NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
दुनिया भर की: अमेरिकी महाद्वीप में समाजवादी व्यवस्थाओं का इम्तिहान
बदलाव की बयार के बीच सामने आ रही है नई चुनौतियां। मध्य व दक्षिण अमेरिका के तीन देशों इक्वाडोर, पेरू और क्यूबा के ताज़ा घटनाक्रम पर नज़र डाल रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र स्वामी
उपेंद्र स्वामी
27 Apr 2021
क्यूबा के नए नेता मिगुएल दियाज-कैनल।
क्यूबा के नए नेता मिगुएल दियाज-कैनल।

कोरोना के दौर में राजनीतिक खबरें अक्सर बेमानी हो जाती हैं या फिर मिल नहीं पाती, ख़ासकर अगर वे सात-समंदर पार के देशों से हों। हम यहां बात कर रहे हैं मध्य व दक्षिण अमेरिका के तीन देशों की जहां पर पिछले दिनों अहम राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिले हैं।

इक्वाडोर

दक्षिण अमेरिकी देश इक्वाडोर में अप्रत्याशित रूप से राष्ट्रपति के चुनाव में एक बैंकर गुइलेरमो लैसो को जीत हासिल हुई है। इक्वाडोर की अर्थव्यवस्था को कोरोनावायरस के दौर में खासा नुकसान पहुंचा, जैसा कि आम तौर पर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में देखने को मिला है। लेकिन इस संकट से बाहर निकलने की कोशिश में समाजवादियों को लोगों को भरोसा फिर नहीं मिल सका। लैसो को 52 फीसदी वोट मिले। उनकी मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के वादों का सीधा मुकाबला अर्थशास्त्री आंद्रेस अराउज की सामाजिक कल्याण की योजनाओं से था।

कई दक्षिण अमेरिकी देशों की ही तरह इक्वाडोर में भी चुनाव दो चरण में होते हैं। पहले चरण में सभी उम्मीदवारों के लिए वोट डलने के बाद शीर्ष दो उम्मीदवारों के बीच आखिर में सीधा मुकाबला होता है। यहां फरवरी में पहला दौर हुआ था। पहले दौर के बाद एक स्थानीय समुदाय के नेता याकु पेरेज ने आरोप लगाया था कि वोटो में धांधली हुई है। इस चक्कर में उन्होंने अपने समर्थकों से आह्वान किया कि विरोध प्रकट करते हुए आखिरी दौर में वे अपने वोट बेकार कर दें। इसलिए बताया जाता है कि निर्णायक दौर में छह में से एक वोट रद्द हो गया था और हो सकता है कि लैसो को जीत में इससे फायदा मिला हो।

यानी यह तय है कि इक्वाडोर निवर्तमान राष्ट्रपति लेनिन मोरेनो की उन्हीं बाजार-समर्थक नीतियों पर चलता रहेगा, जिनमें वे सरकारी बहीखाता तो सुधारने की कोशिश करते रहे लेकिन लोगों के लिए रोजगार नहीं जुटा सके। लैसो का प्रचार अभियान भी विदेशी निवेश बढ़ाकर रोजगार जुटाने के वादे पर केंद्रित था।

इसके उलट अराउज ने गरीब परिवारों को आर्थिक मदद देने और पूर्व राष्ट्रपति राफेल कोरिया के समाज कल्याण कार्यक्रमों को फिर से अमल में लाने का वादा किया था जो सिरे न चढ़ सका।

विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की नीतियों के समर्थक लैसो की जीत को उभरते बाजारों के लिए एक अच्छे संकेत के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जो अर्जेंटीना की आर्थिक स्थिति को हमेशा एक हौवे की तरह पेश करते रहे हैं। इसीलिए बाजार समर्थक विश्लेषक मानते हैं कि लैसो आईएमएफ से बेहतर तरीके से सौदेबाजी कर सकेंगे। बहरहाल, अभी तो नए राष्ट्रपति को देश के रुके पड़े कोविड टीकाकरण अभियान को फिर से पटरी पर लाना होगा।

पेरु

लेकिन एक और दक्षिण अमेरिकी देश पेरु में ठीक उलटी वजह से राष्ट्रपति चुनाव दिलचस्प हो चला है। वहां भी चुनाव का पहला ही दौर हुआ है और चूंकि पहले दौर में किसी भी उम्मीदवार को बहुमत वोट नहीं मिले, इसलिए दूसरा दौर जून में होगा लेकिन यहां पहले दौर में 51 साल के यूनियन नेता और प्राइमरी स्कूल के टीचर पेड्रो कैस्टिलो ने अप्रत्याशित रूप से बढ़त हासिल कर ली। पहले दौर के मतदान तक कैस्टिलो लगभग अनजान से थे। अब वे अचानक राष्ट्रपति के पद के लए तगड़े समाजवादी दावेदार के रूप में सामने आ गए हैं।

