NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अपराध की जाति और धर्म
वास्तव में विकास दुबे का पूरा मामला उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक चरित्र का एक नमूना है। उत्तर प्रदेश का समाज न सिर्फ जातिवादी और सांप्रदायिक है बल्कि वह अपराधियों के प्रति आदर रखने वाला भी है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
10 Jul 2020
विकास दुबे
image courtesy : The Hindu

लखनऊ के एक राजनीतिशास्त्री कहते हैं कि राजनीतिशास्त्र दरअसल अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है। यह मध्यवर्ग का एक छोटा सा हिस्सा है जो नैतिकता और आदर्श की बात करता है। बाकी सब कुछ उपर्युक्त रिश्ते से चलता है। यह बात सुनने में अटपटी लगती है लेकिन उत्तर प्रदेश के गैंगस्टर विकास दुबे से जुड़े हफ्ते भर के घटनाक्रम से प्रमाणित होती है।

विकास दुबे ने जब उसे पकड़ने आई पुलिस पार्टी के आठ अधिकारियों को अपने गांव में क्रूरतापूर्वक मारकर ढेर कर दिया तब से उत्तर प्रदेश के समाज में अपराध और अपराधी को लेकर जातिवादी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं।

सबसे ताजा प्रतिक्रिया लखनऊ के एक बौद्धिक मित्र की है जो ब्राह्मण समाज के युवाओं की भावनाओं को छूने की कोशिश है। वे अपने फेसबुक पर लिखते हैं, `` उत्तर प्रदेश में तीन दिन का लॉकडाउन कोरोना से बचाने के लिए नहीं किया गया है। यह विकास दुबे के `फर्जी इनकाउंटर’ पर उठने वाले विरोध को दबाने के लिए है। मामला ठाकुर बनाम ब्राह्मण बन गया है। सवाल उठ रहा है कि योगी यानी अजय सिंह बिष्ट की सरकार ने चुलबुल सिंह, बृजेश सिंह, विनीत सिंह, राजा कुंडा, अभय सिंह और बृजभूषण सिंह जैसे अपराधी चरित्र के लोगों का क्यों नहीं इनकाउंटर किया। क्यों प्रतापगढ़ में पुलिस अफसर जिया उल हक और बुलंदशहर में सुबोध सिंह की हत्या करने वालों का इनकाउंटर नहीं किया गया। शायद इसलिए कि वे लोग संघ से जुड़े थे।’’

उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है जो सब कुछ कानून और संविधान के अनुरूप किए जाने की मांग कर रहे हैं और इस बात से गुस्सा हैं कि कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ। ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा है जो या तो इस `संदेहास्पद इनकाउंटर’ पर या तो खुशी जता रहे हैं या फिर इसका जातिगत आधार पर विरोध कर रहे हैं।

छह दिन पहले जब विकास के गांव में आठ पुलिस वालों की ड्यूटी पर हत्या हुई थी तब सोशल मीडिया पर सवर्ण समाज और विशेषकर ब्राह्मण बिरादरी के युवा विकास के पक्ष में प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। उनका कहना था कि आखिर पुलिस उसके घर क्या करने गई थी। क्या वह रिश्वत लेने गई थी। जब पुलिस ऐसी हरकतें करेगी तो ऐसे ही होगा। कई लोग तो यह भी कह रहे थे कि क्या पिछड़ी जाति और अल्पसंख्यक बिरादरी के लोगों को ही अपराध करने और गैंगस्टर बनने का हक है? क्या ब्राह्मणों को गैंगस्टर बनने का हक नहीं है?

