NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
कुन्नूर से नागालैंड: दो अंत्येष्टि, योग्य और अयोग्य पीड़ित
मीडिया और अभिजात्य वर्ग ने नागालैंड में हत्याओं से मुंह मोड़ लिया, एक बार फिर उस चयनात्मकता को प्रदर्शित किया जिससे घटनाएं आम लोगों के सामने परोसी जाती हैं।
स्मृति कोप्पिकर
14 Dec 2021
Nagaland
चित्र साभार: PTI

ये चित्र व्यथित करने वाले हैं-ताबूतों या कफन में लिपटे शव, मृतक के सम्मान में अर्पित पुष्पाजलियों, दुख के आंसू, सूनी आंखें और निर्मम हत्या के बाद के मृतक के सम्मान में कभी कभार कहे जा रहे कुछ अस्फुट से शब्द। पूरे सप्ताह इससे हमारे टेलीविजन स्क्रीन, सोशल मीडिया फीड्स और अखबारों के पन्ने रंगे रहे और भारतीयों के सहानुभूति तथा शोक संदेश आते रहे। फिर भी, दुर्भाग्यपूर्ण हेलिकॉप्टर दुर्घटना, जिसमें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत सहित 13 लोगों की जानें गईं, कहानी का केवल आधा हिस्सा था। दूसरे आधे हिस्से के बारे में बुमश्किल हमारे टेलीविजन स्क्रीन, सोशल मीडिया फीड्स पर कोई जानकारी दी गई। 

यह कहानी का वो आधा हिस्सा है जिसे भारत और उसकी मीडिया ने भुला दिया, जहां शवों के लिए कोई प्रार्थना नहीं की गई या पुष्प अर्पित नहीं किए गए, गलियों में लोगों ने कोई नारे नहीं लगाये या जिसने ‘‘ राष्ट्रीय‘‘ खबरों में सुर्खियां नहीं बटोरीं। नागालैंड के मोन जिले में एक खदान में काम कर घर लौटने वाले 14 भारतीय नागरिकों की हत्या कर दी गई और जिन गांव वालों ने विरोध में आवाज उठाई, उन्हें मीडिया की पहुंच से दूर कर दिया गया और इन नृशंस हत्याओं पर देश के दूसरे नागरिक शोक तक नहीं जता पाए। उन सभी को भारतीय सेना के कमांडोज द्वारा गोलियों से भून दिया गया ( सेना के एक जवान को भी क्रेधित गांव वालों में मार डाला) जिसे भारत सरकार ने ‘ गलत पहचान का मामला‘ कह कर उचित ठहराने की कोशिश की (पुलिस ने इस घटना के लिए सेना के 21 पैरा स्पेशल बलों के खिलाफ ‘इरादतन हत्या‘ का मामला दर्ज किया है)। 

प्रत्येक मौत शोक जताए जाने की हकदार है। वर्दी में देश के सबसे बड़े रक्षा अधिकारी भारत के सीडीएस के लिए प्रोटोकॉल की भी आवश्यकता होती है।  निश्चित रूप से यह खबरों तथा लोगों की चेतना के लिए भी सबसे बड़ी खबर थी और होगी भी। तमिलनाडु के कुन्नूर के निकट 8 दिसंबर को हेलिकॉप्टर दुर्घटना की परिस्थितियों ने कई सवाल पैदा किए। दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर, खासकर, सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर साजिश की अफवाहों का बाजार गर्म हो गया जिससे दुर्घटना को लेकर संदेह की भी बू आने लगी। सेवानिवृत्त वरिष्ठ सेना तथा वायु सेना के अधिकारियों, उड्डयन विशेषज्ञों तथा अन्य लोगों ने उनमें से कुछ सवालों के उत्तर देने के भी प्रयास किए। 

यह त्रासदी उनकी पत्नी मधुलिका तथा ब्रिगेडियर एल एस लिद्दर, लेफ्टिनेंट कर्नल हरजिंदर सिंह, स्क्वायड्रन लीडर के सिंह, नाइक गुरसेवक सिंह, नाइक जितेंद्र कुमार, नाइक विवेक कुमार, नाइक बी एस तेजा, हवलदार सतपाल, जेडब्ल्यूओ दास, जेडब्ल्यूओ प्रदीप ए और पायलट विंग कमांडर पृथ्वी सिंह चैहान सहित सेना के अन्य 11 जवानों की मौत से और गहरा गई। एक उच्च पद पर आसीन हाई-प्रोफाइल अधिकारी की मौत से जो प्रतीकवाद जुड़ा होता है, उससे एक प्रकार की अप्रत्यक्ष शोक, नुकसान और गम की भावना जुड़ी होती है। सीडीएस रावत के पद ने सुनिश्चित किया कि यह खबर समाचारों की सुर्खियों में बनी रहेगी। 