लोग यहां भी बदहाल अर्थव्यवस्था से परेशान थे और महामारी से भी। फुजिमोरी परिवार से भी काफी लोग तंग आ चुके हैं जिसके मुखिया अल्बर्टो फुजिमोरी इस समय जेल में हैं और भ्रष्टाचार के आरोप झेल रही उनकी बेटी कीको अब आखिरी दौर में कैस्टिलो से मुकाबला करेंगी। उनपर मनी लॉंड्रिंग के आरोप लगे हैं जिनमें उन्हें 31 साल तक की सजा हो सकती है।

कैस्टिलो वामपंथी रुझान वाले हैं और उनके चुने जाने पर जाहिर है कि पेरु की दिशा व दशा बदलेगी। दरअसल, पहले दौर का नतीजा इतना अप्रत्याशित था कि किसी भी चुनाव विश्लेषक ने इन दो के बीच आखिरी दौर का मुकाबला होने की तैयारी ही नहीं की थी क्योंकि इस बात की संभावना ही किसी को नहीं थी। ‘समाजवादी वाम’ धारा की फ्री पेरु पार्टी के कैस्टिलो पहले दौर के मतदान से एक महीने पहले तक 4 फीसदी से भी कम मतों के अनुमान के साथ शीर्ष छह दावेदारों में भी नहीं थे।

लेकिन फिर एक महीने में उनका ग्राफ चढ़ना शुरू हुआ, उन्होंने पेरु के संविधान तक में बदलाव का वादा कर डाला। खास तौर पर गरीब इलाकों में उनकी लोकप्रियता बढ़ी जहां कोरोनावायरस की मार सबसे ज्यादा थी। उन्होंने राष्ट्रीयकरण का भी पक्ष लिया।

लेकिन विडंबना देखिए कि मुक्त बाजार के समर्थक हमेशा की तरह उनकी नीतियों को बाजार अर्थव्यवस्था के लिए खतरा मान रहे हैं। लेकिन हकीकत यही है कि एक उदार सरकार के होते हुए भी 2020 में पेरु की अर्थव्यवस्था में पिछले तीन दशकों की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई।

पिछले राष्ट्रपति मार्टिन विजकार्रा लोक्पिरय थे लेकिन पिछले साल भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद कांग्रेस ने महाभियोग लगाकर उन्हें हटा दिया। उनके उत्तराधिकारी को भी सड़कों पर भीष विरोध प्रदर्शनों के बाद सत्ता छोड़नी पड़ी। तब ज्यादातर लोग राजनीतिक वर्ग में आमूलचूल बदलाव की मांग करने लगे थे। नतीजा सामने है।

क्यूबा

लेकिन इन दोनों देशों की तुलना में जिस एक अन्य समाजवादी व्यवस्था में बदलाव पर दुनियाभर की निगाह सबसे ज्यादा रही, वह थी मध्य अमेरिकी देश क्यूबा पर। विश्लेषक इस क्यूबा में कास्त्रो दौर के अंत के रूप में देख रहे हैं। क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो के छोटे भाई 89 वर्षीय राउल कास्त्रो ने क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम सचिव के दायित्व से खुद को मुक्त करके मिगुएल दियाज-कैनल को नया पार्टी प्रमुख बना दिया है।

मिगुएल पहले ही 2018 में राउल से राष्ट्रपति पद का दायित्व संभाल चुके थे, लेकिन क्यूबा में कम्युनिस्ट पार्टी के प्रथम सचिव का पद सबसे ताकतवर माना जाता है, जिसकी नीतियां तय करने में अहम भूमिका होती है।

क्यूबा की क्रांति के बाद 1959 से ही पहले फिदेल कास्त्रो और फिर राउल कास्त्रो यह दायित्व संभालते रहे। देखना होगा कि कास्त्रो की विरासत को मिगुएल कैसे आगे लेकर जाते हैं। हालांकि मिगुएल ने कहा है कि वह राउल कास्त्रो की सलाह लेकर ही आगे चलेंगे लेकिन कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मिगुएल कम उम्र (60 साल) होने की वजह से ज्यादा व्यावहारिक हैं और मौजूदा दौर की चुनौतियों से वाकिफ हैं।

हालांकि, भले ही मिगुएल 1959 की क्रांति के बाद पैदा हुए हों लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी और कास्त्रो की नीतियों के प्रति उनकी जो निष्ठा है, उससे नीतिगत स्तर पर कोई परिवर्तन होगा, ऐसा नहीं लगता।

