NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
सोशल मीडिया
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
22 महीनों में 10 चुनावों के दौरान इन 34,884 राजनीतिक विज्ञापनों ने बीजेपी की पहुंच दोगुनी कर दी।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
16 Mar 2022
Facebook

किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग से विज्ञापन देने वाले सरोगेट विज्ञापनकर्ताओं को 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को प्रोत्साहित करने और विपक्ष के खिलाफ़ गलत धारणा फैलाने के लिए अपना मंच प्रदान किया। इन विज्ञापनदाताओं में रिलायंस जियो से वित्त पोषित "NEWJ (न्यू एमर्जिंग वर्ल्ड ऑफ़ जर्नलिज़्म)" भी शामिल है। इन चीजों का खुलासा द रिपोर्टर्स कलेक्टिव (टीआरसी) और एड.वॉच द्वारा एक साल तक की गई जांच में हुआ है। 

भारत स्थित गैर लाभकारी मीडिया संगठन टीआरसी के कुमार संभव और श्रीगिरीश जलिहाल व एड.वॉच की नयनतारा रंगनाथन ने यह जांच की है। एड.वॉच एक शोध प्रोजेक्ट है, जो सोशल मीडिया पर राजनीतिक विज्ञापनों का अध्ययन करता है। टीआरसी और एड.वॉच की रिपोर्ट को अल-जजीरा ने छापा है। जांच के पहले हिस्से में बताया गया है कि NEWJ ने फरवरी, 2019 से नवंबर 2020 के बीच हुए दस चुनावों में करीब़ 52 लाख रुपये के 718 विज्ञापन फ़ेसबुक पर चलवाए, जिन्हें 29 करोड़ बार देखा गया।

फरवरी, 2019 से नवंबर 2020 के बीच प्रसारित हुए 5,36,070 विज्ञापनों के विश्लेषण के ज़रिए अध्ययन में बताया गया है कि NEWJ बीजेपी के पक्ष में सरोगेट राजनीतिक विज्ञापन (तीसरे पक्ष द्वारा अप्रत्यक्ष विज्ञापन) चलवाती है, जिससे बीजेपी को अपना दायरा बढ़ाने का मौका मिलता है। अध्ययन में शामिल लोगों ने फ़ेसबुक के "ऐड लाइब्रेरी एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग" का इस्तेमाल कर यह आंकड़े निकाले हैं। 

फ़ेसबुक ने बीजेपी को अपनी पहुंच दोगुनी करने में मदद की

जांच के दूसरे हिस्से में पाया गया है कि इन 22 महीनों में 10 चुनावों के दौरान 23 बेनाम (घोस्ट एडवर्टाइज़र) और सरोगेट विज्ञापनकर्ताओं ने फ़ेसबुक को बीजेपी का प्रचार करने के लिए या विपक्ष की आलोचना करने के लिए 34,884 विज्ञापनों को चलाने के ऐवज में 5।8 करोड़ रुपये दिए। इन विज्ञापनों पर 1।31 अरब व्यू आए। यह विज्ञापन दिल्ली, ओडिशा, महाराष्ट्र, बिहार और हरियाणा चुनाव के दौरान चलाए गए। इन विज्ञापनकर्ताओं की असली पहचान या उन्हें सत्ताधारी दल से जोड़ने का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड ही नहीं है। 

टीआरसी के मुताबिक़, इन सरोगेट विज्ञापनों के जरिए बीजेपी, मोदी और दूसरे नेताओं की दृश्यता दोगुनी हुई, जबकि विपक्ष का चुनाव अभियान कमज़ोर हुआ। टीआरसी ने पाया कि बीजेपी और उसके प्रत्याशियों ने आधिकारिक तौर पर फ़ेसबुक पर 26,291 विज्ञापनों के लिए 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च किए, जिनपर एक अरब छत्तीस करोड़ व्यूज़ आए।   

टीआरसी और एड।वॉच ने एपीआई का इस्तेमाल करते हुए, फरवरी, 2019 से नवंबर 2020 के बीच 5 लाख रुपये से ज़्यादा के राजनीतिक विज्ञापन जारी करने वालों की सूची निकालकर यह हैरान करने वाले आंकड़े निकाले हैं। 

फ़ेसबुक पर सरोगेट बीजेपी समर्थक

चुनाव आयोग प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में सरोगेट या बेनामी विज्ञापन देने पर प्रतिबंध लगाता है। बल्कि कोई तीसरा पक्ष, जिसका संबंधित प्रत्याशी से कोई संबंध भी नहीं है, तो भी तीसरे पक्ष द्वारा दिए गए विज्ञापनों का खर्च प्रत्याशी के खर्च में जोड़ा जाता है। इसके अलावा ख़बर की आड़ में पैसे देकर करवाया गया प्रचार भी खर्च में जोड़ा जाता है। 