चुनाव दर चुनाव तथा बीच बीच में भी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी द्वारा देश में अति-राष्ट्रवादी वातावरण को भड़काए जाने को देखते हुए, सीडीएस रावत तथा उनकी पत्नी की अंत्येष्टि यात्रा को राजनीतिक राष्ट्रवाद के एक और परेशान करने वाले प्रदर्शन के रूप में बदल देना आसान था। कई ट्वीटर यूजरों ने बताया कि श्रद्धांजलि अर्पित करने वाले कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चार चित्र ट्वीट किए जिनमें उन पर पूरा फोकस था और मधुलिका रावत के ताबूत पर नाम सहित शेष अन्य चीजों को धुंधला कर दिया गया था।  

सीडीएस रावत ने नवसृजित पद पर पदोन्नत होने के समय जो राजनीतिक और अनावश्यक बयान दिए थे, इस अवसर की गंभीरता को देखते हुए उन्हें दरकिनार कर दिया गया। ऐसा सही भी था, हालांकि बाद में इतिहासकारों और स्वतंत्र विश्लेषकों द्वारा बाद में उन पर अवश्य विचार किया जाएगा कि किस प्रकार देश के सबसे उच्च सैन्य पद पर आसीन व्यक्ति ने न केवल तत्कालीन सरकार बल्कि सत्तारूढ़ दल के साथ निकटता बढ़ाई बल्कि इस पर भी विचार किया जाएगा कि इसका भारतीय बलों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा। 

जब रावत पति पत्नी की अंत्येष्टि की गई, लोगों ने इस कार्यक्रम को अपने टीवी स्क्रीन पर देखा और श्रीनगर सहित विभिन्न स्थानों पर दीप प्रज्जवलित किए गए। ब्रिगेडियर लिद्दर की पत्नी और छोटी बेटी-जिसे उसके विचारों के लिए उस दिन ट्रोल किया गया था, द्वारा प्रदर्शित शिष्टता और गरिमा ने लोगों का दिल जीत लिया। औपचारिक विदाई में दनके भाग लेने पर राष्ट्र ने उनके साथ दुख व्यक्त किया। 

वहीं दूर, नागालैंड में पलक झपकते, सेना के दूसरे जवानों ने एक अक्षम्य अपराध करते हुए 14 भारतीय नागरिकों की जान ले ली।  इन पीड़ित को न तो श्रद्धांजलि नसीब हुई और न ही मुख्यधारा की मीडिया या उसके ‘राष्ट्रीय‘ दर्शकों का कोई ध्यान प्राप्त हुआ। उनके शवों को पंक्ति में लिटा दिया गया, उनके शोक संतप्त संबंधियों द्वारा अंतिम विदाई देने की तैयारी की गई, उनके दुख हमारे स्क्रीन या सोशल मीडिया फीड्स पर नहीं दिखाए गए, उनके क्रंदन हमारे कानों तक नहीं पहुंचे। मोन के इस हत्याकांड ने भारतीयों को व्यथित नहीं किया। 

क्या वे कम पीड़ित, अयोग्य शिकार थे? क्या खदान में काम करने वाले तथा उनके साथी गांव वाले हेलिकाॅप्टर दुर्घटना के शिकारों की तरह ध्यान पाने के योग्य नहीं थे? भाषाविद्-बुद्धिजीवी नोम चोमस्की द्वारा प्रतिपादित योग्य-अयोग्य शिकार बाइनरी यानी युग्मक सिद्धांत उस चयनात्मकता को प्रदर्शित करता है जिसके साथ मीडिया और अभिजात्य वर्ग वह नैरेटिव निर्धारित करते हैं जिसमें पीड़ितों के विभिन्न वर्ग मीडिया और इसलिए आम लोगों के ध्यान के विभिन्न स्तर प्राप्त करते हैं। 

4 दिसंबर को नागालैंड में हुई मौतें किसी वायु दुर्घटना की तरह दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं थीं। ये हत्याएं थीं जो कथित रूप से बिल्कुल नजदीक से सेना के जवानों द्वारा की गई थीं, जो सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (अफस्पा) लागू होने की अनिवार्यता को उजागर करती हैं जैसाकि कश्मीर में होता रहा है। इस घटना से देश को हल जाना चाहिए था, मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह के रातों की नींद उड़ जानी चाहिए थी और मीडिया को मोन की इस घटना पर लगातार फाॅलो अप स्टोरी चलाई चाहिए थी। आखिरकार, इसके लिए सेना के बल जिम्मेदार हैं। 

