NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
दंतेवाड़ा का दूसरा पक्ष
नंदिनी सुन्दर
04 Aug 2015

मोदी की दंतेवाड़ा यात्रा पर नंदिनी सुन्दर का आलेख जिसे अमर उजाला से साभार साझा किया जा रहा है;

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दंतेवाड़ा यात्रा के लिए सराहना की जानी चाहिए। लेकिन पिछले प्रधानमंत्री की यात्रा के विपरीत, जिन्होंने जैव विविधता और आदिवासी लोगों को हुए असाध्य नुकसान के कारण बोधघाट जलविद्युत परियोजना बंद कर दी थी, मोदी को यहां सिर्फ लोहा और इस्पात ही दिखाई दिया। सरकार ने इस क्षेत्र में अन्य चीजों के अलावा डिलमिली स्थित अल्ट्रा मेगा इस्पात संयंत्र और रावघाट-जगदलपुर रेलवे लाइन के लिए 24 हजार करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की। सार्वजनिक क्षेत्र के स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और इरकॉन के साथ समझौते किए गए, लेकिन नगरनार इस्पात संयंत्र में चल रहा निर्माण कार्य दर्शाता है कि टाटा जैसी निजी क्षेत्र की कई कंपनियों की दिलचस्पी कुछ खास चीजों में ही है।

                                                                                                       

गैर आदिवासी बाहरी लोग, जिनका इस क्षेत्र के व्यापार और राजनीति में वर्चस्व है, काफी खुश हैं। वे अपने बच्चों के लिए रोजगार, व्यावसायिक विस्तार और बस्तर में व्यापक बदलाव की संभावनाएं देख रहे हैं। बस्तर जल्द ही वन और आदिवासी बहुल इलाके की अपनी पहचान खो देगा और एक औद्योगिक क्षेत्र बन जाएगा। इसके बावजूद छोटे हिस्से में वन पर्यटन उपलब्ध रहेगा, चौराहे पर नृत्य करती आदिवासी महिलाओं की मूर्तियां सजी रहेंगी, पर असली आदिवासी शहरों में मजदूर बनने के लिए मजबूर होंगे। गोंडी (जो बहुसंख्यक आदिवासियों की भाषा है) नहीं, हिंदी बोली जाएगी।

जिन लोगों ने डिलमिली के आसपास मूल आदिवासी भूस्वामियों से एक हजार से लेकर पांच हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से सैकड़ों एकड़ जमीनें खरीदीं, वे िवशेष रूप से खुश हैं। इनमें कांग्रेस एवं भाजपा के राजनेता, नौकरशाह और मारवाड़ी व्यापारी शामिल हैं। आदिवासी नौकरशाहों और राजनेताओं को इससे समस्या नहीं है, पर चूंकि पांचवीं अनुसूची के तहत वैधानिक रूप से गैर आदिवासी आदिवासियों की जमीन नहीं ले सकते, इसलिए इनमें से कई जमीन बेनामी हैं। अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के ग्रामीणों को भी अपनी जमीन बेचने के लिए पहली बार निशाना बनाया गया है।

यही प्रक्रिया नगरनार में चल रही है। वर्ष 2001-02 में पुलिस ने उन लोगों को पीटा और गिरफ्तार किया, जिन्होंने मुआवजे का चेक लेने से इन्कार कर दिया। इनमें गर्भवती महिलाएं भी थीं। उनके घर भी तोड़ डाले गए। अंततः 303 परिवारों को 1023 एकड़ जमीन मामूली कीमत पर देने के लिए मजबूर होना पड़ा। मसलन, शंकर (नाम परिवर्तित) को अपनी पांच एकड़ जमीन के लिए 73,000 रुपये मिले। यह परिवार इस दर पर दूसरी जगह जमीन खरीदने में असमर्थ है और अपने बेटे की किरंदुल में एनएमडीसी में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी पर निर्भर है। अधिग्रहण का दूसरा दौर 2007 में चला, तब मात्र 28 लोगों को ही नौकरी मिली। आज ज्यादातर जमीनें बाहर के संपन्न लोगों द्वारा खरीदी जा चुकी हैं, बाकी जमीनों का अधिग्रहण 28 से 30 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर पर हो रहा है। यहां काफी पैसा बनाया गया है, पर उसमें स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी नहीं है। अखबारों में प्रकाशित पूरे पेज का सरकारी विज्ञापन यह तो बताता है कि डिलमिली इस्पात संयंत्र से 10,000 लोगों को रोजगार मिलेगा, पर वह यह नहीं बताता कि कितने लोगों को विस्थापित किया जाएगा और कितना रोजगार स्थानीय लोगों को मिलेगा।

जहां तक रावघाट की बात है, वहां यह मुद्दा नहीं है कि किसे लाभ मिलेगा, बल्कि तथ्य यह है कि इससे देश को नुकसान होगा। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की रिपोर्ट बताती है कि अगर रावघाट खदान और रेलवे लाइन अस्तित्व में आती है, तो दुर्लभ और लुप्तप्राय प्रजातियों की रेड लिस्ट में शामिल 26 पादप प्रजातियां, स्तनधारियों की 22 प्रजातियां (जिनमें से 15 या तो आईयूसीएन या डब्ल्यूपीए की सूची में लुप्तप्राय या संवेदनशील हैं), बड़ी संख्या में कीट, जिनमें कुछ दुर्लभ भी हैं, तितलियों की 28 प्रजातियां और पक्षियों की 102 प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। यह स्थल खनन कचरा डालने के लिए प्रस्तावित है। रिपोर्ट चेताती है कि इससे पूरी घाटी की जल निकासी अवरुद्ध हो जाएगी, और स्थानीय संस्कृति शायद विलुप्त हो जाएगी। पर इस क्षेत्र को सीआरपीएफ के 22 शिविर घेरे हुए हैं और खदान के काम को आगे बढ़ाने के लिए आसपास के गांवों के कई सरपंचों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

