NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
धर्मान्तरण – दलितों और गरीबों के खिलाफ एक घिनौना अपराध
महेश कुमार
16 Dec 2014

बलपूर्वक या किसी लालच के एवज़ में धर्मान्तरण घिनौना अपराध है. यह अपराध सदियों से किया जा रहा है. मज़े की बात है कि इस अपराध के लिए आज तक किसी को सज़ा नहीं मिली है. धर्म को आधार बनाकर देश के समुदायों में साम्प्रदायिक उन्माद को बढ़ावा देने वाली शक्तियां न कल चुप बैठी थीं और न आज़. वे लगातार अपना काम जारी रहे हुए हैं. तथाकथित विकास पुरुष मोदी के सत्ता में आने के बाद जड़ हिनुद्त्व की ताकतें इस अभियान में जोर-शोर से लग गयी हैं और आर.एस.एस. और उसके सहयोगी संगठन “घर वापसी” के नाम पर मुस्लिम और ईसाईयों के धर्मान्तरण के व्यापक कार्यक्रमों के आयोजनों में जुट गए हैं. उनका कहना है कि हम उन सभी का धर्म परिवर्तन कराएंगे जो लोग हिन्दू धर्म छोड़कर मुस्लिम या इसाई धर्म में गए हैं.

धर्मान्तरण के शिकार कौन हैं

अगर इतिहास उठाकर देखा जाए तो पता चलेगा कि मुख्यतः धर्म परिवर्तन के शिकार ज्यादातर वे ही लोग होते हैं जी गरीब हैं और दलित और आदिवासी समुदायों से सम्बन्ध रखते हैं. यह याद रखना चाहिए कि देश के संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर को भी हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म की शरण में जाना पड़ा था. और उन्होंने इसका मुख्य कारण हिन्दू धर्म में जाती व्यवस्था और उसके आधार पर दलितों का उत्पीड़न बताया था. हिन्दू समाज जिसे कि मनु स्मृति और जातीय व्यवस्था के आधार पर चलाया जाता है, उसमें दलितों का शोषण सदियों से होता आया है. यही एक सबसे बड़ी वजह रही है इन समुदायों के लोग जातीय उत्पीड़न से बचने के लिए धर्म परिवर्तन करते रहे हैं. आज भी जाती के नाम पर हर राज्य में दलितों का भयानक शोषण जारी है. उनके घरों को जलाना, उनकी बारातों को गाँव में प्रवेश न करने देना, उनकी महिलाओं से बलात्कार करना, उनकी ज़मीनों पर कब्ज़ा करना और उनके लिए सरकारी योजनाओं का दुरूपयोग करना आदि निरंतर जारी है. अपने ही धर्म में जब वे बेगाने बन जाते हैं तो उन्हें धर्म परिवर्तन कुछ हद तक उस स्थिति से उभरने का उपाय नज़र आने लगता है. यह बात अलग है कि धर्म परिवर्तन के बावजूद वे या तो दलित मुस्लिम या फिर दलित इसाई कहलाते हैं. कुल मिलाकर धर्म परिवर्तन करने के बावजूद भी उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई सुधार नहीं होता है. आदिवासियों को बड़े स्तर पर इस धर्म से उस धर्म में खींचने का प्रयास चलता रहता है. आर.एस.एस. ने न जाने आदिवासियों के नाम पर कितने संगठन खोले हुए जो उन्हें हमेशा “घर वापसी” के नाम पर इसाई धर्म से हिन्दू धर्म में लाने की कोशिश करते रहते हैं. लेकिन ये तथाकथित ‘घर वापसी’ वाले सभी संगठन इन तबकों के सामाजिक और आर्थिक तरक्की की बात नहीं करते हैं। न ही ये संगठन जातीय व्यवस्था के खात्मे की बात करते हैं। अफ़सोस इस बात का भी है कि बड़े-बड़े दलित नेता भी इस साम्प्रदायिक मुहीम के खिलाफ कुछ कारगर कदम नहीं उठाते हैं। क्योंकि इस मुहीम के पीछे एक राजनीतिक मंशा छिपी हुयी है। यानी वोट की राजनीति के लिए कोई किसी को नाराज़ नहीं करना चाहता है।

                                                                                                                                  

