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शिक्षा
भारत
प्राइमरी शिक्षा : आइए आशीष डंगवाल की तस्वीर को पलट कर देखें
शिक्षक की वायरल तस्वीरों के भीतर का सच। कैमरा नहीं, ज़िंदगी के एंगल से ये तस्वीरें बेहद खूबसूरत थीं। अब इन्हीं तस्वीरों से शिक्षक और सरकारी स्कूलों की ओर स्विच करें, तो तस्वीर एकदम पलट जाती है।
वर्षा सिंह
13 Sep 2019
Ashish dangwal with children
शिक्षक आशीष डंगवाल बच्चों के साथ।

उत्तरकाशी के एक सरकारी स्कूल के टीचर की तबादले के बाद की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं। इन तस्वीरों में शिक्षक आशीष डंगवाल के तबादले से स्कूल के बच्चे रो रहे थे। बच्चों के अभिवावक रो रहे थे। एक शिक्षक के तबादले से पूरा गांव रो रहा था।
शिक्षक की वायरल तस्वीरों के भीतर का सच

कैमरा नहीं, ज़िंदगी के एंगल से ये तस्वीरें बेहद खूबसूरत थीं। जब बच्चे स्कूलों में बेहतर करियर हासिल करने वाली एक मशीन के रूप में तैयार किये जा रहे हैं, प्रतियोगिता के दौर में बच्चों पर अव्वल होने का भार बढ़ता जा रहा है, बच्चों के बीच सहज भाव से बैठे पर्वतीय जिले के इस शिक्षक की तस्वीर दिलासा देती है। उम्मीद देती है।

अब इन्हीं तस्वीरों से शिक्षक और सरकारी स्कूलों की ओर स्विच करें, तो तस्वीर एकदम पलट जाती है। ज्यादातर जगह पर प्राइमरी सरकारी स्कूलों की बदहाली नज़र आती है। शिक्षकों पर ऐसे बच्चों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी होती है, जिन के घरों में ज्यादातर पढ़ाई का कोई माहौल नहीं होता। वो बच्चे जो घर जाकर कोर्स का रिवीज़न नहीं करते, बल्कि उन पर घर-बाहर के काम की जिम्मेदारियां होती हैं। पांचवी कक्षा में पढ़ने वाली कई लड़कियां घर में खाना बनाकर स्कूल आती हैं और स्कूल से घर जाकर जूठे बर्तन मांजती हैं। नदी-गदेरों पर पानी भरने जाती हैं।

इन बच्चों के पठन-पाठन की क्षमताओं के आंकलन के लिए शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत देश के सबसे बड़े गैर सरकारी संगठन 'प्रथम' के वार्षिक सर्वेक्षण 'एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट' (असर)-2018 कहती है कि पांचवीं कक्षा के करीब 35 फीसद बच्चे दूसरी कक्षा का पाठ नहीं पढ़ सकते। आठवीं कक्षा के 51 फीसदी बच्चे गणित के दो अंकों के बीच भाग नहीं दे सकते।

वे बच्चे तो ज़िंदगी के गणित में उलझे रहते हैं। स्कूल और शिक्षा उनके प्राथमिक कार्य नहीं होते।
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कक्षा के 35 मिनट सिर्फ पढ़ाई पर हों खर्च

आशीष कहते हैं कि सरकारी प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा घर जाकर पढ़ाई नहीं करता, बल्कि काम करता है। ऐसे में शिक्षक के पास 35 मिनट की एक क्लास होती है, जिसमें उसे कक्षा के सभी बच्चों को एक विषय पढ़ाना होता है। उन 35 मिनट में भी शिक्षक के पास इतने सारे काग़ज़ी और गैर शिक्षकीय काम होते हैं कि वो कक्षा के 35 मिनट पूरे बच्चों को नहीं दे पाता। वो कहते हैं कि हमें प्राइमरी शिक्षकों को रचनात्मक बनाने के लिए समय देना होगा, न कि उन्हें अन्य सरकारी कार्यों में उलझाए रखना।

मिसाल के तौर पर अभी हाल ही में देहरादून के डीएवी कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव के दौरान जिले के 22 प्राइमरी शिक्षकों की ड्यूटी लगाई गई।

