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भारत
राजनीति
भारत की गिरती आपराधिक न्याय प्रणाली का सुधार विलाप
पुलिस व्यवस्था में सुधार को लेकर कई आयोग और समितियां बनायी गयी हैं। अब उन पर अमल किये जाने का वक़्त आ गया है।
के एस सुब्रमण्यन
15 Dec 2020
भारत की गिरती आपराधिक न्याय प्रणाली का सुधार विलाप
प्रतीकात्मक फ़ोटो

हम जिसे भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली कहते हैं, उसमें बुनियादी तौर पर अदालत, पुलिस और जेल शामिल हैं,और आज यह प्रणाली गहरे संकट में है। इससे पहले इस लेखक ने पुलिस प्रणाली के संकट की जांच-पड़ताल की थी। हाल-फ़िलहाल में मद्रास उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता-श्रीराम पंचू, प्रख्यात अधिवक्ता-कार्यकर्ता-प्रशांत भूषण,और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश,एपी शाह जैसे वक़ालत और अदालत से जुड़े अनुभवी और वरिष्ठ लोगों ने इंसाफ़ देने में सर्वोच्च न्यायालय की नाकामी पर गंभीर चिंता जतायी है। न्यायपालिका के शीर्ष संगठनों के भीतर के आंतरिक परेशानियों के चलते कुछ न्यायाधीश भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के ख़िलाफ़ आरोप लगाने के लिए प्रेरित हुए हैं। एक न्यायाधीश ने सीजीआई से कहा है कि वह न्यायिक कार्यों में सरकारी हस्तक्षेप पर चर्चा करने के लिए सभी न्यायाधीशों की बैठक बुलायें। विपक्षी दलों के एक तबके ने 2018 में सीजेआई के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने का आह्वान भी किया था।

“सबसे अच्छा इंसाफ़ सभी अपराध-सिद्धि की शून्यता है,जबकि सबसे बुरा इंसाफ़ ज़बरदस्त जज़्बातों से भरा होना है",यह कहावत उच्च न्यायपालिका में चल रहे मामलों की मौजूदा हालत को अच्छे तरीक़े से बयान करती है। ख़ासकर देश के सामाजिक, राजनीतिक, सांप्रदायिक और आपराधिक आतंकवादी हिंसा के कई स्वरूप के सिलसिले में इस प्रणाली में दूरगामी सुधार की आवश्यकता है।सभी मोर्चों पर,ख़ासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बढ़ती हिंसा को देखते हुए यह परेशान करने वाला सिलसिला है।

अल्पसंख्यकों के अधिकार और संविधान

भारत का संविधान छह धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों-मुस्लिम,सिख,ईसाई,जैन,पारसी और बौद्ध को मान्यता देता है। इसके अलावा,आपराधिक न्याय प्रणाली का मतलब सभी नागरिकों को सुरक्षा देने से है। अल्पसंख्यकों के हितों और क़ानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय मान्यता प्राप्त इन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा मुहैया कराता है। हालांकि,भारत का संविधान पूर्वोत्तर राज्यों के सैकड़ों “राष्ट्रीय और जातीय” अल्पसंख्यकों के अधिकारों का ख़्याल रखने में नाकाम रहा है। आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार पर न्यायमूर्ति वी.एस. मलीमथ समिति, 2003 की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है।

क़ानून के उल्लंघनों के ख़िलाफ़ किसी सज़ा का नहीं दिया जाना

1984 में सिखों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हुए अपराध और हिंसा के मामलों भी अदंडित रह गये। ठीक उसी तरह, 1992 में बाबरी मस्जिद का विध्वंस, 1993 में मुंबई में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा, 2002 में गुजरात में अल्पसंख्यक के ख़िलाफ़ संगठित हिंसा, 2008 में ओडिशा में ईसाइयों के ख़िलाफ़ व्यापक हिंसा और पूर्वोत्तर में जातीय अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ लगातार होती हिंसा के मामले भी अदंडित ही रह गये।

