NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पुस्तकें
किताबें : सरहदें सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं होतीं
कई बार सरहदें मिलनबिंदु का काम करती हैं, और अक्सर उनके बीच तनाव व टकराहट भी बनी रहती है। साहित्य व कला में यह चीज़ नयी अभिव्यक्ति, नया संयोजन (केमिस्ट्री) पैदा करती है।
अजय सिंह
29 Apr 2021
किताबें : सरहदें सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं होतीं

सरहदें सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं होतीं: वे हमारी आत्मा में भी खिंची होती हैं। हमारे आत्मजगत और यथार्थजगत या बाहरी दुनिया के बीच कई सरहदें होती हैं, और उनके बीच मिलनबिंदु भी होते हैं। कई बार सरहदें मिलनबिंदु का काम करती हैं, और अक्सर उनके बीच तनाव व टकराहट भी बनी रहती है। साहित्य व कला में यह चीज़ नयी अभिव्यक्ति, नया संयोजन (केमिस्ट्री) पैदा करती है।

कवि, अनुवादक व गद्यकार प्रेमलता वर्मा (जन्म 1938) का दूसरा कविता संग्रह ‘दो सरहदों के बीच’ (2012, साहित्य भंडार) इसी कशमकश, द्वंद्व व मिलनबिंदु  को आत्मीय व रचनात्मक गहनता के साथ अभिव्यक्त करता है। 248 पेज के इस संग्रह में 93 कविताएं हैं, जो कवि के ‘आत्ममंथन की स्थिति’ का अता-पता देती हैं। ‘आत्ममंथन’ कई स्तरों पर रहा है, जिसकी झलक इस संग्रह से मिलती है। यह संग्रह बताता है कि कवि के रचनात्मक आवेग और संवेदनात्मक सक्रियता में कमी नहीं आयी है—वह सघन और प्रखर होती चली गयी है।

प्रेमलता वर्मा का पहला कविता संग्रह ‘सुइयों का पैरहन’ 1970 में आया था, राधाकृष्ण प्रकाशन (दिल्ली) से। 42 साल बाद, 2012 में, उनका दूसरा कविता संग्रह छपने की नौबत आ पायी। हिंदी साहित्य जगत में कवि व गद्यकार के रूप में प्रेमलता वर्मा की अच्छी-ख़ासी ख्याति रही है। इसके बावजूद अब तक उनके कुल दो कविता संग्रह ही आ पाये हैं, और उन दोनों के बीच 42 साल का फ़ासला है। कवि/लेखक अगर संपर्क साधने की कला (नेटवर्किंग) में माहिर नहीं है, तो उसे ऐसी स्थिति झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए!

इस बीच, प्रेमलता दिल्ली छोड़ कर लातिन अमेरिकी देश अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में बस गयीं। क़रीब 50 साल होने को आ रहे हैं, वह वहीं हैं। लेकिन उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी हैं, और वह भारत की नागरिक हैं।

अब यह दो संस्कृतियों, दो परिवेशों—भारत और अर्जेंटीना—के बीच जो द्वंद्व व टकराहट है, साथ ही दोनों के बीच आत्मीय मिलनबिंदु भी है—यही ‘दो सरहदों के बीच’ की कई कविताओं में व्यक्त हुआ है। ‘पैडल में उलझी भाषा’, ‘ब्रेज़री बेचनेवाली’, ‘शमशेर जी के प्रति’, ‘देलियो कास्त्रो का पियानो सुनकर’, ‘खेल’, ‘हथकड़ी’, ‘बहुजन हिताय’, आदि कविताएं कई तरह की अर्थ ध्वनियां लिये हुए हैं।

'विस्मृति के रहगुज़र’ 

कवि अशोकचंद्र (जन्म 1956) की संस्मरण किताब ‘विस्मृति के रहगुज़र’ (2016, अनिमेष फ़ांउंडेशन) दरअसल यादों का झरोखा है - स्मरण, संस्मरण, लेख व डायरी का मिलाजुला रूप। यह पढ़ने लायक किताब है। इसमें कई हिंदी साहित्यकारों को बड़ी आत्मीयता व सजलता के साथ याद किया गया है, उनके बारे में लिखा गया है, और एक लेख (स्मृतिसभा की रिपोर्टिंग) भाकपा (माले-लिबरेशन) के दिवंगत महासचिव विनोद मिश्र पर है।

जिन साहित्यकारों को याद किया गया है/उन पर लिखा गया है, उनके नाम हैं: सुरेंद्रपाल, त्रिलोचन, मधुकर सिंह, अनिल सिन्हा, वीरेन डंगवाल, मोहन थपलियाल, संजीव, महेश्वर, बीर राजा, गंगाप्रसाद मिश्र, और ठाकुरप्रसाद सिंह। इनमें उपन्यासकार संजीव को छोड़ कर बाक़ी सब दुनिया से विदा हो चुके हैं।

