NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
पर्यावरण
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
क्यूबा ने जगाई किसानों और पर्यावरण के लिए नई उम्मीद
विभिन्न देशों के नीति निर्धारक क्यूबा में रसायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करते हुए खाद्य उत्पादन को बढ़ाने का काम किया है।
भारत डोगरा
15 Oct 2020
Translated by महेश कुमार
क्यूबा ने जगाई किसानों और पर्यावरण के लिए नई उम्मीद
Image Courtesy: Farm and Dairy

पिछले 25 वर्षों के दौरान क्यूबा की कृषि क्षेत्र में रोमांचक प्रगति ने पूरी दुनिया के किसानों और पर्यावरणविदों के भीतर नई उम्मीद जागा दी है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल को काफी हद तक कम करते हुए, क्यूबा प्रतिकूल परिस्थितियों में खाद्य उत्पादन बढ़ाने में सफल रहा है।

क्यूबा की सफलता की कहानी न केवल पर्यावरण हितैषी (इको-फ्रेंडली) वाले तरीके हैं, बल्कि वे तरीके हैं जो खेती और भूमि संरचनाओं की समानता के लिए भी जिम्मेदार है, जो किसानों के बीच सहयोग बढ़ाते है, और इसलिए वैज्ञानिक किसानों के साथ मिलकर काम करते हैं। और  पिछले 25 वर्षों का क्यूबा मॉडल कृषि के निगमीकरण के खिलाफ एक ठोस विकल्प है, जिसे भारत सहित कई देशों में शीर्ष मॉडल के रूप में पेल दिया गया है, जिसके चलते छोटे किसानों को कोई राहत नहीं मिली है।

1991 में, क्यूबा की कृषि व्यवस्था और खाद्य प्रणाली को बड़े संकट का सामना करना पड़ा था जिसमें सबसे अनुकूल देश से खाद्य और उर्वरक के आयात में बड़ा संकट पैदा हो गया था, क्योंकि क्यूबा इन देशों से आयात पर बहुत निर्भर था, फिर अचानक सोवियत संघ के विघटन से सब ढह गया। सोवियत के पतन की वजह से क्यूबा ने नब्बे के दशक के मध्य तक अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खो दिया था।

जबकि आयात और सहायता में गिरावट हो गई थी, और उनके शत्रुतापूर्ण पड़ोसी देश संयुक्त राज्य अमेरिका का विभिन्न तरीके के दबाव बढ़े जिसमें व्यापक आर्थिक प्रतिबंध भी शामिल थे। हर तरफ से दबाया गया और उनके खाद्य उत्पादन में बड़ी गिरावट आ गई, क्यूबा ने टिकाऊ और आत्मनिर्भर तरीकों का उपयोग करके भोजन में आत्मनिर्भरता हासिल करने की योजना बनाई, और आयात पर भरोसा करने के बजाय स्थानीय संसाधनों का सबसे अच्छा उपयोग किया। इससे कृषि-पारिस्थितिकी आधारित दृष्टिकोण का बहुत सफल और निरंतर इस्तेमाल किया गया। 

1970 के दशक के बाद से ही कृषि-पारिस्थितिकी दृष्टिकोण काफी चर्चा में रहा है और दुनिया भर में वाम-उन्मुख संगठनों/समूहों सहित कई किसान और पर्यावरण संगठन/समूहों ने इसे उत्साहजनक परिणामों के साथ लागू किया। हालाँकि, क्यूबा पहला देश था जिसने पहली बार इसे राष्ट्रीय नीति के रूप में अपनाया था और 25 वर्षों के निरंतर कार्यान्वयन और प्रयास से यह तरक्की सुनिश्चित की है।

कृषि-पारिस्थितिकी का दृष्टिकोण प्रकृति से सीखने, और खेती और खाद्य उत्पादन में प्रकृति के तरीकों को सीखने को शामिल करने पर आधारित है। इसमें जैविक खेती के आवश्यक पहलू शामिल हैं, लेकिन इसमें अधिक सामाजिक (केवल तकनीकी की तुलना में) दृष्टिकोण को जोड़ा जाता है, जिसमें वैज्ञानिकों और लोगों के करीबी सहयोग पर आधारित स्वदेशी ज्ञान से सीखना शामिल है, जिसमें दोनों ही इच्छुक हैं जो एक दूसरे से सीखते हैं। 

क्यूबा के समाज में पहले के बदलाव जो उन्हे लोगों की समानता की दिशा में ले गए थे, उन्होने उन्हें सशक्त बनाया और शिक्षा और विज्ञान को बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंचाया। इससे अन्य क्षेत्रों में भी सफलताओं की नींव रखने में मदद मिली।

इनपुट और तकनीकी परिवर्तन में रासायनिक उर्वरक के बजाय कृमि खाद, पोल्ट्री खाद और जैव-उर्वरक पर अधिक निर्भरता शामिल थी। यह पोषक तत्वों के पुनर्चक्रण, फसलों और जानवरों के बेहतर और अधिक एकीकरण करने और फसल के बीच स्वस्थ्य अंतर पर आधारित था। मिट्टी संरक्षण को अधिक और बेहतर ध्यान मिला। जैव कीटनाशक एजेंटों और रासायनिक कीटनाशकों के अन्य विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए कई केंद्र स्थापित किए गए थे।