2014 के बाद ईसाई और मुसलमानों सहित अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अपराध बढ़े हैं, जबकि जुलाई 2016 के बाद से कश्मीर में मुसलमानों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर प्रशासन की तरफ़ से हो रही हिंसा,अपराधों और न्यायेत्तर फ़ैसले दिये जाने की घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। भारत ने इस हिंसा के लिए पाकिस्तान को दोषी ठहराता है, लेकिन कश्मीरी नेताओं का कहना है कि यह मसला अंदरूनी है।

पुलिस का सरलीकरण

कहा जाता है कि 2015 के बाद से भारत में तक़रीबन 500 अपराध नफ़रत की वजह से हुए हैं। मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या के बाद "लव जिहाद" के नाम पर महिलाओं पर नैतिक पुलिसिंग की जाती रही है। असहमति जताने वाले 65 से ज़्यादा बुद्धिजीवियों, तर्कवादियों और अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को मार दिया गया है। 2014 के बाद से दलितों के ख़िलाफ़ भी व्यापक हिंसा हुई है। हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है; हर छह मिनट में एक दलित महिला के साथ बलात्कार होता है। 2007 से लेकर 2017 के एक दशक में दलितों के ख़िलाफ़ अपराधों में 66% का इज़ाफ़ा हुआ था। आपराधिक न्याय प्रणाली की ख़ामियों और नाकामियों को देखते हुए इन अपराधों में से 80% से ज़्यादा मामलों में सज़ा नहीं मिल पायी है।

मणिपुर में 2000 के दशक में हर साल 200 से ज़्यादा न्यायेत्तर फ़ैसले सुनाये गये हैं। इन हत्याओं के लिए जवाबदेह मणिपुर के पूर्व पुलिस महानिदेशक को इस राज्य का उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था। ग़ौरतलब है कि इन मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप बहुत कम और बहुत देर से होता है और आपराधिक न्याय प्रणाली पूरी तरह से ध्वस्त हो गयी है। मणिपुर में असम राइफल्स की तरफ़ से होने वाली राज्य हिंसा में इस्तेमाल होने वाले कठोर सैन्य बल (विशेष बल) अधिनियम,1958 को निरस्त करने की मांग को लेकर 16 साल (5 नवंबर 2000 से 9 अगस्त 2016) तक भूख हड़ताल पर बैठने वाली इरोम शर्मिला को नज़रअंदाज कर दिया गया था। अफ़सोसनाक है कि यह अधिनियम आज भी क़ायम है।

2002 में गुजरात में वहां की पुलिस ने क़ानूनी मानदंडों और जांच प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया था। एफ़आईआर दर्ज किये जाने में भी पक्षपात किया गया। तीन प्रतिष्ठित न्यायाधीशों की अध्यक्षता वाले एक नागरिक न्यायाधिकरण ने उस हिंसा की जांच की थी और उस जांच की रिपोर्ट को तीन खंडों में प्रस्तुत किया गया था। इस ट्रिब्यूनल को हिंसा पीड़ितों की तरफ़ से 2,000 से ज़्यादा हलफ़नामे मिले थे और ट्रिब्यूनल ने पाया था कि सूबे की पुलिस उस हिंसा के अपराधियों को गिरफ़्तार करने में नाकाम रही थी और अपराधियों की गिरफ़्तारी के बजाय पुलिस ने पीड़ितों को ही गिरफ्तार किया था। पुलिस ने कर्फ़्यू लगाने में देरी की थी,राजनीतिक प्रभाव में आपराधिक क़ानूनों की अनदेखी की थी, ख़ुफ़िया जानकारी जुटाने में विफल रही थी,हिंसा में भाग लिया था,एक ही प्राथमिकी कई मामलों में दर्ज की गयी थी,शिनाख़्त को लेकर किये जाने वाले परेड को नज़रअंदाज़ कर दिया गया था, जिन इलाक़ों में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग रहते थे,वहां दुर्भावनापूर्ण "तलाशी अभियान" चलाया गया था,बलात्कार पीड़ितों को नज़रअंदाज़ किया गया था, आपराध करने वाली भीड़ को निकल जाने दिया गया था,एनएचआरसी की सिफ़ारिशों की अनदेखी की गयी थी और सूबे की पुलिस केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन करने में नाकाम रही थी। इसी तरह की वाक़ये 1984 में दिल्ली और 2008 में ओडिशा के कंधमाल में हुए थे।

