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सबको जाननी चाहिए यह कहानी: बेगूसराय के लोगों ने कैसे शुरू किया था श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में राहत अभियान
"हम लोग पैसे वाले नहीं हैं, लेकिन इतना जानते हैं कि भूखों को खाना और प्यासों को पानी पिलाना चाहिए। हमने उस रात को भी यही किया।"
उमेश कुमार राय
03 Jun 2020
 Everyone should know this story: how the people of Begusarai started relief operations in labor special trains
श्रमिक स्पेशल ट्रेन में खाने-पीने का सामान बांटते स्थानीय लोग।

मिज़ोरम के मुख्यमंत्री जोरामथंगा ने 30 मई को एक वीडियो ट्वीट कर बेगूसराय के लोगों को शुक्रिया कहा। उन्होंने ट्वीट में लिखा,"लॉकडाउन में फंसे मिजोरम के नागरिकों की तरफ से बाढ़ प्रभावितों को ट्रेन से खाना देने के कुछ दिन बाद एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के बेगूसराय में रुकने पर बिहार के नेकदिल नागरिकों ने ट्रेन यात्रियों को भोजन मुहैया कराया! अच्छे काम के एवज में अच्छा काम। बेपनाह मोहब्बत से भरपूर भारत बहुत खूबसूरत है।"

सीएम ने जो वीडियो ट्वीट किया था, वो श्रमिक स्पेशल ट्रेन के यात्रियों ने ही बनाया था और ट्विटर पर डाल दिया था। वीडियो में खाने से भरी टोकरियां, फल व अन्य सामान लिए लोग ट्रेन की तरफ दौड़ते दिखते हैं और ट्रेन के करीब जाकर खिड़कियों से खाना, फल, पानी आदि पैसेंजरों को दे रहे हैं

 ये वीडियो वायरल हुआ, तो उस जगह की शिनाख्त शुरू हुई और पता चला कि बेगूसराय में लछमिनिया और बरौनी स्टेशनों के बीच कस्बा नाम के गांव के करीब ये ट्रेन रुकी थी। ट्रेन रुकी, तो गांव वाले खाने-पीने का सामान और पानी लेकर दौड़ते-भागते पहुंचे और खिड़कियों से यात्रियों को खाने का सामान दिया था।

 

न्यूजक्लिक ने कस्बा गांव के लोगों से संपर्क किया, तो एक अलग और दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई। हुआ यों कि 22 मई की रात करीब 11 बजे कस्बा गांव से एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन गुज़र रही थी। गांव से कुछ आगे शाहपुर कमाल में रेलवे का कुछ काम चल रहा था, तो ट्रेन आधे-पौन घंटे के लिए गांव में ही रोक दी गई। वो ट्रेन विलंब से चल रही थी और ट्रेन में सवार लोगों के पास न तो खाना बचा था, न पानी। ट्रेन जब रुकी, तो यात्रियों को रेलवे लाइन से बमुश्किल 50 कदम दूर एक घर और वहां बल्ब टिमटिमाता दिखा। फिर क्या था, कुछ लोग ट्रेन से उतरे और उस घर में पहुंच गए। उन्होंने दरवाजा खटखटाया और पानी देने की गुजारिश की।
 

 ये घर 55 वर्षीया सबुन्निसा का है। इतनी रात को दरवाजा पीटने से वह पहले तो डर गईं, लेकिन लोगों की गुहार सुन उन्होंने दरवाजा खोला, तो देखा कि 8-10 जर्द पड़े मायूस चेहरे उन्हें उम्मीद से देख रहे हैं। सबुन्निसा फोन पर कहती हैं, "उन लोगों ने कहा कि वे 4-5 दिनों से भूखे हैं और मेरे पास अगर खाना-पीना बचा है, तो मैं उन्हें दूं। उनकी बातें सुनकर हमसे रहा न गया। मैं, मेरी बहू और बेटे ने बाल्टी भर-भर पानी दिया और घर में खाने का जो भी सामान था, उन्हें दिया।"

"उस वक्त हमारा रोज़ा चल रहा था, इसलिए घर में फरही, चूड़ा, दालमोट आदि ज्यादा मात्रा में रखा था। सब उनमें बांट दिया। कोरोनावायरस के संक्रमण का भी डर था, तो हम लोग पानी और खाने का सामान एक जगह रख दिया था। लोग ज़रूरत के हिसाब उठा ले रहे थे। कई यात्रियों ने शर्ट खोलकर उसी में चूड़ा, फरही रख लिया", उन्होंने कहा।

सबुन्निसा के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा परदेस में रहता है और छोटा बेटा गांव में ही रहकर रिक्शा चलाता है। वह कहती हैं, "हमलोग पैसे वाले नहीं हैं, लेकिन इतना जानते हैं कि भूखों को खाना और प्यासों को पानी पिलाना चाहिए। हमने उस रात को भी यही किया।"

सुबह हुई, तो रात की घटना की खबर पूरे गांव में फ़ैल गई। इसके बाद गांव के लोग अपनी क्षमता के हिसाब से खाने-पीने का सामान लेकर पहुंचने लगे और जो भी ट्रेन रुकती थी, उनमें सवार यात्रियों में बांटने लगे। ये बात धीरे-धीरे पड़ोस के गांव हुसैना और सालेहचक तक पहुंच गयी व इस तरह एक अभियान ही शुरू हो गया।

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गौरतलब हो कि केंद्र सरकार 1 मई से अलग-अलग राज्यों में फंसे मजदूरों को उनके गृह राज्य भेजने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चला रही है। अभी तक लगभग 4000 श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से तकरीबन 56 लाख प्रवासी मजदूरों और कामगारों को उनके गृह राज्यों तक पहुंचाया जा चुका है। 

