NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
फ़र्क़ साफ़ है- अब पुलिस सत्तासीन दल के भ्रामक विज्ञापन में इस्तेमाल हो रही है
पिछले कुछ सालों से देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने ही देश के नागरिकों को ‘कपड़ों से पहचानने’ की जो युक्ति ईज़ाद की है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी मंशा से भाजपा ने इस विज्ञापन में दंगाई व्यक्ति दिखलाने के लिए मुस्लिम युवा की धज का इस्तेमाल किया है।
सत्यम श्रीवास्तव
04 Jan 2022
fark saaf hai
उत्तर प्रदेश भाजपा द्वारा जारी विज्ञापन का स्क्रीन शॉट।

उत्तर प्रदेश भाजपा के ट्विटर हैंडल से सबसे पहले जारी हुए एक विज्ञापन वीडियो की तरफ ध्यान देने की ज़रूरत है जो अब देश के समस्त इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर चल रहा है। यह वीडियो विज्ञापन भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपनी प्रशस्ति और पूर्ववर्ती समाजवादी सरकार की आलोचना के लिए जारी ‘फर्क साफ है’ सीरीज में शामिल है। जो यह बतलाने का प्रयास है कि 2017 तक यानी जब तक प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार सत्तासीन थी तब तक प्रदेश में दंगाई बेखौफ होते थे और 2017 के बाद अब वो या तो सरेंडर कर चुके हैं या डरे और घबराए हुए हैं। इस आशय का एक विज्ञापन कुछ रोज़ पहले देश के सभी दैनिक अखबारों में पहले पेज पर प्रकाशित हो चुके हैं और जिन्हें लेकर भाजपा के सांप्रदायिक संदेश की आलोचनाएँ भी हुई हैं।

वजह बहुत साफ है क्योंकि इस विज्ञापन में जिन्हें दंगाई कहा गया है वो ज़ाहिर तौर पर एक मुस्लिम युवा की तस्वीर है। संभव है कि लोगों का ध्यान इस तरफ नहीं भी जाता क्योंकि दंगाई होना किसी एक मजहब का मामला नहीं है बल्कि वह एक प्रवृत्ति है और कोई भी व्यक्ति दंगाई हो सकता है लेकिन पिछले कुछ सालों से देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने ही देश के नागरिकों को ‘कपड़ों से पहचानने’ की जो युक्ति ईज़ाद की है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी मंशा से भाजपा ने इस विज्ञापन में दंगाई व्यक्ति दिखलाने के लिए मुस्लिम युवा की धज का इस्तेमाल किया है।

इसी आशय का वीडियो देखने पर यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाती है कि यह विज्ञापन क्यों और किसे निशाने पर लेने के लिया बनाया गया है? इस वीडियो विज्ञापन में वही युवा है जो अखबारों के पहले पन्नों पर छाया रहा। यहाँ वो एक पुलिस थाने में खड़ा है और गिड़गिड़ा रहा है। वह इस वीडियो में कहते हुए सुना जा सकता है कि मम्मी कहती थीं कि मेरे बेटे का फोटो अखबार में छपेगा, इन्होंने तो पोस्टर छपवा दिये। फिर वो आगे कहता है कि -आंदोलन के नाम पर एक बस ही तो फूंकी थी, पहले की सरकारों में तो पूरे मोहल्ले तक जला देते थे तब भी कोई कुछ नहीं कहता था?

यहाँ आकर इस विज्ञापन की स्क्रिप्ट यह स्पष्ट कर देती है कि थाने में गिड़गिड़ाता हुआ वह युवा किस मज़हब से जुड़ा है और किस आंदोलन का ज़िक्र कर रहा है? नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 2019 की सर्दियों में हुए आंदोलन की यादें अभी ऐसे कई युवाओं को लेकर ताज़ा हैं जिन्हें लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा है। ज़ाहिर इनमें से अधिकांश युवा मुस्लिम हैं जिन्हें इन ज़्यादतियों का सामना करना पड़ रहा है।  

आगे वह पुलिस से यह गुहार लगा रहा है कि उसके घर की कुर्की होने से बचा लीजिये। वह अपने साथ एक कपड़े की पोटली में कुछ धन भी लाया है और हर्जाना भर रहा है। लेकिन उसे पता है जैसे कि इतनी रकम काफी नहीं है इसलिए वह गिड़गिड़ा रहा है कि उसके घर की कुर्की न हो। वह बहुत घबराया हुआ है और परेशान है।