प्राइमरी का शिक्षक सिर्फ शिक्षक नहीं होता

गोविंद बोहरा प्राथमिक शिक्षक संगठन के चंपावत के जिलाध्यक्ष हैं। वे कहते हैं कि सबसे ज्यादा प्राइमरी के शिक्षकों पर गैर शिक्षकीय कार्यों की जिम्मेदारी होती है। उनसे जनगणना, बाल गणना, चुनाव समेत दुनियाभर के काम कराये जाते हैं। वे कहते हैं कि जिस बच्चे को कुछ नहीं आता, उसे सालभर में ट्रेंड करने की जिम्मेदारी शिक्षक की ही होती है। सिलेबस पूरा करना होता है। लेकिन व्यहवारिक तौर पर ये सब फेल हो जाता है। ज्यादातर प्राइमरी सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी है। एक स्कूल में पांच कक्षाएं चलती हैं और 2 अध्यापक होते हैं। बच्चों का बैकग्राउंड ऐसा होता है कि पढ़ाने के लिए जो भी कराना है, स्कूल में ही कराना है।

गोविंद कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में एक रफ कॉपी बच्चों को दे दी, वो भर गई, तो दूसरी रफ कॉपी लाना मुश्किल हो जाता है। फिर शिक्षक को उसे अपने हिसाब से मैनेज करना होता है। फिर लोगों को लगता है कि शिक्षक को इतनी मोटी तनख्वाह दी जा रही है। आप उसे महीने के दस लाख रुपये भी दे दीजिए, लेकिन इससे वो एक ही समय दो क्लास में एक साथ उपस्थित तो नहीं हो सकता।

लोहाघाट की एक सरकारी प्राइमरी स्कूल के शिक्षक कहते हैं कि हमारा ज्यादा ज़ोर शिक्षक के समय पर स्कूल पहुंचने को लेकर होता है। लेकिन ये मॉनीटरिंग नहीं होती कि शिक्षक स्कूल में बच्चों को क्या पढ़ा रहा है, कैसा पढ़ा रहा है। बच्चों के इम्तिहान के नतीजों से आप शिक्षक की योग्यता नहीं माप सकते। प्राइमरी एजुकेशन में तो शिक्षक को ही स्टाफ बना रखा है। हर कार्य की जिम्मेदारी उसी पर है।

खेल-खेल में खेल नहीं होता, पढ़ाई क्या होगी

चमोली के नारायणबगड़ ब्लॉक के एक सरकारी स्कूल के शिक्षक भी प्राइमरी स्कूलों में शिक्षकों की सख्त कमी की बात कहते हैं। वे कहते हैं कि हमारे पास आए बच्चों के बेसिक्स क्लियर नहीं होते। वे अपने स्कूल की स्थिति बताते हैं जिसमें गांववालों की मदद से टिन शेड बनाए गए हैं। शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए पेरेंट्स टीचर एसोसिएशन की सहमति से बच्चों से बीस-बीस रुपये लेकर एक शिक्षक रखा गया है। कहते हैं कि स्कूल में बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर तक नहीं है। प्रार्थना करने तक के लिए फील्ड नहीं है। खेल के लिए भाले और गोले रखे गए हैं, उन्हें फेंके कहां। वे कहते हैं कि पहाड़ों के स्कूल कई तरह की समस्याओं से ग्रसित हैं।

प्राइमरी एजुकेशन की बात करने पर ये शिक्षक बताते हैं कि पांचवी तक के बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाई करायी जाती है। लेकिन हमारे यहां कभी खेल विधि का प्रयोग नहीं होता। इस सब के लिए शिक्षक के पास समय भी नहीं होता। शिक्षक के पास समय हो तो वो नई तकनीकें सिखाए।
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एक अच्छा सा स्कूल तो दो

