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भारत
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एंट्रेंस एग्ज़ाम : एक जानलेवा परीक्षा
हर साल लाखों छात्र जेईई, एनईईटी और सीबीएसई बोर्डों की परीक्षाओं में शामिल होते हैं। इन परीक्षाओं के तनाव और बेहतर प्रदर्शन के दबाव ने इस वर्ष अब तक कम से कम पांच आभ्यार्थियों की जान ले ली।
अरिजीत सेनगुप्ता
07 Jun 2018
entrance exam

4 जून को नेशलन इलिजिबिलिटी कम इंट्रेंस टेस्ट (एनईईटी) का परिणाम घोषित कर दिया गया। इस चिकित्सीय परीक्षा का आयोजन सीबीएसई द्वारा प्रत्येक वर्ष कराया जाता है। इस साल मेडिकल कॉलेजों में दाख़िले के लिए राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली इस प्रवेश परीक्षा में कुल 13,26,725 अभ्यार्थियों ने हिस्सा लिया। रिपोर्ट के मुताबिक परीक्षा के परिणाम की घोषणा के बाद से आत्महत्या के पांच मामले सामने आए हैं।

एनईईटी के नतीजे घोषित होने के दो दिन बाद मुंबई के 23 वर्षीय एमबीबीएस स्नातक पार्थ बमारिया ने रविवार को कंदिवली में अपने सातवें मंज़िल के फ्लैट से कूद कर आत्महत्या कर ली। स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश पाने का बमारिया का ये दूसरा प्रयास था जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। पुलिस के अनुसार बमारिया ने आत्महत्या नोट में लिखा था कि वह तनाव में था। उधर हैदराबाद में 18 वर्षीय मेडिकल का अभ्यार्थी जसलीन कौर सलुजा जो एनईईटी 2018 की परीक्षा में शामिल हुआ था, उसने मंगलवार की सुबह भीड़भाड़ वाली सड़क पर एक ऊंची इमारत से कूदकर अपनी जान दे दी। पुलिस को यहां से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है लेकिन शक है कि इस प्रवेश परीक्षा में ख़राब प्रदर्शन के चलते उसने ये क़दम उठाया। वह नारायणगुडा में श्री चैतन्य कॉलेज की छात्र थी। इसी तरह की दिल दहला देने वाली घटना दिल्ली में सामने आ। एनईईटी का परिणाम जारी होने के तुरंत बाद 19 वर्षीय एक अभ्यार्थी ने द्वारका सेक्टर 12 में एक इमारत की 8 वीं मंजिल से कूद कर अपनी जान दे दी।

परिणाम घोषित होने के कुछ ही घंटों के बाद 4 जून को तमिलनाडु के विल्लुपुरम ज़िले में एक 17 वर्षीय लड़की अपने घर में मृत पाई गई। पुलिस को शक है कि उसने ज़हर खाकर आत्महत्या की थी। अनिता के पिता खेतों में मज़दूरी करते थें। अनिता ने 12 वीं कक्षा की परीक्षा में 98 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे लेकिन मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास करने में नाकाम रही। एनईईटी की शुरूआत के पहले नौ वर्षों तक तमिलनाडु सरकार ने इस प्रवेश परीक्षा की प्रणाली को अस्वीकार कर दिया था, राज्य बोर्ड के कक्षा 12 वीं के अंकों के आधार पर मेडिकल में दाख़िला होता था। राज्य सरकार का कहना था कि इससे गांव और छोटे शहरों के अभ्यार्थियों को मेडिकल में प्रवेश मिल जाता है। देकर कहा था कि यह छात्रों को गांवों और छोटे शहरों के मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश करने की इजाजत देता है। पिछले साल जब अखिल भारतीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा पहली बार आयोजित की गई थी तो सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को एनईईटी की बाध्यता से मुक्त कर दिया था। इस साल उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। अनिता ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था और अदालत के सामने अनुरोध किया था कि गांवों में रहने वाले उसके जैसे ग़रीब छात्र प्राइवेट कोचिंग के ख़र्च का भार नहीं उठा सकते हैं, जो शहरों में रहने वाले धनी छात्र इस प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में लाभ उठा सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने आदेश दिया था कि तमिलनाडु में दाख़िला कक्षा 12 वीं के अंक के आधार पर नहीं होगा, यह केवल एनईईटी के ज़रिए होगा। इस परीक्षा को अनिता पास नहीं कर सकी जो उसकी आत्महत्या का कारण बनी। इस घटना को लेकर तमिलनाडु में विरोध सामने आए हैं। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के मुताबिक़ छात्र और कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर जाम लगा दिया, रेल रोक दिया और तिरुवल्लूर और कांचीपुरम जैसे विभिन्न ज़िलों में कक्षाओं का बहिष्कार किया।

