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भारत
राजनीति
दिल्ली में बुलडोज़र गवर्नेंस या डबल इंजन सरकार का आगाज़?
कोई भी सरकार संविधान के दायरे में रहते हुए इन कार्रवाईयों को उचित नहीं ठहरा सकती क्योंकि ये कार्रवाईयां कानून सम्मत नहीं हैं।
सत्यम श्रीवास्तव
21 Apr 2022
jahangirpuri
फ़ोटो साभार: सोशल मीडिया

भारतवर्ष के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से शुरू हुए बोलडोज़र-गवर्नेंस की अपार चुनावी सफलता के बाद इसे पड़ोसी राज्यों में भी तेज़ी से प्रोत्साहित किया जा रहा है। हाल ही में मध्य प्रदेश और उसके बाद देश की राजधानी में भी इसे पूरी तैयारी के साथ आज़माया गया है। अगर यह प्रयोग यहां भी सफल होता है तो तय मानिए कि देश के अन्य राज्यों में भी इसे मुख्य धारा का गवर्नेंस मॉडल बनने से कोई नहीं रोक सकता।

बुलडोज़र का प्रयोग अगर अतिक्रमण हटाने के लिए भी होता है तो भी यह अंतिमतम प्रक्रिया होती है। यानी इससे पहले न्यूनतम क़ानूनी और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करना होता है। जब सारी प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं तभी अंत में किसी अवैध करार दिये गए निर्माण को बुलडोज़ किया जा सकता है।

इस लिहाज से देखें तो यह अंतिम प्रक्रिया अब सबसे पहले अपनाई जाने लगी है। प्रक्रियाओं के क्रम में बुलडोज़र को मिल रही प्राथमिकता ही वह नया गवर्नेंस मॉडल है जो अब हर तरफ अपनाई जा रही है। ध्वंस पर आधारित यह मॉडल क्या कुछ नया रचेगा और गढ़ेगा कहना मुश्किल है लेकिन यह कहना बिल्कुल ठीक है कि इस नए मॉडल को बहुसंख्यक जनता का समर्थन प्राप्त हो रहा है। जैसे देश में बढ़ती मंहगाई और बेरोज़गारी को भी एक स्थायी जनाधार मिलता हुआ दिखलाई देता है।

अगर ऐसा नहीं होता तो युवाओं की जो भीड़ और भारी तादात राम नवमी और हनुमान जयंती पर मस्जिदों के इर्द-गिर्द बेकाबू होकर गालियों से भरे श्लोक पढ़ रही थी, उस तादात को सरकारी प्रतिष्ठानों के आस-पास अपने लिए रोज़गार हासिल करने पर ज़ोर देना था। मंहगाई के कारण किसी तरह चल रहे घरों के इन गरीब बच्चों को दाम बांधने की लड़ाई लड़ना थी।

ये मॉडल सभी सरकारों के लिए एक मुफीद मॉडल है। सरकार को सारा जतन केवल युवाओं और हिन्दू दिमागों को भड़काने और बहकाने के लिए ही करना है। यह काम रोजगार सृजन करने या अपने अमीर पूंजीपतियों के मुनाफे में कटौती करने से ज़्यादा आसान है। आसान रास्ता चुनने के लिए कोई भी सरकार सदैव तत्पर बैठी है।

दिल्ली में कल यानी 20 अप्रैल को अतिक्रमण हटाने के नाम पर जिस मुस्तैदी के साथ जहांगीरपुरी इलाके में बुलडोज़र चलाये और देश की सबसे बड़ी अदालत की अवमानना की उसने देश दुनिया का ध्यान खींचा है। मध्य प्रदेश के खरगौन में जब इसी तरह बुलडोज़र का इस्तेमाल हुआ तब भी हालांकि लोगों का ध्यान उस तरफ गया और यह उल्लेखनीय बात रही कि इन दो राज्यों में हाल ही में हुई घटनाओं की आलोचनाओं के स्वर ज़्यादा मुखर रहे। कानून-व्यवस्था के इस तरह चरमरा जाने को लेकर बड़े वर्ग ने चिंता ज़ाहिर की।

दोनों राज्यों में बुलडोज़र के इस्तेमाल से हुई कार्रवाई एक खास पैटर्न में दिखलाई देती हैं। पहले सत्ता समर्थित और संरक्षित भीड़ का उन्माद और उसके तुरंत बाद सरकार द्वारा प्रत्यक्ष कार्रवाई। इन दोनों ही मामलों में हालांकि सरकारों ने अपने द्वारा की गयी कार्रवाई को अतिक्रमण हटाने की रूटीन कार्रवाई कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की लेकिन आज देश में कौन नहीं जानता कि इन कार्रवाइयों के पैटर्न का असल मकसद क्या है?

