NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
फिल्में
कला
रंगमंच
संगीत
एकतारा कलेक्टिव : प्रतिरोधी सिनेमा का निर्माण, एक समय में एक फ़िल्म
सिनेमा लम्बे समय से निश्चित वर्गों और जातियों से निर्देशित होता रहा था, जिसने मुख्यधारा के नैरेटिव और सौंदर्यशास्त्र को एक स्वरूप प्रदान किया।
एकतारा कलेक्टिव, मुकुलिका आर
13 Dec 2020
एकतारा कलेक्टिव

केरल के ‘ओडेसा’ ग्रुप के अनुरूप और फ़िल्म एवं टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के ‘युक्त फ़िल्म कोऑपरेटिव’, एकतारा कलेक्टिव भी भारतीय फ़िल्मकारों का एक समूह है, जो प्रतिरोध के सिनेमा को बनाने और उसका निर्माण करने के एक सामूहिक लक्ष्य के लिए एक साथ जुटे हैं। एकतारा की पहली फीचर फ़िल्म, ‘तुरूप,’ भोपाल में नेबरहुड चेस टूर्नामेंट को देश की मौजूदा सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं, खासकर क्षेत्र में बढ़ते दक्षिणपंथी कट्टरता, को एक रूपक के रूप में इस्तेमाल करता है। अभी तक इसे कई फ़िल्म समारोहों में दिखाया जा चुका है और इसे भारत के विकसित होते देशज और प्रतिरोधी सिनेमा के विशेष संस्करण के रूप में मान्यता मिली है।

‘होटल राहगीर’ एकतारा की नई फ़िल्म प्रस्तुति है, जो इसी महीने रिलीज होने वाली है।  इसका ट्रेलर अक्टूबर में सामूहिक और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर रिलीज की गई थी,  जिसके कुछ ही दिनों के भीतर अपने चुभते संवादों और बहुपक्षीय मसलों को संस्पर्शित करने की वजह से बड़ी संख्या में दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जैसा कि इस इंटरव्यू में कहा गया है,  इस फ़िल्म का निर्माण युवाओं के लिए हाल ही में आयोजित नवोदित अभिनेताओं और फ़िल्मकारों के वर्कशॉप के दौरान किया गया है, जिसमें ये अप्रशिक्षित प्रतिभागी अपने दिल से जुड़े विचारों और कहानियों पर घोर मंथन किया। आगे की बातचीत में  इकतारा कहता है, “रेलवे स्टेशन की कैंटीन के सेट पर ‘होटल राहगीर’ मौजूदा समय की एक टिप्पणी और प्रतिक्रिया के रूप में काम करती है।”

मुकुलिका आर (एमआर) : नई विचारोत्तेजक फ़िल्म के लिए आपको बहुत-बहुत बधाइयां।  आप हमें ‘होटल राहगीर’ के बारे में सब कुछ बताएं।

एकतारा कलेक्टिव  (ईसी) : ‘होटल राहगीर’ हमारी बिल्कुल नई फ़िल्म है,  जिसे एक साझा प्रक्रिया द्वारा बनाया गया है।  हम  उम्मीद करते हैं कि यह दिसंबर के दूसरे हफ्ते में रिलीज हो जाएगी।  एकतारा ने सिनेमा बनाने के विभिन्न आयामों- पटकथा,  अभिनय,  प्रकाश, ध्वनि, निर्माण, कला-निर्देशन और संपादन से संबंधित एक कार्यशाला का आयोजन किया था। इसमें हरेक क्षेत्र के महारथियों ने प्रतिभागियों को प्रशिक्षित किया था। हरेक क्षेत्र के लोगों ने इन कार्यशालाओं में हिस्सा लिया था,  तो यह फ़िल्म निर्माण का  प्रारंभिक बिंदु था। अंततोगत्वा, ‘होटल राहगीर’ की पटकथा कार्यशाला के दौरान साझा की गईं अनेकानेक कहानियां के एक समुच्चय के रूप में सामने आई। अभिनय पर आधारित कार्यशाला में भाग लेने वालों में तमाम युवा अभिनेता थे। रेलवे स्टेशन की कैंटीन में लगाया गया सेट यह समकालीन समयों की एक टिप्पणी और प्रतिबिंब के रूप में काम करता है।

एमआर:  वैश्विक महामारी कोरोना के प्रकोप के समय इस फ़िल्म के निर्माण का  आपका अनुभव कैसा रहा?

