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भारत
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खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं
प्रोटीन के बुनियादी स्रोत जैसे मांस, अंडे, दालें आम आदमी की पहुँच से बाहर हो गए हैं और रसोई गैस की क़ीमत की तरह खाना पकाने के तेल की क़ीमतों में भी बड़ा उछाल आया है। 
सुबोध वर्मा
05 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
खाद्य सामग्री की ऊंची क़ीमतें परिवारों के पोषण को तबाह कर रही हैं

पिछले कुछ महीनों से कुछ आवश्यक खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार उछाल आ रहा है, जिससे परिवारों के पोषण स्तर में काफी कमी आई है जिसके चलते पहले से ही कम पारिवारिक बजट और अधिक सिकुड़ गया है। रसोई गैस की कीमतों में बेंतहा बढ़ोतरी ने इस दुख को और बढ़ा दिया है, जिस पर सब्सिडी मई 2020 में समाप्त कर दी गई थी और उसके बाद से कीमतें 46 प्रतिशत तक आसमान छू गई है।

जबकि रबी की फसल के बाज़ार में आने से अनाज और सब्जियों की कीमतें मुख्यत स्थिर बनी हुई थी, लेकिन कुछ खाद्य पदार्थों के समूहों में कीमतें बेंतहा बढ़ गई, जैसा कि नीचे दिए चार्ट में दिखाया गया है। इस डेटा को सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा संरक्षित करने वाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक डेटाबेस से लिया गया है।

आमतौर पर आम जन द्वारा खाई जाने वाली अधिकांश दालें – फिर चाहे अरहर या तूर दाल हो या फिर मूंग, मसूर और उड़द हो - 2021 के पहले पांच महीनों में इनकी कीमतें अचानक से 13 प्रतिशत से बढ़कर 23 प्रतिशत हो गई हैं। जनवरी माह से सभी प्रकार के मांस और मछली और अंडे की कीमतों में भी बड़ी वृद्धि हुई है। इस साल चिकन की कीमत में सबसे ज्यादा 33 प्रतिशत का उछाल दिखा जबकि मटन और पोर्क (सूअर का मांस) में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

लेकिन सबसे विनाशकारी वृद्धि खाना पकाने के तेल की कीमतों में देखी गई है, जो सभी भारतीय व्यंजनों को बनाने का जरूरी आइटम है। मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों या पूर्वी भारत में उपयोग किए जाने वाले सरसों के तेल में 43 प्रतिशत, मूंगफली के तेल में 37 प्रतिशत और विभिन्न अन्य परिष्कृत तेलों जैसे सूरजमुखी, सोयाबीन आदि में 47 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। खाना पकाने का तेल रसोई में इस्तेमाल किए जाने वाली ऐसी कोई इस्तेमाल वैकल्पिक वस्तु नहीं हैं जिन्हें परिवारों द्वारा बदला या हटाया जा सकता है। अगर अधिकांश भारतीय परिवार तेल के बिना खाना पकाएंगे तो कुछ अनाज-आधारित वस्तुओं जैसे उबले हुए चावल या गेहूं के आटे की चपाती, आदि तक सिमट कर रह जाएंगे।

गरीब परिवार बढ़ती कीमतों की वजह से आम तौर पर मांस, अंडे और दालों को छोड़ देते हैं और सब्जियों को अधिक पकाने लगते है, जो अपेक्षाकृत सस्ती होती हैं। यह कुछ समय के लिए उनका पेट भर सकती है लेकिन लंबे समय तक ऐसा करने से पहले से ही कुपोषित आबादी पर इसका हानिकारक प्रभाव पड़ने लगता है क्योंकि इससे आहार में प्रोटीन के प्रमुख स्रोतों की कमी हो जाती है।

ऊपर जबकि मांस की बिक्री के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने एक अनिश्चितता का माहौल पैदा किया हुआ है जिसके कारण मांस की कीमतों पर दबाव बना हुआ है, फिर खाना पकाने के तेल और दालों की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि उनके आर्थिक निर्णय लेने का प्रत्यक्ष परिणाम नज़र आता है।

जैसा कि रिपोर्ट किया गया है, खाना पकाने के तेल की कीमतें इस साल मई में 11 साल के सबसे उच्च स्तर पर पहुँच गई हैं।

