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पाकिस्तान
पाकिस्तान किस प्रकार से बलूचिस्तान में शांति के लिए पहले-विकास की राह को तलाश सकता है
राष्ट्र को एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान की कोशिश के संघर्ष के केंद्र में अपनाई जा रही आतंकवाद विरोधी मॉडल की विफलता है।
जस्टिन पॉडुर  
11 Mar 2022
pakistan
चित्र साभार: एपी फोटो/अरशद बट

हाल के वर्षों में पाकिस्तान और विदेशों में रहने वाले बलूच कार्यकर्ताओं की रहस्यमय परिस्थितियों के तहत लापता होने और उनकी हत्याओं ने सुर्खियाँ बटोरी हैं। इन “गायब कर दिए जाने” से संबंधित मामलों में हुई तेजी ने इस क्षेत्र के लोगों के द्वारा महसूस की जाने वाली तकलीफों का हल निकालने के लिए पाकिस्तान की तात्कालिकता को उजागर किया है, क्योंकि इसके द्वारा अमेरिका से एक अलग पहचान बनाने की कोशिस की जा रही है और अपने भविष्य के विकास के लिए इसने चीन की ओर देखना शुरू कर दिया है।

20 दिसंबर, 2020 को महामारी के दौरान एक सर्दी के दिन, कनाडा में निर्वासित रहकर अपना जीवन बिता रही एक पाकिस्तानी बलूच मानवाधिकार कार्यकर्ता 37 वर्षीय करीमा बलूच ने स्पष्ट रूप से सेण्टर आइलैंड के टोरंटो तट पर घूमने-फिरने का मन बनाया - एक पर्यटक क्षेत्र जो उस दौरान व्यवसाय के लिए तालाबंदी वाले इलाके से दूर-दराज पर स्थित था, उन्हें पानी में डूबने की वजह से मृत पाया गया था। गार्डियन के मुताबिक, पुलिस ने उनकी मौत के पीछे किसी भी आपराधिक गतिविधि की संभावनाओं से इंकार कर दिया था, लेकिन उनके पति हम्माल हैदर, जो खुद भी एक कार्यकर्ता हैं, ने कहा कि उनकी पत्नी की मौत से एक महीने पहले ही उन्हें जान से मार देने की धमकी प्राप्त हुई थी।  

इससे आठ महीने पूर्व, मई 2020 में, एक अन्य बलूच कार्यकर्त्ता, पत्रकार साजिद हुसैन की भी स्वीडन में एक नदी में डूबने से मौत हो गई थी, जहाँ उन्हें 2019 से राजनीतिक शरण दी गई थी। ये दो मौतें - जो पश्चिमी देशों में घटित होने और शरण में रहने वाले कार्यकर्ताओं के साथ हुई थीं, और दोनों ही सुर्ख़ियों के लायक हैं, किंतु पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में कार्यकर्ताओं की गुमशुदगी के मामलों की तुलना में ये समुद्र में एक बूंद के बराबर है। बलूचिस्तान में मौजूद समूहों का मानना है कि पाकिस्तान में गायब होने वालों की संख्या हजारों, संभवतः दसियों हजार लोग हैं, जहाँ पर हर समय “लापता कर दिए जाने के” नए-नए मामले दर्ज होते रहते हैं। एक पश्चिमी सूत्र ने बताया है कि सिर्फ 2011 से 2016 के बीच में ही बलूचिस्तान में 1,000 से अधिक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को “जान से मार देने और फेंक दिए जाने” की घटनाएं दर्ज की गई हैं। 

तेज-तर्रार पाकिस्तानी कार्यकर्ता एवं लेखक परवेज हुडभॉय ने मुझसे कहा कि “2021 के अंत में बलूचिस्तान क्षेत्र में “लापता कर दिए जाने” के खिलाफ जो विरोध प्रदर्शन हुए थे, उसने “लगातार तीन सप्ताह तक महिलाओं और बच्चों सहित दसियों हजार लोगों को ग्वादर के आस-पास के इलाकों, जिनमें तुर्बत, पिश्कान, ज़मोरान, बुलेदा, ओरमारा और पासनी शामिल हैं, से रोज-ब-रोज आने के लिए आकृष्ट किया। वे लोग स्थानीय लोगों के साथ हो रहे व्यवहार, विशेष रूप से पीने के पानी की कमी और चीनी मछली पकड़ने के जहाजों द्वारा की जा रही घुसपैठ का विरोध कर रहे थे। बलूचिस्तान में वंचित कर दिए जाने की भावना व्यापक स्तर पर घर कर गई है।” 

बलूचिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष के कई आयाम हैं। बलूचिस्तान प्रान्त अफगानिस्तान के साथ पाकिस्तान की सीमा पर है जो वहां पर पिछले चार दशकों से चल रहे संघर्ष से बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) का यह प्रमुख कुंजी है, जो चीन से लेकर ग्वादर के क्षेत्रीय हब बंदरगाह तक फैला हुआ है। यह पाकिस्तान के भीतर उत्पीड़ित बलूच अल्पसंख्यक समुदाय का क्षेत्र भी है।

हालाँकि इस संघर्ष के केंद्र में, राष्ट्र को एकजुट रखने के लिए पाकिस्तान के द्वारा अपनाए जा रहे जवाबी कार्यवाई वाले मॉडल की विफलता है। 

इंग्लैंड ने अपने 19वीं सदी के “ग्रेट गेम” अभियान के हिस्से के तौर पर, जिसका उद्देश्य एशिया में ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित एवं विस्तारित करने का था, के इरादे से 1839 में बलोचिस्तान पर आक्रमण किया। अर्ध-स्वायत्त के तौर पर माने जाने वाले बलोचिस्तान को कलात कहा जाता था, और कलात के खान मीर अहमद यार खान के द्वारा शासित था, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान के तौर पर भारत के 1947 के विभाजन की पीड़ादायक घटनाओं के दौरान इस क्षेत्र की स्वतंत्रता की घोषणा की थी। 1947 में शुरू हुए आठ महीनों के विद्रोह के बाद कालात के खान ने अंततः 1948 में पाकिस्तान में विलय को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बलूच राष्ट्रवादियों और पाकिस्तान की सरकार के बीच में कई दौर के युद्ध चले: जो 1958-1959, 1962-63, 1973-1977, और 2004 से लेकर आज तक जारी हैं। 

अफगानिस्तान में संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ पिछले चालीस वर्षों से चले आ रहे अक्सर अस्पष्ट गठबंधन ने पाकिस्तानी राष्ट्र को पूरी तरह से तब्दील करके रख दिया है, और देश के सैन्य बलों की गुप्त शाखाओं को ताकतवर बनाने का काम किया है। 1980 के दशक से, पाकिस्तान ने अफगान विद्रोहियों का समर्थन किया है। 2000 के दशक में, पाकिस्तान ने अमेरिकी विद्रोही गुटों का समर्थन किया, और अंततः एक ही समय में अफगानिस्तान में अमेरिकी कब्जे और तालिबान विद्रोह (जिसने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया और तब से देश पर शासन कर रहा है) दोनों को अपना समर्थन दिया। पाकिस्तान ने बलूच अलगाववाद से निपटने के लिए अमेरिकी मॉडल वाले दृष्टिकोण को अपनाया, और इस क्षेत्र में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के खिलाफ इस्लामिक उग्रवाद को प्रायोजित करने और विद्रोह को कुचलने के लिए उग्रवाद विरोधी क्रूर तरीकों को इस्तेमाल में लिया।

जब मैंने हुडभॉय से बलूचिस्तान के बारे में पाकिस्तान के दृष्टिकोण के बारे में जानना चाहा तो उनका कहना था: “लातिनी अमेरिका के खूंखार जनरलों की तरह, पाकिस्तान के जनरल भी विद्रोहियों से कैसे निपटना है जान गए हैं। कई वर्षों से यहाँ पर सड़कों के किनारे यातना के निशानों के साथ शव नजर आते हैं, और कई-कई हजार की संख्या में युवा बलूच लापता हो गये हैं, कुछ तो हमेशा-हमेशा के लिए।”