चमोली ज़िले का माणा गांव, भारत का अंतिम गांव माना जाता है। समुद्र तल से 18,000 फुट की ऊंचाई पर बसे इस गांव के कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के सरकारी स्कूलों की दीवारों को आर्ट गैलरी की तरह सजा दिया गया है। ये तस्वीरें कला विषय की शिक्षिकाओं ने बनाई है। जिसमें चांद पर आदमी उतरता है। तितली का जीवन चक्र है। मिकी माउस और छोटा भीम से लेकर गणित और विज्ञान से जुड़ी तस्वीरें सरकारी स्कूलों की दीवारों पर दिखती हैं। यहां की जिलाधिकारी स्वाति एस. भदौरिया की पहल पर कला शिक्षिकाओं ने ये कार्य किया है।
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इन्हीं में से एक कला शिक्षिका कहती हैं कि हमारे कुछ स्कूल बहुत अच्छे हैं। शिक्षक बहुत मेहनत करते हैं। लेकिन सरकारी स्कूलों में समस्याएं भी बहुत हैं। जैसे उन्हें कला के साथ हिंदी और होमसाइंस भी पढ़ाना पड़ जाता है। क्योंकि इस विषय के शिक्षक मौजूद नहीं हैं। वो बताती हैं कि पहले यहां छह महीने कक्षाएं पहाड़ों पर लगती थीं, बाक़ी के छह महीने की कक्षाएं नीचे घिघराण गांव में लगा करती थीं। लेकिन लोगों को पढ़ाई की अहमियत समझ आई। फिर स्कूल घिघराण में ही लगने लगा। वो बताती हैं कि हर बच्चा खेती-बाड़ी जैसे कार्य से जुड़ा है।
कई बार ऐसा भी होता है कि कक्षा छह या सात में पढ़ने वाले बच्चे को अ-आ तक लिखना नहीं आता। इसके लिए हमारे नियम जिम्मेदार हैं। हम पांचवी तक किसी बच्चे को फेल नहीं करते। उसे धक्का देकर अगली क्लास में पहुंचा देते हैं। बाद में सारा ठीकरा शिक्षक पर फोड़ दिया जाता है। उनके स्कूल मे स्मार्ट क्लासेस हैं, ई-लर्निंग है। वो बताती हैं कि ज्यादातर सरकारी स्कूल में जरूरी सुविधाएं नहीं होतीं। जबकि स्कूलों को संसाधनयुक्त होना चाहिए।

पांचवी तक के स्कूल में पांच शिक्षक अभी संभव नहीं

प्राइमरी शिक्षा के अपर निदेशक गढ़वाल शिव प्रसाद खाली कहते हैं कि चुनाव के अलावा शिक्षकों से अन्य गैर शिक्षकीय कार्य को कम कर दिया गया है। वे बताते हैं कि छात्र संख्या के आधार पर शिक्षकों की संख्या में बढ़ोतरी की जा रही है। लेकिन पांचवी तक के स्कूल में दो शिक्षकों की व्यवस्था कर दी गई है (पहले एक शिक्षक भी हुआ करते थे।), सिंगल टीचर नहीं रहेगा। वे मानते हैं कि कक्षा पांच तक की पांच अलग-अलग कक्षाओं के लिहाज से ये अनुपात ठीक नहीं है, कहते हैं कि वर्तमान में हमारे पास यही स्थिति है। धीरे धीरे शिक्षकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। जल्द ही हम कम से कम तीन शिक्षकों की व्यवस्था करेंगे। जबकि मानक के अनुसार पांच क्लास में छह शिक्षक होने चाहिए। छह नहीं तो पांच ही हो जाएं। शिव प्रसाद कहते हैं कि पांच शिक्षकों की व्यवस्था में समय लगेगा। इस मुद्दे पर वे और बात नहीं करना चाहते और फोन कट कर देते हैं।

"जिसे नौकरी नहीं मिलती बीएड कर लेता है"

ये स्थिति तब है जब हज़ारों बेरोज़गार नौकरी की मांग कर रहे हैं। 9 सितंबर को कोटा में एक कार्यक्रम में केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक जो पहले उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, कहते हैं कि जिसे नौकरी नहीं मिलती वो बीएड कर लेता है और फिर बेरोज़गारों की फौज खड़ी हो जाती है। देश में हर साल 19 लाख छात्र बीएड करके निकल रहे हैं और मात्र 3.30 लाख छात्रों को ही नौकरी मिल पाती है। निशंक कहते हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता पर हमारा विशेष ज़ोर है। शिक्षक चयन के ऐसे मापदंड बनाए जाएंगे जो आईएएस से भी कठिन होंगे।

मानव संसाधन मंत्री ये भी बताएं कि 21वीं सदी के भारत में, चांद पर पहुंचने की कोशिशों के बीच, हम एक राज्य और देश में बच्चों को सरकारी प्राइमरी स्कूलों में पांचवी तक की अच्छी-गुणवत्ता युक्त शिक्षा मुहैया कराने में सक्षम हैं या नहीं।

(पेंटिंग्स की तस्वीर माणा गांव के सरकारी स्कूल की हैं। जो हमें कला शिक्षिका के सौजन्य से मिलीं।)

Education Sector
education system
Ashish Dangwal
Government schools
Primary education

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