NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
भारत
राजनीति
डीयूः नियमित प्राचार्य न होने की स्थिति में भर्ती पर रोक; स्टाफ, शिक्षकों में नाराज़गी
दिल्ली विश्वविद्यालय के इस फैसले की शिक्षक समूहों ने तीखी आलोचना करते हुए आरोप लगाया है कि इससे विश्वविद्यालय में भर्ती का संकट और गहरा जाएगा।
रवि कौशल
24 May 2022
DU
चित्र सौजन्य: पीटीआई

दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए कॉलेजों में नियमित प्राचार्यों की अनुपस्थिति में अपने 32 संबद्ध कॉलेजों में शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति पर प्रतिबंध लगा दिया है।

शासी निकायों के अध्यक्षों को संबोधित एक पत्र में, विश्वविद्यालय के सहायक रजिस्ट्रार (कॉलेज) नरेश कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय ने फैसला किया है कि “जब तक नियमित प्रिंसिपल की नियुक्ति तक ऐसे कॉलेज या शिक्षण संस्थान, जिनमें भी कोई कार्यवाहक या स्थानापन्न प्रिंसिपल पद पर हैं, उन-उन संस्थानों में नियमित प्रिंसिपल की नियुक्ति होने तक विश्वविद्यालय के अध्यादेश XVIII के खंड 7(2) के अनुसार शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों पर अनुबंध, तदर्थ या नियमित आधार पर कोई नियुक्ति नहीं की जाएगी।”

पत्र में कहा गया है,“इसलिए, एक बार फिर से विश्वविद्यालय के अध्यादेश XVIII के खंड 7(2) के संदर्भ में कॉलेज के नियमित प्रिंसिपल की नियुक्ति करने के लिए चयन समिति की बैठक बुलाने की त्वरित कार्रवाई करने और इस बीच अनुबंध, तदर्थ, अतिथि और नियमित आधार पर शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों की नियुक्ति के बारे में मामलों पर पकड़ रखने के लिए स्पष्ट रूप से अवगत कराया गया है। यह दोहराया जाता है कि यदि अनुबंध, तदर्थ, अतिथि बतौर या नियमित आधार पर शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों को भरा जाता है, वह नियुक्ति शुरुआत से ही अमान्य मानी जाएगी।”

दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) प्रशासन के इस निर्णय की शिक्षकों के समूहों की तीखी आलोचना की है। इनका आरोप है कि इस रोक की वजह से पिछले दो दशकों से विश्वविद्यालय में जारी भर्ती संकट को और गहरा हो जाएगा। शिक्षक समूहों का अनुमान है कि विश्वविद्यालय में वर्तमान में 4500 संकाय पदों की रिक्तियां हैं, जिन्हें बड़े पैमाने पर तदर्थ शिक्षकों के माध्यम से भरा जा रहा है। इसके अतिरिक्त, यह कदम ओबीसी आरक्षण के तहत सभी स्वीकृत पदों को भरने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों को देखते हुए एक ब्रेकर के रूप में कार्य कर सकता है।

कार्यकारी परिषद की पूर्व सदस्य और डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की सचिव आभा देव हबीब ने न्यूजक्लिक को बताया कि यह कदम कॉलेज की गतिविधियों को पंगु बना सकता है क्योंकि दूसरे सेमेस्टर के पठन-पाठन का काम अभी भी जारी है। उन्होंने कहा, "अतिथि शिक्षकों सहित सभी नियुक्तियों पर एक मुश्त प्रतिबंध लगाना संस्थानों को अपंग करने के ही समान है। यदि किसी कॉलेज को अपने छात्रों को पढ़ाने के लिए सेमेस्टर के बीच ही अतिथि शिक्षकों की आवश्यकता होती है, तो वह इस वैक्यूम को कैसे भरेगा? हालांकि, हमलोग इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि क्या यह प्रतिबंध नई शिक्षा नीति (एनईपी) को लागू करने की गरज से तो नहीं लगाया गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय पहले से ही एनईपी को स्वीकार कर चुका है। ऐसे में विश्वविद्यालय पुराने पाठ्यक्रमों के लिए शिक्षकों की भर्ती क्यों करेगा, जब उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि कई प्रविष्टियों और एक्जिट प्वाइंट्स के साथ नए पाठ्यक्रम शुरू किए जाएंगे। इसलिए, इन भर्तियों पर रोक शिक्षण संस्थानों को पंगु बना सकती है।”

डीयू के इस अचानक लिए गए निर्णय का विश्वविद्यालय के एकेडमिक फॉर एक्शन एंड डेवलपमेंट (एएडी) ने जोरदार विरोध किया है। उसने कहा है कि शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्तियों को रोकना इस सौ वर्षीय विश्वविद्यालय की संघीय प्रकृति, सिद्धांतों, मानदंडों और प्रथाओं के अनुरूप नहीं है।