बलूचिस्तान में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के खिलाफ पाकिस्तान के द्वारा विद्रोहियों उकसाए जाने के बारे में हुडभॉय ने कहा: “सत्ता प्रतिष्ठान ने बलूच राष्ट्रवाद के मारक के तौर पर सिपाह-ए-सहाबा जैसे चरमपंथी उग्रवादी धार्मिक संगठनों का जानबूझकर इस्तेमाल किया है। इसने एक बिंदु तक अपना काम किया है - जिसे कभी मार्क्सवाद से प्रेरित विद्रोह के तौर पर... [देखा जाता था] उस 1973 के विद्रोह को, वह अब कहीं अधिक जातीय तौर पर उन्मुख हो गया है।”

हुडभॉय ने इस समस्या के हस्से के रूप में इस मुद्दे के स्थानीय मीडिया कवरेज को भी चिह्नित किया: “यदि कोई भी पत्रकार बलूचिस्तान की घटनाओं पर सटीक रिपोर्टिंग करता है तो वह अपने लिए बहुत दिनों तक जिंदा रहने की उम्मीद नहीं कर सकता है।” उन्होंने आगे कहा, “जनवरी 2022 में, एक आतंकी हमले [लाहौर में बाजार क्षेत्र में एक बम विस्फोट की घटना] के बाद बलूच छात्रों को लाहौर में हिरासत में ले लिया गया था, जो कि [बलूचिस्तान से] कई सौ मील की दूरी पर स्थित है, जिसके तालिबान के द्वारा किये जाने की संभावना थी।”

ख़ुफ़िया अभियान चलाने, विशिष्ट उग्रवादियों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के लिए घुसपैठ एवं प्रायोजित करने का काम, बेगुनाह लोगों के खिलाफ आम जनता की सहमति के लिए नकली मीडिया को तैयार करना, जिन्हें निराधार रूप से आतंकी गतिविधियों में फंसाया जाता है-- ये सभी चीजें इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी जवाबी कार्यवाहियों की खूबियाँ रही हैं। लेकिन क्या पाकिस्तान को अपनी अमेरिकी विरासत को तब भी इस्तेमाल करना जारी रखना चाहिए, जब अब उसे ऐसा करने की किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है? 

अमेरिका और पाकिस्तान के बीच लगातार बिगड़ते रिश्ते 

यूक्रेन के साथ रूस के युद्ध के बीच में, 23-24 फरवरी को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मास्को की यात्रा, ने पाकिस्तान-अमेरिकी रिश्तों की खेदजनक स्थिति का प्रतीक है। रिश्तों में यह गिरावट एक दशक से भी पहले से जारी थी, क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका की निराशा पाकिस्तान के भीतर अमेरिकी ड्रोन हमलों और अफगानिस्तान पर अमानवीय अमेरिकी कब्जे के प्रति पाकिस्तान के कम-उत्साही समर्थन से बढ़ती जा रही थी। 

अल ज़जीरा के एक लेख के अनुसार, पूर्व अमेरिकी महासभा सदस्य डाना रोह्राबचेर ने 2012 में कहा था कि, “निश्चित रूप से, पाकिस्तानी सेना और इसके नेताओं ने अमेरिकियों के सामूहिक हत्यारे [ओसामा बिन लादेन] को सुरक्षित ठिकाना दे रखा है, और उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।” एक अन्य सांसद, लुई गोहमर्ट ने 2012 के दौरान एक वीडियो साक्षात्कार में सुझाया था कि अमेरिका को अब पाकिस्तान के टुकड़े करने पर विचार करना चाहिए, अमेरिकी सैनिकों की मदद करने की रणनीति के रूप में, जो उस दौरान भी अफगानिस्तान को कब्जाए हुए थे: “हमें पाकिस्तान के दक्षिणी हिस्से में बलूचिस्तान को खड़ा करने के बारे में बात करनी चाहिए। वे अफगानिस्तान के भीतर आईईडी और सभी प्रकार के हथियारों के प्रवेश को रोक सकते हैं, और हमें वहां पर जीत हासिल करने के लिए एक कोशिश करनी चाहिए,” अल ज़जीरा ने सूचित किया था।

पाकिस्तान पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया गया है और फाइनेंसियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (एफएटीएफ) के जरिये उसे वित्तीय नियंत्रणों एवं प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिका अपने सहयोगियों और शत्रुओं दोनों के खिलाफ समान रूप से वित्तीय युद्ध चलाता है। एक अमेरिकी शत्रु बनने की ओर तेजी से बढ़ रहे एक सहयोगी के तौर पर, पाकिस्तान के पास इन वित्तीय प्रतिबंधों से बचने की संभावना अब शायद ही बची है।

