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डीयू : शैक्षणिक आज़ादी के लिए छात्रों का प्रदर्शन
"आरएसएस के इशारे पर काम करने वाले डीयू प्रशासन का यह रवैया स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थान के लिए ख़तरनाक है। किसी भी विश्वविद्यालय के जीवित रहने के लिए ज़रूरी है कि अपने प्रोफ़ेसरों को एकेडमिक फ़्रीडम दी जाए और छात्रों में एक महत्वपूर्ण तार्किक और आलोचनात्मक सोच विकसित की जाए।"
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
23 Jul 2019
DU Protest

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों ने अपनी एकेडमिक फ़्रीडम, यानी शैक्षणिक आज़ादी पर हो रहे हमलों के ख़िलाफ़ आज मंगलवार को दिल्ली विश्विद्यालय के आर्ट्स फ़ैकल्टी के बाहर प्रदर्शन किया। सभी ने डीयू के पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया में एबीवीपी की बाधा और हस्तक्षेप की निंदा की।

इससे पहले एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा अंग्रेज़ी और इतिहास विभाग के प्रोफ़ेसरों को धमकाने और एकेडमिक काउन्सिल की बैठक को बाधित किया था। इसे शिक्षकों ने विश्वविद्यालय की स्वतंत्रता पर हमला बताया था। शिक्षकों का कहना है कि सिलेबस तैयार करना एक स्वतंत्र शैक्षणिक काम है जिसमें विषय के साथ गहन जुड़ाव की आवश्यकता होती है और इसमें विषय के सभी शिक्षण सदस्यों के साथ व्यापक चर्चा की जाती है। अंग्रेज़ी विभाग के नव प्रस्तावित पाठ्यक्रम को डीयू में 120 से अधिक फ़ैकल्टी सदस्यों के संयुक्त प्रयासों द्वारा तैयार किया गया था। फ़ैकल्टी सदस्यों ने भी दिल्ली विश्वविद्यालय की एकेडेमिक काउन्सिल और कार्यकारी परिषद के समक्ष कई बार संशोधित सिलेबस का प्रस्ताव दिया था लेकिन कुलपति ने आरएसएस समर्थित शिक्षक के दबाव और एबीवीपी के दबाव में संशोधित सिलेबस को वापस भेज दिया।

डीयूटीए की पूर्व अध्यक्षा नंदिता नारायणन ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा, "पाठ्यक्रम तय करने के लिए एक तय क़ायदे और नियम है। उसी के आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किये जाते है। इसमें सभी हितधारकों शमिल होते है। लेकिन अब इन सभी को ख़त्म किया जा रहा है और शिक्षकों को धमकाया जा रहा है। विरोध करना सबका अधिकार है लेकिन उसके लिए एकेडमिक काउन्सिल की मीटिंग हॉल तक जाना और उसके सदस्यों को धमकी देना पूरी तरह निंदनीय है।"

उन्होंने कहा, "ये सब बिना प्रशासन की मिलीभगत के नहीं हो सकता है क्योंकि जहाँ मीटिंग हो रही थी उसके अंदर किसी को भी बिना परमिशन के जाने की अनुमति नहीं है तो फिर इतनी संख्या में परिषद के छात्र कैसे पहुंच गए!”

शिक्षक संघ के सदस्यों ने भी इसकी निंदा की और कहा, "आरएसएस के इशारे पर काम करने वाले डीयू प्रशासन का यह रवैया स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थान के लिए ख़तरनाक है। किसी भी विश्वविद्यालय के जीवित रहने के लिए ज़रूरी है कि अपने प्रोफ़ेसरों को एकेडमिक फ़्रीडम दी जाए और छात्रों में एक महत्वपूर्ण तार्किक और आलोचनात्मक सोच विकसित की जाए, लेकिन अगर शिक्षकों की चर्चा और तर्क की जगह किसी विशेष विचारधारा और उसके संगठनों के दबाव में पाठ्यक्रम तैयार किये जाएंगे तो विश्विद्यालय की आत्मा ही ख़त्म हो जाएगी।"

इससे पहले भी कई बार पाठयक्रमों से कई महत्वपूर्ण मुद्दों को हटाया गया है। इतिहास विभाग से भारत में वाम आंदोलन के इतिहास से संबंधित अध्यायों को हटा दिया था। राजनीति विज्ञान विभाग ने कृषि संकट और माओवादियों के संदर्भ में प्रोफ़ेसर नंदिनी सुंदर के लेखन को हटा दिया अंग्रेज़ी विभाग ने शिल्पा परालकर द्वारा 2002 में गुजरात दंगों के संदर्भ में लिखे गए मणिबेन उर्फ़ "बीबीजान" नामक एक अध्याय को हटा दिया है। इसी तरह, मुज़फ्फ़रनगर दंगों का उल्लेख वाले चैप्टर को अंग्रेज़ी पत्रकारिता पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया था।

Delhi University
Student Protests
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