोत बने हुए हैं, जो इस क्षेत्र में प्रगति की कुंजी है। लेकिन, यहां उसकी एक दीर्घावधि समस्या भी आती है। अमरीकी विश्वविद्यालयों के शोध कार्यक्रम मुख्यत: विदेशी छात्रों के भरोसे चल रहे हैं, जिनमें से ज्यादातर चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों से हैं। बेशक, इनमें से बड़ी संख्या में उच्च-प्रशिक्षित लोग अमरीका में ही रह जाते हैं और वह ज्ञान शक्ति मुहैया कराते हैं, जिसकी जरूरत ज्ञान के क्षेत्र में उस प्रगति के लिए पड़ती है, जो आज अमरीका ने हासिल कर रखी है।

इसे देखते हुए, अगर मिसाल के तौर पर चीनी छात्रों तथा शोधार्थियों के लिए अमरीका अपने दरवाजे मूंदता है, तो उसके ज्ञान के विकास का यह स्रोत कमजोर हो जाएगा। दुर्भाग्य से भारत जैसे देशों ने ऐसी उच्च गुणवत्ता की शिक्षा तथा शोध प्रयोगशालाओं में समुचित निवेश किया ही नहीं है, जिसके चलते वह अमरीकी विश्वविद्यालयों में पहुंचने वाले चीनी छात्रों के प्रवाह की जगह नहीं भर सकता है। दूसरी ओर, चीन ने अपने विश्वविद्यालयों तथा शोध संस्थाओं में भारी निवेश किये हैं और विज्ञान व प्रौद्योगिकी की क्षेत्र में वहां से निकलने वाली पीएचडियों की संख्या ने, अमरीका को भी पीछे छोड़ दिया है। वह, विश्वविद्यालयों/ शोध संस्थाओं से उद्योग तक, नयी खोजों की एक प्रबल पाइप लाइन का भी निर्माण कर रहा है।

वास्तव में अमरीकी सेमीकंडक्टर उद्योग को चिंता इसकी है कि चीन ही तो अब तक अमरीका के चिप डिजाइन सॉफ्टवेयर का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ था। बेशक, अमरीकी कंपनियां उन्नततम चिप भी डिजाइन करती हैं, जिनका उत्पादन ताइवान में होता है। संक्षेप में यह कि इतना तो तय है कि अमरीका द्वारा लगायी गयी पाबंदियों से उन्नत चिप उत्पादन और ऐसे चिपों पर आधारित इलैक्ट्रोनिक उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में चीन पर चोट पड़ेगी। लेकिन, इस चक्कर में अमरीकी कंपनियां भी तो अपने राजस्व का खासा बड़ा हिस्सा गंवा देंगी, जो वे अब तक डिजाइन उपकरणों की चीनी बाजार में बिक्री से कमाती आयी थीं। इसका मतलब यह भी है कि उन्नततम चिपों से मिलने वाले उस राजस्व में भी गिरावट आयेगी, जो क्वालकॉम तथा न्विडिया जैसी अमरीकी कंपनियां डिजाइन करती हैं और टीएसएमसी द्वारा ताइवान में जिनका उत्पादन किया जाता है।

अमरीकी उच्च प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिए इस नुकसान का मतलब है शोध तथा विकास में लगाने के लिए पैसा घटना और यह धीरे-धीरे संबंधित क्षेत्र में ज्ञान के विश्व गढ़ के रूप में अमरीका की हैसियत को कमजोर करेगा। इसलिए, अगर अमरीकी कंपनियां अपना चीनी बाजार खो देती हैं और इस तरह अपने राजस्व का अच्छा-खासा हिस्सा गंवा देती हैं, तो इससे भविष्य में प्रतिस्पद्र्घा की उनकी क्षमता भी गंभीर रूप से कम हो जाएगी। इस तरह, फौरी तौर पर तो उन्हें कुछ फायदा हो सकता है, जैसे कि हुआवे के स्मार्टफोन के क्षेत्र में अपनी अव्वल नंबर की हैसियत गंवाने से हुआ है, लेकिन दीर्घावधि में इससे उनके अपने राजस्व की हानि का अर्थ यह होगा कि ज्ञान पैदा करने की ही उनकी क्षमता घट जाएगी, जिसके बल पर अमरीका को प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बाकी सब से बढ़त हासिल है। 

शोध के लिए कम पैसा होने का मतलब अंतत: इस क्षेत्र में अमरीका की बढ़त का ही खत्म होना होगा क्योंकि दूसरे देशों के विपरीत, अमरीका बढ़ते पैमाने पर चिपों या मशीनों के उत्पादन से हटता गया है और दोनों में ही लगने वाले ज्ञान के मामले में भी आगे बना रहा है।