इसके बजाये, जल्द ही यह स्टोरी अखबारों के मुख्य पृष्ठों तथा टेलीविजन स्क्रीन से गायब हो गई, सोशल मीडिया फीड्स तथा हैशटैग से हटा लिया गया और फिर लोगों की चेतना से भी विलुप्त हो गई। ऐसा नहीं हुआ होता अगर सबसे बड़े तथा सबसे प्रमुख मीडिया घरानों ने वहां एक सप्ताह या और अधिक समय के लिए अपने सर्वश्रेष्ठ पत्रकार तैनात किए होते। शवों के साथ शोकसंतप्त संबंधियों के कुछ छोटे वीडियो क्लिप या एकाध फोटो जो मीडिया में दिख रहे हैं, उन कुछ स्थानीय पत्रकारों के मेहनती प्रयासों के कारण हैं जिन्होंने इन हत्याओं को खबरों के रडार -और देश के अंतःकरण से दूर नहीं जाने दिया।

ओटिंग गांव का प्रतिनिधित्व करने वाले ओटिंग नागरिक कार्यालय ने उस दुर्भाग्यपूर्ण शाम के बारे में जारी बयान में सशस्त्र बलों पर मारे गए व्यक्तियों के पास हथियार रख कर तथा उन्हें आतंकियों के छद्मआवरण तथा बूटों को पहना कर उन्हें आंतकवादी करार देने की कोशिश करने का आरोप लगाया। यह एक गंभीर आरोप है, लेकिन इसकी कोई खबर नहीं बनी।

तथ्यों को पहले ही तोड़ामरोड़ा जा चुका है। लोकसभा में इस घटना पर शोक व्यक्त करते हुए शाह ने कहा कि सेना उस खुफिया सूचना पर कार्रवाई कर रही थी कि उस इलाके में अराजक तत्व घूम रहे थे, जब उन्होंने एक वाहन को रुकने का इशारा किया और उन्होंने भागने की कोशिश की तो उन्हांेने गोली चला दी। ग्रामीणों ने स्थानीय मीडिया को बताया कि रुकने का कोई संकेत नहीं दिया गया, सभी वाहन खराब सड़क स्थितियों के कारण धीरे धीरे चल रहे थे और पहली गोली विंड-शील्ड के जरिये (यह सवाल उठाते हुए कि क्या यह संभव है अगर ड्राइवर भागने की कोशिश कर रहा था) ड्राइवर पर चलाई गई, जो घटनास्थल पर ही मारा गया। उस क्षेत्र में भाजपा की सहयोगी पार्टी नेशनल पीपुल्स पार्टी ने भी शाह के बयान पर सवाल खड़े किए और कहा कि उन्होंने ‘तथ्यों को तोड़ा मरोड़ा‘ है। 

हर लिहाज से, इस घटना के सभी पहलुओं को कई दिनों तक खबरों की सुर्खियां बननी चाहिए थीं। इसकी जगह इसे धीरे धीरे खत्म कर दिया गया। यह घटना एक प्रशासनिक दुर्घटना बन गई-एक विशेष जांच टीम की घोषणा की गई, अधिकारियों के खिलाफ जांच अदालत के गठन तथा ऐसी ही बातों की घोषणा की गई। घटना स्थल से बहुत कम जानकारी ली गई। पीड़ितों और उनके संबंधियों, मुख्य रूप से कोन्याक जनजाति से हमने बहुत कम सुना और देखा। 36 वर्षीय लैंगटौन कोन्याक अपने पीछे दो महीने की एक बेटी छोड़ गया है, 37 वर्षीय होकुप कोन्याक अपने परिवार में अकेला कमाने वाला था और बमुशिकल एक पखवाड़े पहले उसकी शादी हुई थी। दूसरे लोग कौन थे जो भारतीय सेना की गोलियों के शिकार हुए, वे  अपने पीछेे किसे छोड़ कर गए हैं, कोन्याक यूनियन क्या है?

