NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
धर्म और जनतंत्र
अपूर्वानंद
05 Jan 2016

केरल के कन्नूर जिले के तालिपाराम्बा में आर. रफीक का स्टूडियो जला दिया गया. वे एक वीडियोग्राफर हैं. स्टूडियो पर हमले की यह वारदात रफीक के मुताबिक़ सार्वजनिक स्थलों पर बुर्के के दुरुपयोग को लेकर एक सीमित व्हाट्स एप समूह (इस्लाम क्या है?) के भीतर उनकी एक टिप्पणी के बाद हुई. उन्होंने कहा था कि पिछले दिनों ऐसी कई घटनाओं की रिपोर्ट आई है कि बुर्काधारी औरतें शादियों और गहनों की दुकानों में चोरियां कर रही हैं. रफीक ने कहा कि इसके पीछे ज़रूर कोई संगठित गिरोह है जो बुर्के की आड़ में चोरी का धंधा कर रहा है. उनका सुझाव था कि सार्वजनिक स्थलों पर औरतों को बुर्के या हिजाब का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ताकि इस गिरोह का पर्दाफ़ाश हो सके.

रफीक एक बहुत सीमित सन्दर्भ में एक सुझाव रख रहे थे. वे तो यह बहस भी नहीं कर रहे थे कि बुर्का इस्लामी रिवायत है या नहीं. उनका प्रस्ताव किसी धार्मिक सामाजिक परम्परा पर पुनर्विचार का भी नहीं था. लेकिन इस टिप्पणी के बाद उन्हें धमकियाँ मिलने लगीं. उनके स्टूडियो के और खुद उनके बहिष्कार का आह्वान किया जाने लगा. ये धमकियाँ केरल के भीतर से तो आईं ही, खाड़ी के मुल्कों से भी आईं यह रफीक का आरोप है जिन्होंने पुलिस को ऐसे सारे फोन नंबर सौंप दिए हैं.

फिर शनिवार की रात या इतवार की सुबह उनके स्टूडियो पर हमला हुआ और उसे बर्बाद कर दिया गया. यह हमला किसने किया, यह तो ठीक-ठीक पुलिस की तहकीकात से मालूम होना चाहिए लेकिन रफीक का और अनेक लोगों का खयाल है कि यह केरल के किसी इस्लामी कट्टरपंथी समूह का ही काम है.

रफीक एक बहुत ही सीमित वार्ता समूह में अपनी बात रख रहे थे जिसके सदस्य एक-दूसरे से परिचित हैं. जब तक उस व्हाट्स एप समूह में से किसी ने यह बात बाहर भी न की हो, उसका औरों तक पहुँचना मुमकिन न था. जाहिर है, उस समूह के किसी सदस्य ने एक आपसी चर्चा को सार्वजनिक कर दिया. अगर किसी ने यह किया तो उसने आपसी विचार-विमर्श के एक मान्य सिद्धांत का उल्लंघन किया  उसने परस्पर विश्वास को तोड़ दिया और अपने एक सदस्य को अरक्षित कर दिया. या फिर यह मान लेना पड़ेगा कि उसी समूह के भीतर के किसी ने यह हमला किया या करवाया जो और भी भयानक बात है. इसका अर्थ यह है कि अब संवाद संभव ही नहीं है.

इस हमले से हाल के एक दूसरे वाकए की याद आना अस्वाभाविक नहीं है जो प्रसिद्ध मलयाली अखबार माध्यमम की पत्रकार वी पी राजीना की फेसबुक पर की गई टिप्पणी के बाद उनपर हमले का था. यह शारीरिक हमला न था लेकिन उनपर गालियों और धमकियों की बौछार कर दी गई ,उनके फेसबुक खाते में सेंध लगाई गई और फिर उसे बंद करवा दिया गया. राजीना ने उस टिप्पणी में अपने एक अनुभव के सहारे मदरसों में बच्चों के यौन शोषण की चर्चा की थी.

राजीना पर आरोप लगाया गया कि वे मदरसों को बदनाम कर रही हैं और इस तरह इस्लाम की भी हतक कर रही हैं. यह सामान्य बुद्धि का मालिक भी समझ सकता है कि न तो रफीक और न ही राजीना का मकसद इस्लाम की आलोचना करना था. यह एक दीगर सवाल है कि अगर वे ऐसा कर भी रहे होते तो यह उनका हक था और इस वजह से उनपर हमला जायज़ नहीं हो जाता.