इसीलिए, अमरीकी वाणिज्य विभाग को दिए गए एक के बाद एक ज्ञापनों में, अमरीकी सेमीकंडक्टर उद्योग ने ठीक यही दलील दी है कि चीनी बाजार से नाता तोड़ना (डीलिंकिंग), उनके लिए भारी राजस्व हानि का कारण बनेगा और अंतत: इलैक्ट्रोनिक्स के क्षेत्र में अमरीका अपनी अग्रणी हैसियत ही गंवा देगा। अमरीकी पाबंदियों के चलते चीनी कंपनियों ने अमरीका द्वारा डिजाइन किए गए कंपोनेंटों को अपनी उत्पादन लाइनों से बाहर करना शुरू भी कर दिया है। इसलिए, अमरीका पाबंदियों की चोट सिर्फ हुआवे तथा अन्य चीनी आपूर्तिकर्ताओं पर ही नहीं पड़ी है, बल्कि अब तक उनकी आपूर्तिकर्ता रहीं खुद अमरीकी कंपनियों पर भी इसकी चोट पड़ी है।

और सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में चीन कब तक अमरीका और उसके सहयोगियों की बढ़त को खत्म कर सकता है? एनालिसिस मेसन नाम की अग्रणी कंसल्टिंग कंपनी ने अपनी 21 मई की रिपोर्ट में कहा है कि चीन, तीन-चार साल में ही सेमीकंडक्टरों के मामले में स्वनिर्भरता हासिल कर लेगा। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप तथा सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री एसोसिएशन ने, चीन की वैश्विक आपूर्ति शृंखला के भंग किए जाने और अमरीका द्वारा अपनी आपूर्ति शृंखला तथा बाजारों के अलग किए जाने के असर का मॉडल तैयार किया है। इसमें यह भविष्यवाणी की गयी है कि इस तरह की नीति से अमरीका, अपनी बढ़त चीन के हाथों में गंवा देगा। अमरीकी वाणिज्य विभाग के सामने सेमीकंडक्टर उद्योग के प्रतिवेदन में कहा गया है कि अमरीका के  अपनी बढ़त बनाए रहने का एक ही तरीका है कि वह चीन के लिए सैन्य क्षेत्र को छोडक़र, निर्यातों की इजाजत दे दे और इस बिक्री से आने वाले मुनाफों का इस्तेमाल, प्रौद्योगिकियों की नयी पीढ़ी के विकास के लिए किया जाए। जाहिर है कि प्रौद्योगिकियों की नयी पीढ़ी की यह विकास, अमरीकी सरकार द्वारा तगड़ी सब्सीडियां दिए जाने के सहारे ही होना है!

और सेमीकंडक्टर विनिर्माण के मामले में भारत कहां खड़ा है? भारत की सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विनिर्माण की गाड़ी तो तभी छूट गयी थी, जब मोहाली स्थित सेमीकंडक्टर काम्प्लैक्स के 1989 में आग में नष्ट होने के बाद, उसका दोबारा निर्माण नहीं करने का फैसला लिया गया था। तत्कालीन नीति निर्माताओं ने तय किया था कि भारत को सॉफ्टवेयर तथा सिस्टम्स के क्षेत्र में ही अपनी सामथ्र्य के आधार पर आगे बढऩा चाहिए और चिपों के निर्माण की परवाह नहीं करनी चाहिए। मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन फॉर इन्फार्मेशन टैक्रोलाजी (एमएआइटी) के एक्जिक्यूटिव डाइरेक्टर रहे, विनी मेहता ने अब से दस साल पहले मिंट से कहा था कि, ‘सिलिकॉन (टैक्रोलॉजी) के बिना कोई राष्ट्र तो ऐसे ही है जैसे बिना दिल के इंसान।’ वह दिल अब भी भारतीय प्रौद्योगिकी पर्यावरण से गायब ही है।

अमरीका अगर विश्व में अग्रणी बना रहना चाहता है, तो उसे भविष्य की प्रौद्योगिकी के लिए ज्ञान उत्पादन में निवेश के मामले में चीन का मुकाबला करने की जरूरत है। लेकिन, तब अमरीका अपनी बढ़त बनाए रखने के लिए चीन के खिलाफ पाबंदियां लगाने का रास्ता क्यों अपना रहा है? क्योंकि पाबंदियां लागू करना आसान होता है जबकि ज्ञान की कद्र करने वाले समाज का निर्माण करना मुश्किल होता है। यही तो पिछैते पूंजीवाद का संकट है।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें:-

Chip War: Can US Really Gain from China's Pain?

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