इन परिवर्तनों को पेश करने के बाद कीटनाशक विषाक्तता के मामलों में तेजी से गिरावट शुरू हुई। पर्यावरण के अनुकूल खेती के लिए अनुकूल कानून पारित किए गए। इस तरह, जिस देश ने नब्बे के दशक में "आयातित उर्वरकों, कीटनाशकों, ट्रैक्टरों, पुर्जों और पेट्रोलियम के नुकसान" का सामना किया था और "स्थिति इतनी खराब थी कि क्यूबा ने लैटिन अमेरिका और कैरिबियन देशों में प्रति व्यक्ति खाद्य उत्पादन में सबसे खराब प्रदर्शन किया था”, जैसा की मिगुएल ए अल्टिएरी और फर्नांडो आर शोधकर्ताओं ने फन्नेस-मोनज़ोटे में 2012 में लिखा था, अब“ आयातित सिंथेटिक रासायनिक आदानों पर कम निर्भर रहने से कृषि को तेजी से उन्मुख किया गया, और यहाँ की पारिस्थितिक कृषि विश्व स्तरीय मामला बन गया।“ 

किसानों और उनकी सहकारी समितियों को आधिकारिक नीति के तहत पर्यावरण के अनुकूल मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया साथ ही किसानों और उनके संगठनों यूनियनों और आंदोलनों के माध्यम से इसे लागू करने की पहल की गई है। इस दृष्टिकोण ने सिर्फ छह साल के भीतर प्रभावशाली परिणाम देने शुरू कर दिए और तब से उत्साहवर्धक नतीजे सामने आ रहे हैं। 2007 तक, खाद्य उत्पादन न केवल बेहतर हो गया था, बल्कि कम हुए स्तरों की तुलना में काफी बढ़ गया था। 1996-97 के सीज़न में, क्यूबा ने 13 बुनियादी खाद्य फसलों में से दस फसलों में काफी ऊंचे स्तर का उत्पादन दर्ज किया था।

2007 तक सब्जियों का उत्पादन 1988 की तुलना में (विघटन से पहले के स्तर) से 145 प्रतिशत रहा, जबकि कृषि रसायनों का इस्तेमाल 1988 की तुलना में 72 प्रतिशत कम हुआ।  सेम/बीन्स का उत्पादन 2007 में 1988 की तुलना में 351 प्रतिशत हुआ, जबकि कृषि-रसायनों का इस्तेमाल 55 प्रतिशत कम रहा हैं। 2007 में कंद-मूल का उत्पादन 1988 के मुक़ाबले 145 प्रतिशत तक बढ़ गया था, जबकि रासायनिक इस्तेमाल में 85 प्रतोषत की गिरावट आई।

बेशक, 1991-92 के विघटन स्तरों के साथ तुलना में उपलब्धियां और भी प्रभावशाली दिखाई देती हैं, लेकिन 1988 के पूर्व-विघटन स्तरों की तुलना में भी, ये उपलब्धियां बहुत सराहनीय हैं। उत्पादन बढ़ाने और कृषि-रासायनिक इतेमाल को कम करने के लिए अन्य देशों ने बहुत छोटे क्षेत्रों में इसे हासिल किया गया है, जबकि क्यूबा लंबे समय से ऐसा कर रहा है और राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कर उसने महत्वपूर्ण उदाहरण पेश किया है।

कृषि-पारिस्थितिकी तंत्र अधिक श्रमिक हितैषी और बहुत रचनात्मक है, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को इस रचनात्मक आजीविका में शामिल होने का अवसर मिलता है। इच्छुक लोगों लोगों के लिए, कृषि-पारिस्थितिकी की रचनात्मक तस्वीर को समझने और इसके इस्तेमाल का एक निरंतर स्रोत है। यह विज्ञान शिक्षा, कृषि शिक्षा और युवाओं के लिए प्रकृति के बारे में सीखने का एक बहुत ही रचनात्मक स्रोत हो सकता है। तथ्य यह है कि इसे सीखना इतना दिलचस्प है कि यह स्कूल और कॉलेज दोनों स्तरों पर शिक्षा के मूल्य को बढ़ाता है।

यह दृष्टिकोण या राष्ट्रीय नीति किसानों को महंगे कृषि-रसायनों के खर्चों में कटौती करने में भी मदद करता है। ऐसे समय में यह पहलू बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है जब दुनिया भर के किसान लागत कम करने और कर्जों को चुकाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इन परिवर्तनों के दौरान, क्यूबा में किसानों और वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि उन्हें अपने अतीत से बहुत कुछ सीखना है। पीटर रॉसेट, जिन्होंने क्यूबा कृषि का बड़े पैमाने पर अध्ययन किया है, ने लिखा है, "लगभग हर किसान ने अपने मामले में बताया कि उन्होंने उन पुरानी तकनीकों को याद किया- जैसे कि इंटरकैपिंग और खाद कहते हैं- जिसे उनके माता-पिता और दादा-दादी आधुनिक रसायनों के आगमन से पहले इस्तेमाल करते थे, साथ ही साथ उन जैव-कीटनाशक और जैव-उर्वरक को जो उनकी उत्पादन प्रथाओं में सम्मिलित थे।”

