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भारत
राजनीति
एक कश्मीरी पंडित कश्मीरी मुसलमानों के लिए क्यों दुखी होता है 
वहां कौन वापस आएगा जहां सड़कों पर मौत नाचती है और बेरोज़गारी अपने चरम पर है?
प्रदीप मैगजीन
08 Aug 2019
Translated by महेश कुमार
jammu and kashmir

जब भी मैं अपने दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश करता हूं, तो मेरी सबसे पुरानी यादों में, लाखों विचार दिमाग में घुमने लगते हैं, और तब मुझे वह वाक्या याद आता है जब एक बच्चा था और जिसे सुरक्षा और आराम का आनंद प्राप्त था उसे एक बूढ़ा और झुर्रियों से भरा व्यक्ति अपने कंधों पर ले जा रहा है।

मुझे तब पता नहीं था कि वह आदमी एक मुसलमान था और मैं एक कश्मीरी पंडित, जैसा कि मैं पैदा हुआ था, जैसे हम सभी पैदा होते हैं, एक ऐसी दुनिया में जिसे मैं मुश्किल से समझ सकता था। 

मेरी चेतना सुप्त यानि निष्क्रिय थी और मेरा दिमाग उन छवियों को दर्ज़ कर रहा था जैसा कि वे दिखाई दे रही थी न कि जैसी वे होनी चाहिए थी। लगभग छह दशक बाद, मुझे याद है कि मेरे आसपास ऐसा कुछ नहीं हो रहा है, जिसे मैं उस याद के साथ जोड़ सकता हूं, बस अगर याद है तो मेरा खुद का रोना और बाद में उनके कांधे की सवारी और मस्ती। 

उन बचपन की यादों से मेरी ज़िंदगी काफी हद तक दूर चली गई है। मैंने अपने जीवन में कई सुखद और भद्दे नज़ारे देखे और उन्हें बाकायदा अपने जेहन में दर्ज़ किया है; इस सब से मेरा दिमाग उबलने लगा।

मैं वह कश्मीरी प्रवासी हूं, जिसने साठ के दशक की शुरुआत में घाटी छोड़ दी थी, क्योंकि मेरे पिता ने केंद्र सरकार की नौकरी कर ली थी। मैंने अपना अधिकांश प्रारंभिक जीवन पंजाब में बिताया, इसलिए मैं एक अलग पंजाबी टोन के साथ बात करता हूं। फिर भी, आदतें और लालन-पालन से मैं अभी भी एक कश्मीरी हूं।

घाटी के साथ मेरा सांस्कृतिक संबंध कभी नहीं बिगड़ा क्योंकि मेरे दादा-दादी कश्मीर में ही रहते थे, मेरे बड़े भाई ने अपनी स्कूली शिक्षा वहीं समाप्त की, और गर्मियों के दौरान मैं नियमित रूप से अपने घर जाया करता था।

यह सब अस्सी के दशक के अंत तक चला, उसके बाद अचानक, बड़े पैमाने पर विद्रोह और उग्रवाद भड़क उठा, ऐसी तेजी के साथ कि जिसने हम सभी को स्तब्ध कर दिया। भय और हिंसा से घबराकर, एक पलायन की लहर पूरी घाटी में दौड़ गई। 

एक आधिकारिक आंकड़े के अनुसार, उस समय लगभग 200 कश्मीरी पंडित मारे गए थे, हालांकि कुछ का दावा है कि मरने वालो की संख्या काफी अधिक थी। इस हिंसा ने हमारे घरों के दरवाजे हमारे लिए हमेशा के लिए बंद कर दिए थे।

मैंने पहली बार 'हम' और 'वे' के बीच के विभाजन को उस समय में देखा था, जब मैंने बड़े होते वक़्त जो समय घाटी में बिताया था, लेकिन वह विभाजन मेरे द्वारा देखे गए जीवन का केवल एक छोटा सा पहलू था।

