NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
केंद्रीय मज़दूर संगठन कामगारों की लंबी आम हड़ताल पर कर रहे हैं विचार
कामगार संगठनों का लक्ष्य है कि केंद्र पर श्रम संहिता को वापस लेने का दबाव बनाया जाए, साथ ही मौजूदा किसान आंदोलन के साथ भाईचारा और समर्थन जताया जाए।
रौनक छाबड़ा
30 Dec 2020
केंद्रीय मज़दूर संगठन

नई दिल्ली: एक महीने से राष्ट्रीय राजधानी में किसानों का आंदोलन जारी है, जिससे केंद्र सरकार बुरी तरह हिल चुकी है। अब ट्रेड यूनियन अपना खुद का आंदोलन तेज करने की योजना बना रही हैं, जो कामगारों की श्रम क़ानूनों से संबंधित मांगों को लेकर चल रहा है।

जिस तरह किसान विवादित कृषि विधेयकों का विरोध कर रहे हैं, उसी तरह से कामगार वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली यूनियनों ने सुधार संबंधी नई श्रम संहिता के खिलाफ़ चिंता जताई थी। श्रम सुधारों से संबंधित 4 क़ानूनों में से 3 अभी सितंबर में संपन्न हुए संसदीय सत्र में पारित किए गए हैं, जिन पर किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई। 

केंद्र ने संकेत दिया है कि अगले साल अप्रैल से एक साथ इन चारों क़ानूनों को लागू कर दिया जाएगा। दिल्ली के बाहर, राज्य की सीमा पर हज़ारों की संख्या में इकट्ठे होकर किसान समुदाय ने केंद्र को अपनी समस्याओं का समाधान करने के लिए दबाव में ला दिया है, अब मज़दूर संगठन भी अपनी आंदोलन को तेज करने के लिए कदम उठा रहे हैं, इसके तहत आने वाले दिनों में कामगारों की एक लंबी हड़ताल भी शामिल है।

आने वाले बजट सत्र के दौरान 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने भूख हड़ताल करने का फ़ैसला किया है, ताकि देश के कामगार वर्ग की मांगों को उठाया जा सके। "ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC)" के महासचिव अमरजीत कौर ने न्यूज़़क्लिक को बताया, "अगले साल हम कई दिनों तक हड़ताल करने की योजना बना रहे हैं।"

वह कहती हैं कि इन कार्रवाईयों का मक़सद केंद्र पर श्रम क़ानूनों को वापस लेने का दबाव बनाना होगा। साथ ही हड़ताल के ज़रिए किसानों के आंदोलन का समर्थन किया जाएगा।

कौर के मुताबिक़, जिस तरह किसानों को इस बात की चिंता है कि बिना दावेदारों से बातचीत किए कृषि क़ानूनों को पारित कर दिया गया है, उसी तरह ट्रेड यूनियन भी इस तथ्य को उठा रही हैं कि श्रम क़ानूनों को संहिताबद्ध करने से पहले ठीक ढंग से विमर्श नहीं किया गया। 

कौर कहती हैं, "कामगार संगठन और किसानों के यूनियन कंधे से कंधा मिलाकर केंद्र की नीतियों के खिलाफ़ खड़े हैं। इस साल जब नवंबर में किसानों ने 'दिल्ली चलो' की पुकार की थी, उसी वक़्त कामगारों ने आम हड़ताल की थी।" कौर कहती हैं कि आगे ट्रेड यूनियन जो भी योजनाएं बनाने जा रही हैं, वह मज़दूर-किसान एकता को मजबूत करने के लिए होगा। 

किसानों के प्रदर्शन के बड़े स्थल, जैसे-सिंघु, टिकरी, गाजीपुर, चिल्ला और शाहजहांपुर, यहां बड़ी संख्या में कामगार वर्ग के लोग, खासकर आसपास के औद्योगिक शहरों से आकर कामगार भागीदार बन रहे हैं।

साहिबाबाद इंडस्ट्रियल टॉउन में सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन (CITU) के अध्यक्ष ईश्वर त्यागी कहते हैं "कई कामगारों की 10 से 12 घंटे की रोजाना की शिफ्ट होती है, उसके बाद भी वह हर दिन किसानों के समर्थन में प्रदर्शन स्थल जरूर जाते हैं।" गाजियाबाद में मौजूद साहिबाबाद, गाजीपुर के प्रदर्शन स्थल के पास है, जहां पश्चिमी उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड से आए किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। 

त्यागी आगे कहते हैं, "फैक्ट्रियों में काम करने वाले कई मज़दूर इन्हीं राज्यों से हैं। कई मज़दूरों के रिश्तेदार या पड़ोसी उनकी मूल जगह पर किसानी के काम में लगे हैं। इसलिए मज़ूदरों में उनका समर्थन करने की नैतिक जिम्मेदारी की भावना है। कामगार प्रदर्शन स्थल जाते हैं और वहां किसानों की लंगर सेवा या दूसरी किसी गतिविधि में मदद करते हैं।"

राजस्थान-हरियाणा बॉर्डर पर शाहजहांपुर गांव में भी ऐसी भागीदारी खूब देखी जा रही है। यहां किसानों ने दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेस वे को बंद कर रखा है। संयोग से यह रोड हरियाणा के बावल, मनेसर और राजस्थान के नीमराना जैसे कुछ बड़े औद्योगिक केंद्रों को जोड़ती है। यह सभी आसपास ही स्थित हैं।