एएडी कार्यकारी परिषद की सदस्या सीमा दास ने दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर योगेश सिंह को संबोधित एक पत्र में कहा, “डीयू द्वारा भेजे गए उक्त पत्र में उन कॉलेजों में शिक्षण-अधिगम (लर्निंग) प्रक्रिया की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की पूरी क्षमता है, जो पहले से ही स्टाफ की कमी के संकट से रूबरू हैं। प्राचार्यों की स्थाई नियुक्ति में विभिन्न बाहरी कारणों से विलंब की वजह से ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए, जब महाविद्यालयों में अनुदेश प्रदान करने की क्षमता पहले से कमजोर हो। यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि अध्यादेश XVIII-7(3) कहता है कि एक कार्यवाहक या स्थानापन्न प्रिंसिपल ‘प्राचार्य पद पर रिक्ति की स्थिति में’ एक 'प्रिंसिपल के रूप में’ ही कार्य करता है। इसके अनुसार, जब भी किसी पद पर नियुक्ति की आवश्यकता होने पर कार्यवाहक या स्थानापन्न प्राचार्यों को इस मामले को देखने की अनुमति दी जाती है। चूंकि ऐसे प्रिंसिपल नियम और कायदों के मुताबिक प्रिंसिपल के अन्य सभी कर्त्तव्यों का निर्वहन करते ही रहे हैं, लिहाजा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा इस तरह के चुनिंदा प्रतिबंध लगाना अनावश्यक लगता है।”

सीमा दास ने आगे लिखा है, “पत्र (डीयू द्वारा भेजा गया) भी पूर्वव्यापी प्रभाव से नियुक्तियों को रद्द करता है। इस तरह के कदम अनावश्यक रूप से संबंधित कर्मचारियों को दंडित करेंगे, जिसमें शिक्षण कर्मचारी भी शामिल हैं   और जिसमें उनकी कोई गलती नहीं है। इसलिए, 18.5.2022 को भेजे उक्त पत्र पर बगैर हीलाहवाली के फिर से गौर करने की जरूरत है।”

आम आदमी पार्टी समर्थित दिल्ली शिक्षक संघ के अध्यक्ष हंसराज सुमन ने न्यूजक्लिक को बताया कि इस आदेश से ओबीसी आरक्षण की दूसरी बारी में नियुक्ति के लिए उत्सुक एससी/एसटी/ओबीसी पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को काफी निराशा हुई है। यूजीसी, शिक्षा मंत्रालय और संसदीय समितियों ने पहले ही विश्वविद्यालय को भर्ती प्रक्रिया को तेज करने का निर्देश दिया हुआ है।

सुमन ने कहा, “विश्वविद्यालय को शैक्षणिक सत्र 2022-23 की शुरुआत से पहले ओबीसी विस्तार की दूसरी किश्त के तहत रिक्तियों को भरना होगा। इसके अतिरिक्त, हम इस वर्ष मार्च से जुलाई तक कई प्राध्यापक रिटायर हो जाएंगे और यह स्पष्ट नहीं है कि कॉलेज इन सीटों को कैसे भरेंगे। मुझे यह भी आशंका है कि यह 2013 के प्रकरण का दोहराव है, जब विश्वविद्यालय ने एक नए रोस्टर की घोषणा के बाद 27.9.2013 को 1997 के रोस्टर के तहत एससी/एसटी के एक हजार से अधिक पदों को समाप्त कर दिया था।”

ऐसा लगता है कि डीयू प्रशासन के इस नए फरमान से खुद उसके कर्मचारी भी नाराज हैं और उनका कहना है कि यह कदम केवल गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियमित नियुक्तियों में देरी करने के लिए उठाया है। दिल्ली कर्मचारी महासंघ की अध्यक्ष अरुणा कुमार ने न्यूजक्लिक को फोन पर बताया कि यह अभूतपूर्व है कि कार्यवाहक प्राचार्यों को अपने कार्यकाल के दौरान नियमित नियुक्तियां करने से रोका गया। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालय ने एनईपी का विकल्प चुना है और यह वकालत करता है कि कॉलेजों के संचालन के लिए वित्त पोषण एजेंसियों पर कम से कम निर्भरता होनी चाहिए। अगर शिक्षकों की संख्या घटाई गई तो इसका सीधा असर कर्मचारियों पर भी पड़ेगा। हम पहले से ही एक ऐसी स्थिति देख रहे हैं, जहां हमारे अनुबंधित कर्मचारी सेवानिवृत्त होने वाले हैं, और वे सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले लाभ लिए बिना ही अपने घर लौट जाएंगे। विश्वविद्यालय से इस तरह का बर्ताव देखना बेहद क्रूर है।”

