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भारत
राजनीति
दिल्ली ने नफ़रत को नामंज़ूर किया!
दिल्ली का पूरा चुनाव बीजेपी ने व्यक्ति के तौर पर अमित शाह के नाम पर और राजनीति के तौर पर नफ़रत के सहारे लड़ा, लेकिन इन दोनों को ही दिल्ली वालों ने नकार दिया।
मुकुल सरल
11 Feb 2020
Amit Shah
Image courtesy: Twitter

दिल्ली चुनाव में जीते तो केजरीवाल हैं, लेकिन हारा कौन? निश्चित तौर पर बीजेपी। लेकिन बीजेपी में भी कौन? वही जिसके नाम पर पूरा चुनाव लड़ा गया और वह एक नाम है अमित शाह।

जी हां, आप इस ग़लतफहमी में मत रहना कि इस चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी या नये नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की हार हुई है। या फिर किसी और उम्मीदवार की हार हुई है। जिस तरह अब गोदी मीडिया साबित करना चाहता है। जिसने सुबह से अपने बीजी-स्टिंग में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चेहरे की बजाय मनोज तिवारी और जेपी नड्डा का चेहरा लगाना शुरू कर दिया। जबकि इससे पहले वही मीडिया अमित शाह को चुनाव का चाणक्य और न जाने क्या-क्या नाम से पुकार रहा था। इस चुनाव में वही चाणक्य धड़ाम से गिर गए।

दिल्ली का पूरा चुनाव बीजेपी ने व्यक्ति के तौर पर अमित शाह के नाम पर लड़ा और राजनीति के तौर पर नफ़रत की राजनीति के सहारे लड़ा लेकिन इन दोनों की ही इस चुनाव में हार हुई है।

वास्तव में अगर इस चुनाव में बीजेपी जीतती तो उसका सारा श्रेय अमित शाह और उनकी रणनीति को ही जाता। यह पहली बार था कि देश के किसी भी राज्य के चुनाव की तरह पोस्टर पर चेहरा तो दिल्ली में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया गया लेकिन चुनाव वास्तव में गृहमंत्री अमित शाह लड़ रहे थे। यही अमित शाह पहली बार दिल्ली की सड़कों पर खुद पर्चा बांटने उतरे। पहली बार उन्होंने खुद को पूरी तरह दांव पर लगाया और 70 सीटों के लिए करीब 60 छोटी-बड़ी सभाएं कीं। उन्होंने ही नारा दिया कि ईवीएम का बटन इतनी ज़ोर से दबना चाहिए कि करंट शाहीन बाग़ तक पहुंचे। हर सभा में उन्होंने इसे दोहराया। लेकिन हुआ इसके उलट करंट शाहीन बाग की बजाय प्रधानमंत्री निवास और गृहमंत्री निवास पर पहुंच गया।

व्यक्ति के तौर पर दिल्ली ने गृहमंत्री अमित शाह को नामंज़ूर किया और राजनीति के तौर पर नफ़रत की राजनीति को नकार दिया।

AMIT SHAH CAA.jpg

अमित शाह का जलवा या ख़ौफ़ उसी दिन टूट गया जब लाजपत नगर में दो लड़कियों ने उनके सामने सीएए के विरोध में बैनर लहरा दिया था। अमित शाह के मुख्य सिपाहसलारों के तौर पर सांसद और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर, सांसद प्रवेश वर्मा, तेजिन्दर पाल सिंह बग्गा, कपिल मिश्रा मैदान में उतरे और एक से बढ़कर एक नफ़रती बयान दिए। नफ़रत की राजनीति जिसमें न सिर्फ गोली मारों के नारे लगाए गए, बल्कि गोली मारने के लिए भी लोग सड़कों पर उतारे गए। जिन्होंने कभी जामिया और कभी शाहीन बाग़ में तमंचे लहराए और गोलियां दागी। इससे पहले जेएनयू हमला और चुनाव से ऐन पहले गार्गी कॉलेज में यौन हमला। ये सब एक ख़ास राजनीति और रणनीति के तहत ही हुआ। 8 तारीख़ चुनाव के दिन को हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बीच मुकाबला बना दिया गया लेकिन दिल्ली वालों ने सबको नकार दिया। 

हां, जिताया उसने हिन्दुस्तान को ही, लेकिन अमित शाह या कपिल मिश्रा के नफ़रती हिन्दुस्तान को नहीं बल्कि शाहीन बाग़ वाले विविधता और प्यार भरे हिन्दुस्तान को। जहां आज भी इस देश और इसके लोकतंत्र और संविधान को बचाने की जद्दोजहद जारी है। शाहीन बाग इस चुनाव का एक मुख्य मुद्दा था और इस तरह इस वोट को सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ भी वोट कहा जा सकता है। हालांकि मैं इसे सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ जनादेश कहने में अभी थोड़ी सी सतर्कता बरतूंगा, लेकिन इतना तय है कि बीजेपी भी सीएए या एनआरसी के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण नहीं कर पाई यानी लोगों ने इस मुद्दे को उसके हिन्दू-मुसलमान एजेंडे के तौर पर स्वीकार नहीं किया जैसा बीजेपी चाहती थी।

इस तरह वास्तव में यह चुनाव काम बनाम सांप्रदायिकता के बीच हुआ, जिसमें निश्चित तौर पर सांप्रदायिकता की हार हुई। लेकिन कुछ पत्रकार और चैनल अब इसे “मुफ्त में हारी बीजेपी?” का नाम दे रहे हैं। यह वही कथित पत्रकार और चैनल हैं जो एग्ज़िट पोल में ही आम आदमी पार्टी की जीत देखकर बौखला गए थे और सियापा करने लगे थे। इन लोगों ने दिल्ली की जनता की समझदारी पर ही सवाल उठा दिए थे और उसे आलसी, शराबी और मुफ़्तख़ोर तक बता दिया था यही पत्रकार अब रिजल्ट आने पर ये बता रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की बिजली-पानी की मुफ्त योजनाओं की वजह से बीजेपी हार गई।

लेकिन ये लोग भूल गए कि बीजेपी ने तो स्कूटी तक मुफ्त में देने का ऐलान कर दिया था। और इसके अलावा किसी भी लोक कल्याणकारी राज्य में बिजली-पानी, शिक्षा-स्वास्थ्य मुफ्त या कम से कम दामों में उपलब्ध कराना मुफ्तखोरी नहीं बल्कि जनता का हक़ और सरकारों की ड्यूटी है। 

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