यह कांड दूरी के कारण होने वाली घटना नहीं है जैसा कि अक्सर पूर्वोत्तर राज्यों की घटनाओं पर फोकस न किए जाने को उद्धृत करते हुए कहा जाता है। यह मीडिया के बारे में है जो सरकार और सशस्त्र बलों के बारे में असहज कर देने वाले सवालों से दूर रहना पसंद करता है। इस हत्याकांड के भीतर पैठने का अर्थ होगा इन दोनों के बारे में सवाल खड़े करना-एक ऐसी संभावना जिसे मुख्यधारा मीडिया के बड़े हिस्से न तो पसंद करते हैं और न ही अब वे इसे अपना काम समझते हैं। 

उनके लिए उस वर्दीधारी अधिकारी जो एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में मारा गया, पर फोकस करना ज्यादा आसान, कम खर्चीला और राजीतिक दृष्टि से विवेकपूर्ण है, बजाये सेना के जवानों के उन पीड़ितों के जो अपनी गलत पहचान के कारण भ्रमवश  शिकार बन गए।  लेकिन, नागरिक के रूप में हम सभी क्षीण पड़ जाते हैं।

लेखक मुंबई स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार तथा स्तंभकार हैं जो राजनीति, सिटीज, मीडिया तथा जेंडर पर लिखती हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

From Coonoor to Nagaland: Two Funerals, Worthy and Unworthy Victims

AFSPA
Nagaland
Gen Bipin Rawat
CDS
Northeastern States
Mon district
Army shootings
chopper crash
Mainstream Media
Army firing Nagaland

Related Stories

राज्यसभा सांसद बनने के लिए मीडिया टाइकून बन रहे हैं मोहरा!

क्या AFSPA को आंशिक तौर पर हटाना होगा पर्याप्त ?

मणिपुर चुनाव : मणिपुर की इन दमदार औरतों से बना AFSPA चुनाव एजेंडा

मणिपुरः जो पार्टी केंद्र में, वही यहां चलेगी का ख़तरनाक BJP का Narrative

मणिपुर चुनावः जहां मतदाता को डर है बोलने से, AFSPA और पानी संकट पर भी चुप्पी

मणिपुर में भाजपा AFSPA हटाने से मुकरी, धनबल-प्रचार पर भरोसा

मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता

नगालैंडः “…हमें चाहिए आज़ादी”

मणिपुर चुनाव: आफ्सपा, नशीली दवाएं और कृषि संकट बने  प्रमुख चिंता के मुद्दे

क्या आपको पता है कि ₹23 हजार करोड़ जैसे बैंक फ्रॉड भी महंगाई के लिए जिम्मेदार है? 


बाकी खबरें

  • BJP Manifesto
    रवि शंकर दुबे
    भाजपा ने जारी किया ‘संकल्प पत्र’: पुराने वादे भुलाकर नए वादों की लिस्ट पकड़ाई
    08 Feb 2022
    पहले दौर के मतदान से दो दिन पहले भाजपा ने यूपी में अपना संकल्प पत्र जारी कर दिया है। साल 2017 में जारी अपने घोषणा पत्र में किए हुए ज्यादातर वादों को पार्टी धरातल पर नहीं उतार सकी, जिनमें कुछ वादे तो…
  • postal ballot
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी चुनाव: बिगड़ते राजनीतिक मौसम को भाजपा पोस्टल बैलट से संभालने के जुगाड़ में
    08 Feb 2022
    इस चुनाव में पोस्टल बैलट में बड़े पैमाने के हेर फेर को लेकर लोग आशंकित हैं। बताते हैं नजदीकी लड़ाई वाली बिहार की कई सीटों पर पोस्टल बैलट के बहाने फैसला बदल दिया गया था और अंततः NDA सरकार बनने में उसकी…
  • bonda tribe
    श्याम सुंदर
    स्पेशल रिपोर्ट: पहाड़ी बोंडा; ज़िंदगी और पहचान का द्वंद्व
    08 Feb 2022
    पहाड़ी बोंडाओं की संस्कृति, भाषा और पहचान को बचाने की चिंता में डूबे लोगों को इतिहास और अनुभव से सीखने की ज़रूरत है। भाषा वही बचती है जिसे बोलने वाले लोग बचते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि अगर पहाड़ी…
  • Russia China
    एम. के. भद्रकुमार
    रूस के लिए गेम चेंजर है चीन का समर्थन 
    08 Feb 2022
    वास्तव में मॉस्को के लिए जो सबसे ज्यादा मायने रखता है, वह यह कि पेइचिंग उसके विरुद्ध लगने वाले पश्चिम के कठोर प्रतिबंधों के दुष्प्रभावों को कई तरीकों से कम कर सकता है। 
  • Bihar Medicine
    एम.ओबैद
    बिहार की लचर स्वास्थ्य व्यवस्थाः मुंगेर सदर अस्पताल से 50 लाख की दवाईयां सड़ी-गली हालत में मिली
    08 Feb 2022
    मुंगेर के सदर अस्पताल में एक्सपायर दवाईयों को लेकर घोर लापरवाही सामने आई है, जहां अस्पताल परिसर के बगल में स्थित स्टोर रूम में करीब 50 लाख रूपये से अधिक की कीमत की दवा फेंकी हुई पाई गई है, जो सड़ी-…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License