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भारत
राजनीति
कोरोना वायरस: भारत में आकस्मिक लॉकडाउन; लेकिन क्या यह पर्याप्त है?
ग़रीब परिवार कैसे जी पायेगा, और स्वास्थ्य व्यवस्था कैसे चल पायेगी, इस बारे में किसी तरह के कोई विचार किये बिना, यह लॉकडाउन इस महामारी की कड़ी को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है।
सुबोध वर्मा
25 Mar 2020
कोरोना वायरस

24 मार्च की रात 8 बजे राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने नाटकीय घोषणा करते हुए कहा कि पूरे देश को 21 दिनों के लिए लॉकडाउन के तहत रखा जायेगा, और यह लॉकडाउन 24-25 मार्च की आधी रात से शुरू होगा। उनका कहना था कि इस वायरस को हराने का यही एकमात्र तरीक़ा है, जिसके कारण दुनिया भर में जानलेवा महामारी COVID-19 फैल रही है और इससे 17 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं और दुनिया भर में अबतक इससे लगभग 4 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। भारत में, 562 पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं और 10 लोगों की मौत हो चुकी है।

प्रधानमंत्री की इस घोषणा को इस तथ्य के संदर्भ में देखे जाने की ज़रूरत है कि भारत में (37 में से) 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पहले से ही लॉकडाउन के तहत हैं। जिस पहल को पहले से ही राज्य द्वारा शुरू किया जा चुका है,उसे प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार द्वारा समर्थन मिलते देख शायद इससे कुछ और गंभीरता आयेगी, या पहले से ही चल रहे लॉकडाउन की स्थिति में और संवेदनशीलता आयेगी। मुमकिन है कि लोग इसे अधिक गंभीरता से लें। मगर,इसका फ़ैसला आने वाला समय करेगा।

प्रधानमंत्री ने कहा है कि दूसरे देशों के अनुभव और विशेषज्ञों की राय ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि केवल लॉकडाउन के ज़रिये ही कोरोना वायरस को रोका जा सकता है। हालांकि,उन्होंने इस लॉकडाउन को लागू करने के तरीक़े के बारे में कोई विवरण नहीं दिया, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी विस्तृत दिशानिर्देशों में इसे बाद में स्पष्ट कर दिया गया। संक्षेप में, लॉकडाउन से रक्षा कर्मचारियों, अस्पतालों, राशन एवं खाद्य भंडार, ईंधन आपूर्ति श्रृंखला आदि को छूट दी गयी है। कहा गया है कि उल्लंघन किये जाने पर आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, और भारतीय दंड संहिता की धारा 188 (लोक सेवक द्वारा विधिवत आदेश की अवज्ञा) के तहत कार्रवाई होगी।  इसे प्रत्येक ज़िले के ज़िला मजिस्ट्रेटों द्वारा नियुक्त आकस्मिक कमांडरों (Incident Commanders) द्वारा संभवतः इस समय के पुलिस का उपयोग करते हुए लागू किया जायेगा।

प्रधानमंत्री ने भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को मज़बूत करने और स्वास्थ्य कर्मियों के लिए ऐसे आवश्यक महामारी से लड़ने वाले वेंटिलेटर, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) जैसे उपकरणों लिए अपेक्षाकृत देर से आवंटित की जाने वाली 15,000 करोड़ रुपये की राशि की भी घोषणा की है। दरअसल, सरकार पिछले कुछ दिनों से इस मुद्दे पर आगे बढ़ रही थी, ताकि निर्माताओं से विभिन्न वस्तुओं का ऑर्डर लिया जा सके। इसलिए,चिंतित भारतीयों को आश्वस्त करने के अलावे इसमें कुछ भी नया नहीं है।

बल्कि,यहां कुछ और भी अधिक गंभीर मुद्दे हैं। अगर आप इस पर एक पल के लिए भी विचार करते हैं, तो इनमें से दो मुद्दे साफ़-साफ़ नज़र आते हैं;

•  एक तो यह कि ग्रामीण इलाक़ों,दूर दराज़ तक फैले खेत-खलिहानों जैसे आंतरिक भागों और शहरी भारत की मलिन बस्तियों में इस लॉक डाउन को पूरी तरह क्या लागू किया जा सकता है ? और अगर लागू किया जा सकता है,तो कैसे ?

• और दूसरी बात यह कि क्या इससे कोरोना वायरस का फैलाव या संचरण रोका जा सकेगा और इस तरह भारत को एक आसन्न तबाही से क्या बचाया जा सकता है?

लॉकडाउन कैसे करें:

भारत के खचाचख भरे हुए घनी आबादी वाले शहरों में लगभग 40% या इससे भी अधिक लोग बहुत आस-पास रहते हैं। वे अक्सर शौचालय और सामुदायिक पेयजल सुविधाओं को आपस में साझा करते हैं, चाहे वह कुएं हों या नल या हैंडपंप ही क्यों न हो। इन इलाक़ों में एकांत होना एक दुर्लभ बात है, और जीवन का लगभग हर पहलू एक दूसरे के साथ जुड़ा हुआ होता है। लोग गर्मियों में सड़कों पर सोते हैं, स्थानीय दुकानों या सड़कों पर जमघट लगाते, यहां रहने वाले लोग अपना सारा समय दूसरों के साथ ही बिताते हैं।

यह महज़ जीवंत दोस्ताना सामुदायिक भावना नहीं है; यह उनकी ज़रूरत भी है। क्या इस बारे में किसी तरह का विचार किया गया है कि ये परिवार, जिनकी संख्या लाखों में हैं, सामाजिक दूरी और लॉकडाउन का पालन किस तरह कर पायेंगे? ऐसा लगता है प्रधानमंत्री के सम्बोधन में इनके लिए कोई जगह थी?, यह तो ऐसा लगता है कि जैसे मध्यम वर्ग को संबोधित किया जा रहा था।