साल 2018 में जेईई मेन्स के लिए 11.5 लाख छात्र उपस्थित हुए थे। ये प्रवेश परीक्षा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) में दाख़िले के लिए कराया जाता है। सीबीएसई बोर्ड की दसवीं और बारहवीं कक्षा की परीक्षाओं के लिए 28 लाख से ज़्यादा छात्र शामिल हुए, जबकि एनईईटी के लिए 13 लाख से अधिक शामिल हुए। ये परीक्षाएं सबसे अधिक तनाव वाली हैं, और ज़्यादातर लोगों द्वारा इसे 'सफलता के प्रवेश द्वार' के रूप में देखा जाता है। तनाव और दबाव के कारण परीक्षा से संबंधित मौतें काफी आम घटना हो गई हैं। दरअसल,साल2015 में इन परीक्षाओं से संबंधित आत्महत्या की संख्या 2,646 तक पहुंच गई। इन परीक्षाओं को पिछली पीढ़ियों के लोग हानिरहित मामलों के रूप में याद करेंगे। अब एक बड़ा मुद्दा बन गया है। कोचिंग सेंटर पूरे देश में फैल गया हैं जो छात्रों को सभी प्रकार की प्रवेश परीक्षाओं के लिए तैयारी कराते हैं। ये सेंटर छात्रों से बहुत अधिक पैसे मांगते हैं। समृद्ध पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को ये फ़ायदा पहुंचाते हैं। चूंकि निजी संस्थान हाशिए पर मौजूद वर्ग के लोगों को कोई आरक्षण नहीं देते हैं, इसलिए अक्सर सरकारी कॉलेजों में दाख़़िले के लिए उनकी सभी उम्मीदें होती हैं जिसके लिए किसी को प्रवेश परीक्षा में बहुत अधिक अंक प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।

राजस्थान का कोटा 1980 के दशक में कोचिंग सेंटर का केंद्र बन गया और तब से हर साल 1,00,000 से अधिक छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षा कीतैयारी करने के लिए कोटा जाते हैं। अक्सर ये छात्र विनीत पृष्ठभूमि से आते हैं जहां कोचिंग संस्थानों में फीस भरने के लिए माता-पिता भारी क़र्ज़ लेते हैं। कोटा पुलिस के आंकड़ों के अनुसार,पिछले पांच वर्षों में 72 छात्रों ने आत्महत्या की है। पुलिस अधिकारी भागवत सिंह हिंगाद ने कहा कि कई छात्र विनीत पृष्ठभूमि से आते हैं और माता-पिता की अपेक्षाओं केबोझ तले दबे होते हैं। उन्होंने कहा, "माता-पिता औसतन कोचिंग पर प्रति वर्ष लगभग 2.50 लाख रुपए से 3 लाख रुपए ख़र्च करते हैं। जब उनके बच्चे ख़ुद को पिछड़ता हुआ पातेहैं, तो वे दोषी महसूस करते हैं और वे तनाव में जा सकते हैं।"

उम्मीदें परीक्षाओं से जुड़ी होती है विशेष रूप से मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के लिए। "समाज" द्वारा स्वीकृत और सम्मानित 'अच्छे जीवन' की कल्पना के लिएबहुत कुछ करना पड़ता है। माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे समृद्ध हों और आरामदायक जीवन बिताए। ऐसा करने के लिए वे उन्हें पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास करते हैं,वे उनकी शिक्षा पर भारी रक़म भी खर्च करते हैं। उन्हें जो चीज़ पता नहीं है कि वह ये कि वे अपने बच्चों को अत्यधिक दबाव में डाल रहे होते हैं। ऐसा लगता है कि 'अच्छा जीवन' के लिए एक डॉक्टर या इंजीनियर बनने या प्रबंधन की डिग्री पाने के लिए भारत में अच्छी तरह से तैयार एक रास्ता है। युवाओं पर सफलता की अपनी योजना को लागू करने की प्रक्रिया में वे प्रभावी रूप से अपनी आकांक्षाओं को कम कर देते हैं, वे अपने पूरे जीवन में एक पटकथा प्रदर्शन की तरह काम करते हैं जो उन्हें मानवता से अलग करता है।

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