लेकिन यह अजीब है कि चुनाव आयोग डिजिटल प्लेटफॉर्म को इस प्रतिबंध से छूट देता है। जबकि डिजिटल की इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया से ज्यादा पहुंच है। चुनाव आयोग के नियमों की इस कमी का फायदा NEWSJ जैसे प्लेटफॉर्म व दूसरी बंद पड़ी वेबसाइट और पोर्टल्स उठाते हैं, व बीजेपी समर्थक विज्ञापनों पर लाखं रुपये खर्च करते हैं, इन विज्ञापनों को खबर की आड़ में प्रकाशित किया जाता है और अक्सर इनमें पार्टी से संबंधों या उसके स्वामित्व की कोई जानकारी नहीं होती। 

टीआरसी के मुताबिक़, बेनामी अज्ञात विज्ञापन चलाने वाले इन 23 विज्ञापनदाताओं में से सिर्फ़ 6 का बीजेपी से संबंध खोजा जा सकता। बाकी के पोर्टल, वेबसाइट या तो बंद हैं या सक्रिय नहीं हैं। जांच में पाया गया कि "myfirstvoteformodi.com", "NationWithNamo.com" और भारत के मन की बात ने फ़ेसबुक के विज्ञापन प्लेटफॉर्म पर अपना पता दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय डाला है। लेकिन इन विज्ञापनकर्ताओं ने फ़ेसबुक पेज या वेबसाइट पर बीजेपी के साथ अपना कोई संबंध नहीं बताया है।  

फिर अन्य दो दूसरे विज्ञापनकर्ताओं- ब्लूक्रॉफ्ट डिजिटल और श्रीनिवासन श्रीकुट्टन अप्रत्यक्ष तौर पर बीजेपी से जुड़े हैं। ब्लूक्रॉफ्ट डिजिटल के निदेशक और सीईओ ने पहले बीजेपी के लिए काम किया है, जबकि श्रीनिवास श्रीकुट्टन दक्षिणपंथी टिप्पणीकार अभिनव खरे के पेज पर विज्ञापन देते हैं। अभिनव खरे पहले एशियानेट न्यूज़ नेटवर्क के सीईओ रह चुके हैं। एशियानेट का स्वामित्व रखने वाली कंपनी जूपिटर कैपिटल की स्थापना बीजेपी के राज्य सभा सांसद और आईटी व इलेक्ट्रॉनिक्स के राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने की थी।

पहले चार विज्ञापनकर्ताओं ने बीजेपी समर्थित 12,328 विज्ञापनों पर करीब 3 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि बाकी दो ने करीब़ 27 लाख रुपये खर्च किए। टीआरसी ने यह भी पाया कि एक दूसरे पोर्टल द पल्स ने इस तरह के विज्ञापनों पर 9 लाख रुपये खर्च किए। इन विज्ञापनों में मोदी की प्रशंसा करते हुए उन्हें बीजेपी को वोट देने की अपील की गई थी। द पल्स खुद को एक मीडिया न्यूज़ कंपनी की तरह पेश करता है, जबकि अपने स्वामित्व और निवेश संबंधी किसी जानकारी का खुलासा कंपनी नहीं करती। 

इसी तरह एक और फ़ेसबुक पेज डिस्टॉय फराक शिवशाही परात (मतलब- अंतर साफ़ है, शिवाजी का शासन वापस आया है) की भी स्वामित्व संबंधी या किसी संगठन, व्यक्ति से संबंध की जानकारी सार्वजनिक नहीं है। इस पेज ने भी 1,748 बीजेपी समर्थक विज्ञापनों पर 22 लाख रुपये खर्च किए। पेज से मुख्यत: 2019 के महाराष्ट्र चुनाव के दौरान ही विज्ञापन जारी किए गए थे। यहां विज्ञापनकर्ता का नाम डीएफएसपी 2019 लिखा हुआ है, लेकिन इसकी वेबसाइट "shivshahiparat.com" खुलती ही नहीं है। 

दिलचस्प है कि इसी तरह के निवेशकों का उल्लेख करने वाले फ़ेसबुक के कई सक्रिय पेज निष्क्रिय वेबसाइटों- "ghargharraghubar.com" (जिसने झारखंड चुनाव के दौरान सरोगेट विज्ञापनों पर 9 लाख रुपये से ज़्यादा खर्च किए), "mainhoondilli.com", "paltuaadmiparty.com" (जिसने दिल्ली चुनाव के दौरान विज्ञापनों पर 18 लाख रुपये खर्च किए), "phirekbaarimaandarsarkar.com" (हरियाणा चुनाव में 28 लाख रुपये खर्च किए) और "aghadibighadi.com" (महाराष्ट्र चुनाव के दौरान 15 लाख रुपये खर्च किए)  पर ले जाते हैं। 