पुलिस ने 2017 के पहलू ख़ान हत्या मामले में गंभीर अनियमिततायें बरती थीं,जिनमें एफ़आईआर दर्ज करने में देरी,अपराध के गवाह रहे पुलिस की शिनाख़्त करने से इन्कार,मानव हत्या के आरोप को कमज़ोर करना, अपराधियों को छोड़ने के लिए मनमाफ़िक साक्ष्य जुटाना और चिकित्सा साक्ष्य को विकृत करना शामिल है।

जस्टिस राजिंदर सच्चर समिति की रिपोर्ट, 2005

सच्चर रिपोर्ट में कहा गया था कि मुसलमानों को "देश-विरोधी" के तौर पर देखा जाता है,लेकिन साथ ही साथ तुष्ट भी किया जाता है। पुलिस मुसलमानों को लेकर क्रूर है, और सरकार आंशिक तौर पर कठोर है। हर दाढ़ी वाले शख़्स को आईएसआई एजेंट के तौर पर देखा जाता है, फर्ज़ी मुठभेड़ में उनकी हत्यायें होती हैं। रिपोर्ट कहती है कि अल्पसंख्यकों को किसी भीड़ वाली बस्ती के हवाले कर दिया गया है और वे सामूहिक तौर पर अलग-थलग कर दिये गये हैं। इसके अलावा,पुलिस ग़ैर-क़ानूनी तौर पर उन इलाक़ों के घरों में ज़बरदस्ती घुस जाया करती है,जिन इलाक़ों में मुसलमान रहते हैं, और उन इलाक़ों में स्कूल और अस्पतालों की तादाद भी नाकाफ़ी है। इस रिपोर्ट में मुसलमानों के बीच पुलिस के ज़बरदस्त डर और पुलिस बल में इस समुदाय के लोगों के बहुत कम प्रतिनिधित्व की भी बात की गयी है।

सही मायने में अपराधों और हिंसा में पुलिस की निष्क्रियता या मिलीभगत देश भर में व्याप्त है।पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पुलिस बल को सिर्फ़ आपराधिक हिंसा से निपटना चाहिए, सामाजिक हिंसा से नहीं, और सामाजिक न्याय पुलिस की चिंता का विषय नहीं है।

नक्सली और उत्तर प्रदेश पुलिस

जब मैं 1970 के दशक के उत्तरार्ध में केंद्रीय गृह मंत्रालय में नागरिक अधिकार प्रकोष्ठ के निदेशक के तौर पर नियुक्त हुआ, तो मैंने इस विषय पर नये क़ानून के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के नागरिक अधिकारों के संरक्षण को लेकर देश भर में पूरे जोश के साथ दौरे किये। मुझे इस मंत्रालय के कर्मचारियों के बीच "नक्सली डीआईजी" के तौर पर जाना जाने लगा था ! हालांकि मैंने साफ़ कर दिया था कि मैं नागरिक अधिकारों पर नये क़ानून को सिर्फ़ लागू करने की कोशिश कर रहा हूं,फिर भी उनका नज़रिया नहीं बदला।

इसी तरह की एक दूसरी मिसाल है और वह यह कि मुझे संसद के उस सवाल का जवाब तैयार करना था,जिसमें पूछा गया था कि 1982 में उत्तर प्रदेश में होने वाली ज़्यादतियों के कितने मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाये थे। "ज़्यादतियों" का तात्पर्य अनुसूचित जाति के लोगों पर ग़ैर-अनुसूचित जाति के लोगों द्वारा किये जाने वाले संज्ञेय अपराध से है। राज्य सरकार ने इसे लेकर यह जानकारी दी थी कि उस साल सिर्फ़ एक "ज़्यादती" हुई थी, हालांकि जो आंकड़े पहले ही रूटीन चैनलों के ज़रिये केंद्र सरकार को मिल गये थे, उनमें ऐसे 3,000 से ज़्यादा मामले थे। राज्य सरकार ने साफ़ कर दिया था कि एक ही ऐसा मामला हुआ था,जिसमें “एससी-एससी जाति की भावना” का ज़िक़्र था। अन्य सभी मामले "सामाजिक-आर्थिक" थे और राज्य सरकार के मुताबिक़ बाक़ी मामले जाति से जुड़े हुए नहीं थे।