दिल्ली यूनिवर्सिटी कॉलेज और कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष देवेंद्र शर्मा ने कहा कि नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी की आशंका के मद्देनजर शासी निकायों को प्रधानाचार्य नियुक्त करना चाहिए। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालय ने शासी निकायों से नियमित प्रधानाचार्य नियुक्त करने को कहा है ताकि जिम्मेदारी तय की जा सके। अदिति महाविद्यालय में गलत नियुक्तियों की खबरें आ रही थीं। विश्वविद्यालय ने पहले ही कॉलेजों को मार्च 2023 तक रिक्तियों को भरने के लिए कहा है। इससे कर्मचारियों पर दबाव कम होगा।”

अंग्रेजी में मूल रूप से लिखे लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें

DU Asks Colleges to Stop Recruitment in Absence of Regular Principals; Teachers Protest

Delhi University
Higher education
Teachers
DUTA

Related Stories

बच्चे नहीं, शिक्षकों का मूल्यांकन करें तो पता चलेगा शिक्षा का स्तर

दिल्ली: दलित प्रोफेसर मामले में SC आयोग का आदेश, DU रजिस्ट्रार व दौलत राम के प्राचार्य के ख़िलाफ़ केस दर्ज

‘धार्मिक भावनाएं’: असहमति की आवाज़ को दबाने का औज़ार

बिहार : सातवें चरण की बहाली शुरू करने की मांग करते हुए अभ्यर्थियों ने सिर मुंडन करवाया

कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट को लेकर छात्रों में असमंजस, शासन-प्रशासन से लगा रहे हैं गुहार

नई शिक्षा नीति का ख़ामियाज़ा पीढ़ियाँ भुगतेंगी - अंबर हबीब

यूजीसी का फ़रमान, हमें मंज़ूर नहीं, बोले DU के छात्र, शिक्षक

नई शिक्षा नीति ‘वर्ण व्यवस्था की बहाली सुनिश्चित करती है' 

शिक्षाविदों का कहना है कि यूजीसी का मसौदा ढांचा अनुसंधान के लिए विनाशकारी साबित होगा

बिहार : सीटेट-बीटेट पास अभ्यर्थी सातवें चरण की बहाली को लेकर करेंगे आंदोलन


बाकी खबरें

  • bollywood
    न्यूज़क्लिक टीम
    बॉलीवुड के 3 खान: मोदी के भारत में हीरो से विलन?
    28 Nov 2021
    किसी ज़माने में कहा जाता था कि बॉलीवुड और क्रिकेट भारत के दो मज़हब हैं, ये दोनों लोगों को जोड़ने का काम करते हैंI लेकिन हाल के सालों में इन दोनों पर ही सांप्रदायिकता का साया पड़ गया हैI चाहे वो…
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : "वह मुसलमानों से डरता था..."
    28 Nov 2021
    गुरुग्राम में पिछले 3 महीनों से अलग-अलग हिंदुत्ववादी संगठनों ने जुमे की नमाज़ में ख़लल डालने का काम किया है। उनके इस शर्मनाक हंगामे को ध्यान में रखिये और पढ़िये निखिल सचान की यह कविता...
  • jewar airport
    प्रशांत सिंह
    जेवर एयरपोर्ट; जश्न और हक़ीक़त: कोई विस्थापित ग्रामीणों का भी दुख पूछे
    28 Nov 2021
    जेवर एयरपोर्ट के शिलान्यास के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए दावों के उलट है विस्थापित ग्रामीणों की कहानी। न पूरा मुआवजा मिला, न घर का सहारा। न ही पीने के पानी की व्यवस्था है और न पूरी बिजली…
  • cartoon
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    सरकार-जी की तपस्या में भला क्या कमी!
    28 Nov 2021
    सरकार जी भी तपस्या कर रहे थे, यह हमें तभी पता चला जब सरकार जी ने खुद हमें बताया कि शायद तपस्या में कमी रह गई है। अन्यथा हमें तो यह ही पता था कि सरकार जी तो अपने राजमहल में मशरूम खा रहे हैं और आराम…
  • govt employee
    अनिल जैन
    निजीकरण की आंच में झुलस रहे सरकारी कर्मचारियों के लिए भी सबक़ है यह किसान आंदोलन
    28 Nov 2021
    किसानों की यह जीत रेलवे, दूरसंचार, बैंक, बीमा आदि तमाम सार्वजनिक और संगठित क्षेत्र के उन कामगार संगठनों के लिए एक शानदार नज़ीर और सबक़ है, जो प्रतिरोध की भाषा तो खूब बोलते हैं लेकिन कॉरपोरेट से लड़ने…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License