‘विस्मृति के रहगुज़र’ में मुझे जो सबसे ख़ास लेख लगा, वह है, भुला दिये गये कवि सुरेंद्रपाल (1932-1970) पर लिखा गया लेख, ‘सुरेंद्रपाल की कविता-उत्खनन की ज़रूरत’। अशोकचंद्र ने कवि सुरेंद्रपाल के जीवन, संघर्ष और उनके एकमात्र कविता संग्रह ‘शीत भीगा भोर’ (1963) पर गहरे लगाव व भाव-प्रबलता के साथ लिखा है। इससे पता चलता है कि असमय मौत के शिकार और उपेक्षित-अलक्षित रह गये सुरेंद्रपाल में कितनी काव्य प्रतिभा और ऊर्जा थी। अशोकचंद्र ने उनकी कई कविता पंक्तियां उद्धृत की हैं। एक नमूना देखियेः ‘आकाश से—/अदृश्य चीज़ों की बारिश हो रही है।/रात—/सोने के खेत में चांदी बो रही है।’

'मोहभंग'

लेखक चंद्रमोहन सिंह (जन्म 1946) के पहले कहानी संग्रह ‘मोहभंग’ (2020, आईसेक्ट) में 14 कहानियां हैं। 103 पेज के इस संग्रह में कई कहानियां आकार में छोटी हैं। अक्सर लगता है, कहानी बनते-बनते रह गयी। शायद स्पेस और दिया जाता, शायद मेहनत और की जाती, शायद विज़न का विस्तार किया जाता, तो कहानी निखर आती।

चंद्रमोहन के पास थीम और सोच तो है, लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि कहानी को व्यक्ति चित्र और स्मरण चित्र होने से बचाया जाये। ‘मोहभंग’, ‘परिंदे जेल के’, ‘कुछ नहीं’, आदि कहानियां कहानी बनते-बनते रह गयी हैं।

लेखक वरिष्ठ कवि व राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं। 

Books
Premlata Verma
Ashok Chandra
Chandramohan Singh

Related Stories

क्यों प्रत्येक भारतीय को इस बेहद कम चर्चित किताब को हर हाल में पढ़ना चाहिये?

गीता हरिहरन का उपन्यास : हिंदुत्व-विरोधी दलित आख्यान के कई रंग

किताब: दो कविता संग्रहों पर संक्षेप में


बाकी खबरें

  • Ambedkar Jayanti
    न्यूज़क्लिक टीम
    डॉ.अंबेडकर जयंती: सामाजिक न्याय के हजारों पैरोकार पहुंचे संसद मार्ग !
    14 Apr 2022
    दो साल के कोरोनाकाल अंतराल के बाद एक बार फिर 14 अप्रैल2022 को डॉ. बीआर अंबेडकर की 131वीं जयंती के मौके पर दिल्ली में संसद मार्ग पर हज़ारों लोग इकट्ठे हुए और उनको याद किया। जनवाद और संविधान पर बढ़ते…
  • Ambedkar Jayanti
    न्यूज़क्लिक टीम
    ग्राउंड रिपोर्ट: अंबेडकर जयंती पर जय भीम और संविधान की गूंज
    14 Apr 2022
    ग्राउंड रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह पहुंची दिल्ली के संसद मार्ग में अंबेडकर जयंती पर होने वाले उत्सव में, जहां लोग अपने पूरे घर-परिवार के साथ पहुंचे थे। उन्होंने दशकों से अंबेडकरवादी…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बनारस: आग लगने से साड़ी फिनिशिंग का काम करने वाले 4 लोगों की मौत
    14 Apr 2022
    साड़ी फिनिशिंग के 12 फुट गुणा 10 फुट के कमरे में साड़ी, फोम, फिनिशिंग सामग्री रखी थी जो सिंथेटिक थी और जिससे आग कमरे में तेजी से फैल गयी। बिजली के तारों में भी आग लग गई और आग रोकने के प्रयास में चारों…
  • आज का कार्टून
    सावधान!, वे लोग इस तरफ़ ही आ रहे हैं
    14 Apr 2022
    आज हम और हमारा देश एक अहम मोड़ पर खड़ा है। यहाँ से ही तय होगा कि देश किस तरफ़ जाएगा। आज वास्तव में अगर किसी को ख़तरा है तो वो हैं हमारे लोकतांत्रिक मूल्य, हमारा संविधान।
  • indian economy
    न्यूज़क्लिक टीम
    महंगाई के कुचक्र में पिसती आम जनता
    14 Apr 2022
    मार्च महीने के खुदरा महंगाई के सरकारी आंकड़े आए हैं। सरकारी आंकड़े बता रहे है कि खुदरा महंगाई दर 17 महीने के ऊपर पहुंच चुका है। पिछले तीन महीने से महंगाई की दर लगातार 6 फीसदी से ऊपर रही है। मार्च…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License