इस वीडियो विज्ञापन में दिखलाए गए पुलिस थाने में कुल तीन पुलिस कर्मी मौजूद हैं जिनमें एक महिला पुलिस कर्मी भी है। जब वह युवक एक पुलिस कर्मी को अपनी पोटली में लायी रकम सौंप रहा है और दूसरे पुलिसकर्मी की तरफ देख रहा है जो शायद थाना प्रभारी है, तभी कैमरा उस बड़े अधिकारी की तरफ ज़ूम इन होता है और वह अधिकारी पूरी स्क्रीन पर छा जाता है। फिर वो इस विज्ञापन की पंच लाइन नाटकीय अंदाज़ में दोहराता है- ‘फर्क साफ है’। 2017 के पहले तक इन दंगाइयों के हौसले बहुत बुलंद थे लेकिन अब कानून के कठोर डंडे के सामने दंगाई घबराये हुए हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आंदोलनकारियों से ही हर्जाना वसूलने और उन्हें समाज और राज्य का दुश्मन बताते हुए उनकी तस्वीरों को बड़े बड़े पोस्टर बनाकर सार्वजनिक जगहों पर लगाने को लेकर गंभीर आलोचनाएँ हुई हैं और इन्हें गैर-वैधानिक तक बताया गया है लेकिन इस विज्ञापन के जरिये पुलिस के लिए बना दी गयी नयी आचार संहिता का भी प्रचार किया जा रहा है। एक गैर-वैधानिक कार्रवाई का महिमामंडन ही किया जा रहा है।

सवाल अब ये है कि क्या एक राजनैतिक दल के चुनावी विज्ञापन में पुलिस का इस्तेमाल इस तरह किया जा सकता है? लेकिन यह सवाल आचार संहिता से जुड़ा हुआ है और इस पर चुनाव आयोग को ध्यान देना होगा लेकिन अभी तक चूंकि आचार संहिता लागू नहीं हुई है तो यह कहा जा सकता है कि अभी चुनाव आयोग की कोई भूमिका नहीं है। तो क्या पुलिस किसी राजनैतिक दल की सरकार के समर्थन और विज्ञापन में खुद का इस्तेमाल होने देना चाहती है?

क्या यह विज्ञापन पुलिस की नाकामी का कुबूलनामा नहीं है? 2017 से पहले अगर तथाकथित दंगाइयों के हौसले इतने ही बुलंद थे तो उस दौरान पुलिस क्या कर रही थी? क्या यह अपने महकमे पर किसी सत्तासीन राजनैतिक दल के दबदबे का इज़हार है? अगर ये दोनों ही बातें सही हैं तब पुलिस महकमे के वजूद पर ही गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

देश की संवैधानिक व्यवस्था में पुलिस का काम देश में कानून के राज को बनाए रखना है। किसी भी दबाव या प्रलोभन के बावजूद उसे केवल कानून व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने का ज़िम्मा दिया गया है। जिसके लिए आचार संहिता है और जिसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि देश या प्रदेश में चुनाव हैं या नहीं हैं। उसका काम हर समय कानून की रक्षा करना है। इस विज्ञापन के जरिये खुद एक पुलिस अधिकारी से यह कहलवाना एक नाटकीय रोमांच पैदा कर सकता है उसकी कीमत बहुत बड़ी है जो पुलिस महकमे को उसकी अनिवार्य सैद्धान्तिक और कानूनन भूमिका यानी निष्पक्षता से चुकानी पड़ सकती है। हालांकि ऐसे मौके पर मौजूदा पुलिस महकमे की निष्पक्षता पर बात करना इतना गैर-ज़रूरी प्रसंग हो चुका है कि कुछ भी कहना महज़ दोहराव होगा।

हमने पिछले कुछ सालों में पुलिस की साम्प्रादायिक होती छवि को ही देखा है। सत्तासीन दलों के द्वारा पुलिस का इस्तेमाल भी नयी परिघटना नहीं है लेकिन जिस तरह से उत्तर प्रदेश में कथित अपराधियों को सबक सिखाने के नाम पर कार्रवाइयां हो रही हैं उन्हें लेकर यह आम समझ बन चुकी है कि इस वक़्त की पुलिस न तो देश की महिलाओं के साथ उनकी सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है और न ही अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलमानों के लिए।

फिर भी एक राजनैतिक दल के प्रचार अभियान का हिस्सा बनना आखिर पुलिस की किस आचार संहिता के तहत आता है यह ज़रूर पूछा जाना चाहिए। पूछा तो यह भी जाना चाहिए कि ऐसे विज्ञापन बनाते समय क्या पुलिस विभाग से अनुमति ली गयी? क्या पुलिस महकमे की रजामंदी के बिना ऐसा विज्ञापन सार्वजनिक हुआ है? अगर हुआ है तब क्या वाकई पुलिस को इस विज्ञापन पर कोई एतराज़ नहीं है? इस विज्ञापन को सार्वजनिक हुए कई दिन बीत चुके हैं लेकिन ऐसी कोई आपत्ति या एतराज़ जताए जाने की कोई खबर नहीं है। और अब इस तरह के कई और विज्ञापन भी जारी किए जा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार का विज्ञापन

