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भारत
राजनीति
दिल्ली चुनाव : भाजपा ने इसे मोदी और संघ की विचारधारा पर जनमत-संग्रह में बदल दिया है
भाजपा ने अपने अभियान में दिल्ली की जनता के ज़हन में भरने यह भरने में लगी है कि भारत का संघी दृष्टिकोण क्या है और मोदी सरकार ने उसे कैसे लागू किया है।
सुबोध वर्मा
08 Feb 2020
Translated by महेश कुमार
BJP-RSS

दिल्ली विधानसभा के लिए कटु और भड़काऊ चुनाव प्रचार के अंतिम दिन, दिल्ली के कई इलाक़ों के  घरों में दैनिक अख़बार की तह में लिपटा एक पर्चा मिला जिसमें केजरीवाल को मुस्लिम टोपी पहने हुए दिखाया गया है और वे नमाज़ अदा कर रहे हैं। ख़बरों के अनुसार, इसे किसी "मुस्लिम" द्वारा जारी किया गया है। दिल्ली में भाजपा के ज़मीनी अभियान का यह ख़ास हिस्सा है जिसमें न केवल केजरीवाल को "देशद्रोहियों" के साथ खड़ा दिखाया जा रहा है बल्कि पूरे समुदाय को बलात्कारी और ठग के रूप में पेश किया जा रहा है। इसके दूसरी तरफ़ लोकसभा में, बीजेपी के एक युवा और उभरते सितारे ने कहा कि अगर आज देशभक्त भारतीय शाहीन बाग़ के ख़िलाफ़ खड़े नहीं होते हैं, तो दिल्ली में "मुग़ल राज की वापसी के दिन बहुत दूर नहीं हैं।" और एक अन्य मंत्री, गिरिराज सिंह ने कहा कि शाहीन बाग़ में  "आत्मघाती हमलावरों के जत्थे तैयार किए जा रहे है।"

यह सब अतुल्य और भयंकर लग सकता है लेकिन पिछले दो हफ़्तों से दिल्ली के हतप्रभ निवासियों को यही सब तेज़ी से परोसा जा रहा है। इस बारे में बहुत कुछ लिखा गया है कि कैसे अपने शानदार चुनाव रणनीतिकारों के साथ अजेय भाजपा को एक केंद्र शासित प्रदेश को जीतने के लिए इतना क्यों गिरना पड़ रहा है फिर भले ही वह राजधानी ही क्यों न हो। लेकिन, इसका एक और पहलू है, जो चुनावी रणनीतियों की नज़रों से परे है।

दो विचारों की लड़ाई 

भाजपा के दूसरे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति और गृह मंत्री अमित शाह ने ख़ुद ही इस लड़ाई को दो विचारधाराओं के बीच की चुनावी लड़ाई करार देकर दांव को ऊंचा कर दिया है। उन्होंने निश्चित रूप से इसे उन लोगों के बीच एक लड़ाई बना दिया जिन्होंने पाकिस्तान को उनकी मांद में हरा दिया/हमला किया, और वे लोग जो आज शाहीन बाग़ के साथ खड़े हैं।

उनके कहने का मतलब यह है: कि भाजपा ने आक्रामक हिंदूवाद के नाम की पहचान को काफ़ी अच्छे ढंग से दुश्मन पाकिस्तान पर हमला करके प्रदर्शित किया है, जबकि ‘आप’ और कांग्रेस शाहीन बाग़ में सीएए/एनआरसी के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध का समर्थन कर रहे हैं, जिसे विभिन्न तरीक़ों से देशद्रोहियों के गढ़ के रूप वर्णित किया गया है (ज़्यादातर मुस्लिम महिलाएं), और दिल्ली के ही एक सांसद परवेश वर्मा ने कहा की ये लोग आपके घरों में घुसेंगे और आपकी बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे और आपका क़त्ल कर देंगे, और शाहीन बाग़ को आत्मघाती हमलावरों का एक केंद्र करार दिया। उनके अनुसार, भाजपा हिंदुओं की आत्मा है, और ‘आप’ हिंदुओं की दुश्मन है, और मुसलमानों की आत्मा।

आरएसएस की यह सोच, शुद्ध और बेमेल है। वे भारत को हिंदुओं की धरती और अल्पसंख्यकों को देशद्रोही के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि हिंदू ताक़त और उनकी एकता ही आगे बढ़ने का रास्ता है। और मोदी सरकार, ख़ासकर अपने दूसरे कार्यकाल में, संघ की पुरानी ख़ुराक पर है। दूरगामी बदलावों की एक श्रृंखला ये दिखाती हैं कि वे सभी आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित हैं – इस विचारधारा के तहत ही: धारा 370, तीन तलाक़, सीएए और एनआरसी को लाया गया है। उन्हें लगता है कि उन्हें जो जनादेश मिला है वह हिंदू राष्ट्र के लिए है!