इस पैटर्न को देखकर लगता है कि पहले एक उन्मादी भीड़ जैसे मौका -मुआयना करने जाती है और ऐसे इलाकों और इन इलाकों में बसे घरों की निशानदेही करती है और पीछे सरकार अपना बुलडोज़र लेकर चली जाती है। कोई भी सरकार संविधान के दायरे में रहते हुए इन कार्रवाईयों को उचित नहीं ठहरा सकती क्योंकि ये कार्रवाईयां कानून सम्मत नहीं हैं।

जब सरकारें कानून को ताक पर रखकर कोई कदम उठाती हैं तब उन्हें अपने किए के लिए जन समर्थन की ज़रूरत होती है। और इसके लिए उन्हें अपने मुताबिक नागरिकों के निर्माण की ज़रूरत होती है जो हर हाल में उनका समर्थन करे। दिल्ली में यह प्रयोग केवल नागरिकों तक सीमित नहीं रहा गया है बल्कि दिल्ली की निर्वाचित सरकार ने भी अलग तरह लेकिन इस सरकार की कार्रवाई का न केवल समर्थन ही किया है बल्कि भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सत्तासीन सरकार के अपने राजनैतिक एजेंडे को आगे बढ़ाया है।

जहांगीरपुरी में हनुमान जयंती (जिसे अब जन्मोत्सव कहा जाने लगा है) के दिन से पैदा हुए तनाव में अब आम आदमी पार्टी ने बांग्लादेशी घुसपैथियों और रोहींग्या मुसलमानों का प्रवेश करा दिया है। आम आदमी पार्टी के नेताओं ने जो कल आधिकारिक बयान दिये हैं वो इस कार्रवाई से कहीं ज़्यादा चिंता का विषय हैं। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, आतिशी सिंह और राघव चड्ढा ने स्पष्ट रूप से कहा कि ये तनाव भारतीय जनता पार्टी ने अपने ही द्वारा बसाये गए रोहिंग्या मुसलमानों और बांग्लादेशी घुसपैठियों के जरिए फैलाया है। एक जैसे बयानों में तीनों नेताओं ने यह कहा कि अगर यह पता चल जाये कि भाजपा ने कहाँ कहाँ इन रोहिग्याओं को बसाया है तो यह जानना आसान हो जाएगा कि अब कहां कहां सांप्रदायिक तनाव और दंगे हो सकते हैं?

ऐसे समय में जब दिल्ली की निर्वाचित सरकार को अपने मतदाताओं और नागरिकों के बीच होना चाहिए और केंद्र सरकार की किसी भी अनुचित कार्रवाई का खुलकर विरोध करना चाहिए। वह इस तनाव को और बढ़ाने बल्कि विशुद्ध सांप्रदायिक बनाने की कोशिश कर रही है। आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही यह जानती हैं कि अगर ऐसे मामलों में रोहिंग्याओं का ज़िक्र भी आ जाये तो लोगों का ध्यान बांटा जा सकता है और प्रकारांतर से इन नाजायज कार्रवाईयों का इस्तेमाल ईंधन के रूप में किया जा सकता है।

दिलचस्प है कि केंद्र सरकार इस कार्रवाई को चेहरा बचाने के मकसद से ही सही अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई बता रही है लेकिन एक निर्वाचित दिल्ली सरकार खुलकर इसे संप्रादायिक बनाने पर उतारू है। आम आदमी पार्टी के इन नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि जब केंद्र की भाजपा सरकार कथित रूप से रोहिंग्याओं को इन इलाकों में बसा रही थी तब वो और उनकी सरकार क्या कर रहे थे?  यह उनके विधानसभा क्षेत्र हैं, ज़ाहिर है वहां के विधायक को इस बात की जानकारी होना चाहिए लेकिन अभी तक इस मसले पर कोई बात नहीं की गयी। अब अचानक इस पूरे मामले में रोहिंग्या मुसलमान कहाँ से आ गए?

हम जानते हैं कि अब दिल्ली सरकार हैसियत लगभग न होने के जैसी है। तीनों नगर निगमों को एक कर दिये जाने के बाद दिल्ली एक महानगर में तब्दील हो गया है। एक अर्द्ध राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को हासिल शक्तियों से ज़्यादा शक्तियां यहां अब एक मेयर को हासिल हो चुकी हैं। 20 अप्रैल को जिस तरह नगर निगम ने इस कार्रवाई को अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए अंजाम दिया उससे बनती हुई दिल्ली का एक नया चेहरा सामने आया है।

डबल इंजन की सरकार भारतीय जनता पार्टी द्वारा ईज़ाद किया एक नया राजनैतिक फार्मूला है। अलग अलग चुनाव चिन्हों की वजह से दिल्ली सरकार और भारतीय जनता पार्टी की केंद्र मौजूद सरकार के बीच यह डबल इंजन का फार्मूला दिल्ली में उस तरह से सक्रियता से काम नहीं कर सका जैसा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आसाम या उत्तराखंड में कर पा रहा है। तीनों नगर निगमों को एक करने और इन्हें दिल्ली विधानसभा से ज़्यादा शक्तियां दे देने के बाद अब दिल्ली के नागरिकों को भी डबल इंजन की सरकार मिल सकी है।

ऐसे एकतरफा कामों और कार्रवाई के लिए डबल इंजन की सरकार बहुत मुफीद है। कल उत्तरी दिल्ली के मेयर इकबाल सिंह के बेबाक बयानों से दिल्ली में इसी डबल इंजन की धमक सुनी जा सकती है।

_______________________

(लेखक लंबे समय से जन आंदोलनों से जुड़े हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)

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Delhi
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