यही बात ग्रामीण इलाक़ों पर भी लागू होती है। वहां, न सिर्फ़ बंधा हुआ जीवन है और दूसरों के साथ घुली-मिली ज़िंदगी है, बल्कि कृषि कार्य भी सामूहिक ही होता है। सही बात तो यह है कि गेहूं, सरसों, अरहर (तूर) आदि की खड़ी फ़सलों की कटाई अभी-अभी शुरू ही होने वाली है, ऐसे में किसानों को क्या करना चाहिए? क्या उनसे यह उम्मीद की जाये कि वे अपने खेतों से फ़सल की कटाई अकेले-अकेले ही कर लेंगे, और फिर इसके बाद क्या? अपने घरों में बिना कुटाई-पिसाई वाली फ़सल को स्टोर कर लेंगे?

प्रशासन इसे लागू करने के लिहाज से एक प्रशासनिक मसले के रूप में देखेगा। और इस मसले को वह ताक़त के दम पर इस रूप में हल करने की कोशिश करेगा, जैसे कि यह केवल क़ानून और व्यवस्था का मुद्दा है। सवाल है कि सही मायने में यह मुमकिन कैसा होगा?

किसी को कुछ भी नहीं पता है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस सबको उस नौकरशाहों के कसे जाने वाले नट और बोल्ट के हवाले कर दिया है, जो गृह मंत्री, अमित शाह द्वारा निर्देशित है। लेकिन, जब यह निर्देश ग्रामीण बिहार या यूपी, या कर्नाटक या असम तक पहुंचेगा और जब स्थानीय ज़मींदार द्वारा फ़सल काटने के लिए लगाये गये मज़दूरों के एक समूह को खेतों में कार्य करते हुए देखा जायेगा, तो स्थानीय आकस्मिक कमांडर इसे लेकर किस तरह का जवाबी कार्रवाई करेगा? और अगर ऐसा बड़े पैमाने पर होता है, तो सवाल है कि COVID-19 संक्रमण की श्रृंखला कैसे टूट पायेगी?

महज़ लॉकडाउन से COVID -19 हार पायेगा?

दूसरा अहम सवाल तो यह भी है कि क्या यह लॉकडाउन काफ़ी है? 1918 में फ़ैलने वाली स्पैनिश फ्लू महामारी के अध्ययन से पता चलता है कि सार्वजनिक जीवन के इस तरह की पाबंदी ने शुरुआत में इसके फैलाव को कम ज़रूर कर दिया और मृत्यु दर को भी कुछ हद तक कम कर दिया। लेकिन, अध्ययन यह भी बताते हैं कि पाबंदी हटते ही ज़ोरदार हमले के साथ उस बीमारी की वापसी फिर से हो गयी।

इस मामले में भी अगर ऐसा होता है, तब?

इसका मतलब यह है कि सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं है। सभी विशेषज्ञ, चाहे वे डब्ल्यूएचओ के हों, या अन्य , इस बात पर सहमत हैं कि इस बीमारी को ख़त्म करने में सिर्फ एक लॉकडाउन ही काम नहीं आयेगा। इसके साथ-साथ "स्क्रीनिंग, परीक्षण, आइसोलेशन,  इलाज" सबकी ज़रूरत है। चीन की हालिया डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट में इन सभी ज़रूरी उपायों का विवरण दिया गया है। इम्पीरियल कॉलेज, लंदन द्वारा हाल ही में किये गये अध्ययन सहित अन्य अध्ययनों में भी इसी तरह के निष्कर्ष पर पहुंचा गया है।

लॉकडाउन का सीधा मतलब यही हो सकता है कि कोरोना वायरस किसी परिवार के भीतर ही रहेगा। और भारत के हालात को देखते हुए, जैसा कि पहले ही ज़िक्र किया जा चुका है, इसके फैलने की बड़ी संभावना है। सच्चाई तो यही है कि आईसीएमआर ने इस बात को फिर से कहा है कि इसका समुदायिक प्रसार होना तो तय है। सभी लोग जानते हैं कि इस तरह का प्रसार पहले से ही हो रहा है, सिर्फ़ इसके विस्फ़ोटक होने का इंतज़ार है।

ऐसे हालात में, जब तक कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का सक्रिय परीक्षण नहीं होता है, यहां तक कि जिनमें इसके लक्षण नहीं दिखते, उनके भी परीक्षण नहीं होते, तबतक कैरियर यानी वाहक को चिह्नित कर पाना मुश्किल है, इसलिए परीक्षण ज़रूरी है। उन्हें दूसरों से अलग किया जाना चाहिए, सिर्फ़ लॉकडाउन के तहत नहीं रखा जाना चाहिए और उनका तेज़ी से इलाज किया जाना चाहिए। यही चीन, दक्षिण कोरिया और यहां तक कि ताइवान का भी अनुभव है।

अगर, भारत ऐसा नहीं करता है, तो भारत भी इटली, स्पेन या अमेरिका के रास्ते पर चल पड़ेगा।

इसलिए, अगर इस तबाही को रोकना है, जो कि पीएम ऐसा ही कुछ करना चाहते हैं, तो इसका जवाब महज एक लॉकडाउन नहीं है। लॉकडाउन से मदद तो मिल सकती है, लेकिन इस बीमारी का सामना नहीं किया जा सकता है।

यह ज़रूरी है कि सरकार और सभी लोग इस पर और अधिक विचार करें, न कि इस आकस्मिक उपायों के लुभाने वाले तरीक़े के आगे झुक जाये, क्योंकि यह महज़ एक धोखा होगा।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Coronavirus: India Witnesses Dramatic Lockdown; But is it Sufficient?

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