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भारत
राजनीति
क्या देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ‘राजनीतिक हस्तक्षेप’ का शिकार हो रहे हैं?
अशोका विश्वविद्यालय दो इस्तीफ़ों को लेकर विवादों में है। देश के कई और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी आज सरकार के निशाने पर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश के शिक्षण संस्थानों में अकादमिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ख़त्म करने की कोशिश की जा रही है।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
22 Mar 2021
प्रताप भानु मेहता (बाएं) और अरविंद सुब्रमण्यम दाएं)
प्रताप भानु मेहता (बाएं) और अरविंद सुब्रमण्यम दाएं)

हरियाणा के सोनीपत में स्थित अशोका विश्वविद्यालय बीते सप्ताह से सुर्खियों में है। इसकी वजह प्रतिष्ठित राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता और पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम का इस्तीफा है। हालांकि अशोका यूनिवर्सिटी की ओर से एक स्टेटमेंट जारी कर कुछ ‘संस्थागत चूक’ की बात कही गई है लेकिन जानकार इन इस्तीफों को राजनीतिक जवाबदेही और अकादमिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं, जो आज के दौर में किसी भी प्रतिष्ठित संस्थान के लिए निश्चित ही चिंताजनक है।

बता दें कि दुनियाभर के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के 150 से अधिक अकादमिक विद्वानों ने अशोका विश्वविद्यालय में प्रोफेसर पद से राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता के इस्तीफा देने पर चिंता जताई है। उन्होंने इस संबंध में विश्वविद्यालय को खुला पत्र लिखा है, जिसमें मेहता के इस्तीफे की वजह राजनीतिक दबाव बताया है।

अकादमिक विद्वानों का अशोका विश्वविद्यालय को खुला पत्र

अकादमिक विद्वानों ने अपने खुले पत्र में लिखा है, “राजनीतिक दबाव के चलते अशोका विश्वविद्यालय से प्रताप भानु मेहता के इस्तीफा के बारे में जानकर हमें दुख हुआ। भारत की मौजूदा सरकार के जाने-माने आलोचक तथा अकादमिक स्वतंत्रता के रक्षक मेहता को उनके लेखों के चलते निशाना बनाया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि अशोका विश्वविद्यालय के न्यासियों ने उनका बचाव करने के बजाय उन पर इस्तीफा देने का दबाव डाला।”

इस पत्र पर न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, ऑक्सफॉर्ड विश्वविद्यालय, स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, प्रिंस्टन विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय और कैलिफॉर्निया समेत अन्य विश्वविद्यालयों के अकादमिक विद्वानों के हस्ताक्षर हैं।

पत्र में कहा गया है, “स्वतंत्र वाद-विवाद, सहनशीलता तथा समान नागरिकता की लोकतांत्रिक भावना राजनीतिक जीवन का हिस्सा होते हैं। जब भी किसी विद्वान को आम जनता के मुद्दों पर बोलने की सजा दी जाती है, तो ये मूल्य खतरे में पड़ जाते हैं।”

यूनिवर्सिटी का क्या कहना है?

संस्थान ने एक बयान जारी कर कहा, “हम मानते हैं कि संस्थागत प्रक्रियाओं में कुछ खामियां रही हैं, जिसे सुधारने के लिए हम सभी पक्षकारों के साथ मिलकर काम करेंगे। यह अकादमिक स्वायत्तता एवं स्वतंत्रता की हमारी प्रतिबद्धता को दोहराएगा जो अशोका यूनिवर्सिटी के आदर्शों में हमेशा अहम रही है।”

अशोका यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज़ के चेयरमैन, कुलपति और उप-कुलपति की ओर से प्रोफेसर प्रताप भानु मेहता और प्रोफेसर अरविंद सुब्रमण्यम के इस्तीफे, और हालिया घटनाओं पर गहरा खेद जाहिर करते हुए कहा गया है, “अशोका को प्रताप भानु मेहता के तौर पर पहले कुलपति और फिर सीनियर फैकल्टी के रूप में नेतृत्व एवं मार्गदर्शन का गौरव मिला। सुब्रमण्यम ने विश्वविद्यालय को प्रतिष्ठा दिलाई, नए विचार और ऊर्जा दी तथा उनके जाने से एक शून्य पैदा हो गया है जिसे भरना मुश्किल होगा।”