भाजपा, आर.एस.एस, धर्म जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल आदि संगठन हिंदुत्व के नाम पर सांप्रदायिक मुहीम चला रहे हैं और वे इसके ज़रिये राज सत्ता पर मुकम्मल कब्ज़ा चाहते हैं। यह स्थिति उनके लिए काफी अच्छी स्थिति है क्योंकि विपक्ष पूरी तरह से कमज़ोर और बंटा हुआ है। इन ताकतों के पीछे मज़बूत और ताकतवार कॉर्पोरेट मीडिया है जो मोटी रकम लेकर अपन मोटा पेट फुलाए बैठा है और इस मोटे पेट के नीचे क्या हो रहा है उसे इससे कोई लेना देना नहीं ही। वह बड़े आर्थिक सुधार का सपना देखते हुए मस्त है क्योंकि इन नव-उदारवादी सुधारों से अगर किसी का फायदा होगा तो केवल उनके आका कॉर्पोरेट का ही फायदा होगा। इसलिए महंगाई कितनी भी बढे, किसान कितनी भी आत्म-हत्या करें, बेरोज़गारी कितनी भी बढे, कृषि डूब जाए, विनिर्माण उद्योग तबाह हो जाए लेकिन जनता को तबाह करने वाले और कॉर्पोरेट को अंधा मुनाफा कमाने वाले आर्थिक सुधार जारी रहने चाहिए। इसीलिए  जनता का ध्यान इस तबाही की ओर न जाए, संघियों ने अपने गुप्त एजेंडे को लागू करना शुरू कर दिया है।

                                                                                                                     

यही सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा के सांसद चाहे वह साक्षी महाराज हो या साध्वी ज्योति हों – सभी को वॉक ओवर मिला हुआ है। वे कुछ भी कह सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। मुंबई में विश्व हिन्दू परिषद् के सम्मलेन में तो यहाँ तक बोल दिया गया कि हम पूरी दुनिया को हिंदुत्व के दायरे में लायेंगे। शायद यही कारण है की प्रधानमंत्री मोदी अब यहाँ सरकार बनाने के बाद विदेशों में ज्यादा घूम रहे हैं ताकि इस एजेंडे को विश्व स्तर पर लागू किया जा सके क्योंकि उन्होंने यहाँ की कमांड साध्वी निरंजन ज्योति, विनय कटियार, योगी आदित्यनाथ, गिरिराज सिंह और साक्षी महाराज सरीखे नेताओं के हाथों में दे दी है। 

हमारे संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा है कि व्यक्ति गर चाहे तो वह किसी भी धर्म की शरण में जा सकता है। और अगर कोई नास्तिक रहना चाहे तो वह भी आजादी संविधान ने हर व्यक्ति को दी है। साथ संविधान बलपूर्वक या किसी लालच में किये गए धर्म परिवर्तन को भी पूर्ण रूप से खारिज करता है। आर।एस।एस – भाजपा और उसके सहयोगी संगठन देश के संविधान की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं क्योंकि वे बलपूर्वक या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं, इसका सबूत आगरा में हुए धर्म परिवर्तन से लगाया जा सकता है जहाँ एक राशन कार्ड और आधार कार्ड के लालच में धर्म परिवर्तन किया गया है।

इस मुहीम को तेज़ करने के लिए अब संघी गिरोह ने कमाल कर दिया है। उन्होंने धर्म परिवर्तन के लिए रेट तय कर दिए हैं और आम जनता से व्यापक फंड अभियान शुरू कर दिया है। मुस्लिम धर्म से परिवर्तन के लिए 5 रूपए और इसाई धर्म से परिवर्तन के लिए 2 लाख रूपए। बाज़ार का ज़माना है और मोदी सरकार भी देश की सम्पत्ति को बाज़ार में नीलाम कर रही है। इसलिए वे बड़ी – बड़ी बहुराष्ट्रीय निगमों को देश के लिए न बनाकर “देश में बनाओ और मुनाफा लूट कर विदेश ले जाओ” का नारा दे रहे हैं। लेकिन बाज़ार ने आज तक न तो किसी सरकार को बचाया है और न ही किसी साम्प्रदायिक ज़हर उगलने वाली शक्ति को। याद रहे हिटलर भी अपने आपको नहीं बचा पाया था। जब जनता अपने हक के लिए खड़ी होगी तो हर बात का हिसाब मांगेंगी।

डिस्क्लेमर:- उपर्युक्त लेख मे व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं, और आवश्यक तौर पर न्यूज़क्लिक के विचारो को नहीं दर्शाते ।

धर्म परिवर्तन
आगरा
भाजपा
आर.एस.एस
साक्षी महाराज
साध्वी निरंजन ज्योति
आदित्यनाथ
मनु
मनुस्मृति

Related Stories

#श्रमिकहड़ताल : शौक नहीं मज़बूरी है..