वास्तव में विकास दुबे का पूरा मामला उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक चरित्र का एक नमूना है। उत्तर प्रदेश का समाज न सिर्फ जातिवादी और सांप्रदायिक है बल्कि वह अपराधियों के प्रति आदर रखने वाला भी है। पिछले दिनों आए दो अपराध धारावाहिक---पाताल लोक और रंगबाज उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति के गठजोड़ और उससे निपटने में लगी पुलिस व्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव को उजागर करते हैं।

इसलिए राजनीति और अपराध के इस रिश्ते को देखने के तीन नजरिए हो सकते हैं। एक नजरिया तो दरोगा का है जो या तो ठोक देने में यकीन करता है या फिर पैसा लेकर छोड़ देने में। दूसरा नजरिया आम आदमी का है जो अपराधी के भीतर अपनी दबी हुई मनोभावों की अभिव्यक्ति पाता है। तीसरा नजरिया एक इतिहासकार और समाजशास्त्री का है जो अपराध को राजनीति के साथ एक क्रम में जोड़कर देखता है। यहीं पर इतिहासकार इरिक हाब्सबाम की 1969 में आई बैंडिट्स किताब प्रासंगिक हो जाती है।

वे कहते हैं कि यह अपराध एक प्रकार का वर्ग संघर्ष है। वे लिखते हैं कि डकैती लोगों के राजनीतिक रूप से जागरूक होने से पहले की अवस्था है। जब वे राजनीतिक रूप से जाग जाते हैं तो वे अपराध से दूर होते जाते हैं। गरीब आदमी जब तक विरोध की राजनीतिक भाषा नहीं सीख पाता तब तक वह अपराध की शरण लेता है। यानी सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन जितने प्रबल और व्यापक होंगे अपराध उतने ही कम होंगे।

हालांकि रंजीत गुहा जैसे सब आल्टर्न इतिहासकार हाब्सबाम के इस नजरिए से पूरी सहमति नहीं जताते। वे कहते हैं कि भारत में आरंभ में जो आदिवासियों के नेतृत्व में किसान आंदोलन हुए और हिंसा हुई उसमें राजनीतिक चेतना थी। इसी तरह इंग्लैंड में 1830 के मजदूर आंदोलन में भी राजनीतिक चेतना थी हालांकि उन लोगों ने थ्रेसिंगग मशीनों को तोड़ा था।

लेकिन इस सैद्धांतिक बहस के बीच उत्तर प्रदेश के गैंगस्टरों की कहानी को देखे जाने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश देश की राजनीतिक आजादी की लड़ाई में भले अगुआ रहा हो लेकिन वह सामाजिक और आर्थिक आजादी की लड़ाई में देश के दक्षिणी प्रांतों की तुलना में पिछड़ा रहा है। वह पूरब से पश्चिम तक एक घनघोर जातिवादी समाज है और हाल के सांप्रदायिक उभार ने उसके कोढ़ में खाज पैदा कर दिया है।

अब उत्तर प्रदेश व्यापक सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक तरक्की को लक्ष्य मानने की बजाय सांप्रदायिक और जातिवादी शक्तियों की राजनीति का अखाड़ा बन चुका है। ऐसे समाज में हिंसक प्रतिरोध का चरण राजनीतिक विरोध में परिवर्तित नहीं हो रहा है। बल्कि अपराध राजनीति का सहोदर हो गया है।

जातिवादी अपराध के सम्मानित होने की अपनी सीमा है। फिर भी जाति अपने में एक बीमा है और वह जाति के नाम पर अपराधियों को एक हैसियत और सम्मान देती है। हालांकि किसी भी जातिवादी गैंग में सारे लोग उसी जाति के हों ऐसा जरूरी नहीं। न ही यह जरूरी है कि किसी जाति के नाम पर गैंग चलाने वाला व्यक्ति विजातीय व्यक्ति को ही निशाना बनाए। अब विकास दुबे को ही लीजिए उसने संतोष शुक्ला से लेकर सीओ मिश्रा तक जिनकी हत्या की है वे सब सजातीय ही हैं।

जातिवादी अपराधी जब सांप्रदायिक रूप से लेता है तो वह और ज्यादा सम्मान का हकदार हो जाता है। उत्तर प्रदेश में यह परिवर्तन तेजी से हुआ है। इससे पहले अगर तमाम डकैत परिवर्तनकारी आंदोलनों से जुड़कर अगर सम्मान हासिल करते थे तो आज तमाम अपराधी राष्ट्रवादी आंदोलन का हिस्सा बनकर हैसियत पा रहे हैं।