बयान में कहा गया है, “प्रताप और अरविंद इस पर जोर देना चाहते हैं कि अशोका यूनिवर्सिटी भारतीय उच्च शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है। वे अशोका खासतौर से उसके बेहतरीन छात्रों और फैकल्टी को छोड़कर दुखी हैं। उनका यह मानना है कि अशोका यूनिवर्सिटी को अकादमिक आजादी एवं स्वायत्तता के लिए एक उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यही नहीं वे हमेशा भविष्य में भी यूनिवर्सिटी को सलाह और सुझाव देने के लिए उपलब्ध रहेंगे।”

मालूम हो कि इन इस्तीफों के विरोध में विश्वविद्यालय के छात्रों ने सोमवार यानी आज 22 मार्च से दो दिन के लिए कक्षाओं के बहिष्कार करने का आह्वान किया है। हालांकि प्रोफेसर मेहता ने छात्रों को लिखे एक पत्र में अपनी वापसी के लिए ‘जोर’ न देने का अनुरोध करते हुए कहा कि जिन परिस्थितियों के चलते उन्होंने इस्तीफा दिया, वे निकट भविष्य में नहीं बदलेंगी।

उन्होंने पत्र में कहा, “जिन परिस्थितियों के चलते इस्तीफा दिया गया, वे निकट भविष्य में नहीं बदलेंगी। इसलिए मुझे यह मामला खत्म करना होगा। मैं आपसे इस मामले पर जोर न देने का अनुरोध करता हूं। मैं जानता हूं कि आप निराश नहीं होंगे। आपका उद्देश्य दो प्रोफेसरों के भाग्य से कहीं अधिक बड़ा है।”

क्या है पूरा मामला?

बीते मंगलवार, 16 मार्च को जाने-माने राजनीतिक टिप्पणीकार प्रताप भानु मेहता ने अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पद से इस्तीफा दे दिया। मेहता ने इस्तीफा देते हुए कहा कि संस्थापकों ने यह ‘खुलकर स्पष्ट’ कर दिया है कि संस्थान से उनका जुड़ाव ‘राजनीतिक जवाबदेही’ था। मेहता ने दो साल पहले विश्वविद्यालय के कुलपति पद से भी इस्तीफा दिया था।

इसके दो दिन बाद यानी 18 मार्च को एक और नामी प्रोफेसर अरविंद सुब्रमण्यम, जोकि नरेंद्र मोदी सरकार में चार साल मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) रहे थे, उन्होंने भी मेहता के साथ एकजुटता दिखाते हुए दो दिन बाद विश्वविद्यालय से इस्तीफा दे दिया। सुब्रमण्यम ने अपने इस्तीफे में कहा कि यूनिवर्सिटी में प्रताप भानु मेहता पर इस्तीफे के लिए दबाव बनाया गया, जिस कारण वे भी इस्तीफा दे रहे हैं।

संस्थान के शिक्षकों ने प्रताप भानु मेहता का खुलकर किया समर्थन

सुब्रमण्यम के इस्तीफे की खबर के कुछ घंटों बाद ही यूनिवर्सिटी फैकल्टी के वाइस चांसलर (वीसी) मालाबिका सरकार के नाम लिखा पत्र सामने आ गया। इसमें संस्थान के शिक्षकों ने प्रताप भानु मेहता का खुलकर समर्थन किया। उनके इस्तीफे पर दुख जताया और यूनिवर्सिटी से अनुरोध किया कि वो मेहता को इस्तीफा रद्द करने को कहे। उधर, कैंपस में छात्र भी प्रताप भानु मेहता के समर्थन में प्रदर्शन करने लगे। उन्होंने मेहता की वापसी की मांग की।

इस बीच रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबाई) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी बात रखी है। उन्होंने लिंक्डइन पर 3 पेज का लेटर लिखा। इस लेटर में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें लिखीं, जो चारो ओर चर्चा का विषय बनी हुई हैं।

रघुराम राजन की चिट्ठी की ज़रूरी बातें

रघुराम राजन ने कहा कि इस सप्ताह यानी बीते सप्ताह अशोका विश्वविद्यालय से भानु प्रताप मेहता तथा अरविंद सुब्रमणयम के इस्तीफे से अभिव्यक्ति की आजादी को ‘गंभीर झटका’ लगा है। उन्होंने कहा कि अशोका विश्वविद्यालय के संस्थापकों ने अपनी आत्मा से समझौता किया है।

राजन ने आगे कहा कि भारत में राजनीति विज्ञान के सबसे अच्छे प्रोफेसर में से एक प्रोफेसर प्रताप मेहता ने अशोका यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दे दिया। “सच्चाई यह है कि प्रोफेसर मेहता किसी संस्थान के लिए ‘कांटा’ थे। वह कोई साधारण कांटा नहीं हैं, बल्कि वह सरकार में उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए अपनी जबर्दस्त दलीलों से कांटा बने हुए थे।”

अभिव्यक्ति की आज़ादी इस महान विश्विविद्यालय की आत्मा है!

