NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
मज़दूर-किसान
भारत
राजनीति
दिल्ली : क्यों चुनावी मुद्दा नहीं बन रहा गरीबों को सस्ते-किफ़ायती घर का वादा?
मज़ूदर ही नहीं निम्न-मध्यम वर्ग के लोगों के लिए भी दिल्ली में घर एक बड़ा सपना है। डीडीए ने कुछ घर बनाए भी हैं तो वे इतने महंगे और इतने छोटे हैं कि उनमें रहना मुश्किल है। कुल मिलाकर ये मुद्दा नीतियों और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की भेंट चढ़ गया है।
मुकुंद झा, रवि कौशल
07 May 2019
गरीबों को सस्ते-किफ़ायती घर का वादा?

उमा देवी 48 वर्ष की हैं, जहांगीर पुरी में राजस्थानी उद्योग नगर की झुग्गी  बस्ती में रहती हैं। उन्होंने 12 मई को दिल्ली में  होने वाले लोकसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को वोट देने के बारे में अभी भी फैसला नहीं किया है। वह  छह सदस्यों के एक परिवार के साथ यहां रहती हैं और उनके लिए  अपने बच्चों की सुरक्षा काफी बड़ी समस्या है। 

uma davi.jpg

बिहार के बेगूसराय जिले से आई हैं उमा देवी। वह अपने घर के बाहर सड़क पर  बैठी हुई थीं, हमने उनसे बात की तो उन्होंने बताया कि उनकी पड़ोसन आस-पास के कारखानों में काम करने के लिए जाती हैं, जहां काफी शोषण होता है, लेकिन उन्होंने घर पर रहना चुना हैं। वो कहती हैं कि मैंने यह सुनिश्चित करने के लिए घर पर रहना चुना है  कि मेरे बच्चे स्कूल जाएं और शिक्षा प्राप्त करें। शिक्षा के बिना जीवन नहीं है। अगर मैं काम पर जाती  हूं, तो वे स्कूल नहीं जाएंगे। हमारा जीवन अब लगभग आधे से ज्याद बीत चुका है, लेकिन वे हैं जिनके पास जीवन जीने के लिए और शिक्षा के बिना एक लंबा जीवन है,  अगर वो शिक्षा ग्रहण नहीं करेंगेतो उनका जीवन बहुत ही कठिन होगा। वह बताती हैं कि पिछले दिनों कुछ स्थानीय बच्चों के झगड़े में उनका छोटा बच्चा फंस गया। उसके बाद वो 10 दिनों के लिए अंबेडकर अस्पताल में भर्ती रहा  था।

लेकिन एक बड़ी चिंता जो उन्हें परेशान करती है, वह है उनके घर की स्थिति। “मैं इस क्षेत्र में 24 साल से रह रही हूं, लेकिन अगर यह झुग्गी तोड़ दी जाती है तो मेरे पास बिहार में अपने गांव वापस जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

सुनीता की परेशानी उमा देवी से अलग है जो किरारी में प्रेम नगर अनधिकृत कॉलोनी में रहती हैं। यह इलाका उत्तर पश्चिम दिल्ली संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है,जहां आम आदमी पार्टी के गुगन सिंह, कांग्रेस के राजेश लिलोथिया और भारतीय जनता पार्टी के हंस राज हंस के बीच त्रिकोणीय लड़ाई देखी जा रही है। 

 प्रेम नगर में एक जूता कारखाने में काम करने वाली सुनीता  ने कहा कि पानी की खपत के बिलों को माफ कर दिए जाने के बाद जीवन यापन की लागत काफी कम हो गई है। लेकिन मकान मालिक द्वारा बिजली का अधिक  शुल्क अभी भी सिरदर्द  बना हुआ हैं। उन्होंने कहा, "मैं किराये के रूप में 2,500 रुपये का भुगतान करती हूं। इसके अलावा, मुझसे 8 रुपये प्रति यूनिट शुल्क लिया जा रहा है, जबकि सरकार की दर 1.75 रुपये प्रति यूनिट है।" एक घर के मालिक होने के सवाल पर, उसने हंसते हुए कहा, "घर तो चलता नहीं, मैं और मेरे पति एक साथ 20,000 कमाते हैं। हम लाखों का घर कैसे खरीद सकते हैं।" 