1980 के दशक की शुरुआत में मध्य बिहार में हुई उस ग्रामीण हिंसा को लेकर संसद में हंगामा हुआ था,जिसका ज़िम्मेदार नक्सलियों को ठहराया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री,इंदिरा गांधी ने वहां का दौरा करने और उस पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए योजना आयोग के तत्कालीन सदस्य सचिव,मनमोहन सिंह की अगुवाई में एक केंद्रीय दल को भेजा था। उस टीम का एक सदस्य मैं भी था। टीम ने पाया कि पुलिस की रिपोर्टों के उलट,सिर्फ़ 12 लोग मारे गये थे, 59 किसान मारे गए थे, और ये सभी नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में नहीं,बल्कि  पुलिस मुठभेड़ों में मारे गये थे।

नक्सलवाद पर राष्ट्रीय नीति

2006 में योजना आयोग की एक बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों और पुलिस प्रमुखों का एक आधिकारिक सम्मेलन हुआ,जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री ने की थी। इस बैठक का मक़सद नक्सली हिंसा पर एक राष्ट्रीय नीति तैयार करना था। योजना आयोग के एक विशेषज्ञ समूह ने बताया कि जहां तक नक्सल हिंसा का सवाल है,तो यह विकास से जुड़ी हुई हिंसा है। लेकिन,वहीं इंटेलिजेंस ब्यूरो ने कहा था कि नक्सली हिंसा भारत की "आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा" है।दिलचस्प बात यह है कि इंटेलिजेंस ब्यूरो की उस रिपोर्ट को मंज़ूर कर लिया गया था और योजना आयोग की रिपोर्ट को दरकिनार कर दिया गया। 2014 के बाद से नयी सरकार ने नक्सलियों पर पिछली पुलिस नीति को ही जारी रखे हुआ है।

भारतीय पुलिस: ब्रिटिश नज़रिया

भारत की पुलिस व्यवस्था को लेकर अंग्रेज़ों की राय अच्छी नहीं थी। वे इसे "सेवा" नहीं,बल्कि एक सरकारी विभाग के तौर पर देखते थे। 1861 और 1902 में स्थापित दो पुलिस आयोगों ने एक जनोन्मुख पुलिस प्रणाली नहीं बनायी,बल्कि उसे क्रूरता से पेश आने वाली ताक़त के तौर पर आगे बढ़ाया। अंग्रेज़ों ने भारतीय पुलिस को "अपराध की शिनाख़्त करने और उसकी रोकथाम में अनुपयोगी और दुखद तौर पर अक्षम" माना; “भ्रष्टाचार और उत्पीड़न को लेकर मशहूर इस पुलिस को उन्होंने ताक़त का इस्तेमाल करने वाली बेशर्म पुलिस” कहा।   

1983 में पुलिस सिस्टम के एक जानकार,डेविड बेले ने पाया कि भारतीय पुलिस "राजनीति से घिरी हुई है, राजनीति का उसमें दखल है और राजनीति में व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर इसकी भागादारी” है।एनएचआरसी ने भी यह पाया है कि जितनी भी गिरफ़्तारियां होती हैं,उनमें से 60% मामलों में पुलिस संलग्न होती है और मानवाधिकार उल्लंघन की 75% शिकायतों के लिए यह पुलिस ही ज़िम्मेदार है।

भारतीय दंड संहिता,1860, आपराधिक प्रक्रिया संहिता,1973 (सीआरपीसी),और पुलिस अधिनियम,1861, किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ होने वाले मामले नहीं,बल्कि मुख्य रूप से स्टेट के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों के प्रति समर्पित है,जो कि संविधान के एकदम उलट है,क्योंकि संविधान व्यक्तिगत सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। आईपीसी की शुरुआती 299 धारायें राज्य सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, आपराधिक साज़िश, राजद्रोह आदि को समर्पित हैं। व्यक्ति (व्यक्तियों) और उनकी संपत्ति के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की जांच-पड़ताल की धारायें,धारा 300 से शुरू होती हैं। इसी तरह का पूर्वाग्रह सीआरपीसी और पुलिस अधिनियम में भी है।