जिस चीज ने पाकिस्तान को पूरी तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका के विरोधी शिविर में डाल दिया है वह है चीन के साथ पाकिस्तान का संबंध, जो कि उसका तथाकथित “हर समय का सहयोगी” है। और इस रिश्ते का प्रतीक शायद चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की आधारशिला है, जो कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) है, जिसका ध्वज-पोत बलूचिस्तान में ग्वादर बन्दरगाह है। 

लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एंड्रू कोरिब्को का तर्क है कि पाकिस्तान एक अमेरिकी हाइब्रिड युद्ध का लक्ष्य है, जो सीपीईसी और बलूचिस्तान पर केंद्रित है, और 2015 से पाकिस्तान इस युद्ध के निशाने पर रहा है। उन्होंने मुझे बताया कि पाकिस्तान अब अमेरिकी लौह मुट्ठी से अपनी दिशा को बदलने में प्रयासरत है: “[पाकिस्तान में] इस बात की कोशिशें की जा रही हैं कि क्षेत्र के बुनियादी ढाँचे पर अधिक निवेश किया जाये, भौतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर। किंतु स्थानीय लोग देश के हालिया विकास से खुद को वंचित महसूस कर रहे हैं और वे अपने संसाधन-संपन्न एवं भू-रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र से हासिल होने वाले धन में एक बड़ा हिस्सा चाहते हैं।” पाकिस्तान के हल्के रवैये के बारे में उनका कहना था कि, “आने वाले दिनों में बलूचिस्तान में इसका परीक्षण हो जायेगा।” 

एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका में बढ़ती उपस्थिति के साथ, बीआरआई (बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव) सौदों में अक्सर चीनी बैंक शामिल रहते हैं, जो इन क्षेत्रों में आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के निर्माण के लिए वित्तपोषण करते हैं, जो कि चीनी कंपनियों के नेतृत्व में होते हैं। कभी-कभी इन ऋणों का भुगतान खनिज या पेट्रोलियम के तौर पर सीधे प्राकृतिक संसाधनों के तौर पर किया जाता है। जैसा कि पूर्व लाइबेरियाई लोक निर्माण मंत्री ग्यूद मूर ने शिकागो विश्वविद्यालय में अपने श्रोताओं को इस बात को समझाया, कि अक्सर चीनी बैंकों के द्वारा इन ऋणों को देय होने पर पुनर्निर्धारित कर दिया जाता है।

बीआरआई इस आधार पर आधारित है कि गरीब देशों के लिए संपन्नता की राह विन-विन समाधान के जरिये हो सकती है- व्यापारिक सौदे जिसमें आर्थिक रूप से मजबूत पार्टी (सभी मामलों में चीन) कमजोर पार्टी या देश की आंतिरक राजनीति में दखलंदाजी नहीं करेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि सीपीईसी के तहत किये जा रहे सभी सौदों के लिए, बलूचिस्तान संघर्ष का समाधान पूरी तरह से पाकिस्तान की जिम्मेदारी है। अपनी खुद की सीमाओं के भीतर शिनजियांग में अलगाववाद के बारे में चीन का दृष्टिकोण, अमेरिका (या पाकिस्तान या भारत के) दृष्टिकोण से भिन्न रहा है: जिसमें लापता कर दिए जाने, हत्याओं और सैन्य अभियानों के विपरीत, चीन की जवाबी कार्यवाई के दृष्टिकोण की आधारशिला में व्यावसायिक प्रशिक्षण, “पुनः शिक्षा” शिविर और गरीबी उन्मूलन का रहा है। 

जस्टिन पोडुर टोरंटो स्थित लेखक हैं और ग्लोबट्रॉटर के साथ राइटिंग फेलो के तौर पर सम्बद्ध हैं। आप इन्हें इनकी वेबसाइट podur.org में और ट्विटर @justinpodur पर देख सकते हैं। आप यॉर्क विश्वविद्यालय में फैकल्टी ऑफ़ एनवायरनमेंट एंड अर्बन चेंज में पढ़ाते हैं। 

स्रोत: इस लेख को ग्लोबट्रॉटर के द्वारा तैयार किया गया था।

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