विकास दुबे के घटनाक्रम में महाकाल मंदिर का एक मोड़ ऐसा आया जिसमें धार्मिक स्थलों की शक्ति दिखाने की कोशिश की गई। वह शक्ति उस राजनीतिक दल के लिए मुफीद है जो उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सत्ता में बैठी है।

यहां सत्तर और अस्सी के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गैंगस्टर की कहानी प्रासंगिक हो जाती है। वह हत्याएं करने के बाद अपने पुरोहित से यज्ञ और मंत्रों का जाप कराता था। वे पुरोहित तो बूढ़े थे और बाद में चल बसे लेकिन उसी दुष्चक्र में फंस कर उनका बेटा एक बदमाश की गोली का शिकार हो गया।

जाति और संप्रदाय का ढांचा आखिरकार हिंसा और अपराध पर ही टिका होता है। वह जितना हिंसा से दूर होता जाएगा उतना उदार होता जाएगा और अपनी पहचान खोता जाएगा। यही एक लोकतांत्रिक समाज की पहचान है। चूंकि उत्तर प्रदेश सामाजिक लोकतंत्र से निरंतर दूर होता जा रहा है इसलिए उसमें जाति और संप्रदाय की हिंसक प्रवृत्तियां प्रबल हो रही हैं।  

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के सामाजिक--राजनीतिक तालाब का पानी सड़ गया है। वहां ऊंचे आदर्शों के जो भी कमल हैं वे कुम्हलाने लगे हैं। वहां की सफाई न तो पुलिस मुठभेड़ से होने वाली है और न ही अपराधी को जाति और धर्म के आधार पर प्रश्रय देने से। वहां लोकतांत्रिक आंदोलन तेज होना चाहिए और उसी के साथ तेज होनी चाहिए पुलिस सुधार। उसी के साथ होना चाहिए न्यायिक प्रणाली का सम्मान। लेकिन न्यायिक प्रणाली व्यक्तियों पर कार्रवाई करती है। वह भ्रष्ट हो चुकी पूरी की पूरी जाति और संप्रदाय पर कार्रवाई नहीं कर सकती। इसलिए यूपी का समाज बुनियादी परिवर्तन की मांग कर रहा है। उसे जितना रोका जाएगा उतनी ही सड़ांध बढ़ेगी। उतने ही अपराधी पैदा होंगे और उतनी ही बार पुलिस वालों को जान से हाथ धोना पड़ेगा और इस तरह से संदेहास्पद इनकाउंटर का नाटक करना पड़ेगा। फिर लखनऊ से उन राजनीतिशास्त्री की बात सही निकलेगी कि राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है।      

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ लेखक और पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

Vikas Dubey
Vikas Dubey Encounter
UttarPradesh
UP police
Caste
Religion Politics
Communal
Casteist

Related Stories

बदायूं : मुस्लिम युवक के टॉर्चर को लेकर यूपी पुलिस पर फिर उठे सवाल

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

ग्राउंड रिपोर्ट: चंदौली पुलिस की बर्बरता की शिकार निशा यादव की मौत का हिसाब मांग रहे जनवादी संगठन

यूपी में  पुरानी पेंशन बहाली व अन्य मांगों को लेकर राज्य कर्मचारियों का प्रदर्शन

क्या वाकई 'यूपी पुलिस दबिश देने नहीं, बल्कि दबंगई दिखाने जाती है'?

मलियाना नरसंहार के 35 साल, क्या मिल पाया पीड़ितों को इंसाफ?

ख़ान और ज़फ़र के रौशन चेहरे, कालिख़ तो ख़ुद पे पुती है

बिहार में विकास की जाति क्या है? क्या ख़ास जातियों वाले ज़िलों में ही किया जा रहा विकास? 

मनरेगा मज़दूरों के मेहनताने पर आख़िर कौन डाल रहा है डाका?


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License