 

अव्वल तो, जैसा राजीना ने कहा, इस्लाम या कोई भी धर्म इतना कमजोर नहीं कि आलोचना से ढह जाए. दूसरी बात, आलोचना एक सम्पूर्ण कार्रवाई है. अगर एक जगह आलोचना में कोताही की जाती है तो वह दूसरी जगह की आलोचना की वैधता ख़त्म कर डालती है. इसके अलावा आप खुद अपने लिए जनतांत्रिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते अगर स्वयं यह दूसरों को देने के पक्ष में आप नहीं हैं.

 

राजीना ने अपना तजुर्बा बयान किया था. वे बच्चों के यौन शोषण की गंभीरता को सामने लाना चाहती थीं. उस पर चर्चा तो दूर, राजीना पर ही चर्चा होने लगी. और यह चर्चा न थी, हमला था. राजीना इससे डरी नहीं. लेकिन केरल के एक प्रमुख इस्लामी प्रकाशन समूह के उपनिदेशक के. टी हुसैन कुत्तूर ने जब उनपर अपने मदरसे के अनुभव में मिर्च मसाला लगा कर लिखने का आरोप लगाया तो राजीना ने कहा कि मैं अपने तजुर्बे का शतांश भी नहीं लिख पाई हूँ और यह बड़ी बदकिस्मती की बात है कि जब कोई औरत इस तरह के शोषण को सार्वजनिक करती है तो उसे हिम्मत बँधाने की जगह उस पर हमला किया जाता है.

राजीना पर भी इस्लाम की हतक का आरोप लगाया गया. उन्होंने ठीक लिखा कि क्या इस्लाम बच्चों का  यौन शोषण करनेवालों को बचाने की बात करता है, क्या वह इतना कमजोर है? उन्होंने लिखा कि मेरी नज़र में इस्लाम इतना  कमजोर नहीं और वह सिर्फ मर्दों और औरतों के हक की नहीं सारे प्राणियों के अधिकार की बात करता है.

जैसा हमने पहले कहा. ऐसे हर मामले में ज़रूरी नहीं होना चाहिए कि हमले का शिकार पहले इस्लाम से अपनी वफादारी का इजहार करे, तभी उसकी मदद की जाए. केरल में राजीना पर हमले के बहुत पहले 2010 में कोच्ची के तोदुपुज्झा के न्यूमैन कॉलेज में मलयालम के शिक्षक टी जे जोसफ पर यह आरोप लगा कर कि उन्होंने एक प्रश्न पत्र में मोहम्मद साहब का अपमान करने की नीयत से एक प्रश्न बनाया था, पहले तो उनकी नौकरी खत्म कर दी गई और फिर एक दिन चर्च से लौटते वक्त उनपर हमला करके उनका एक हाथ काट दिया गया. ईसाइयों के इस कॉलेज ने जोएस्फ की नौकरी बहाल न की जिसके नतीजे में अपमान और गरीबी न झेल पाने के चलते उनकी पत्नी ने चार साल बाद खुदकुशी कर ली. हमलावर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के सदस्य कहे जाते हैं. इस साल उनके हमलावरों को सजा सुनाई गई.

जोसफ के आरोप की जांच करने पर पता चाला कि उन्होंने तो सिर्फ एक मलायली लेखक की रचना के अंश के आधार पर सवाल बनाया था जिसमें एक पागल और खुदा के बीच की एक बातचीत की कल्पना थी.

इस्लाम के मुहाफ़िज़ों के गिरोह इस्लाम के भीतर किसी विचार-विमर्श की संभावना को ऐसे हमलो से खत्म कर रहे हैं और इस तरह उसे एक जीवित धार्मिक परंपरा के गौरव से वंचित करके रूढ़ियों के एक सिलसिले में शेष कर रहे हैं. किसी तरह के आत्म-चिंतन और आत्मावलोकन की ताकत के बिना किसी भी परंपरा का ज़िंदा रहना नामुमकिन है.

इस बात पर बहुत चर्चा की जाती है कि क्या आज के दौर में जब एक तरह का इस्लाम-भय पूरी दुनिया में फैलाया जा रहा हो, फ्रांस में नेशनल फ्रंट, अमरीका में रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प या भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे लोग और संगठन जब ऐसा सुनियोजित तरीके से कर रहे हों तब क्या इस्लाम या मुसलमानों की ऐसी आलोचना ठीक है जो उनकी नकारात्मक छवि बनाती हो! इस आड़ में इस्लाम के भीतर और बाहर किसी तरह की समीक्षा या आलोचना को गलत ही नहीं, समुदाय के खिलाफ जुर्म ठहरा दिया जाता है.