पुलिस प्रणाली में सुधार के लिए कई आयोग और समितियां बनायी गयी हैं। जैसा कि क़ानून के प्रख्यात प्रोफ़ेसर, उपेंद्र बक्सी ने कहा है कि 2006 के सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश अपनी प्रकृति में "अवसंरचनात्मक"( infrastructural) नहीं,बल्कि "अधिरचनात्मक"( superstructural)थे। आज़ादी के बाद भी भारतीय पुलिस का अर्धसैनिक चरित्र और ढांचे,दोनों में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं आया है। ग़ौर करने वाली बात है कि न सिर्फ़ सीआरपीएफ और बीएसएफ़ जैसे नियमित अर्धसैनिक बल,बल्कि सिविल पुलिस का ढांचा भी एक अर्धसैनिक वाला ही है। ख़ुफ़िया संगठन का चरित्र औपनिवेशिक बना हुआ है और उनमें ढांचे की  कमी है और उनमें चार्टर ऑफ़ ड्यूटी का भी अभाव है।

इनसे जुड़ा हुआ रुख़

भारत की संसद और सर्वोच्च न्यायालय,दोनों ही आज कमज़ोर हो रहे हैं। उनकी न्याय देने की भूमिका में अहम गिरावट देखी जा रही है। 2017 में संसद की बैठक महज़ 57 दिनों के लिए हुई थी। यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका की संसद की प्रतिनिधि सभा की बैठक हर साल 140 से 150 दिनों के लिए होती है।

लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में "व्यवस्था की कमी" के आधार पर दो अविश्वास प्रस्ताव को मंज़ूर करने से इनकार कर दिया है। इन नियमों के तहत,लोकसभा अध्यक्ष द्वारा प्राप्त किये जाने पर इस तरह के प्रस्ताव को तुरंत सदन के सामने उठाया जाना चाहिए। 2017 में 72 विधेयकों में से सिर्फ़ नौ विधेयकों को संसदीय समितियों के हवाले किया गया था। 2017 के बाद से रेल बजट को एक अभूतपूर्व और अचानक उठाये गये क़दम के तौर पर केंद्रीय बजट के साथ शामिल कर लिया गया है। केंद्रीय बजट को बिना चर्चा के आधे घंटे के भीतर पारित करा दिया गया। कार्यपालिका का अनुसरण करने वाले नौकरशाहों की नियुक्ति की शुरुआत करके संसद के सचिवालय को भी कमजोर कर दिया गया है।

2017 में बजट सत्र के दौरान राज्य से जुड़े हुए विशिष्ट मांगों के चलते लोकसभा की बैठक लगातार 16 दिनों तक नहीं चली। सरकार इन मांगों को अलग से ले सकती थी। आधार और विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम या एफ़सीआरए संशोधन बिल को नियमों और परिपाटियों के उलट वित्त विधेयक के तौर पर पारित करा लिया गया। इसी तरह,संसद देश के गंभीर कृषि संकट पर चर्चा करने में नाकाम रही है।

सुझाव

भारतीय पुलिस के अर्धसैनिक ढांचे में बदलाव होना चाहिए और पुलिस को ज़मीनी स्तर पर पंचायती राज संस्थाओं (PRI) के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। आईएएस और आईपीएस को भी इसी पंचायती राज संस्थाओं के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। "सार्वजनिक व्यवस्था" से जुड़ा हुए दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2005-2007) की रिपोर्ट को लागू किया जाना चाहिए। न्यायिक सुधारों में एक पूर्णकालिक न्यायिक नियुक्ति आयोग को शामिल किया जाना चाहिए, जो सरकार और न्यायपालिका,दोनों से स्वतंत्र हो। एक स्वतंत्र न्यायिक शिकायत आयोग होना चाहिए और उच्चतर न्यायपालिका और नागरिक सेवाओं से जुड़े लोगों को सेवानिवृत्ति के बाद नौकरी पर नहीं रखा जाना चाहिए।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

India’s Decadent Criminal Justice System Cries for Reform

Civil rights
Criminal Laws
Judicial reform
Violent Crime

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