फ़ेसबुक ने ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर कार्रवाई का दावा किया है और कहा है कि अगर इन विज्ञापनकर्ताओं ने अपनी पहचान, संबंधों में गलत जानकारी दी है, तो उनकी पोस्ट भी हटाई गई हैं। लेकिन जब "माय फर्स्ट वोट फॉर मोदी", "भारत के मन की बात", "दिस्तॉय फरक शिवशाही परत" और "राष्ट्रीय जंगल दल" जैसे इन पेजों की पोस्ट हटाई गईं, तब तक उन्हें 16 करोड़ 19 लाख, 14 करोड़ 57 लाख व्यूज़, 6 करोड़ 32 लाख व्यूज़ और 1 करोड़ 53 लाख व्यूज़ क्रमश: मिल चुके थे। 

2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान रूसी भ्रामक जानकारी अभियान के बाद फ़ेसबुक ने 2018 में राजनीतिक विज्ञापन देने वालों की पहचान और पैसे के स्त्रोत् के परीक्षण की नीति की घोषणा की थी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों और अन्य विधानसभा चुनावों में सरोगेट विज्ञापनदाताओं द्वारा एक अहम किरदार निभाने के बाद यह नीति भारत में असफल हो चुकी है। 

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

23 Facebook Ghost Advertisers Pumped Rs 5 Crore into ‘Promoting’ BJP

Narendra modi
BJP
Facebook
Lok Sabha Elections
General elections
Parliamentary elections
Assembly elections
Political advertisements
Meta
Mark Zuckerberg
instagram
Congress
Rahul Gandhi
JEM
Jaish
Pakistan
mehbooba mufti
Amazon
Muslims RELATED STORIES

Related Stories

बीजेपी के चुनावी अभियान में नियमों को अनदेखा कर जमकर हुआ फेसबुक का इस्तेमाल

चुनाव के रंग: कहीं विधायक ने दी धमकी तो कहीं लगाई उठक-बैठक, कई जगह मतदान का बहिष्कार

पंजाब विधानसभा चुनाव: प्रचार का नया हथियार बना सोशल मीडिया, अख़बार हुए पीछे

अफ़्रीका : तानाशाह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कर रहे हैं

‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा

मुख्यमंत्री पर टिप्पणी पड़ी शहीद ब्रिगेडियर की बेटी को भारी, भक्तों ने किया ट्रोल

सांप्रदायिक घटनाओं में हालिया उछाल के पीछे कौन?

हेट स्पीच और भ्रामक सूचनाओं पर फेसबुक कार्रवाई क्यों नहीं करता?

वे कौन लोग हैं जो गोडसे की ज़िंदाबाद करते हैं?

कांग्रेस, राहुल, अन्य नेताओं के ट्विटर अकाउंट बहाल, राहुल बोले “सत्यमेव जयते”


बाकी खबरें

  • russia ukrain
    अजय कुमार
    यूक्रेन की बर्बादी का कारण रूस नहीं अमेरिका है!
    24 Feb 2022
    तमाम आशंकाओं के बाद रूस ने यूक्रेन पर हमला करते हुए युद्ध की शुरुआत कर दी है। इस युद्ध के लिए कौन ज़िम्मेदार है? कौन से कारण इसके पीछे हैं? आइए इसे समझते हैं। 
  • up elections
    अब्दुल अलीम जाफ़री
    उत्तर प्रदेश चुनाव: ज़मीन का मालिकाना हक़ पाने के लिए जूझ रहे वनटांगिया मतदाता अब भी मुख्यधारा से कोसों दूर
    24 Feb 2022
    उत्तर प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनाव के छठे चरण का मतदान इस इलाक़े में होना है। ज़मीन के मालिकाना हक़, बेरोज़गारी और महंगाई इस क्षेत्र के कुछ अहम चुनावी मुद्दे हैं।
  • ayodhya
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    यूपी चुनाव: अयोध्यावादियों के विरुद्ध फिर खड़े हैं अयोध्यावासी
    24 Feb 2022
    अयोध्या में पांचवे दौर में 27 फरवरी को मतदान होना है। लंबे समय बाद यहां अयोध्यावादी और अयोध्यावासी का विभाजन साफ तौर पर दिख रहा है और धर्म केंद्रित विकास की जगह आजीविका केंद्रित विकास की मांग हो रही…
  • mali
    पवन कुलकर्णी
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों की वापसी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत है
    24 Feb 2022
    माली से फ़्रांसीसी सैनिकों को हटाने की मांग करने वाले बड़े पैमाने के जन-आंदोलनों का उभार 2020 से जारी है। इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि में, माली की संक्रमणकालीन सरकार ने फ़्रांस के खिलाफ़ लगातार विद्रोही…
  • Himachal Pradesh
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    हिमाचल प्रदेश: फैक्ट्री में ब्लास्ट से 6 महिला मज़दूरों की मौत, दोषियों पर हत्या का मुक़दमा दर्ज करने की मांग
    24 Feb 2022
    हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में एक फैक्ट्री में विस्फोट होने से छह लोगों की मौत हो गयी और 12 अन्य झुलस गए हैं। फैक्ट्री में अवैध रूप से पटाखे बनाए जा रहे थे। जानकारी के मुताबिक मारे गए ज्यादातर लोग और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License