राजन कहते हैं कि अशोका यूनिवर्सिटी पिछले एक दशक में भारत की कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड के मुकाबले की यूनिवर्सिटी रही है। दुर्भाग्य से अब इसको झटका लगेगा। “अभिव्यक्ति की आजादी इस महान विश्विविद्यालय की आत्मा है। इस पर समझौता कर विश्वविद्यालय के संस्थापकों ने आत्मा को चोट पहुंचाई है।”

राजन ने मेहता के त्याग-पत्र की कुछ पंक्तियों का भी उल्लेख किया है। इसमें कहा गया है, ‘संस्थापकों के साथ बैठक के बाद मुझे यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि मेरा विश्वविद्यालय से जुड़ाव को एक राजनीतिक बोझ समझा जाएगा।’

राजन लिखते हैं “मुझे नहीं पता कि अशोका यूनिवर्सिटी के फाउंडर्स की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्हें हाथ खींचने पड़े। प्रोफेसर मेहता हमेशा सरकार में बैठे लोगों और विपक्ष दोनों को लेकर बराबर ही क्रिटिकल रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि वे आगे भी लिबरल भारत के इंटेलेक्चुअल लीडर बने रहेंगे।”

यूनिवर्सिटी ने बाहरी दबाव के आगे घुटने टेक दिए!

राजन के मुताबिक प्रोफेसर अरविंद सुब्रमण्यम ने भी इस्तीफा दे दिया। वे भी जाने-माने इकॉनमिस्ट हैं। प्रोफेसर सुब्रमण्यम के स्टेटमेंट से भी ये बात पता चल रही है कि यूनिवर्सिटी ने बाहरी दबाव के आगे घुटने टेककर एक समस्या पैदा करने वाले आलोचक से छुटकारा पाना ही बेहतर समझा।

“उनके इस्तीफे की कुछ लाइन पर गौर करना चाहिए – “प्राइवेट स्टेटस और प्राइवेट पूंजी से चल रही अशोका यूनिवर्सिटी में भी अब शैक्षणिक अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता के लिए कोई जगह नहीं बची है। ये बात चिंताजनक है।”

कौन हैं प्रताप भानु मेहता?

प्रताप भानु मेहता ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से फिलॉसफी, पॉलिटिक्स और इकनॉमिक्स की पढ़ाई कर चुके हैं। अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री ली है। अपने करियर में उन्होंने दुनिया के कई प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों में पढ़ाया है। इनमें अमेरिका की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे चर्चित संस्थान शामिल हैं।

मेहता को देश के बड़े बुद्धिजीवियों में से एक माना जाता है। राजनीति, राजनीतिक सिद्धांत, संविधान, शासन और राजनीतिक अर्थशास्त्र जैसे विषयों के एक्सपर्ट हैं। केंद्र सरकार के थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। मनमोहन सरकार में बने नेशनल नॉलेज कमीशन के सदस्य भी रहे हैं।

प्रताप भारत के विश्वविद्यालयों में होने वाले छात्र संघ चुनावों की गाइडलाइंस तैयार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई लिंगदोह कमेटी में भी शामिल रह चुके हैं। इसके अलावा, वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की काउंसिल ऑफ ग्लोबल गवर्नेंस में वाइस चेयरमैन रह चुके हैं। उन्होंने भारत सरकार और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की अनेकों रिपोर्टों में अपना योगदान दिया है।

वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं। कई अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं के एडिटोरियल बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। देश-विदेश के अखबारों में उनके लेख छपते रहते हैं। वे समाज और राजनीति के विषयों में अपनी मुखर टिप्पणी और विश्लेषण के लिए खासतौर पर जाने जाते हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी में वे जुलाई 2017 से जुलाई 2019 के बीच वाइस चांसलर रहे। बाद में उन्होंने ये पद छोड़ दिया लेकिन यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफेसर बने रहे और पढ़ाने का काम जारी रखा। अब उन्होंने इस पद से भी इस्तीफा दे दिया है।

क्या थी इस्तीफे की वजह ?