एक और बहुचर्चित अध्ययन में, ओरेगॉन विश्वविद्यालय के मौरिसियो बेटनकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला है कि... "हालांकि क्यूबा अभी भी कृषि के दायरे में और इसके बाहर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.... इस देश ने इतने कम बाहरी इनपुट संसाधनों के साथ जो हासिल किया है वह भी संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंधों के बावजूद, उल्लेखनीय सफलता है।”

दो वरिष्ठ कृषि-पारिस्थितिकीविदों, अल्टिएरी और फुन्स-मोनज़ोट ने इसे खास तौर पर दर्ज किया है कि अन्य देश भी क्यूबा से अधिक ऊर्जावान, कुशल, टिकाऊ, सामाजिक रूप से न्यायसंगत और लचीली कृषि प्रणाली की व्यवस्था को लागू करना सीख सकते हैं। "दुनिया के किसी भी अन्य देश ने कृषि में ऐसी सफलता के स्तर को हासिल नहीं किया है जो जैव विविधता की पारिस्थितिक सेवाओं का इस्तेमाल करता है और फूड मील, ऊर्जा का इस्तेमाल कम करता है, और प्रभावी रूप से स्थानीय उत्पादन और खपत चक्र को बंद कर देता है," उन्होंने 2012 में मंथली रिव्यू में क्यूबा में उठाए गए कदमों के बारे में विस्तार से लिखा था। 

अब जबकि भारत अपनी कृषि प्रणाली में "सुधार" के लिए कदम उठा रहा है, तो भारत जैसे देश को क्यूबा से सीख लेने की जरूरत हैं, जहां पूरी दुनिया के सामने कृषि और किसान की तरक्की मिसाल बन कर उभरी है। 

लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं जो कई सामाजिक आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Cuba’s Big New Hope For Farmers and Environment

Cuba economy
Cuba agriculture
Indian farm bills
Agriculture
Organic farmers

Related Stories

किसानों और सत्ता-प्रतिष्ठान के बीच जंग जारी है

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

यूपी चुनाव : किसानों ने कहा- आय दोगुनी क्या होती, लागत तक नहीं निकल पा रही

देशभर में घटते खेत के आकार, बढ़ता खाद्य संकट!

कृषि उत्पाद की बिक़्री और एमएसपी की भूमिका

कृषि क़ानूनों के वापस होने की यात्रा और MSP की लड़ाई

हरियाणा के किसानों ने किया हिसार, दिल्ली की सीमाओं पर व्यापक प्रदर्शन का ऐलान

खेती के संबंध में कुछ बड़ी भ्रांतियां और किसान आंदोलन पर उनका प्रभाव

खेती- किसानी में व्यापारियों के पक्ष में लिए जा रहे निर्णय 

क्यों बना रही है सरकार कृषि संबंधित वृहद डेटाबेस?


बाकी खबरें

  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी: सावित्री बाई फुले को याद करना, मतलब बुल्ली बाई की विकृत सोच पर हमला बोलना
    03 Jan 2022
    सवाल यह है कि जिन लोगों ने, सावित्री बाई फुले के ऊपर कीचड़ डाला था, उनके ख़िलाफ गंदी-अश्लील टिप्पणी की थी, वे 2022 में कहां हैं। वे पहले से अधिक खूंखार हो गये हैं, पहले से ज्यादा बड़े अपराधी—जिन्हें…
  • stop
    सोनिया यादव
    ‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा
    03 Jan 2022
    मुस्लिम महिलाओं को ‘ट्रोल’ करने की कोशिश के बीच विपक्ष के साथ-साथ महिला संगठनों और आम लोगों ने सोशल मीडिया पर इस मामले में सरकार और पुलिस की सक्रियता और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः एनएमसीएच के 84 डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव, मरीज़ों में कोरोना चेन बनने का ख़तरा
    03 Jan 2022
    एनएमसीएच में डॉक्टरों समेत 194 लोगों का सैंपल लिया गया था। 84 डॉक्टरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद आशंका बढ़ गई है कि अस्पताल के कई मेडिकल स्टॉफ भी चपेट में आ सकते हैं।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : जारी है एचईसी मज़दूरों की हड़ताल, साथ आए सभी विपक्षी दल
    03 Jan 2022
    एचईसी के मज़दूरों के टूल डाउन और हड़ताल को एक महीना हो गया है और अभी भी वो जारी है, ऐसा एचईसी के इतिहास में पहली बार हुआ है।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    नहीं पूरा हुआ वयस्कों के पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य, केवल 63% को लगा कोरोना टीका
    03 Jan 2022
    पहले केंद्र ने दिसंबर 2021 के अंत तक भारत में सभी वयस्क आबादी के पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल कर लेने का लक्ष्य घोषित किया था। जबकि हकीकत यह है कि करीब 9.73 करोड़ वयस्कों को अभी भी दोनों खुराक दी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License