NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कानून
समाज
भारत
लड़कियों की शादी की क़ानूनी उम्र बढ़ाकर 21 साल करना बाल विवाह का समाधान नहीं
इसकी बजाय सरकार को लड़कियों को शिक्षा के अवसर, स्वास्थ्य-सेवाएं एवं सुरक्षा प्रदान करने में और अधिक निवेश करना चाहिए। उन्हें अपना करियर चुनने में मदद करनी चाहिए।
सुमैया खान
29 Dec 2021
लड़कियों की शादी की क़ानूनी उम्र बढ़ाकर 21 साल करना बाल विवाह का समाधान नहीं
साभार: लाइव लॉ

अपनी शिक्षा और करियर के चयन से लेकर जीवन साथी चुनने तक और फिर जिस तरह का जीवन वे जीना चाहती हैं, इन्हें देखते हुए लड़कियों-महिलाओं को हमारे पितृसत्तात्मक समाज में बहुत कम आजादी हासिल है। कन्या भ्रूण हत्या, ऑनर किलिंग, घरेलू हिंसा, बलात्कार और अन्य प्रकार के यौन शोषणों की खबरों से पता चलता है कि कैसे महिलाओं को हमेशा पुरुषों के अधीन और दुर्व्यवहार का विषय माना जाता है।

समाज ने हमेशा महिलाओं की स्वायत्तता पर हमला किया है। इसका उदाहरण, लोकसभा में हालिया पेश किया गया बाल विवाह निषेध (संशोधन) विधेयक-2021 है, जो कि बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 का ही एक संशोधित प्रस्ताव है। इसके तहत लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष कर दी गई है।

लड़कियों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य तक अधिक पहुंच बनाने और बाल विवाह की बढ़ती संख्या को रोकने के लिए 1978 में उनके विवाह की कानूनी आयु 16 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई थी। हालांकि, बाल विवाह की प्रथा अभी भी प्रचलित है।

यूनिसेफ, आइसीआरडब्ल्यू और एनएफएचएस द्वारा साझा किए गए नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि देश में बाल विवाह का प्रतिशत 27 से 47 फीसद के बीच है। यह दर्शाता है कि इस मध्ययुगीन प्रथा को मिटाने में केवल कानून बहुत मदद नहीं कर सकता; सरकार को और एक समाज के रूप में, हमें भी अधिक प्रयास करने होंगे।

सहमति की आयु 18 वर्ष है। इस आयु तक व्यक्ति वयस्क हो जाता है। लड़का या लड़की को स्वयं के बारे में कोई भी निर्णय लेने के लिए कानूनी रूप से परिपक्व माना जाता है। इसका मतलब है कि दो व्यक्ति जो वयस्कता की अवस्था तक पहुंच चुके हैं, वे बिना किसी कानूनी रोक के यौन संबंध बना सकते हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में यह संशोधित विधेयक एक अजीबोगरीब सवाल उठाता है, वह यह कि: जब कोई व्यक्ति 18 साल की उम्र में सहमति से सेक्स तो कर सकता है लेकिन 21 साल की उम्र तक उसे शादी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है? हालांकि मैं लिव-इन की अवधारणा के खिलाफ नहीं हूं, लेकिन शादी की कानूनी उम्र को बढ़ाकर 21 साल करने से युवा जोड़ों को लिव-इन का विकल्प चुनने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। यह दीर्घावधि में विवाह की संस्था को कमजोर करेगा और महिलाओं के अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव डालेगा क्योंकि लिव-इन अधिकार कानून बहुत मजबूत नहीं हैं। दूसरी ओर, वैवाहिक अधिकार सामान्य और व्यक्तिगत, दोनों कानूनों के तहत ठोस और अच्छी तरह से संरचित-संरक्षित हैं।

प्रस्तावित विधेयक में एक और दोष है। इसमें 18 से 21 आयु वर्ग में स्वतंत्र परिपक्व महिलाओं को अपरिपक्व वयस्कों में वर्गीकृत करना है, जो अपने माता-पिता के नियंत्रण में रहते हुए स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय लेने की शक्तियों को खो देंगी। तब हमारे पास अधिक भ्रमित महिलाएं होंगी, जो अपना करियर तो तय कर सकती हैं या एक व्यापार अनुबंध में प्रवेश कर सकती हैं, लेकिन जीवन साथी का चयन करने में असमर्थ होंगी। जाहिर है कि इस तरह प्रस्तावित कानून केवल समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता को प्रोत्साहित करना चाहता है।

हालांकि सरकार का दावा है कि प्रस्तावित कानून, जो विवाह योग्य उम्र बढ़ाकर महिलाओं को शैक्षिक और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करने का इरादा रखता है, उनके करियर के अवसरों का विस्तार करेगा।

कानून के इच्छित उद्देश्य को बिना किसी कानूनी बाध्यता के और समाज में अधिक जागरूकता पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां बाल विवाह मुख्य रूप से गरीबी और बच्चियों की सुरक्षा की चिंता के कारण अधिक प्रचलन में है। ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की कोई बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं या बहुत कम हैं-उदाहरण के लिए, स्कूलों में उचित शौचालयों की कमी है और फिर वे काफी दूरी पर हैं, जो छात्राओं की उच्च ड्रॉपआउट दर के प्रमुख कारण हैं। गरीब परिवारों में जहां माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, वहां लड़कियां घर में अकेली रह जाती हैं, जिनसे उनकी सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ जाती हैं। इसलिए, सरकार को निचले तबके में महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