इस इस्तीफे को राजनीतिक दबाव से जोड़कर देखा जा रहा है। मेहता के कई लेखों और राजनीतिक टिप्पणियों में मौजूदा केंद्र सरकार के कामकाज और नीतियों की तीखी आलोचना की गई है। हाल में उन्होंने कृषि कानूनों पर सरकार की आलोचना की थी। मोदी सरकार को वे पहले ही ‘फासीवादी' बता चुके हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मेहता ने एक बार मोदी सरकार को 1975-77 की इंदिरा गांधी सरकार से भी ज्यादा ‘धूर्त’ बताया था। हाल ही में उन्होंने हरियाणा सरकार जोकि बीजेपी और जेजेपी गठबंधन सरकार है उसकी नई जॉब रिजर्वेशन पॉलिसी की आलोचना करते हुए इसे संवैधानिक रूप से गलत और राजनीतिक स्वार्थ करार दिया था।

इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि हाल में अशोका यूनिवर्सिटी के फाउंडर्स ने मेहता से मुलाकात की थी। सूत्रों ने कहा कि ये मीटिंग ‘मौजूदा सियासी माहौल’ को लेकर ही थी, जिसके बारे में कई लोगों की राय है कि इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाया जा रहा है।

अखबार के मुताबिक, मीटिंग में संस्थापकों ने मेहता से यही कहा कि यूनिवर्सिटी उनके ‘बौद्धिक हस्तक्षेप’ की अब और रक्षा नहीं कर सकती। इस मीटिंग के बाद ही मेहता ने अपना रेजिग्नेशन वाइस चांसलर मालाबिका सरकार को भेज दिया था।

इसमें उन्होंने लिखा था, “मेरा सार्वजनिक लेखन सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान से जुड़े संवैधानिक मूल्यों के लिए समर्पित राजनीति का समर्थन करता है, जिसे यूनिवर्सिटी के लिए खतरा पैदा करने वाला माना गया है… ये साफ है कि मेरे लिए अशोका यूनिवर्सिटी छोड़ने का समय आ गया है। एक उदार विश्वविद्यालय को आगे बढ़ने के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से उदार परिस्थितियों की जरूरत होगी। मैं उम्मीद करता हूं कि यूनिवर्सिटी उस माहौल को बचाए रखने में एक भूमिका निभाएगी।”

ज़मीन का क्या मामला है?

अशोका यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट न्यूजपेपर दि एडिक्ट ने मेहता के इस्तीफे के एक दिन बाद यानी 17 मार्च 2021 के एडिशन में  एक सूत्र के हवाले से अशोका यूनिवर्सिटी को मिलने वाली किसी जमीन का जिक्र किया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, “प्रोफेसर मेहता से इस्तीफा लेने का मकसद कैंपस का दायरा बढ़ाने के लिए एक नई जमीन हासिल करने की यूनिवर्सिटी की कोशिशों को आसान बनाना था। साथ ही, संस्थान के चार साल वाले पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा कोर्स को भी औपचारिक रेकग्नेशन मिल सकता है।”

कुछ बातें अशोका यूनिवर्सिटी की

अशोका यूनिवर्सिटी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकार और हरियाणा सरकार से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय है। अपने रिसर्च और एकेडमिक्स के लिए ये यूनिवर्सिटी देश के बाहर भी जानी जाती है। इसका मकसद युवाओं को केवल नौकरी पाने के लायक बनाना नहीं, बल्कि देश और हालात को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरूक बनाना हो गया। खासतौर पर लिबरल आर्ट्स में विशेष काम करने के मामले में ये देश के चुनिंदा संस्थानों में है।

यूनिवर्सिटी पूरी तरह से डोनेशन यानी दान पर चलती है। अशोका यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के अनुसार यहां फिलहाल 2250 बच्चे कैंपस में हैं, जो कि 30 राज्यों से हैं। इनके अलावा यहां विदेशी युवा भी डिग्री लेने आ रहे हैं, जो 27 अलग-अलग देशों से हैं।

यूनिवर्सिटी की फाउंडिंग बॉडी में 70 उद्योगपति जुड़े हुए हैं। इनमें से ज्यादातर का शिक्षा के क्षेत्र में सीधा दखल रहा है और वे जाने-माने शिक्षाविद रहे हैं। ये सदस्य लगातार राजनीति और सामाजिक बदलावों पर खुलकर बोलने के लिए जाने जाते रहे हैं।

गौरतलब है कि जब इसका प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो इसे नोबल प्रोजेक्ट का नाम दिया गया। अपने अलग वैचारिक मॉडल के कारण साल 2014 में बनी ये यूनिवर्सिटी महज़ कुछ ही समय में देश के नामी-गिरामी संस्थानों में गिनी जाने लगी। देश के कई और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भी आज सरकार के निशाने पर हैं। ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि क्या होगा देश में शिक्षा का भविष्य और क्या ऐसे बनेंगे विश्वगुरु?

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