जावंगा के सरपंच बोमडा राम कवासी ने अपने गांव में हाई स्कूल, खेल के मैदान और हॉस्टल के निर्माण के लिए 22 एकड़ और अस्पताल के लिए पांच एकड़ सरकारी भूमि रख छोड़ी थी। जब कलक्टर रीना कंगाले और उनके उत्तराधिकारी ओपी चौधरी ने उन्हें जमीन देने के लिए कहा, तो वह आसानी से इस शर्त पर राजी हो गए कि गांव के बच्चों को पढ़ने की सुविधा मिलेगी। जावंगा का उदाहरण मोदी के तर्क को दर्शाता है कि नया भूमि अधिग्रहण कानून स्थानीय बुनियादी संरचनाओं के निर्माण के लिए जरूरी है। स्थानीय लोग स्कूलों और अस्पतालों के लिए जमीन देने को उत्सुक रहे हैं। समस्या सरकार की प्राथमिकताओं में है।

मोदी ने दंतेवाड़ा यात्रा के दौरान बच्चों के साथ अपनी जुगलबंदी के जरिये मानवीय पक्ष भले प्रदर्शित किया हो, लेकिन ध्यान रहे कि वहां 'विकास' बंदूक के दम पर और स्थानीय आदिवासियों की कीमत पर हो रहा है। बेशक माओवादियों को हिंसा रोकनी चाहिए, लेकिन क्या प्रधानमंत्री सलवा जुड़ूम या फर्जी मुठभेड़ों से प्रभावित उन हजारों बच्चों के साथ पांच मिनट बिताना चाहेंगे, जिनके घर जला दिए गए और जिनके माता-पिताओं का मार डाला गया या सुरक्षा बलों ने जिनके परिवार की महिलाओं के साथ बलात्कार किया? इसके बजाय भाजपा पर फिर से सलवा जुड़ूम शुरू करने का भूत चढ़ा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को इस अपराध के लिए मुकदमा चलाने और भविष्य में ऐसे किसी भी समूह के संचालन को रोकने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

सौजन्य; संघर्ष संवाद

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।

अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट
छत्तीसगढ़
दंतेवाड़ा
विस्थापन विरोधी आंदोलन
नरेन्द्र मोदी
भाजपा

Related Stories

बैलाडीला : अभी मोर्चा नहीं छोड़ेंगे आदिवासी, धरना-प्रदर्शन जारी

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों 10 सितम्बर को भारत बंद

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी


बाकी खबरें

  • sudan
    पीपल्स डिस्पैच
    सूडान: सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ 18वें देश्वयापी आंदोलन में 2 की मौत, 172 घायल
    17 Feb 2022
    इजिप्ट इस तख़्तापलट में सैन्य शासन का समर्थन कर रहा है। ऐसे में नागरिक प्रतिरोधक समितियों ने दोनों देशों की सीमाओं पर कम से कम 15 जगह बैरिकेडिंग की है, ताकि व्यापार रोका जा सके।
  • muslim
    नीलांजन मुखोपाध्याय
    मोदी जी, क्या आपने मुस्लिम महिलाओं से इसी सुरक्षा का वादा किया था?
    17 Feb 2022
    तीन तलाक के बारे में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना, तब, जब मुस्लिम महिलाओं को उनकी पारंपरिक पोशाक के एक हिस्से को सार्वजनिक चकाचौंध में उतारने पर मजबूर किया जा रहा है, यह न केवल लिंग, बल्कि धार्मिक पहचान पर भी…
  • aaj ki baat
    न्यूज़क्लिक टीम
    पंजाब चुनाव में दलित-फैक्टर, सबको याद आये रैदास
    16 Feb 2022
    पंजाब के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी सहित सभी पार्टियों के शीर्ष नेता बुधवार को संत रैदास के स्मृति स्थलों पर देखे गये. रैदास को चुनावी माहौल में याद करना जरूरी लगा क्योंकि पंजाब में 32 फीसदी…
  • up elections
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: मोदी की ‘आएंगे तो योगी ही’ से अलग नितिन गडकरी की लाइन
    16 Feb 2022
    अभी तय नहीं कौन आएंगे और कौन जाएंगे लेकिन ‘आएंगे तो योगी ही’ के नारों से लबरेज़ योगी और यूपी बीजेपी के समर्थकों को कहीं निराश न होना पड़ा जाए, क्योंकि नितिन गडकरी के बयान ने कई कयासों को जन्म दे दिया…
  • press freedom
    कृष्ण सिंह
    ‘दिशा-निर्देश 2022’: पत्रकारों की स्वतंत्र आवाज़ को दबाने का नया हथियार!
    16 Feb 2022
    दरअसल जो शर्तें पीआईबी मान्यता के लिए जोड़ी गई हैं वे भारतीय मीडिया पर दूरगामी असर डालने वाली हैं। यह सिर्फ किसी पत्रकार की मान्यता स्थगित और रद्द होने तक ही सीमित नहीं रहने वाला, यह मीडिया में हर उस…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License