अव्वल तो, जैसा राजीना ने कहा, इस्लाम या कोई भी धर्म इतना कमजोर नहीं कि आलोचना से ढह जाए. दूसरी बात, आलोचना एक सम्पूर्ण कार्रवाई है. अगर एक जगह आलोचना में कोताही की जाती है तो वह दूसरी जगह की आलोचना की वैधता ख़त्म कर डालती है. इसके अलावा आप खुद अपने लिए जनतांत्रिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते अगर स्वयं यह दूसरों को देने के पक्ष में आप नहीं हैं.

जो लोग धर्म या मजहब के रक्षक हैं, वे दरअसल धार्मिक नहीं. क्योंकि हर धर्म एक मानवेतर, उससे कही ऊपर की सत्ता की प्रभुता पर टिका है. तो क्या यह इंसानी अहंकार नहीं कि वह इस सर्वोच्च सत्ता की मान रक्षा का दावा करता है?

सारी धार्मिक व्यवस्थाओं को इस बात का इल्म होना बहुत ज़रूरी है कि वे एक जनतांत्रिक संसार में रह रहे हैं और यह संसार व्यक्तियों की आज़ादी के उसूल पर टिका है. उसमें आलोचना का अधिकार बुनियादी है. और यह टुकड़ों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. दुनिया के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति पर अपनी राय जाहिर करने के लिए जब हमला हो तो उसका विरोध में हिचकिचाहट का मतलब है उस आज़ादी की जगह का सिकुड़ना.   

(यह लेख सत्याग्रह वेबसाईट में भी छपा हैं)

सौजन्य: सबरंगइंडिया
 
डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख में वक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारों को नहीं दर्शाते ।
 
केरल
कन्नूर
तालिपाराम्बा
आर. रफीक
आरएसएस
इस्लाम

Related Stories

नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक: नहीं काम आ रहा 'डबल इंजन’, यूपी-बिहार सबसे नीचे

बढ़ते हुए वैश्विक संप्रदायवाद का मुकाबला ज़रुरी

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा भी बोगस निकला, आप फिर उल्लू बने

एमरजेंसी काल: लामबंदी की जगह हथियार डाल दिये आरएसएस ने

हामिद अंसारी, जिन्ना की तस्वीर और एएमयू में हंगामा

जेईजेएए NDA सरकार के ख़िलाफ 16 मई से राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएगा

बिहार: इस्लामोफ़ोबिक नारों और आक्रामक तेवरों ने 7 ज़िलों में सांप्रदायिक दंगे करवाए

इन दो पिताओं को सुन लें, इससे पहले कि नेता आपको दंगाई बना दे

तमिलनाडु के विपक्षी दलों ने 'राम राज्य रथ यात्रा’ को अनुमति देने का विरोध किया

तेरी मेरी सबकी बात ,कन्हैया कुमार के साथ: राजनीतिक विकल्प की बात-2


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 19 महीने बाद 6 हज़ार से कम नए मामले सामने आए 
    14 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 88 हज़ार 993 हो गयी है, लेकिन साथ ही देश में अब ओमिक्रॉन वेरिएंट के मामलो की संख्या बढ़कर 41 हो गयी है।
  • health sector
    ऋचा चिंतन
    भाजपा के कार्यकाल में स्वास्थ्य कर्मियों की अनदेखी का नतीजा है यूपी की ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था
    14 Dec 2021
    एक कमज़ोर और अपर्याप्त स्वास्थ्य कार्यबल का ही नतीजा होता है कि लोगों की स्वास्थ्य सेवा की स्थिति ख़राब हो जाती है। यूपी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, जहां स्वास्थ्य कर्मी, ख़ास तौर पर ग्रामीण यूपी में…
  • data protection bill
    प्रबीर पुरकायस्थ
    डेटा निजता विधेयक: हमारे डेटा के बाजारीकरण और निजता के अधिकार को कमज़ोर करने का खेल
    14 Dec 2021
    सरकार द्वारा एकत्र किए जाने वाले हमारे डेटा के व्यापारीकरण को निजी डेटा संरक्षण विधेयक के साथ जोड़ दिया गया है।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    PM मोदी का बनारस दौरा, CBSE के प्रश्नपत्र पर विवाद और अन्य ख़बरें
    13 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी पीएम के काशी दौरे पर जनता का सवाल, CBSE के स्त्री विरोधी प्रश्नपत्र पर विवाद और अन्य ख़बरों पर।
  • Farmers' Movement
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन: लंगर के लिए भी याद रखा जाएगा
    13 Dec 2021
    एक साल से लंबे संघर्ष के बाद किसानों की जीत के साथ उनका आंदोलन खत्म हुआI यह आंदोलन अपने तमाम अन्य पहलुओं के साथ-साथ सभी मोर्चों पर चल रहे लंगरों के लिए भी याद रखा जाएगाI न्यूज़क्लिक ने 10 दिसंबर यानी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License