लेकिन, इन ट्रेनों में यात्रियों के खाने पीने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं रही। और तो और ट्रेनें गंतव्य से भटक कर अन्यत्र भी चली गईं।

अब तक 40 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें  गंतव्य स्टेशन की जगह कहीं और पहुंच गईं। वहीं, श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में अब तक 80 लोगों की मौत हो चुकी है। अव्यवस्था का आलम ये है कि पैसेंजर, ट्रेन के टॉयलेट का पानी पीने को विवश हो रहे हैं।

 बरौनी और कटिहार रेलवे स्टेशन पर तो पिछले दिनों भूखे प्यासे मजदूरों ने खाने-पीने के सामान के लिए छीना-झपटी भी कर ली थी। ऐसे में स्थानीय लोगों की मदद इन मज़दूरों के लिए वरदान बनकर आई। 

हालांकि, बरौनी में कुछ दिन पहले एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन में खाना बांटने पर प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी, जिस कारण इन गांवों के लोग भी डरे हुए थे।इसलिए वे राहत अभियान की कोई फ़ोटो या वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने से बच रहे थे,जिस वीडियो को मिज़ोरम के सीएम ने शेयर किया था, वो वीडियो शुक्रवार, 29 मई का है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, ट्रेन जब रुकी, तो वे लोग दौड़ कर वहां पहुंचे। कोई तरबूज बांट रहा था,  कोई रोटी और कोई सूखा भोजन दे रहा था। पहले तो यात्रियों को लगा कि वे लोग सामान बेच रहे हैं, इसलिए लेने से इनकार करने लगे। सबुन्निसा के छोटे बेटे नदीम ने फोन पर बताया, "हमलोगों ने समझाया कि ये सब फ्री है, तब वे खाना लेने को तैयार हुए।" 

स्थानीय निवासी और मुखिया पति फ़ैज़-उर-रहमान बताते हैं, "पूरा अभियान स्थानीय लोगों की स्वत:स्फूर्त मदद से चला। लोग खुद अपने घर से रोटी-सब्जी बनकर लाते थे और श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का इंतज़ार करते थे। कुछ लोग चूड़ा लेकर आ जाते थे, तो कोई पानी का पाउच ले आता था। रोज़ाना करीब 2000 लोगों के खाने लायक खाना ट्रेनों में बंटता था। खाना मिलने पर वे लोग कृतज्ञता व्यक्त करते थे।"

दिल्ली, उत्तर प्रदेश व अन्य क्षेत्रों से नार्थ ईस्ट व नार्थ बंगाल जाने वाली ट्रेनों का ये अहम रूट है, इसलिए इस रूट से ज्यादा ट्रेनें चलीं। अब तक इन गांवों के लोग करीब 50 ट्रेनों में खाने-पीने का सामान पहुंचा चुके हैं।

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शनिवार को कूचबिहार जा रही एक ट्रेन जब गांव में रुकी, तो पता चला कि एक बच्चे ने दो दिनों से दूध नहीं पिया है और वह कमजोर हो गया है। सबुन्निसा ने कहा, "बच्चे को तत्काल ट्रेन से उतारा गया और मेरे पास आधा लीटर दूध था, वो उसे दे दिया। बच्चे को दूध पिलाया गया, तो उसके शरीर में फुर्ती आई।"

फ़ैज़-उर-रहमान कहते हैं, " हमें नहीं पता था कि यहां के आमलोगों के इस प्रयास को इतनी सराहना मिलेगी। हम लोग इंसानियत के नाते ही ये सब कर रहे थे। हमें किसी तरह का प्रचार नहीं चाहिए था, इसलिए हमलोग कोई फ़ोटो वगैरह भी नहीं ले रहे थे।"

पिछले तीन दिनों से गांव के लोग ट्रेनों में खाना नहीं बांट पा रहे हैं, क्योंकि अब ट्रेनों का आना कम हो गया है, रविवार को सिर्फ़ 69 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें ही चलीं। दूसरी वजह ये है कि शाहपुर कमाल के पास रेलवे का जो काम चल रहा था, वो संभवतः खत्म हो चुका है, जिस कारण जो भी ट्रेनें चल रही हैं, वे वहां ठहर नहीं रही हैं। 

फ़ैज़-उर रहमान ने कहा, "रविवार को तो काफ़ी खाना बर्बाद हो गया था। हमलोग खाना लेकर ट्रेन का इंतजार करने लगे, लेकिन ट्रेनें रुकी नहीं। इसके बावजूद हमारी तैयारी है और अगर ट्रेन यहां रुकेगी तो हम पैसेंजरों की मदद करेंगे।"

हरियाणा से पूर्वोत्तर के लिए खुली एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन 24 मई को पटना के दानापुर जंक्शन पर पहुंची थी, तो स्थानीय लोगों ने ट्रेन में तोड़फोड़ की थी। पूर्वोत्तर के लोगों का आरोप था कि कोरोनावायरस के संक्रमण के ख़तरे के मद्देनजर जब स्थानीय पैसेंजरों को ट्रेन में सवार होने से रोका गया, तो उन लोगों ने ट्रेन में तोड़फोड़ शुरू कर दी थी ।इस घटना से पूर्वोत्तर में बिहार की छवि खराब हुई थी  उम्मीद की जानी चाहिए कि बेगूसराय के लोगों की सदाशयता से बिहार की छवि बदलेगी।

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