इस विभाजन ने अब एक और भयावह मोड़ ले लिया था। तब से, कश्मीर में जो हिंसा भड़की है, उसने एक धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को उनके वतन से उखाड़ फेंका है और बहुसंख्यक मुस्लिमों को उनके अपने ही राज्य में अपंग बना दिया है। उनमें से या तो हजारों आतंकवादी की बंदूक से मारे गए हैं, या फिर सुरक्षा बलों द्वारा।

लगभग एक दशक तक, कश्मीर हमारे लिए न जाने की जगह बन गया था। 2000 के दशक से मेरी श्रीनगर जाने की यात्रा फिर से शुरू हुई। मेरा खुले हाथों से स्वागत किया गया, हालांकि सभी व्यावहारिक मामलों में, मैं अब एक बाहरी व्यक्ति ही था और मैं सोचता था कि क्या मेरे लिए एक ऐसे राज्य में कोई जगह है जो भारत के साथ युद्ध में शामिल है। यह युद्ध और मेरा बाहरी होना या शरणार्थी होने का दर्ज़ा मेरी नागरिकता की पहचान बन गई थी।

अपनी यात्राओं के दौरान, मैंने देखा कि श्रीनगर में करण नगर क्षेत्र, जहां मेरे दादा-दादी रहते थे, अभी भी यहां कुछ जीवन बचा था। यह शहर में तैनात कई केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) बटालियनों में से एक का मुख्यालय बन गया था। 

हमारा घर बरकरार था, हालांकि इसमें वहां के अधिकांश पंडित के घरों की तरह सुरक्षा बल रह रहे थे। अन्य स्थान जहां से पंडित दहशत में भाग गए थे, वह जगह हमेशा एक सुनसान कब्रिस्तान की तरह मेरा स्वागत करती थी। उनके घरों को बंद कर दिया गया था, ये घर उपेक्षा का शिकार थे और अपने रखरखाव के लिए जैसे रो रहे थे।

कई अन्य पंडितों की तरह, मैं अब कश्मीर का एक नियमित आगंतुक हूं, लेकिन स्थायी वापसी का विचार मेरे दिमाग में कभी नहीं आया। बंदूक का डर अभी भी 'हमें' सताता है, हालांकि घाटी में पर्याप्त आवाजें हैं जो हमें वापस बुलाती हैं और कहती हैं कि 'वापस आओ'। 

आखिरकार, ऐसी जगह पर कौन लौटना चाहेगा जहां मौत सड़कों पर नाचती है, जहां स्थानीय लोग असुरक्षित हैं और आर्थिक रूप से अपने अस्तित्व को बनाने लिए कोई रोजगार मौजूद नहीं हैं।

ज्यादातर पंडितों की तरह, खासकर पुरानी पीढ़ी के, मेरे अब भी कश्मीरी मुस्लिम दोस्त हैं। मेरे मामले में, इनमें से कई लोगों के साथ मेरे रिश्ते वर्ष 2000 के बाद कायम हुए हैं। 

उन्होंने मेरे दर्द को समझा और मैंने उनके, फिर भी विडंबना यह है कि इस दुख के बारे में हम कुछ नहीं कर सकते हैं। जब इतिहास के पन्नों को खून में डुबोया जा रहा हो और नफरत और विभाजन को बढ़ाने वाले सभी फैसलों के पीछे राजनीति ही एकमात्र ताकत है, तो एक उस खाईं को पाटना असंभव हो जाता है। 

जब आप एक जटिल मानवीय त्रासदी को एक आरोप-प्रत्यारोप के खेल में तबदील कर देते हैं और उन आरोपों से प्रभावित हो कर अपनी प्रतिक्रियाओं को आकार देते हैं और आप फिर अपना मत इसके अनुसार देते हैं कि आप किस समुदाय से हैं, तो इससे यह तय हो जाता है कि आप एक बड़ी तबाही की तरफ बढ़ रहे हो सकते है।

जब से मैं पैदा हुआ, तब से कश्मीर एक राजनीतिक समस्या है, जिसे पहले विभाजन ने बढ़ाया और उसके बाद महाराजा हरि सिंह के डोगरा शासन ने उसे आकार दिया। बाद के युग को कई इतिहासकारों द्वारा समझाया गया है, लेकिन इतिहासकार मृदु राय से बेहतर अभी तक कोई नहीं है जिन्होंने अपनी पुस्तक, हिंदू शासक, मुस्लिम विषय, में विस्तार से समझाया है।