आदर्श बहुओं की नहीं आदर्श पतियों की है कमी

आपकी चुप्पी बता रहा है कि आपके लिए राष्ट्र का मतलब जमीन का टुकड़ा है

अबकी बार, मॉबलिंचिग की सरकार; कितनी जाँच की दरकार!

आरक्षण खात्मे का षड्यंत्र: दलित-ओबीसी पर बड़ा प्रहार

झारखंड बंद: भूमि अधिग्रहण बिल में संशोधन के खिलाफ विपक्ष का संयुक्त विरोध

झारखण्ड भूमि अधिग्रहण संशोधन बिल, 2017: आदिवासी विरोधी भाजपा सरकार

यूपी: योगी सरकार में कई बीजेपी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप

मोदी के एक आदर्श गाँव की कहानी

क्या भाजपा शासित असम में भारतीय नागरिकों से छीनी जा रही है उनकी नागरिकता?


बाकी खबरें

  • कमलप्रीत
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: कमलप्रीत ने फाइनल के लिए क्वालीफाई किया, सीमा पूनिया और श्रीशंकर चूके
    31 Jul 2021
    पच्चीस वर्ष की कमलप्रीत ने चक्का फेंक के अपने तीसरे प्रयास में 64 मीटर का थ्रो फेंका जो क्वालीफिकेशन मार्क भी था। क्वालीफिकेशन में शीर्ष रहने वाली अमेरिका की वालारी आलमैन के अलावा वह 64 मीटर या अधिक…
  • टोक्यो ओलंपिक: चार दशक बाद ओलंपिक सेमीफाइनल में जगह बनाने से एक कदम दूर भारतीय हॉकी टीम
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: चार दशक बाद ओलंपिक सेमीफाइनल में जगह बनाने से एक कदम दूर भारतीय हॉकी टीम
    31 Jul 2021
    ओलंपिक में भारत को आखिरी पदक 1980 में मॉस्को में मिला था जब वासुदेवन भास्करन की कप्तानी में टीम ने पीला तमगा जीता था। उसके बाद से भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन में लगातार गिरावट आई।
  • सनबोर शुलई
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट/भाषा
    मुर्गा, बकरा या मछली के बजाय बीफ ज़्यादा खाओ : भाजपा मंत्री
    31 Jul 2021
    पिछले हफ्ते ही मेघालय सरकार में पशुपालन और पशु चिकित्सा मंत्री की शपथ लेने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता सनबोर शुलई ने बीफ ज़्यादा से ज़्यादा खाने की वकालत कर सबको चौंका दिया है।
  • सिंधू
    भाषा
    टोक्यो ओलंपिक: सिंधू का स्वर्ण पदक का सपना टूटा, कांस्य के लिये बिंग जियाओ से भिड़ेगी
    31 Jul 2021
    रियो ओलंपिक की रजत पदक विजेता सिंधू ने ताइ जु को पहले गेम में कड़ी चुनौती पेश की लेकिन आखिर में उन्हें 40 मिनट तक चले मैच में 18-21, 12-21 से हार का सामना करना पड़ा।
  • बिहार: काम का दाम मांग रहे वार्ड सचिवों पर बर्बर लाठीचार्ज को लेकर आक्रोश
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार: काम का दाम मांग रहे वार्ड सचिवों पर बर्बर लाठीचार्ज को लेकर आक्रोश
    31 Jul 2021
    "विगत चार सालों से सरकार राज्य के 1 लाख 14 हजार वार्ड सचिवों से वार्ड स्तर पर नल-जल एवं गली-नली योजना में काम कराती रही है लेकिन आज तक इन लोगों को एक रुपया तक नहीं दिया गया है। जब वे अपने काम का दाम…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License