Affordable Housing यानी सस्ते-किफ़ायती घर का संकट अकेले औद्योगिक  मज़दूरों  को ही  नहीं मार रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में किराये के प्रति असंतोष मुखर्जी नगर क्षेत्र में देखा गया था, जहां देश के अन्य हिस्सों के छात्रों ने दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक सप्ताह का लंबा विरोध प्रदर्शन  किया था। किफायती घरों की तीव्र कमी के बावजूद, यह मुद्दा अभी भी मुख्यधारा के दलों के नेताओं के भाषणों में गायब है।

लेकिन क्या भूमि और संसाधनों की कमी के कारण यह मुश्किल आ रही है?  ऐसा नहीं है। रिपोर्टों से पता चलता है कि इस मामले में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) में इच्छाशक्ति की कमी दिखती है।

dda felt.jpg

       (जहांगीरपुरी के रामगढ़ रोड इलाके में डीडीए फ्लैट)

न्यूज़क्लिक की टीम को जहांगीरपुरी के रामगढ़ रोड इलाके में डीडीए फ्लैटों की यात्रा के दौरान पता चला कि आवंटन के बाद प्राधिकरण के कुल 268 फ्लैट्स में सभी खाली पड़े हैं, क्योंकि फ्लैट्स की कीमत और आकार के कारण यहां रह पाना  मुश्किल था। प्राधिकरण ने फ्लैटों के लिए 22 लाख रुपये कीमत तय की है। आस-पास के इलाकों के लोगों ने कहा कि फ्लैट की कीमत बहुत ज्यादा है। एक व्यक्ति ने कहा कि क्षेत्र में एक व्यक्ति बहुत अधिक 12-15 लाख रुपये में फ्लैट खरीद सकता है। कोई भी इन फ्लैटों के लिए 7-8 लाख रुपये तक अतिरिक्त क्यों देगा। ये मकान अब लगभग 4 साल से खाली हैं। अब, वे केवल जरूरतमंदों के बजाय असामाजिक तत्वों को आश्रय देते हैं।"

डीडीए के फ्लैट्स की मांग के दौरान राष्ट्रीय आवास क्षेत्र में कम दरों पर बेहतर सुविधाएं प्रदान करने के उद्देश्य से निजी आवास के लिए इस परियोजना को शुरू किया गया था। वास्तव में यह निजी बिल्डरों के बढ़ती कीमतों का मुकाबला करने के लिए था। ये मकान अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम का हिस्सा थे। 

यह कदम डीडीए की आम जनता के लिए मकान बनाने की प्राथमिकता से एक कदम था। लेकिन, "गलत तरीके से डिज़ाइन किए गए" फ्लैट्स को बेचने में वोअसफल दिख रही हैं। जिन लोगों ने इन फ्लैट को खरीद भी लिया है वो इसमें रह नहीं रहे हैं, बल्कि वे डीडीए पर धोखधड़ी का आरोप लगा रहे हैं, इसके खिलाफ उन्होंने सड़को पर उतारकर बड़ा प्रदर्शन भी किया लेकिन कुछ समाधान नहीं निकला। ऐसे में यह लगता है जिस संस्था को लोगो के लिए किफायती आशियाने बनाने थे वो पूरी तरह से विफल रही है। 

सस्ते-किफायती आवास के लिए अभियान चला रही निर्मला गोराना ने कहा कि इस मुद्दे पर अभी भी राजनीतिक दलों और लोगों का ध्यान नहीं गया है। उन्होंने कहा, केंद्र ने वादा किया था कि वह 2022 तक हर जरूरतमंद व्यक्ति को किफ़ायती घर मुहैया कराएगा। लेकिन उपलब्ध कराए गए घरों की संख्या के बारे में जानकारी नहीं है। हाल के एक मामले में जहां बंधुआ मजदूरों के स्कोर को मुक्त कर दिया गया था, उन्हें घर मुहैया कराने के लिए किसी भी पक्ष से कोई प्रतिबद्धता नहीं है। जहां तक डीडीए का संबंध है, यह केवल घरों को प्रदान करने के बजाय झुग्गी  बस्तियों को ध्वस्त करने में रुचि रखता है। हमें यह समझना चाहिए कि यह अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक और प्रवासी श्रमिक हैं जो इन कार्यों से प्रभावित हैं। मुझे लगा कि अजय माकन मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद स्थिति में सुधार होगा। लेकिन लगातार झुग्गी वस्तियों को ध्वस्त करने के इस  फैसले की भावना के खिलाफ है।  इसलिए  यह मुद्दा संसाधनों की कमी से अधिक राजनैतिक इच्छाशक्ति का अधिक है। 