पेश किया गया विधेयक बाल वधू के अधिकारों के बारे में भी स्पष्ट नहीं है। इसमें बाल वधू के अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। इस तरह के विवाह को न्यायालय द्वारा केवल तभी अमान्य घोषित किया जा सकता है, जब दोनों पक्षों में से कोई एक याचिका दायर करे।

इस तरह के विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे के अधिकारों को व्यक्तिगत कानूनों में संरक्षित किया जाता है। उदाहरण के लिए, विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 16 के अनुसार शून्य घोषित किए जाने के बाद भी वैध माना जाता है। इस बालिका वधू के मां बनने के अधिकारों को अच्छी तरह से परिभाषित नहीं किया गया है। प्रस्तावित कानून में बाल वधू के कुछ ठोस अधिकारों का उल्लेख होना चाहिए।

अंत में, इस प्रस्तावित कानून में कुछ संवैधानिक मुद्दे भी हैं। यह कुछ समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करेगा क्योंकि सरकार चाहती है कि प्रस्तावित कानून सभी धर्मों पर लागू हो। अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि "सभी व्यक्ति समान रूप से अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के स्वतंत्र अधिकार के हकदार हैं"। इसलिए, प्रस्तावित कानून के लिए संवैधानिक चुनौती को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दिए जाने पर पारित करना मुश्किल होगा।

उपरोक्त कारणों को देखते हुए सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश करना चाहिए। लड़कियों के लिए निवेश की गारंटी सुविधाओं में वृद्धि करनी चाहिए जहां वे अपना करियर चुन सकती हैं, सामाजिक जागरूकता और उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अधिक बजटीय आवंटन बाल विवाह की समस्या का हल हो सकता है।

(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कानून के चौथे वर्ष की छात्रा हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

 

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Increasing Legal age of Marriage for Women to 21 years not Solution to Child Marriage

Girl
Women
Marriage
Leagal
Increase
Law
education
HEALTH
Career
budget

Related Stories

मैरिटल रेप : दिल्ली हाई कोर्ट के बंटे हुए फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, क्या अब ख़त्म होगा न्याय का इंतज़ार!

जातिवाद का ख़ात्मा: छात्रों की हिफ़ाज़त में क़ानून की भूमिका

यूपी: ललितपुर बलात्कार मामले में कई गिरफ्तार, लेकिन कानून व्यवस्था पर सवाल अब भी बरकरार!

लिव-इन रिश्तों पर न्यायपालिका की अलग-अलग राय

क्या सूचना का अधिकार क़ानून सूचना को गुमराह करने का क़ानून  बन जाएगा?


बाकी खबरें

  • vikram
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    यूपीः बीजेपी नेताओं का विरोध जारी, गांव से बैरंग लौटा रहे हैं किसान
    22 Jan 2022
    चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में कई मौकों पर विभिन्न मुद्दों के लेकर लोगों ने बीजेपी नेताओं का विरोध किया है। चाहे कृषि कानून का मामला या कोई दूसरा क्षेत्रीय या राष्ट्रीय मामला इन सबको लेकर इन नेताओं को…
  • cartoon
    राजेंद्र शर्मा
    कटाक्ष: नये इंडिया का नया गणतंत्र ‘दिवस’!
    22 Jan 2022
    नेताजी का किया-धरा चाहे सब मिट्टी में मिलाएंगे, पर नेताजी की 25 फुट ऊंची मूर्ति तो मोदी जी ही लगाएंगे और वह भी परेड के रास्ते पर। इस गणतंत्र दिवस की तस्वीरें एक नयी कहानी सुनाएंगी-नये इंडिया के नये…
  • up hot seat
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: योगी और अखिलेश की सीटों के अलावा और कौन सी हैं हॉट सीट
    22 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश की गोरखपुर शहर विधानसभा सीएम योगी और करहल विधानसभा अखिलेश यादव के कारण पहले ही चर्चा में हैं, इसके अलावा कौन-कौन सी सीटों पर रहेगी राजनीतिक दलों और आम लोगों की ख़ास नज़र..
  • clubhouse
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ‘क्लब हाउस चैट’ मामले में एक और गिरफ़्तारी, ‘बिस्मिल्ला’ के नाम से आईडी चला रहा था आरोपी राहुल कपूर  
    22 Jan 2022
    क्लब हाउस चैट मामले के तार देश के हर शहर से जुड़ते जा रहे हैं, हरियाणा के बाद अब लखनऊ से एक आरोपी को गिरफ़्तार किया गया है, जो अपना नाम बदलकर महिलाओं के बारे में अश्लील टिप्पणियां करता था।
  • online campaign
    रश्मि सहगल
    चुनावों के ‘ऑनलाइन प्रचार अभियान’ में कहीं पीछे न छूट जाएं छोटे दल! 
    22 Jan 2022
    डिजिटल की तरफ शिफ्ट की बातें करना इसे लागू करने की तुलना में काफी आसान है क्योंकि चुनावी राज्यों के कई हिस्सों में अभी भी इंटरनेट की पैठ कम है और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों का रवैया भी काफी हद तक…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License