ईसी:  ‘होटल राहगीर’ की शूटिंग महामारी के फैलने से पहले ही कर ली गई थी, लेकिन फ़िल्म निर्माण के बाद के ज्यादातर अधूरे काम लॉकडाउन के दौरान ही किये गए। वैश्विक महामारी ने हम सभी के सामने लॉजिस्टिक चुनौतियों को दरपेश किया है।  विशेषकर हम अपने फ़िल्म संपादक के साथ संपादन के बारे में विचार विमर्श और मौके पर ही उन सुझावों-सुधारों  पर अमल करने का काम  दो-चार दिनों से ज्यादा नहीं कर सकते थे।   फिल्मों में किसी काट छांट  और किसी टिप्पणी को ऑनलाइन ही साझा करना पड़ता था।  संपादन का काम करने के लिए प्रत्येक के साथ बैंडविथ की सीमा और एक प्रतिबद्ध  स्लॉट का अभाव हम लोगों के लिए वास्तव में चुनौतीपूर्ण था।  यद्यपि हमने किसी तरह इसके सभी पक्षों का काम पूरा कर लिया, भले ही इसमें कुछ दिनों की देरी हो गई। हम यही उम्मीद करते हैं कि हमारी नई फ़िल्म  के निर्माण के समय बहुत कुछ पहले की तरह “सामान्य” हो जाएगा।

एमआर:  जैसा कि हम समझते हैं कि ‘चंदा के जूठे1’,  ‘जादुई मच्ची’, और ‘तुरूप’ के बाद कलेक्टिव की  यह चौथी फ़िल्म है। तो फिल्मों के निर्माण की अब तक की यात्रा कैसी रही?

ईसी:  कहानियों के लिहाज से सभी चारों फिल्में एक दूसरे से अलग हैं।  लेकिन उन्हें बनाने की  हमारी प्रक्रिया और टीम में एक सामान्यता है,  जो संख्या के साथ  विकसित  होती जा रही है और प्रत्येक फ़िल्म के साथ निर्माण कौशल में वृद्धि हो रही है।  इसके अलावा,  सामूहिकता के साथ काम करने की हमारी समझदारी भी बढ़ती जा रही है, इस तरह कि वहां ऊर्जा ज्यादा और दुविधा  कम है और जो है. वह भी हमारे प्रत्येक फ़िल्म निर्माण के साथ खत्म भी होती जा रही है। फ़िल्म निर्माण शिल्प के प्रति भी हमारी समझदारी बढ़ रही है और इस तरह हमारा आत्मविश्वास भी।

एमआर:  इस सामूहिक संस्था का निर्माण किस तरह से हुआ?

ईसी: जब अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों ने जब यह अनुभव किया कि  उन्हें  अपनी कहानियों को कहने के लिए एक साझा मंच पर आने की जरूरत है, जिन्हें वह सुनाना-दिखाना चाहते हैं।  हम महसूस करते थे कि हमारी कहानियां मुख्यधारा  सिनेमा  से गायब हो रही थीं,  जो हमारी वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं  करता थीं।  तो हम लोग फिक्शन फ़िल्म बनाने के लिए एक जगह जमा हुए, जो हमारी कहानियां कहेंगी।

एमआर:  जैसा कि हम समझते हैं कलेक्टिव के सदस्यों के बीच बड़ी भौगोलिक भिन्नताएं हैं।  ऐसे में, हम यह जानने के लिए काफी उत्सुक हैं कि आप इन अंतरों के बावजूद किस तरह से काम कर पाते हैं?

ईसी :  कलेक्टिव के कई सदस्य  भोपाल  और मध्य प्रदेश के विभिन्न इलाकों से  आते हैं।  बाकी अन्य सदस्य देश के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं।  प्रत्येक फ़िल्म बनाने के पहले हम अपने सदस्यों से उन कहानियों को साझा करने के लिए कहते हैं, जिस पर कोई व्यक्ति यह अनुभव करता है कि इस पर अगली फ़िल्म बनाई जानी चाहिए।  हम सभी उन कहानियों को पढ़ने की कोशिश करते हैं, उन पर अपनी राय देते हैं और तब पटकथा लेखन की शुरुआत होती है- जिसके कई रूपांतरण होते हैं। ( ‘होटल राहगीर’ में इससे भिन्न तरीका अपनाया गया था।  पटकथा लेखन के लिए आयोजित कार्यशाला में आए लोगों के साझा प्रयास से इसकी पटकथा तैयार की गई थी)। फ़िल्म के लोकेशन के बारे में विचार किया गया और जो कोई भी इसकी टोह लेने जा सकता था, वह वहां चला जाता। एक बार जब  फ़िल्म निर्माण की तारीखें पक्की हो गईं, हम सभी ने  अपनी यात्रा प्लान  बना लिया।  अभी तक हमारी सभी फिल्मों के लोकेशन भोपाल और इसके आसपास ही रहे हैं।  वास्तविक रुप से शूटिंग शुरू होने से पहले हम लोग आपस में मिल बैठते रहे हैं, जहां सुधार-संशोधनों और ब्योरों के बारे में चर्चा की जाती थी। एक बार जब शूटिंग खत्म हो गई तो अधिकतर लोग अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं। फ़िल्म निर्माण के बाद जरूरत के मुताबिक लोग परस्पर मिलते हैं या कुछ जगहों की यात्रा करते हैं। फिर हम मिल-बैठकर फ़िल्म की रिलीज की तारीख और जगह तय करते हैं। आमतौर पर हम यह कोशिश करते हैं फ़िल्म की पहली पब्लिक स्क्रीनिंग के मौके पर पूरी टीम इकट्ठी रहे।

एमआर:  हम विश्वास करते हैं कि भारत के देशज और प्रतिरोधी सिनेमा परिदृश्यों में कलेक्टिव एक गंभीर और परिणामदायक हस्तक्षेप कर रहा है। अपने देश में इस तरह के सिनेमा की स्थिति के बारे में आपका क्या विचार है?