लेकिन दिल्ली चुनाव में, भाजपा/आरएसएस को एक ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ा जिसकी उन्होंने उम्मीद नहीं की थी। दिल्ली में एक ऐसी सरकार है जिसके पास सीमित ताक़त है, और वह अपने द्वारा किए गए विभिन्न और विविध कल्याणकारी उपायों के कारण बहुत लोकप्रिय है। यह सरकार काफ़ी हद तक ईमानदार और साफ सुथरी भी दिखाई देती है। इसे लोगों के साथ चलने वाली सरकार के रूप में देखा जाता है न कि बड़ी अमीर (सुपर-रिच) क्रोनियों के साथ चलने वाली माना जाता है।

भाजपा/आरएसएस ने सोचा था कि उनकी अहंकारी और अंधकारवादी हिंदुत्व पर आधारित अस्पष्ट अपील इस सारे लोकलुभावनवाद को धो देगी क्योंकि उनकी सोच के अनुसार ये मध्ययुगीन विचार आर्थिक संकट और सब्ज़ियों की क़ीमतों के नीरस मुद्दों से बेहतर हैं। वे इसी तरह की समझ से देश के आर्थिक संकट से निबटने की कोशिश कर रहे हैं, उन्होंने सोचा कि यह सोच दिल्ली में भी काम आ जाएगी।

इस समझ ने न तो देश के बाक़ी हिस्सों में काम किया है, न ही यह दिल्ली में काम कर रही है। दिसंबर 2018 से भाजपा ने कई राज्यों में अपनी सरकारों को खो दिया है। उन्हे आरएसएस से प्रेरित नीतियों के ख़िलाफ़ देश भर में मुखर और निरंतर विरोधों का सामना करना पड़ रहा है। इसे श्रमिकों और किसानों की बड़ी हड़तालों का सामना करना पड़ा है। फिर भी उन्हें लगता है कि कुछ “देशद्रोही” लोगों को “गुमराह” कर रहे हैं। वरना सब कुछ ठीक है!

यह संघ के विचारों पर जनमतसंग्रह है 

इस प्रकार दिल्ली चुनाव को दोहरे जनमत संग्रह में बदल दिया गया है। एक ओर, मोदी और उनकी सरकार द्वारा लागू की गई आरएसएस की विचारधारा है। दूसरी तरफ लोगों के कल्याण का विरोधी विचार है। यह विरोधी विचार पूर्ण रूप से विकसित विचारधारा नहीं है और न ही ये किसी भी तरह से सबसे अच्छा विचार है जिसका सहारा लिया गया है। लेकिन जो है सो है।

इसके साथ, दिल्ली चुनाव, चुनावों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना बन जाती है। बीजेपी की हार, जो साफ़ तौर पर नज़र आ रही है, वह इस विचार को मानने से इनकार करती है कि हिंदू-मुस्लिम विरोधाभास और पाकिस्तान देश के शीर्ष मुद्दे हैं। भाजपा की हार समाज में कलह और हिंसा पैदा करने वाले आग लगाने के प्रयासों की अस्वीकृति भी होगी। यह न केवल समुदायों के बीच सामंजस्य स्थापित करेगी, बल्कि भविष्य में हर दृष्टिकोण में लोगों के कल्याण की सर्वोच्चता पर ज़ोर देगी। 

11 फ़रवरी को वोटों की गिनती के साथ ही अमित शाह द्वारा लगाए गए दांव और उनके सवालों का जवाब दिया जाएगा। पूरे देश को नतीजों का इंतज़ार रहेगा।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Delhi Elections: BJP Made This Into Referendum on Modi & RSS Ideology

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