मिगुएल इलेक्ट्र्रॉनिक्स इंजीनियर रह चुके हैं और खेलों में भी रुचि रखते हैं। यह सही है कि उन्होंने कभी कास्त्रो भाइयों जैसा दबदबा नहीं दिखाया और न ही उन्होंने खुद को उभारने की कभी कोशिश की। पहनावे में वह मौजूदा दौर को पसंद करते रहे हैं और 12-13 साल पहले दो प्रांतों में युवा पार्टी प्रमुख के बतौर उन्होंने एलजीबीटी-अनुकूल सांस्कृतिक केंद्र स्थापित किए। वह लंबे बाल और रॉक म्यूजिक पसंद करते रहे हैं।

पहले शिक्षा मंत्री और फिर उप-राष्ट्पति के तौर पर उन्होंने इंटरनेट की व्यापक पहुंच को बढ़ावा दिया। हमेशा टैवलेट साथ रखने वाले मिगुएल लगातार ट्वीट भी करते हैं। रायटर्स का कहना है कि अक्सर कई कार्यक्रमों में वह पत्नी के साथ नजर आते रहे हैं, जिससे यह लगता है कि गैर-आधिकारिक तौर पर ही सही फर्स्ट लेडी की जगह भी क्यूबा की राजनीति में बनेगी, जो कास्त्रो दौर में पहले कभी नहीं रही।

जाहिर है कि आने वाले दिनों में कोरोनावायरस के संकट से जूझने के साथ-साथ बाकी नीतिगत फैसलों पर भी सारी दुनिया की नजर रहेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

America
Socialism
Ecuador
Peru
cuba

Related Stories

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

एक किताब जो फिदेल कास्त्रो की ज़ुबानी उनकी शानदार कहानी बयां करती है

क्यों USA द्वारा क्यूबा पर लगाए हुए प्रतिबंधों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं अमेरिकी नौजवान

क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

समाजवाद और पूंजीवाद के बीच का अंतर

इक्वाडोर के नारीवादी आंदोलनों का अप्रतिबंधित गर्भपात अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प

यूक्रेन में छिड़े युद्ध और रूस पर लगे प्रतिबंध का मूल्यांकन

'द इम्मोर्टल': भगत सिंह के जीवन और रूढ़ियों से परे उनके विचारों को सामने लाती कला

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?

लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें


बाकी खबरें

  • bhasha singh
    भाषा सिंह
    बात बोलेगी: सावित्री बाई फुले को याद करना, मतलब बुल्ली बाई की विकृत सोच पर हमला बोलना
    03 Jan 2022
    सवाल यह है कि जिन लोगों ने, सावित्री बाई फुले के ऊपर कीचड़ डाला था, उनके ख़िलाफ गंदी-अश्लील टिप्पणी की थी, वे 2022 में कहां हैं। वे पहले से अधिक खूंखार हो गये हैं, पहले से ज्यादा बड़े अपराधी—जिन्हें…
  • stop
    सोनिया यादव
    ‘बुल्ली बाई’: महिलाओं ने ‘ट्रोल’ करने के ख़िलाफ़ खोला मोर्चा
    03 Jan 2022
    मुस्लिम महिलाओं को ‘ट्रोल’ करने की कोशिश के बीच विपक्ष के साथ-साथ महिला संगठनों और आम लोगों ने सोशल मीडिया पर इस मामले में सरकार और पुलिस की सक्रियता और कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पटनाः एनएमसीएच के 84 डॉक्टर कोरोना पॉज़िटिव, मरीज़ों में कोरोना चेन बनने का ख़तरा
    03 Jan 2022
    एनएमसीएच में डॉक्टरों समेत 194 लोगों का सैंपल लिया गया था। 84 डॉक्टरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद आशंका बढ़ गई है कि अस्पताल के कई मेडिकल स्टॉफ भी चपेट में आ सकते हैं।
  • jharkhand
    अनिल अंशुमन
    झारखंड : जारी है एचईसी मज़दूरों की हड़ताल, साथ आए सभी विपक्षी दल
    03 Jan 2022
    एचईसी के मज़दूरों के टूल डाउन और हड़ताल को एक महीना हो गया है और अभी भी वो जारी है, ऐसा एचईसी के इतिहास में पहली बार हुआ है।
  • covid
    ऋचा चिंतन
    नहीं पूरा हुआ वयस्कों के पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य, केवल 63% को लगा कोरोना टीका
    03 Jan 2022
    पहले केंद्र ने दिसंबर 2021 के अंत तक भारत में सभी वयस्क आबादी के पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को हासिल कर लेने का लक्ष्य घोषित किया था। जबकि हकीकत यह है कि करीब 9.73 करोड़ वयस्कों को अभी भी दोनों खुराक दी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License