कश्मीर मुद्दे पर मेरी अपनी प्रतिक्रियाएं और कश्मीरी पंडितों के प्रवास के मद्देनज़र, मेरे पिता के व्यापक धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण ने मेरी समझ को आकार दिया। उस समय मेरे कई युवा रिश्तेदारों के विपरीत, मेरे पिता के दिल में 'अन्य' के लिए मोहब्बत थी और नफरत कभी नहीं रही थी। उनके लिए, शेख अब्दुल्ला, 1947 के बाद कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री और नेशनक कॉन्फ्रेंस के संस्थापक थे, जो हिंदुओं के एक रक्षक थे।

हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित कश्मीर से मिलन का दस्तावेज (Instrument of Accession) कई शर्तों के साथ लाया गया था, संविधान का अनुच्छेद 370 उनमें से एक था। एक वादा किया गया था कि इस क्षेत्र में शांति स्थापित होने के बाद जनमत संग्रह होगा। कश्मीरियों को मतपत्र के माध्यम से अपना भविष्य तय करने का अधिकार दिया जाएगा। यह विश्वास का वह अनुछेद है, जिसने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था, जिसे  भारत सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को एक क्रूर तरीके से समाप्त कर दिया।

जो मेरे पिता ने मुझे बताया था, मेरे बचपन की यादें और कश्मीर की मेरी यात्रा मुझे दोबारा से अपना मन बनाने का कोई कारण नहीं देती हैं। मैं जानता था- और मैं खुद यह सब देख सकता था - कि कश्मीरी मुसलमानों को बहुत शिकायतें थीं और उनके दिल में आज़ादी की चाहत थी।

एक छोटे से अल्पसंख्यक होने के बावजूद, हम कश्मीरी पंडित घाटी में महलनुमा घरों में रहते थे, हमने नौकरशाही, कॉलेजों और अस्पतालों को नियंत्रित किया हुआ था ... 1989 के बाद यह बदल गया, जब 'विशेषाधिकार प्राप्त' अल्पसंख्यक 'शरणार्थी' बन गए। एक कठोर दक्षिणपंथी सरकार के सत्ता में आने से, भारतीय मानचित्र पर कश्मीर का महत्व केवल एक बिंदु की तरह सिमट कर रह गया है।

मेरे जैसे बहुत से लोग दुखी और हैरान हो गए हैं, जिस तरह से इस उद्देश्य को हासिल करने की कोशिश की गई है; वह भी एक ऐसे देश के लोगों के व्यापक समर्थन से, जो यह कहते हुए कभी नहीं थकता कि वह वसुधैव कुटुम्बकम या दुनिया को एक परिवार मानता है, और जो बुद्ध की भूमि होने का दावा करता है, जो मानता था कि केवल करुणा के जरिए, यहां तक कि अपने शत्रु के प्रति, आप निर्वाण को प्राप्त कर सकते हैं।

एक राज्य की पूरी की पूरी आबादी को उनके घरों में बंद कर देना, उनके राजनीतिक नेताओं को गिरफ्तार कर लेना, किसी भी तरह के विरोध को कुचलने के हजारों सैनिकों को उतार देना, और फिर उनके सभी संचार माध्यमों को समाप्त कर देना वह भी उन्हें विश्वास में लिए बिना, यह मोदी सरकार द्वारा एक अकल्पनीय कायरता का काम है, जो कड़ी निंदा को आमंत्रित करता है।

जब मैं उन लाखों लोगों की चिंता के बारे में सोचता हूं जो डर के साये में रह रहे हैं, जो अपने घरों में यह सोच रहे हैं कि उनके भाग्य में आगे क्या लिखा है, उस बूढ़े आदमी की याद जो मुझे अपने दर्दनाक बचपन के क्षणों की फिर से याद दिलाती है। मैं अब उसकी आँखों में नहीं देख सकता।

(प्रदीप मैगजीन वरिष्ठ पत्रकार हैं। अभी दिल्ली में रहते हैं।

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