ईसी:  हम जानते हैं कि स्वतंत्र फ़िल्म निर्माण और कई ऐसी नई पहलें सिनेमा में कई नई आवाजों और संदर्भों को सामने ला रही हैं।  सिनेमा भी इससे काफी समृद्ध हो रहा है।  लंबे समय तक सिनेमा निश्चित वर्गों और जातियों  से नियंत्रित होता था, जिसमें  मुख्यधारा  के सिनेमा के नैरेटिव और सौंदर्यशास्त्र को गढ़ने का काम किया।  विषय वस्तु और विभिन्न आवाजों के परिदृश्य, जिन्हें संसाधनों के अभाव में अब तक हमसे दूर रखा गया  था, वे उन कहानियां के प्रकार और कहने के तरीकों में बदलाव लाएंगे। जैसा कि हम सभी खोज रहे हैं और इन फिल्मों के अपने श्रोता और दर्शक भी मिल रहे हैं।

एकतारा कलेक्टिव एक स्वतंत्र, स्वायत्त, गैर वित्त पोषित लोगों का समूह है, जो   प्रशिक्षित- अप्रशिक्षित लोगों के साथ फिल्में बनाने में साझा सृजनशील प्रयासों और कल्पनाओं  और समन्वय की मांग करते हैं। एकतारा म्यूजिक वीडियो भी बनाता है और इंग्लिश फिल्मों एवं अन्य भाषाओं में बनी फिल्मों को हिंदी में डब करने का काम करता है।

मुकुलिका आर भारतीय संस्कृति फोरम, नई दिल्ली में कलेक्टिव एडिटोरियल की सदस्य हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Ektara Collective: Building Resistance, One Film a Time

indian cinema
Indian Cultural Forum
Ektara Collection
Pandemic
Indian art

Related Stories

ओटीटी से जगी थी आशा, लेकिन यह छोटे फिल्मकारों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा: गिरीश कसारावल्ली

फ़िल्म निर्माताओं की ज़िम्मेदारी इतिहास के प्रति है—द कश्मीर फ़ाइल्स पर जाने-माने निर्देशक श्याम बेनेगल

"लव स्टोरी": महज़ एक प्रेम कथा नहीं?

भारतीय सिनेमा के एक युग का अंत : नहीं रहे हमारे शहज़ादे सलीम, नहीं रहे दिलीप कुमार

हीरक राजार देशे :  एक अभिशप्त देश की कहानी


बाकी खबरें

  • protest
    न्यूज़क्लिक टीम
    लखीमपुर खीरी: दिल्ली में भी उठी न्याय के लिए आवाज़
    04 Oct 2021
    उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का विरोध करने पर किसानों पर हुए जानलेवा हमले के ख़िलाफ़ आज दिल्ली स्थित यूपी भवन पर दिल्ली के छात्र ,नौजवान और महिला संगठन के लोगो ने रोष प्रदर्शन किया…
  • Protest
    मुकुंद झा
    लखीमपुर नरसंहार : कई राज्यों में विरोध के बाद झुकी सरकार, मुआवज़े का दिया आश्वासन
    04 Oct 2021
    दिनभर के विरोध प्रदर्शनों के बाद आख़िरकार किसानों की मांग के आगे सरकार झुकी और दोनों पक्षों में समझौता हुआ, जिसमें धारा 302 और 120B के तहत मंत्री के लड़के के ऊपर एफ़आईआर दर्ज की गई है। मृत किसानों को…
  • bhasha
    भाषा सिंह
    लखीमपुरः योगी राज के लिए दावानल बन सकती है किसानों की मौत
    04 Oct 2021
    बात बोलेगी: हिंसा और प्रतिशोध और वह भी अपने ही देश के नागरिकों के प्रति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतिपादित नये भारत का नया नार्मल होता जा रहा है। ऐसा लगता है सरकारों ने अपने लोगों-नागरिकों…
  • agriculture
    रूबी सरकार
    खेती- किसानी में व्यापारियों के पक्ष में लिए जा रहे निर्णय 
    04 Oct 2021
    खाद की किल्लत से किसानों की परेशानी बढ़ रही है। सरकार ने गेहूं ख़रीद पर 40 रुपए समर्थन मूल्य बढ़ाकर खाद की क़ीमत क़रीब दोगुनी कर दी है।
  • Taxes
    न्यूज़क्लिक टीम
    पैंडोरा पेपर्स लीक: कैसे अमीर और ताकतवर टैक्स से बचते हैं
    04 Oct 2021
    सचिन तेंदुलकर, अनिल अम्बानी , किरण मजूमदार , इक़बाल मिर्ची , इमरान खान, टोनी ब्लेयर- इन सबसे में क्या समानता है ? इन सभी का नाम हाल ही में हुए पैंडोरा पेपर्स लीक में आया है। ऑनिंद्यो चक्रवर्ती और…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License