इंकलाबी मज़दूर केंद्र के योगेश कुमार कहते हैं कि औद्योगिक केंद्रों के आसपास जहां किसान प्रदर्शन कर रहे हैं, अब वहां अब श्रम क़ानूनों के बुरे प्रभावों पर भी विमर्श होने लगा है।

किसान यूनियनों की चिंता है कि कृषि विधेयक कॉरपोरेट के पक्ष में चीजों को झुका देंगे, ट्रेड यूनियन भी ऐसी ही चिंता श्रम क़ानूनों के संहिताबद्ध करने पर जताती हैं, इस प्रक्रिया में 40 मौजूदा कृषि क़ानूनों का विलय किया जाएगा, जिससे नियोक्ता, मज़ूदरों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए और भी सशक्त होंगे। 

कुमार कहते हैं, "हर सीमा पर हमारे संगठन के सदस्य पर्चे वितरित कर रहे हैं, जिसमें मज़दूरों से जुड़े मुद्दों की चर्चा है।" मनेसर के औद्योगिक कामगारों के बीच खासतौर पर सक्रिय मज़दूर केंद्र ने टिकरी सीमा पर एक बुक स्टॉल भी लगाया है। 

भाईचारा और समर्थन जताने के ऐसे कार्यक्रम ट्रेड यूनियन जारी रख रही हैं, अब उनका मानना है कि किसानों के समानांतर कामगारों का आंदोलन नरेंद्र मोदी सरकार को उसके हालिया फ़ैसलों पर और भी ज़्यादा घेरने का काम करेगा।

CITU हरियाणा के सतबीर सिंह इस विचार से सहमति जताते हुए कहते हैं कि यूनियन की राष्ट्रीय समिति इस दिशा में पहले ही कई आह्वान कर चुकी है।

30 दिसंबर को अपने काम की जगहों पर एक देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आयोजित करने का आह्वान किया गया है। वहीं CITU से जुड़े संघ 7 और 8 जनवरी को जिला स्तर पर अपने सदस्यों की गिरफ़्तारियों देंगे।

सिंह कहते हैं, "फिलहाल जो आंदोलन जारी है, उससे कामगारों की अपने अधिकारों के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाई मजबूत होगी। दूसरी तरफ अब कामगार भी यह समझ चुके हैं कि अगर किसान हारते हैं, तो उनका हारना भी तय है।"

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें। 

Central Trade Unions Mull Over Prolonged General Strike of Workers

Workers rights
Labour Codes
Central Trade Unions
farmers
farmers protest
AITUC
CITU
Narendra modi

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

मुंडका अग्निकांड: 'दोषी मालिक, अधिकारियों को सजा दो'

मुंडका अग्निकांड: ट्रेड यूनियनों का दिल्ली में प्रदर्शन, CM केजरीवाल से की मुआवज़ा बढ़ाने की मांग

झारखंड-बिहार : महंगाई के ख़िलाफ़ सभी वाम दलों ने शुरू किया अभियान

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

आशा कार्यकर्ताओं को मिला 'ग्लोबल हेल्थ लीडर्स अवार्ड’  लेकिन उचित वेतन कब मिलेगा?

हिसारः फसल के नुक़सान के मुआवज़े को लेकर किसानों का धरना

मुंडका अग्निकांड: सरकारी लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रेड यूनियनों ने डिप्टी सीएम सिसोदिया के इस्तीफे की मांग उठाई

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग


बाकी खबरें

  • sedition
    भाषा
    सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह मामलों की कार्यवाही पर लगाई रोक, नई FIR दर्ज नहीं करने का आदेश
    11 May 2022
    पीठ ने कहा कि राजद्रोह के आरोप से संबंधित सभी लंबित मामले, अपील और कार्यवाही को स्थगित रखा जाना चाहिए। अदालतों द्वारा आरोपियों को दी गई राहत जारी रहेगी। उसने आगे कहा कि प्रावधान की वैधता को चुनौती…
  • बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    एम.ओबैद
    बिहार मिड-डे-मीलः सरकार का सुधार केवल काग़ज़ों पर, हक़ से महरूम ग़रीब बच्चे
    11 May 2022
    "ख़ासकर बिहार में बड़ी संख्या में वैसे बच्चे जाते हैं जिनके घरों में खाना उपलब्ध नहीं होता है। उनके लिए कम से कम एक वक्त के खाने का स्कूल ही आसरा है। लेकिन उन्हें ये भी न मिलना बिहार सरकार की विफलता…
  • मार्को फ़र्नांडीज़
    लैटिन अमेरिका को क्यों एक नई विश्व व्यवस्था की ज़रूरत है?
    11 May 2022
    दुनिया यूक्रेन में युद्ध का अंत देखना चाहती है। हालाँकि, नाटो देश यूक्रेन को हथियारों की खेप बढ़ाकर युद्ध को लम्बा खींचना चाहते हैं और इस घोषणा के साथ कि वे "रूस को कमजोर" बनाना चाहते हैं। यूक्रेन
  • assad
    एम. के. भद्रकुमार
    असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की
    11 May 2022
    राष्ट्रपति बशर अल-असद का यह तेहरान दौरा इस बात का संकेत है कि ईरान, सीरिया की भविष्य की रणनीति का मुख्य आधार बना हुआ है।
  • रवि शंकर दुबे
    इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा यूपी में: कबीर और भारतेंदु से लेकर बिस्मिल्लाह तक के आंगन से इकट्ठा की मिट्टी
    11 May 2022
    इप्टा की ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा उत्तर प्रदेश पहुंच चुकी है। प्रदेश के अलग-अलग शहरों में गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मंचन किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License