DDA
Delhi
2019 चुनाव
General elections2019
loksabha elcetion 2019
AAP
BJP
Congress
working class
Housing and Urban Development Corporation

Related Stories

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

मुंडका अग्निकांड : क्या मज़दूरों की जान की कोई क़ीमत नहीं?

तमिलनाडु: छोटे बागानों के श्रमिकों को न्यूनतम मज़दूरी और कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रखा जा रहा है

मज़दूर दिवस : हम ऊंघते, क़लम घिसते हुए, उत्पीड़न और लाचारी में नहीं जियेंगे

ज़रूरी है दलित आदिवासी मज़दूरों के हालात पर भी ग़ौर करना

मई दिवस: मज़दूर—किसान एकता का संदेश

आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

दिल्ली: बर्ख़ास्त किए गए आंगनवाड़ी कर्मियों की बहाली के लिए सीटू की यूनियन ने किया प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोविड -19 के टीके का उत्पादन, निर्यात और मुनाफ़ा
    08 Feb 2022
    आज हम डॉ. सत्यजीत के साथ कोविड -19 के टीके का उत्पादन के बारे में बात करेंगे, टीके के निर्यात को ले के दुनिया के अलग- अलग देशों और उनके कंपनियों की नीतियों को भी समझेंगे और इन टीकों से जो बड़ा…
  • Uttarakhand
    मुकुंद झा
    उत्तराखंड चुनाव : रुद्रप्रयाग में दस साल पहले प्रस्तावित सैनिक स्कूल अभी तक नहीं बना, ज़मीन देने वाले किसान नाराज़!
    08 Feb 2022
    रुद्रप्रयाग विधानसभा के जखोली विकासखंड के थाती-बड़मा गांव में 2013 में सैनिक स्कूल प्रस्तावित किया गया था मगर आज तक यहाँ सरकार स्कूल नहीं बनवा पाई है। पढ़िये न्यूज़क्लिक संवाददाता मुकुंद झा की यह…
  • Media
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ‘केंद्रीय मीडिया प्रत्यायन दिशा-निर्देश-2022’ : स्वतंत्र मीडिया पर लगाम की एक और कोशिश?
    08 Feb 2022
    यह सरकारी दिशा-निर्देश ऊपर से जितने अच्छे या ज़रूरी दिखते हैं, क्या वास्तव में भी ऐसा है? ‘‘सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता’’ या ‘जन व्यवस्था’ जितने आवश्यक शब्द हैं, इन्हें लागू करने की नीति या…
  • union budget
    सी. सरतचंद
    अंतर्राष्ट्रीय वित्त और 2022-23 के केंद्रीय बजट का संकुचनकारी समष्टि अर्थशास्त्र
    08 Feb 2022
    केंद्र सरकार आखिरकार केंद्रीय बजट में ठहरे/गिरते सरकारी राजस्व व्यय और पूंजीगत व्यय में स्पष्ट वृद्धि के बीच में अंतर क्यों कर रही है?
  • jammu and kashmir
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर : क्षेत्रीय दलों ने परिसीमन आयोग के प्रस्ताव पर जताई नाराज़गी, प्रस्ताव को बताया जनता को शक्तिहीन करने का ज़रिया
    08 Feb 2022
    महबूबा मुफ़्ती का कहना है कि बीजेपी गांधी के भारत को गोडसे के भारत में बदलना चाहती है। इस लक्ष्य के लिए जम्मू-कश्मीर को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License