ऐसा माना जाता है कि पाम तेल और सोयाबीन तेल पर उच्च आयात शुल्क और उपकर लगाने से कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। जैसे-जैसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ता अन्य तेलों की ओर रुख करते गए, उनकी कीमतें भी बढ़ती गईं। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि सरकार "रिफाइंड, ब्लीच्ड, डीओडराइज्ड' (आरबीडी) पाम तेल पर 59.4 प्रतिशत और सूरजमुखी और सोयाबीन तेलों पर 38.5 प्रतिशत से 49.5 प्रतिशत के बीच उच्च आयात शुल्क वसूल करती है। भारत, घरेलू मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर खाना पकाने के तेल के आयात पर निर्भर है। 2019-20 में, भारत ने खाना पकाने के तेल की कुल घरेलू मांग का लगभग 56 प्रतिशत आयात किया था।

लोगों पर बोझ कम करने का एक सीधा-सीधा तरीका आयात शुल्क और उपकर को कम करना या उसे समाप्त करना होगा। इसके लिए अन्य तरीकों में सब्सिडी प्रदान करना और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाना पकाने के तेल के वितरण की व्यवस्था करनी होगी। हालांकि, नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ऐसा करने की संभावना नहीं है, क्योंकि यह लोगों के कल्याण पर जितना संभव हो उतना कम खर्च करने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार संकटपूर्ण महामारी के समय में भी सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार करने से इनकार कर रही है या लॉकडाउन और कोरोनावायरस के कारण पीड़ित परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान न करने से यह बात अच्छी तरह से स्थापित हो गई है।

लेकिन, खाने-पीने की ऊंची कीमतों की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। आगे और भी कहानी है।

रसोई गैस महंगी और कोई सब्सिडी नहीं

परिवारों के भीतर जिस बात ने सबसे बड़ी दहशत पैदा की है, वह पिछले एक साल में रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भारी वृद्धि है, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने प्रत्येक सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी को गुप्त रूप से वापस ले लिया है।

जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है, चार महानगरों (दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता) में औसत एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है - मई 2020 में लगभग 579 रुपये प्रति सिलेंडर की कीमत से जुलाई 2021 बढ़कर 845 रुपये से ऊपर हो गई है. डेटा इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के इंडेन ब्रांड के बारे में है।

इसके लिए जो स्पष्टीकरण दिया जा रहा है वह यह कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें और मानक एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों बढ़ोतरी हुई हैं, इसलिए घरेलू कीमतों में भी वृद्धि हुई है। यह वास्तव में एक सच्चाई है, लेकिन इसमें कहानी के भीतर कहानी हैं।

पिछले साल, मई 2020 में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट के बाद से, मोदी सरकार ने घोषणा की थी कि एलपीजी पर कोई सब्सिडी देने की जरूरत नहीं है क्योंकि सिलेंडर की कीमत लगभग 600 रुपये हो गई है। लेकिन कुछ महीने बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगीं और एलपीजी सिलेंडर की कीमतें भी बढ़ने लगीं। लेकिन, सब्सिडी बहाल नहीं की गई। 

इस बात को यह इस तथ्य में देखा जा सकता है कि पिछले साल अप्रैल-जून तिमाही के दौरान, रसोई गैस के लिए सरकारी सब्सिडी (प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण के माध्यम से) 2,573 करोड़ रुपये थी, जो जुलाई-सितंबर तिमाही में घटकर 445 करोड़ रुपये रह गई थी, और आगे चलकर अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में यह 345 करोड़ रुपये रह गई थी और पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ (पीपीएसी) के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार,  अंतिम तिमाही में यह केवल 196 करोड़ रुपये पर समाप्त हो गई थी। यह (फरवरी 2021 तक) तक कुल 3,559 करोड़ रुपये बैठता है। पिछले वर्ष रसोई गैस के लिए कुल प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण सब्सिडी 22,635 करोड़ रुपये थी।

एक बार फिर, ऐसा लगता है कि यह सरकार की सोची-समझी नीति है, जो खाना पकाने के तेल की तरह, और वास्तव में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी, लोगों पर उच्च कीमतों/लागत का बोझ डाल रही है।

ट्रेड यूनियन और किसान संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाया जाना चाहिए और खाना पकाने के तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं को शामिल कर इसका विस्तार किया जाना चाहिए। वे यह भी मांग कर रहे हैं कि वर्तमान में महामारी की वजह से चल रहे आर्थिक संकट से निपटने के लिए सभी गैर-आयकर भुगतान करने वाले परिवारों को प्रति माह 7,500 रुपये हस्तांतरित किए जाएं। लेकिन क्या मोदी सरकार मजदूर-किसानों और आम जनता की बात सुनेगी या उनके दर्द को महसूस करेगी?

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें।

High Food Prices Destroying Family Nutrition in Already Stressed Times

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