ऐसा माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार के पास अपने पाँच साल की उपलब्धियों में सबसे बड़ी उपलब्धि कानून व्यवस्था ही बतलाई जा रही है। हालांकि इस कानून व्यवस्था की पोल लगभग हर रोज़ प्रदेश में बढ़ते अपराधों की खबरों में खुल रही है लेकिन एक राज्य की अपने नागरिकों के प्रति ठोंको नीति को कानून व्यवस्था का स्थानपन्न बनाने की कोशिश में ऐसे विज्ञापन शायद असरकारी हैं जिसमें कथित अपराधी के मजहब को पहचानने की खुली स्क्रिप्ट लिखी गयी है।

दिलचस्प ये है कि ये वीडियो विज्ञापन एक फिल्मांकन है जिसे किसी पेशेवर फिल्ममेकर ने ही बनाया है। जो कलाकार इस वीडियो में अभिनय कर रहे हैं वो भी पेशेवर अभिनेता हैं और ज़ाहिर है इस वीडियो को बनने और इसके प्रसारण में निवेश किया गया है। अगर यह निवेश उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने काम और उपलब्धियों के लिए जनसम्पर्क विभाग की ओर से किया गया है तब फिर यह बात सोचना बहुत ज़रूरी हो जाता है कि जनता के दिये कई तरह के करों का इस्तेमाल किस तरह एक जमात को दुश्मन बनाने और पुलिस को एक राजनैतिक दल की सेना में बदले जाने में खर्च हो रहा है। हालांकि अब इस तरह के सवाल जनता के मन में उठना बंद से हो गए हैं लेकिन फिर भी सोचना तो चाहिए ही।

(लेखक पिछले डेढ़ दशकों से जन आंदोलनों से जुड़े हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Uttar pradesh
UP Assembly Elections 2022
UP election 2022
fark saaf hai
Modi Govt
Yogi Adityanath
BJP
UP police
fark saaf hai

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

आजमगढ़ उप-चुनाव: भाजपा के निरहुआ के सामने होंगे धर्मेंद्र यादव

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • रवि शंकर दुबे
    सरकार का दो तरफ़ा खेल... ‘’कोयले की कमी भी नहीं विदेशों से आयात भी करना है’’
    19 Apr 2022
    उत्तर प्रदेश में बिजली संकट को लेकर विदेशों से कोयला खरीदने का का मामला नियामक आयोग पहुंच गया है। आरोप है कि कुछ निजी घरानों को लाभ पहुंचाने की तैयारी की जा रही है।
  • रूबी सरकार
    आख़िर किसानों की जायज़ मांगों के आगे झुकी शिवराज सरकार
    19 Apr 2022
    किसान नेता महेश दत्त पाराशर कहते हैं कि 50 वर्षों के लम्बे अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि यह शक्कर कारखाना सौ फ़ीसदी सफलतापूर्वक चलेगा। किसान इसे जीत की पहली कड़ी मान रहे हैं।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहारः गर्मी बढ़ने के साथ गहराने लगा जल संकट, ग्राउंड वाटर लेवल में तेज़ी से गिरावट
    19 Apr 2022
    राज्य के कई ज़िलों से शिकायत सामने आई है कि ट्यूबवेल का पानी छोड़ने लगा है। आने वाले दिनों में गर्मी बढ़ने के साथ पानी के स्तर को लेकर समस्या और बढ़ सकती है।
  • अनीस ज़रगर
    कश्मीर यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर को 2011 में लिखे लेख के लिए ग़िरफ़्तार किया गया
    19 Apr 2022
    केंद्र शासित प्रदेश की नवगठित जांच एजेंसी ने बताया कि ‘द कश्मीर वाला’ में प्रकाशित अब्दुल आला फाजिली का लेख "उत्तेजक, देशद्रोही और जम्मू-कश्मीर में खलल पैदा करने के इरादे" से लिखा गया है।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    जहांगीरपुरी हिंसा : अब 'आप' ने मुख्य आरोपी अंसार को 'बीजेपी' का बताया
    19 Apr 2022
    दिल्ली के जहांगीरपुरी में हुई हिंसा के मामले में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने एक ट्वीट कर कुछ बड़ी बातें सामने रखी हैं। ग्रेटर कैलाश विधायक और आप की नेता आतिशी ने मंगलवार शाम 5 बजे 1 ट्वीट करके जहांग
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License